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आनेवाले दिनों में बंगलुरु में पानी की बूंद-बूंद को तरस सकते हैं लोग, ‘डे जीरो’ वाले बन रहे हालात: रिपोर्ट

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News Wing Desk : 22 मार्च को पूरी दुनिया में वर्ल्ड वाटर डे (विश्व जल दिवस) मनाया जाता है. इस मौके पर सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) द्वारा प्रकाशित पत्रिका डाउन टु अर्थने दुनियाभर में जल की स्थिति को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इसमें खासतौर पर दुनिया के उन 200 शहरों और 10 मेट्रो सिटी का जिक्र है जो डे जीरोकी ओर बढ़ रहे हैं.डे जीरोका मतलब होता है, वह दिन जब आपके घर के नलों में एक बूंद भी पानी न आए. पूरे शहर में पानी की किल्लत हो जाए और लोग इसके लिए संघर्ष करते दिखे. इस रिपोर्ट में दुनिया के 200 शहर में भारत का बेंगलुरु भी है. साल 2050 तक 36 फीसदी शहर पानी की गंभीर समस्या से जूझेंगे. रिपोर्ट में कहा गया है कि अफ्रीका के केपटाउन की तरह ही भारत के बेंगलुरु का भी जलस्तर तेजी से घट रहा है. कुछ महीने या साल में यहां पानी की काफी ज्यादा किल्लत होने वाली है.

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भारत में 16.3 करोड़ लोगों को नहीं मिल पाता पीने लायक पानी

द वॉटर गैपरिपोर्ट 2018 के मुताबिक, युगांडा, नाइजर, मोजांबिक, भारत और पाकिस्तान उन देशों में शुमार हैं जहां सबसे ज्यादा लोग ऐसे हैं जिन्हें आधे घंटे का आना-जाना किए बगैर साफ पानी नसीब नहीं हो पाता. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 16.3 करोड़ लोग साफ पानी के लिए तरस रहे हैं. पिछले साल ये आंकड़ा 6 करोड़ 30 लाख लोगों का था. आंकड़ा बढ़ने की वजह ये है कि वो लोग जिन्हें अपने घर तक पानी लाने में आधे घंटे लगते हैं, उन्हें यूएन के नियमों के मुताबिक पानी की पहुंच वाले लोगों की श्रेणी में शामिल नहीं किया जाता. दुनियाभर में बगैर साफ पानी के गुजारा करने वाले 84.4 करोड़ लोगों में से 16.3 करोड़ अकेले भारत में मौजूद हैं. मतलब साफ है कि भारत का अपने लोगों तक साफ पानी पहुंचाने का सीधा असर वैश्विक लक्ष्य की सफलता पर पड़ेगा.

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युगांडा में सिर्फ 38% लोगों तक

इरीट्रिया, पापुआ न्यू गिनी और युगांडा ऐसे तीन देश हैं जहां घर के करीब साफ पानी की उपलब्धता सबसे कम है. युगांडा में महज 38% लोगों तक पानी की पहुंच है. पानी पर बेहतरीन काम करने वाले टॉप 4 में मोजाम्बिक शामिल है. इसके बावजूद वह सबसे कम पानी की पहुंच के मामले में दुनिया के टॉप 10 देशों में शुमार है. गरीबी-अमीरी की खाई भी पानी की उपलब्धता में अंतर पैदा कर रही है. नाइजेरिया में 41% गरीबों तक ही पानी पहुंच पा रहा है, जबकि अमीरों में यह आंकड़ा 72% है. माली में 45% और 93% के साथ यह अंतर देखने को मिलता है.

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बड़ी तादाद बन रहे बांध के कारण भी आ रही है समस्या

यूएन वर्ल्ड वॉटर डेवलपमेंट की रिपोर्ट 2018 के मुताबिक बड़ी तादाद में बन रहे बांधों के चलते लोगों का विस्थापन हो रहा है. साथ ही सीमित मात्रा में खाद्य सुरक्षा आई है. वर्ल्ड कमीशन ऑन डैम्स ने अपनी स्टडी में कहा है कि भारत में बड़े पैमाने पर चल रहे वॉटर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के चलते विस्थापन, मिट्टी का कटाव, पानी का जमाव जैसी समस्याएं आ रही हैं. गौरतलब है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल का उपयोगकर्ता है. इसके बाद अमेरिका, ईरान और पाकिस्तान का नंबर आता है. ये सभी देश मिलकर दुनिया का 67% भूजल का इस्तेमाल करते हैं.

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बेंगलुरु में वॉटर लेबल 76-91 मीटर नीचे पहुंचा

बीते कुछ सालों में बिना प्लानिंग के शहरीकरण और गांवों में अतिक्रमण की वजह से बेंगलुरु के 79% तालाब खत्म हो चुके हैं. वहीं मानवनिर्मित इन्फ्रास्ट्रक्चर 1973 के 8% के आंकड़े से बढ़कर 77% हो गया. सीएसई के मुताबिक बीते दो दशकों में बेंगलुरु का वॉटर लेबल (जमीन का जलस्तर) 10-12 मीटर से बढ़कर 76-91 मीटर तक नीचे चला गया है. वहीं, बीते 30 सालों में पानी निकालने के लिए खुदे हुए कुंओं की संख्या 5 हजार से बढ़कर 4.5 लाख पहुंच गई है.

डे जीरो की चपेट में जल्द आ सकते हैं 10 शहर

मैगजीन के मुताबिक केपटाउन की तरह 10 शहर ऐसे हैं जहां भविष्य में पानी को लेकर हालात बिगड़ सकती हैं. ये शहर हैं साओ पाउलो, बेंगलुरू, मेक्सिको सिटी, नैरोबी, कराची, काबुल, इस्तांबुल, बीजिंग, ब्यूनोस आयर्स और सना.

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पिछले साल हुई थी कर्नाटक में पानी की भारी कमी

बीते साल अप्रैल में कर्नाटक में पानी की भारी कमी के चलते सरकार ने किसानों को नहरों और जलाशयों से पानी ना निकालने की अपील की थी. कर्नाटक के जल संसाधन मंत्री एमबी पाटिल ने कहा था कि बांध के स्तरों को देखते हुए बेंगलुरु के पास सिर्फ 60 दिन के पीने का पानी ही बचा है. इसके अलावा पिछले 4 सालों से गर्मी के मौसम में बेंगलुरु में पानी की किल्लत पैदा हुई है.

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