न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें
bharat_electronics

ऐदलहातू गांवः ढूंढने से भी नहीं मिलते खतियानी रैयत, खतरे में आदिवासियों का अस्तित्व

59

Pravin Kumar

mi banner add

Ranchi, 10 December : ऐदलहातू एक समय पुराना मुंडा गांव हुआ करता था, जिसके मूल बाशिंदे मुंडा आदिवासी समुदाय के लोग थे. आज हालात ऐसी बन गयी है कि पूरे गांव में खतियानी मूल बाशिंदों को बस्ती में ढूंढना भी मुश्किल हो गया है. एदलहातू में भी पूरे छोटानागपुर की तरह सीएनटी एक्ट की धज्जियां उड़ायी गयी है. यहां भी आदिवासी जमीन गैर आदिवासियों के पास चली गयी. बता दें कि आदिवासियों के जमीन संरक्षण वाला यह कानून वर्ष 1908 में लागू किया गया था. इसके बाद भी कई आदिवासी किसी न किसी मजबूरी से अपनी जगह जमीन खोते चले गये. या ये कहें कि उनकी जमीन लुटती चली गयी.

ऐदलहातू मुंडा भाषा परिवार का शब्द है. ऐदल का अर्थ सेमल का वृक्ष होता है, वहीं हातू का मतलब गांव होता है. जानकार बताते हैं कि एक समय ऐदलहातू में बहुत सारे सेमल के पेड़ हुआ करते थे. जिसके कारण इस बस्ती का नाम ऐदलहातू पड़ा. रांची शहर के आस-पास कई पुरानी बस्तियां बसी हुई हैं, जिसमें एक प्रमुख बस्ती के रूप में ऐदलहातू है.

इसे भी पढ़ें- राजधानी में खत्म होता आदिवासी मुहल्ला-एक : 1970 में चडरी में थे सात टोले, अब बन गया झोपड़पट्टी (देखें वीडियो)

ऐशो-आराम की लत के कारण बिकती चली गयी जमीन

बस्ती की जानकारी साझा करते हुए बुर्जुग बताते हैं कि इस गांव में अधिकांश जमीन मुंडा समुदाय की हुआ करती थी. मुंडा समुदाय जमींदार की तरह जीते थे. समुदाय के पुरूष काफी रंगीन मिजाज के हुआ करते थे. वे नृत्य, गीत और खान-पान के शौकीन थे. छउ नृत्य से लेकर नचनी का नाच एदलहातू में आयोजित की जाती थी. मुंडा समुदाय ने इसी क्रम में अपनी जमीन को धीरे-धीरे दूसरे समुदाय के हाथ बेचना शुरु कर दिया. और आज हालात ऐसे हैं कि उनके पास नाममात्र की जमीन शेष रह गयी. बाद के समय में इस बस्ती में उरांव परिवार रहने आए जो मूलतः पास के भीठा गांव के थे. आज इनकी चौथी पीढ़ी के चार पांच परिवार ही रहते हैं.

उन्नीसवीं सदी की शुरूआत में मुंडाओं द्वारा कई जमीन मुस्लिम समुदाय को हस्तांतरित की गयी. हस्तांतरित करने का मुख्य कारण व्यवसायियों से सामग्री व धन उधार लेना और फिर उसे ना चुका पाने की स्थिति में अपनी जमीन गैर आदिवासियों के नाम करना था.

1910 में कपड़ा व्यवसायी मो. बक्स आये थे रहने 

सबसे पुराने मुस्लिम परिवार के सदस्य मोहम्मद अमानुल्लाह बताते हैं हमारे परदादा कपड़ा व्यवसायी मो. बक्स 1910 में इस इलाके में रहने के लिए आये थे. उनके साथ एक और मुस्लिम परिवार था. उन्होंने एक खेवट जमीन मुंडा परिवार से और दो खेवट रातू महाराज से खरीदा. धीरे-धीरे कई मुस्लिम परिवार आते चले गये और एदलहातू को अपना बसेरा बना लिया. बक्स सहाब के बेटे अब्दुल अजीज ने 1938 में इस गांव में एक महल का निर्माण कराया. वह भवन आज भी अजीज मंजील के रूप में मौजूद है. पर वह महल अब खंडहर बन चुका है. इस तरह मूल रैयत अगर 1932 को माने तो तीन समुदाय यहां के मूल रैयत के रूप में थे. जिसमें मुंडा परिवार के करीब 20, उरांव 4-6 एवं मुस्लिम 2 परिवार रहते थे. 1990 के बाद इस इलाके की आबादी में बेतहाशा वृद्धि होने लगी.

इसे भी पढ़ें- मिटते आदिवासी टोलों की कहानी-2 : 15 एकड़ जमीन के मालिक 20 डिसमिल के घर में सिमटे

इसे भी पढ़ें- राजधानी में खत्म होता आदिवासी मुहल्ला-तीनः आदिवासियों से हड़पी हुई जमीन पर खड़ा है एजी को-आपरेटिव कॉलोनी

एदलहातू में 1985 में थे कुल 50 घर

70 वर्षीय पौलुस तिर्की जो सेना में कार्यरत थे बताते हैं कि वे 1965 की भारत और चीन एवं बांग्लादेश की मुक्ति की लड़ाई में शामिल हुए थे. वे 1985 में सेवानिवृत हो कर आये थे. उस समय को याद करते हुए कहते हैं कि 1985 में एदलहातू में कुल मिलाकर 40 से 50 घर हुआ करते थे. गांव के लोगों की आजीविका का साधन खेती था. साथ ही मजदूरी कर लोग अपना जीवन निर्वाह करते थे. उस दौर से ही आदिवासियों की हालत खराब होने लगी थी. झारखंड बनने के बाद आदिवासियों की हालत बद से बदतर होते चली गयी. दलाल लोगों ने इस इलाके की आदिवासी जमीन गैर आदिवासियों के नाम हस्तांतरित करना शुरु कर दिया. शराब और मुर्गा के एवज में आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासियों के नाम होने लगी. आज मूल बाशिंदों का मूल पेशा खेती भी नहीं रह गया है. वह श्रम आधारित रोजगार करते हैं. उरांव टोला की अधिकांश महिलाएं घर चलाने के लिए रेजा का काम करती है और पुरुष कूली का काम कर रहे हैं.

इसे भी पढ़ें- राजधानी में सिमटते आदिवासी टोले-4, कैसे बना इंदपीरी से हिंदपीढ़ी (देखें वीडियो)

Related Posts

पूर्व सीजेआई आरएम लोढा हुए साइबर ठगी के शिकार, एक लाख रुपए गंवाये

साइबर ठगों ने  पूर्व सीजेआई आरएम लोढा को निशाना बनाते हुए एक लाख रुपए ठग लिये.  खबर है कि ठगों ने जस्टिस आरएम लोढा के करीबी दोस्त के ईमेल अकाउंट से संदेश भेजकर एक लाख रुपए  की ठगी कर ली.

बिहार से आ कर बस रहे लोगः पौलुस टोप्पो

एदलहातू के ही पौलुस टोप्पो बताते हैं कि 2000 से पहले हमारे पास 11 एकड़ जमीन हुआ करती थी लेकिन आज करीब एक-डेढ़ एकड़ ही जमीन बची है. कई कारणों की वजह से हमारे हाथ से जमीन निकलती गई और वह लगातार निकलती ही जा रही है. इस इलाके में अधिकांश परिवार बिहार से आकर बस रहे हैं. आज भी पूरे गांव में उरांव परिवारों की संख्या मात्र 25-30 ही है.

गांव के मूल बाशिंदे ही नजर नहीं आतेः पुनीत कुजूर

पुनीत कुजूर बताते हैं कि हमारा परिवार यहां का मूल बाशिंदा है. पुरानी बात को याद करते हुये गांव के बारे में कहते हैं कि यहां तीन टोला हुआ करता था. ऊपर टोला, नीचे टोला और नायक टोला लेकिन आज गांव से मूल बाशिंदे ही नजर नहीं आते हैं.

इसे भी पढ़ें- कौन लेता है जेएमएम के बड़े फैसले, आखिर किसके कब्जे में हैं कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन?

प्रेम विवाह कर बच्चे पैदा किये और छोड़ दियाः सीमा देवी

एदलहातू की 24 वर्षीय सीमा देवी (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि उन्होंने 2010 में एक गैर आदिवासी लड़के से प्रेम विवाह किया था. वहीं बताती हैं कि उस शादी से हमारे दो बच्चे हुए. आज बेटी 7 साल और बेटा 5 साल के हो गये हैं. हमारे पति ने हमें छोड़ दिया है. अब बच्चों के भरण-पोषण और शिक्षा-दीक्षा करने में बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

आदिवासी अस्मिता और पहचान संकट में

गांव की वर्तमान हालत के बारे में गांव के बुजुर्ग बताते हैं जिस तरह आदिवासी जमीन का हस्तांतरण गैर आदिवासियों की नाम पर होता जा रहा है. उसी तरह इस इलाके में आदिवासी लड़कियां भी गैर आदिवासी से प्रेम जाल के चक्कर में फंसकर विवाह कर रही है. फिर उन्हें छोड़ दिया जाता है. अब तो आदिवासी अस्मिता और पूरी पहचान ही संकट में है.

रेजा, कुली और दाई के काम के अलावा कोई चारा नहींः टुनमा मुंडायन

65 वर्षीय टुनमा मुंडायन बताती हैं कि हमारी जमीन गैर आदिवासियों ने कागज बनाकर हड़प ली. हमारे पास बहुत सारी जमीन हुआ करती थी. हमारे ससुर खेती-बारी कर पूरे परिवार की आजीविका चलाते थे. लेकिन आज सिर्फ हमारा घर ही बचा हुआ है. इसके अलावा एक भी जमीन नहीं बची. ऐसे में परिवार चलाने के लिए आदिवासी परिवार के पास रेजा, कुली और दाई का काम करने के सिवा कोई चारा नहीं है. अब तो बाहरी आबादी जिस तरीके से इस इलाके में बस रही है उस आधार से आदिवासियों की जमीन के साथ-साथ आदिवासी परिवार की बहन-बेटियां भी गैर आदिवासियों द्वारा अधिग्रहित की जा रही हैं. प्रेम विवाह के जाल में फंसाकर कुछ दिन साथ रखकर लड़की को छोड़ दिया जाता है. ऐसी कई घटना इस गांव में भी हुई है.

एदलहातू में आदिवासी मूल बाशिंदे अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं

अब हालात ऐसे हो गये हैं कि शहर में ही नहीं शहर से सटे इलाकों में भी आदिवासी सिमटते जा रहे हैं. पिछले 18 सालों में जहां पूरी तरह आदिवासी समुदाय जिन इलाकों में निवास करते थे आज वहां कई हजार घर बन गए हैं. आदिवासी समुदाय की अपनी जमीन खेती बारी बिखरते जा रही है. एदलहातू में आदिवासी मूल बाशिंदे अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं. वर्तमान समय में मूल बाशिंदों को खोजना से भी नहीं मिल पाते. अब उनके पास मजदूरी करने के अलावा जीने का कोई साधन नहीं है.

न्यूज विंग एंड्रॉएड ऐप डाउनलोड करने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पेज लाइक कर फॉलो भी कर सकते हैं.

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

dav_add
You might also like
addionm
%d bloggers like this: