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कबूतरा समाज की नई पीढ़ी लिख रही बदलाव की इबारत

झांसी, 16 जनवरी | बुंदेलखंड में कबूतरा और कंजर समाज की पहचान जरायम पेशा अर्थात अपराध करने वाले समाज के रूप में है, लेकिन इस समाज की नई पीढ़ी इस बदनुमा दाग से मुक्त होना चाहती है और इसके लिए उसने कदम भी बढ़ा दिए हैं। यही कारण है कि कच्ची शराब का केन थामने वाले हाथों में इन दिनों किताबें नजर आने लगी हैं और उनकी जुबान से अंग्रेजी की वर्णमाला सुनाई देने लगी है।

बुंदेलखंड में कबूतरा व कंजर समाज को सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता। उनके डेरे गांव से बाहर बने हैं और आम लोग वहां नहीं जाते। इन डेरों में सिर्फ पुलिस जाती है।

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झांसी से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित परवई गांव में है कबूतरा समाज का डेरा, जिसे दातार नगर के नाम से जाना जाता है। इस डेरे में लगभग 200 परिवार रहते हैं। इन परिवारों के पास लगभग 400 एकड़ जमीन है। उनकी आमदनी का जरिया खेती के साथ-साथ अवैध शराब का कारोबार भी रहा है। लेकिन नई पीढ़ी इससे मुक्त होना चाहती है।

लगभग एक दशक पहले महेंद्र मनोरिया ने इसकी कोशिश शुरू की थी। उन्होंने बच्चों को पढ़ाने पर जोर दिया। आज इस गांव के करीब 200 बच्चे शहर के अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में पढ़ने जाते हैं। बकौल महेंद्र, “आज बच्चे पढ़-लिखकर नौकरी करना चाहते हैं, लेकिन आर्थिक स्थिति से लेकर सरकार की नीतियां आड़े आती हैं। यदि इस समाज को सुविधाएं मिल जाए तो हालात बदल सकते हैं।”

इस गांव के नरेंद्र सिंह मनोरिया इस समय वकालत की पढ़ाई कर रहे हैं। उन्होंने इस पर अफसोस जताया कि समाज में उनकी पहचान अवैध शराब बनाने वाले की है। साथ ही उन्होंने कहा कि कम उम्र में बच्चों का विवाह इस जाति की एक बड़ी समस्या है। स्वयं उनकी शादी कम उम्र में हुई है। लेकिन अपने बच्चों के साथ वह ऐसा नहीं करेंगे और उनकी पढ़ाई पर खास ध्यान देंगे।

उन्होंने यह भी कहा कि इस समाज के लोगों का नजरिया धीरे-धीरे बदल रहा है। पहले जहां अधिकतर लोग शराब के कारोबार में शामिल और नशे के आदी थे, वहीं अब इसमें कमी आई है। नई पीढ़ी शराब नहीं पीती। यहां तक कि उसे तम्बाकू से भी परहेज है। हर युवा अपना और अपने बच्चों का बेहतर भविष्य बनाना चाहता है।

गांव का ही जसविंदर नौवीं का छात्र है। उसने आठवीं की परीक्षा 84 फीसदी अंकों के साथ पास की थी। वह इंजीनियर बनना चाहता है। उसकी इच्छा है कि वह नौकरी करे और गांव के अन्य बच्चे भी ऐसा ही करें। सुनील कुमार सहकारिता विभाग में नौकरी करने लगे हैं। 12वीं में पढ़ने वाला रूपेश भी इंजीनियरिंग करके नौकरी करना चाहता है।
– संदीप पौराणिक

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