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अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का दो टूक : विधायिका से कानून बनाने को नहीं कह सकते

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New Delhi, 11 December : उच्चतम न्यायालय ने आज कहा कि वह विधायिका को कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकता लेकिन उसने तो केन्द्र और जम्मू कश्मीर सरकार से यही कहा है कि वे इस बारे में विचार करें कि राज्य में बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय कोअल्पसंख्यकों के लाभ प्राप्त करने के लिये क्या अल्पसंख्यक माना जा सकता है या नहीं. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्र, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड की पीठ को केन्द्र ने सूचित किया कि वह अभी भी अनेक मुद्दों पर विचार कर रहा है. इसमें यह भी शामिल है कि क्या मुसलमानों को, जो जम्मू कश्मीर में बहुमत में हैं, उन लाभों के लिये अल्पसंख्यक माना जा सकता है जो राज्य में सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिये हैं.

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सिर्फ विचार करने को कह सकते हैं

पीठ ने कहा, ‘‘हमारे सामने कानूनी दिक्कतें हैं, हम किसी एक मुद्दे विशेष पर कानून बनाने का निर्देश विधायिका को नहीं दे सकते. हमने तो सिर्फ उनसे (केन्द्र और राज्य से ) विचार करने के लिये कहा है. ’’ पीठ ने अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल के इस वक्तव्य पर विचार किया कि विचार विमर्श की प्रक्रिया जारी है और इस पर फैसला लिया जायेगा. इसके साथ ही न्यायालय ने केन्द्र को आठ सप्ताह का समय दे दिया. पीठ ने आठ अगस्त को केन्द्र और अन्य को जम्मू के वकील अंकुर शर्मा की याचिका में उठाये गये मुद्दों पर तीन महीने के भीतर निर्णय लेने के लिये अंतिम अवसर प्रदान किया था. केन्द्र ने तब न्यायालय से कुछ समय देने का अनुरोध करते हुये कहा था कि वह राज्य सरकार के साथ विचार विमर्श कर रहा है. इससे पहले, शीर्ष अदालत ने इस याचिका पर केन्द्र, राज्य सरकार और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को अंकुर शर्मा की याचिका पर नोटिस जारी किये थे. इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य में 68 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है जो अल्पसंख्यकों को मिलने वाले लाभ ले रही है.

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