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कश्मीर में 13 आतंकियों के सफाये पर तिलमिलाए फारुख अब्दुल्ला,  अफरीदी के बयान का किया समर्थन

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Murli Manohar Mishra  

जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन ऑल आउट के तहत जिस रफ्तार से आतंकियों का सफाया हो रहा है, उससे पाकिस्तान सरकार, उसकी सेना और उसके पाले हुए आतंकी संगठनों की बौखलाहट तो समझी जा सकती है, लेकिन कश्मीर में कई बार सीएम पद पर रह चुके फारुख अब्दुला बार बार आतंकियों की मौत पर झल्लाहट प्रकट कर आखिर किसको और क्या संदेश देना चाहते हैं, ये सियासी गलियों में चर्चा का विषय है. काफी मशक्कत के बावजूद सत्ता से दूर रहने के दर्द ने फारुख अब्दुल्ला को क्या इतना मजबूर कर दिया है कि वे आतंक के खिलाफ भारत की कार्रवाई को पाकिस्तान के चश्मे से देखने लगे हैं, जिसकी तह में उस वोटबैंक को अपने पक्ष में करने की बेचैनी है, जो अलगाववादियों, और पाकिस्तान के इशारों पर नाचता है.

अफरीदी के ट्वीट का फारुख ने किया समर्थन

फारुख के दिल में उमड़ी आतंकियों के प्रति हमदर्दी एक बार फिर तब प्रकट हुई, जब उन्होंने 13 आतंकियों के सफाये के बाद पाक क्रिकेटर शाहिद अफरीदी द्वारा मारे गए आतंकियों को निर्दोष बताने वाले बयान का समर्थन करते हुए कहा, कश्मीर में हो रहीं हत्याओं की हर तरफ निंदा हो रही है.

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ट्विटर पर हुई अफरीदी की फजीहत

वहीं, फिल्म निर्माता मधुर भंडारकर ने अफरीदी के इस बयान को बेहूदा बताया, जबकि क्रिकेटर गौतम गंभीर ने भी अफरीदी के बयान पर तंज कसते हुए कहा, अफरीदी पर क्या कहूं, अफरीदी यूएन की तरफ देख रहे हैं, जबकि उनकी डिक्शनरी में यूएन का मतलब अंडर- 19 है, जो कि उनका एज ब्रैकेट भी है. मीडिया को अफरीदी को गंभीरता से लेने की जरुरत नहीं है. वे नो बॉल पर विकेट मिलने का जश्न मना रहे हैं.”

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सेना की कार्रवाई से आतंकी भयभीत, समर्थक बेचैन
गौरतलब है कि सेना ने रविवार को कश्मीर के शोपियां और अनंतनाग में तीन अलग-अलग जगहों पर एनकाउंटर में 13 आतंकियों को मार गिराया था, जिसे सैन्य अधिकारियों ने शहीद उमर फैयाज की हत्या का बदला भी करार दिया था.  सैन्य सूत्रों के मुताबिक, शोपियां और अनंतनाग में कई आतंकी अमरनाथ यात्रा, सुरक्षाबलों और राजनेताओं पर हमलों की साजिशें रचने के लिए बैठक करने पहुंचे थे. लेकिन वक्त रहते सेना ने उनके मनसूबों को नाकाम कर दिया. इन आतंकियों के मारे जाने के बाद से ही पूरी घाटी में स्थिति नाजुक बनी हुई है. विरोध प्रदर्शन कर रहे लोग पुलिस और सेना पर पत्थरबाजी भी कर रहे हैं. ऐसे हालात में जहां आतंकियों का मनोबल तोड़ने की जरूरत है, वहीं कुछ नेता कश्मीर की वादियों में खौफ भरने वालों की हिमायत में उतरे हुए हैं. उनमें फारुख अब्दुल्ला ज्यादा मुखर दिख रहे हैं. फारुख के बयानों पर गौर करें तो वे इससे पहले भी कई बार आतंकियों से हमदर्दी और पाक प्रेम का कार्ड खेलकर सत्ता में आ चुके हैं. यह संभव लगता है कि कश्मीर घाटी के वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए फारुख सोच समझकर बयानबाजी कर रहे हैं, ताकि अगली बार चुनाव में इसका माइलेज मिल सके. मगर उससे भी बड़ा सवाल है कि क्या सत्ता की लालसा देशहित से बड़ी होती है ?

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