फर्जी नक्सल सरेंडर मामले में सरकार ने कहा गृह मंत्रालय के निर्देश पर कराया जा रहा था सरेंडर, कोर्ट ने 29 जनवरी तक मांगा दस्तावेज

Publisher NEWSWING DatePublished Tue, 01/09/2018 - 15:43

Ranchi : आदिवासी क्षेत्र के भोले-भाले युवकों को नक्सली बनाकर सरेंडर कराने के मामले में मंगलवार को हाई कोर्ट में सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान सरकार के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि नक्सलियों को सरेंडर कराने की योजना केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशन में बनायी गयी थी. इसमें सीआरपीएफ व राज्य पुलिस शामिल थे. कोर्ट ने इस पर सरकार से 29 जनवरी तक जवाब मांगा है. कोर्ट ने कहा है कि अगर केंद्रीय गृह मंत्रालय के स्तर से एेसी योजना बनायी गयी थी तो इससे संबंधित दस्तावेज 29 जनवरी तक उपलब्ध करायें. अधिवक्ता राजीव कुमार ने बताया कि  कोर्ट ने पूरे मामले की जांच और कार्यशैली पर संदेह व्यक्त करते हुए रांची पुलिस से कहा है कि किसी सरकारी आदेश पर भी गलत काम को जायज नहीं ठहराया जा सकता. इसके अलावा कोर्ट ने मामले की जांच कर रही रांची पुलिस से कहा कि अभी तक सिर्फ धोखाधड़ी के बिंदु पर जांच की गयी है. इस पूरे प्रकरण में सीनियर अफसरों की भूमिका की जांच करके 29 जनवरी तक रिपोर्ट दें. सुनवाई के दौरान कोर्ट में सिटी एसपी अमन कुमार भी उपस्थित थे. 

2013 में तत्कालीन आइजी सीआरपीएफ एमवी राव ने किया था खुलासा

फर्जी नक्सल सरेंडर का मामला वर्ष 2013 में सामने आया था. तब के सीआरपीएफ आइजी (झारखंड सेक्टर) एमवी राव ने पुलिस मुख्यालय को एक रिपोर्ट भेजी थी. जिसमें उन्होंने कहा था कि 514 ग्रामीण युवकों को पुराने जेल परिसर में  कोबरा बटालियन की निगरानी में रखा गया है. युवकों को क्यों रखा गया है, किसके आदेश पर रखा गया है, यह स्पष्ट नहीं है. एमवी राव की रिपोर्ट पर पुलिस मुख्यालय ने मामले की जांच करायी. जांच में फर्जी तरीके से युवकों को नक्सली बताकर सरेंडर कराने का मामला सामने आया. जिसके बाद लोअर बाजार थाना में मामले की प्राथमिकी दर्ज की गयी. 

डीके पांडेय थे आइजी सीआरपीएफ, तब हुआ था खेल

कोबरा बटालियन की निगरानी में जब युवकों को पुराने जेल में रखा गया था, तब सीआरपीएफ झारखंड सेक्टर के आइजी डीके पांडेय थे. डीके पांडेय अभी डीजीपी हैं. जब वह सीआरपीएफ आइजी थे, तभी यह मामला शुरु हुआ था. उल्लेखनीय है कि इस मामले की जांच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी की थी. आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट में सीआरपीएफ व राज्य पुलिस के सीनियर अफसरों की भूमिका को संदेहास्पद माना था.

सीबीआई जांच की अनुशंसा की थी हेमंत सरकार ने

वर्ष 2014 में तत्कालीन हेमंत सोरेन सरकार ने मामले की सीबीआई जांच की अनुशंसा की थी. सीबीआई ने जांच शुरु करने पर मंजूरी भी दे दी थी. सीबीआई के द्वारा झारखंड पुलिस मुख्यालय को पत्र लिख कर अनुरोध किया गया था कि मामले की जांच में सहयोग के लिए राज्य पुलिस से कुछ अफसरों की प्रतिनियुक्ति सीबीआई में की जाये. क्योंकि सीबीआई में अफसरों की कमी है. झारखंड पुलिस ने सीबीआई को पुलिस अफसर देने से इंकार कर  दिया. जिस कारण जांच शुरु नहीं हो सकी.

रघुवर सरकार ने भी दिया था सीबीआई जांच का आश्वासन

वर्ष 2015 में यह मामला विधानसभा में जोर-शोर से उठा था. जेवीएम के विधायक प्रदीप यादव ने मामले की सीबीआई जांच और इसमें शामिल अफसरों पर कार्रवाई करने की मांग की थी. जिसके बाद सरकार ने विधानसभा में आश्वासन दिया था कि वह सीबीआई जांच की अनुशंसा दुबारा करेगी. लेकिन अब तक सरकार ने इस आश्वासन को पूरा नहीं किया.

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