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आज के दौर में टेलीविजन का इडियोटिकरण, मीडिया की मदद से जनता की मानसिकता बदलने में लगी राजनीतिक पार्टियां

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Asif Asrar

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टेलीविजन का अविष्कार 1930 में हुआ,लेकिन टेलीविजन को बनाने की प्रकिर्या 1920 से ही शुरू हो गई थी. वैसे तो टेलीविजन बनाने में बहुतों का हाथ रहा है लेकिन फादर ऑफ टेलीविजन जॉन लोगी बार्ड को माना जाता है. सबसे अनोखी बात ये है कि जॉन जिन्होंने टेलीविजन का अविष्कार किया उन्ही के घर मे टेलेविजन नहीं था. जॉन का कहना था इससे इंसान को कोई फायदा नहीं है, इसलिए टेलीविजन को इडियट बॉक्स भी कहा गया.

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इस दौर में टेलीविजन को इडियट बॉक्स क्यों कहा गया ये हम टेलेविजन (न्यूज चैनल) चालू करते ही समझ सकते हैं. हर तरफ एक ही तरह के मुद्दे और एक ही तरह के एजेंडे से न्यूज चैनलों द्वारा टेलीविजन का इडियोटिकरण किया जा रहा है. हाल ही में कोबरापोस्ट द्वारा किये गए स्टिंग से सामने आया है कि कैसे देश के 17 बड़े मीडिया संस्थान जिसमे इंडिया टीवी,दैनिक जागरण, यूएनआई भी शामिल हैं जो  पैसों के लिए एक विचारधारा के प्रचारक बने घूम रहे हैं. मीडिया की मदद से राजनीतिक पार्टियां जनता की मानसिकता बदलने में लगे हैं.

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टेलीविजन के इडियोटिकरण होने के कुछ उदहारण, कुछ चैनल के एंकरों को देखकर पता लगाया जा सकता है. ऐसा लगता है जैसे वो एक अदालत चला रहे हैं और उस अदालत के वकील भी खुद हैं और न्यायमूर्ति भी वही हैं. एक पत्रकार ने प्रधानमंत्री से इंटरव्यू में पूछा कि आप विदेश में सब से दोस्ती कैसे कर लेते हैं ? एक चैनल किम जोंग में लगा रहता है. एक चैनल ने तो प्रवक्ताओं को ही पत्रकार बना डाला.

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साइबर ठगों ने  पूर्व सीजेआई आरएम लोढा को निशाना बनाते हुए एक लाख रुपए ठग लिये.  खबर है कि ठगों ने जस्टिस आरएम लोढा के करीबी दोस्त के ईमेल अकाउंट से संदेश भेजकर एक लाख रुपए  की ठगी कर ली.

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टेलीविजन के इडियोटिकरण के समय में ये बात हर दर्शक को खुद से पूछना जरूरी हो गया है कि हम टेलीविजन क्यों देखते हैं? मीडिया को जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है क्या वो अब गिरता नजर आ रहा है ? जनता को ये बात समझना होगा कि मीडिया जनता की आवाज है लेकिन अब सरकार की आवाज बनती नजर आ रही है.

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हाल ही में मैंने कुछ पत्रकारों से एक सवाल पूछा, आपको क्या लगता है भारत में प्रेस आजाद है ? तो न्यूज नेशन के एक पत्रकार ने कहा कि कॉरपोरेट से चल रही मीडिया के अंदर आजादी की बात करना ही झूठ है. कभी इसके खिलाफ खबर मत लिखो और कभी उसके खिलाफ खबर मत लिखो कहा जाता है. वहीं बिजनेस स्टैण्डर्ड के पत्रकार ने कहा, आजादी किस बात की?  जो पूंजी लगाता है कुछ-कुछ उसके मुताबिक होता ह. ज्यादा कुछ उसके मुताबिक होता है जो मीडिया का सीईओ और प्रधान संपादक होता है. बाकी तो बस अपनी नौकरी करते हैं. एक और पत्रकार ने कहा कि सच्चाई तो यही है कि बिकाऊ मीडिया आजाद हो ही नहीं सकता. सरकार के खामियों पर पर्दा डालना, जरूरी और बुनियादी मुद्दों को दरकिनार करना साथ ही सरकार की तरफदारी व प्रशंसा के इस दौर में टेलीविजन को इडियट बॉक्स कहना गलत नहीं है.

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