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इंग्लैंड से मंगाए गए अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस मोबाइल मेडिकल वैन बना अजायबघर

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Saurabh Shukla

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Ranchi : कभी था इलाज घर अब बन गया आजायबघर. जी हां आज से 40 साल पहले सरकार ने गांव वालों को स्वस्थ रखने की महत्वकांक्षी योजना बनाई थी. तब सुदूरवर्ती गांव में अस्पताल ना के बराबर होते थे. केंद्र सरकार ने घुमंतू इलाज घर की योजना बनायी. बड़े से वाहन (मोबाइल वैन) में इलाज की सुविधा उपलब्ध कराई गई. वैन में माइनर ऑपरेशन थियेटर, एक्सरे, दवा तथा डॉक्टर की व्यवस्था की गयी थी.

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री-ओरिएंटेशन ऑफ मेडिकल एजुकेशन प्रोग्राम के तहत की गयी थी शुरुआत

1977 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री राजनारायण ने री-ओरिएंटेशन ऑफ मेडिकल एजुकेशन प्रोग्राम के तहत इसकी शुरुआत की थी. योजना का मकसद सिर्फ इलाज करना ही नहीं था. बल्कि मेडिकल के अंडर ग्रेजुएट छात्रों को गांव में भेज कर ग्रामीणों की स्वास्थ्य व्यवस्था का हाल जानना भी था. चिकित्सकों का दल वैन में जाता था. जबकि छात्रों का दल दूसरे वाहन से जाते थे. सुदूरवर्ती क्षेत्र में बेहतर स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाने की योजना थी. बच्चों को सिर्फ बड़े शहरों एवं इमारतों में पढ़ाई देने की सुविधा नहीं, बल्कि गांव की हालत से रू-ब-रू भी कराना था. ताकि जरूरत पड़ने पर डॉक्टर को गांव में रहने में कोई हिचकिचाहट न हो.

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रिम्स में पड़े-पड़े कबाड़ बना दो वाहन 

प्रत्येक मेडिकल कॉलेज में दो बेडफोर्ड वाहन दिए गए थे. उक्त वाहन इंग्लैंड से मंगाए गए थे. इस मेडिकल वैन की लागत करोड़ों में थी. लेकिन राजनारायण का सपना सड़क पर अटक गया. इतने बड़े वाहन को ले जाने के लिए उस समय अच्छी सड़क नहीं थी. सड़क के ऊपर बिजली के तार और पेड़ों की शाखाओं के कारण गाड़ी सुदूरवर्ती गांव तक पहुंच ही नहीं सकी. निकली भी तो कभी सड़क से लुढक गई, तो कहीं पेड़ की डालियों में अटक गई. सड़क की जर्जर हालत के कारण यह योजना फेल हो गई.

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