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कांग्रेस के नये नेतृत्व और नयी टीम की खनक

ललित गर्ग

कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने के बाद राहुल गांधी पार्टी के भीतर बड़े परिवर्तन कर रहे हैं. भाजपा के कांग्रेस मुक्त भारत के नारे बीच कांग्रेस की दिनों दिन जनमत पर ढ़ीली होती पकड़ एवं पार्टी के भीतर भी निराशा के कोहरे को हटाने के लिये ऐसे ही बड़े परिवर्तनों की आवश्यकता है. एक सशक्त लोकतंत्र के लिये भी यह जरूरी है. परिवर्तन के बारे में एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि यह संक्रामक होता है. जिससे कोई भी पूर्ण रूप से भिज्ञ नहीं है, न पार्टी के भीतर के लोग और न ही आम जनता. हालांकि यह मौन चलता है, पर हर सीमा को पार कर मनुष्यों के दिमागों में घुस जाता है. जितना बड़ा परिवर्तन उतनी बड़ी प्रतिध्वनि.

राहुल गांधी ने पार्टी के पुराने और अनुभवी नेता अशोक गहलोत को महासचिव के रूप में संगठन और प्रशिक्षण का प्रभारी बनाकर पार्टी के भीतर ऐसी ही परिवर्तन की बड़ी प्रतिध्वनि की है, जिसके दूरगामी परिणाम पार्टी को नया जीवन एवं नई ऊर्जा देंगे. जिसने न सिर्फ कांग्रेस पार्टी के वातावरण की फिजां को बदला है, अपितु राहुल गांधी के प्रति आमजनता के चिन्तन के फलसफे को भी बदल दिया है. “रुको, झांको और बदलो”- राहुल गांधी की इस नई सोच ने पार्टी के भीतर एक नये परिवेश को एवं एक नये उत्साह को प्रतिष्ठित किया है, जिसके निश्चित ही दूरगामी परिणाम सामने आयेंगे.

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Sanjeevani

राहुल गांधी ने पिछले दिनों पार्टी के पूर्ण अधिवेशन में संकेत दिया था कि वह संगठन को नया रूप देंगे और युवा चेहरों को सामने लाएंगे. अभी नई कार्यसमिति तो नहीं बनी है, लेकिन जो थोड़े बदलाव हुए हैं वे भी बहुत महत्वपूर्ण हैं. उनके द्वारा किये जा रहे परिवर्तन दूरदर्शितापूर्ण होने के साथ-साथ पार्टी की बिखरी शक्तियों को संगठित करने एवं आम जनता में इस सबसे पूरानी पार्टी के लिये विश्वास अर्जित  करने में प्रभावी भूमिका का निर्वाह करेंगे. सर्वविदित है कि नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस के एकछत्र साम्राज्य को ध्वस्त किया है. इस साम्राज्य का पुनर्निर्माण राहुल गांधी के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती है. अशोक गहलोत को महासचिव के रूप नियुक्ति देकर उन्होंने इस चुनौती की धार को कम करने की दिशा में चरणन्यास किया है.

अशोक गहलोत पार्टी के कद्दावर के नेता हैं. हाल ही गुजरात प्रभारी के रूप में वे गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी के मुख्य रणनीतिकार की भूमिका में थे. जिससे भाजपा के पसीने छूट गये थे. उससे पहले उन्होंने पंजाब चुनाव में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. जहां कांग्रेस को जीत हासिल हुई. अब इस नई जिम्मेदारी ने साफ कर दिया कि वह पुराने दौर के उन कुछेक चेहरों में शामिल हैं जिन्हें नए नेतृत्व का पूरा भरोसा हासिल है. गहलोत की नयी पारी एवं जिम्मेदारी के भी सुखद परिणाम आये तो कोई आश्चर्य नहीं है. इस फैसले का दूसरा पहलू यह है कि राजस्थान विधानसभा चुनावों से पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का रास्ता साफ हो गया. गहलोत चूंकि राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा मोर्चा संभालने वाले हैं, इसलिए राज्य में पायलट को इसी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में स्वतंत्र होकर काम करने का अवसर मिलेगा. भले ही गहलोत ने प्रदेश पार्टी से दूर होने की बात को नकारा हो. उन्होंने अपने एक बयान में कहा भी है कि राजस्थान से उन्हें बहुत प्यार मिला है. इस कारण वे राजस्थान से दूर होने की बात सोच भी नहीं सकते. उनकी इस बात से कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मानना है कि राजस्थान की राजनीति में उनका पूरा दखल रहेगा. यह दखल रहना अच्छी बात है लेकिन इससे पार्टी में बिखराव या द्वंद्व की स्थिति बनना खतरनाक हो सकता है.

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अशोक गहलोत पार्टी सीनियर लीडर हैं, उनके पास 36 साल का राजनीतिक अनुभव है. वे एक ऊर्जावान, युवाओं को प्रेरित करने वाले, कुशल नेतृत्व देने वाले और कुशल प्रशासक के रूप में प्रदेश कांग्रेस के जननायक हैं. वे प्रभावी राजनायक हैं, जबकि न तो वे किसी प्रभावशाली जाति से हैं, न ही किसी प्रभावशाली जाति से उनका नाता है, न ही वे दून स्कूल में पढ़े हैं. वे कोई कुशल वक्ता भी नहीं हैं. वे सीधा-सादा खादी का लिबास पहनते हैं और रेल से सफर करना पसंद करते हैं. सन् 1982 में जब वे दिल्ली में राज्य मंत्री पद की शपथ लेने तिपहिया ऑटोरिक्शा में सवार होकर राष्ट्रपति भवन पहुंचे तो सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोक लिया था. मगर तब किसी ने सोचा नहीं था कि जोधपुर से पहली बार सांसद चुन कर आया ये शख्स सियासत का इतना लम्बा सफर तय करेगा. लम्बी राजनैतिक यात्रा में तपे हुए गहलोत अपनी सादगी एवं राजनीतिक जिजीविषा के कारण चर्चित रहे हैं और उन्होंने सफलता के नये-नये कीर्तिमान स्थापित किये हैं. सचमुच वे कार्यकर्ताओं के नेता हैं और नेताओं में कार्यकर्ता. उनकी सादगी, विनम्रता, दीन दुखियारों की रहनुमाई और पार्टी के प्रति वफादारी ही उनकी पूंजी है. भले ही विरोधियों की नजर में वे एक औसत दर्जे के नेता हैं जो सियासी पैंतरेबाजी में माहिर हैं.

गहलोत का पार्टी में इस महत्वपूर्ण एवं जिम्मेदारीपूर्ण पद पर आना सांकेतिक रूप से पार्टी की कमान सोनिया के करीबियों के हाथों से राहुल के करीबियों के हाथों में आने की घोषणा है. गहलोत न केवल राहुल के नजदीक माने जाते हैं बल्कि पिछले कुछ समय से पार्टी में महत्वपूर्ण मोर्चे संभालते रहे हैं. अब इस नई जिम्मेदारी ने साफ कर दिया कि वह पुराने दौर के उन कुछेक चेहरों में शामिल हैं जिन्हें नए नेतृत्व का पूरा भरोसा हासिल है.

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इस फैसले का दूसरा पहलू यह है कि राजस्थान विधानसभा चुनावों से पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का रास्ता साफ हो गया. पायलट भी उन युवा नेताओं में शामिल रहे हैं जो राहुल के खास करीबी माने जाते हैं. ये ऐसे बदलाव हैं जो देश के साथ-साथ देश के सबसे बड़े राज्य यानी राजस्थान की राजनीति पर भी गहरा असर डालेंगे. ऐसे ही दो अन्य युवा नेता जितेंद्र सिंह और राजीव सातव क्रमशः गुजरात और ओडिशा के प्रभारी बनाए गए हैं. पार्टी अध्यक्ष ने इसी सप्ताह गुजरात प्रदेश कांग्रेस समिति का अध्यक्ष युवा चेहरे और चार बार से विधायक रहे अमित चावड़ा को बनाया है. उन्हें भरत सिंह सोलंकी की जगह यह जिम्मेदारी सौंपी गई है. कांग्रेस अध्यक्ष ने अखिल भारतीय कांग्रेस सेवा दल के मुख्य संयोजक पद पर लालजी देसाई को नियुक्त किया है. उन्हें महेन्द्र जोशी की जगह यह जिम्मेदारी दी गई है. गुजरात के ही आदिवासी क्षेत्र छोटा उदयपुर के प्रभावी नेता नारायण भाई राठवा को राज्यसभा में भेजकर आदिवासी समुदाय पर अपनी पकड़ को मजबूत बनाया गया है.

राहुल गांधी की अध्यक्षीय शुरुआत के इन बदलावों में वे दोनों सूत्र साफ-साफ पहचाने जा सकते हैं जिनकी घोषणा उन्होंने अपने पहले अध्यक्षीय भाषण में की थी. उन्होंने कहा था कि पुराने नेताओं की प्रतिष्ठा कायम रहेगी और नए युवा चेहरों को कमान सौंपी जाएंगी. लेकिन राहुल गांधी को या उनकी इस नई टीम को यह ध्यान में रखना होगा कि उनके सामने चुनौती बड़ी है और अत्यधिक कठिन है. इन्हें जमीनी स्तर पर संगठन को दोबारा खड़ा करने का भगीरथ प्रयत्न करना है और राह में आने वाले चुनाव भी जीतते चलने हैं ताकि आम कार्यकर्ताओं का मनोबल न टूट जाए. इस दोहरी चुनौती से निपटना बच्चों का खेल नहीं होगा. कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी खोयी प्रतिष्ठा का प्राप्त करना भी है.

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