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कह दे सरकार कि पारित आदेश निरर्थक हैं और उसे कचरे के डिब्बे में डाल दिया गया है – सुप्रीम कोर्ट

New Delhi : देश की शीर्ष अदालत ने निर्माण क्षेत्र के श्रमिकों के कल्याण से संबंधित एक कानून को लागू नहीं करने के लिए केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगायी. सरकार के रवैये से खासे नाराज नजर आ रहे न्यायालय ने उससे कहा कि वह औपचारिक रूप से यह कह दें कि इस मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेशों को ‘कूड़ेदान में फेंक दिया है’.

New Delhi : देश की शीर्ष अदालत ने निर्माण क्षेत्र के श्रमिकों के कल्याण से संबंधित एक कानून को लागू नहीं करने के लिए केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगायी. सरकार के रवैये से खासे नाराज नजर आ रहे न्यायालय ने उससे कहा कि वह औपचारिक रूप से यह कह दें कि इस मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेशों को कूड़ेदान में फेंक दिया है.

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अदालत ने  मामले में केंद्र के रवैये पर सवाल खड़ा किया

शीर्ष अदालत ने इस मामले में केंद्र के रवैये पर सवाल खड़ा किया और कहा कि उसे देखते हुये यह स्पष्ट है कि भवन व अन्य निर्माण श्रमिक (रोजगार नियमन व सेवा शर्त) कानून-1996 का किसी भी तरह कार्यान्वयन नहीं किया जा सकता. न्यायालय ने इसे पूरी तरह असहाय वाली स्थितिबताया और कहा कि अगर सरकार इतनी गंभीर नहीं है तो हमें बताए. आप जो कर रहे हैं कि आप धन संग्रह कर रहे हैं. लेकिन इसे निर्माण श्रमिकों को दे नहीं रहे, जिनके लिए इसे जुटाया जा रहा है. इस कानून के तहत उपकर के रूप में 37,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि संग्रहित की गई है. नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (कैग) ने इससे पहले एक हल्फनामे में न्यायालय को सूचित किया था कि निर्माण श्रमिकों के कल्याण को लक्षित धन को लैपटाप व वाशिंग मशीन खरीदने के लिए खर्च किया जा रहा है.

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न्यायाधीश मदन बी लोकूर व न्यायाधीश दीपक गुप्ता की पीठ ने अतिरिक्त ​सोलीसिटर जनरल (एएसजी) मनिंदर सिंह से कहा कि आप सही बात क्यों नहीं करते, हमें बताइए. साथ ही कोर्ट ने कहा कि आप एक हल्फनामा दाखिल कीजिये कि इस मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेश निरर्थक हैं और उसे कचरे के डिब्बे में डाल दिया गया है, इसलिए अब कोई आदेश जारी नहीं करें. न्यायालय ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए उक्त टिप्पणी की. इस याचिका में कहा गया है कि निर्माण श्रमिकों के कल्याण के लिए रीयल एस्टेट कंपनियों पर लगाए गए सांविधिक उपकर से जुटी राशि का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा है, क्योंकि ऐसी कोई प्रणाली ही नहीं है जिनसे उचित लाभान्वितों को चिन्हित किया जा सके.

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जब अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल ने पीठ को निगरानी समिति की हालिया बैठक के बारे में बताया तो न्यायालय ने कहा कि सरकार का रवैया तो इस बैठक के ब्यौरे को देखकर ही पता चलता है. अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल ने न्यायालय को बताया कि कानून के कार्यान्वयन का केंद्रीयकरण किया जाना है, क्योंकि राज्यों की इस मामले में अपनी अलग राय है. 

याचिकाकर्ता एनजीओ नेशनल कैंपेन कमि​टी फोर सेंट्रल लेजीसलेशन ऑन कंस्ट्रक्शन लेबर की ओर से वरिष्ठ वकील कोलिन गोंजालवेस ने कहा कि इन मुद्दों पर विचार के लिए हाल ही में बुलाई गई बैठक दो घंटे से भी कम समय में खत्म हो गई और इसमें कुछ उल्लेखनीय नहीं हुआ. इस पर पीठ ने उनसे कहा कि बैठक और इसके ब्यौरे से यह स्पष्ट है कि कानून को लागू नहीं किया जा सकता.

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