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गरीबों के हक का बंदरबांट!

रांची/चतरा: चतरा में गरीबों की 19 करोड़ की आवास योजना में पार्षदों अधिकारियों ने मचाई लूट! ऊपर से नीचे तक सभी चुप..

आज पूरा झारखंड, इसके सभी 24 जिले, उग्रवाद की चपेट में है। राज्य के अधिकांश संसाधन और कोष विकास कार्यक्रमों की बजाय उग्रवाद से टक्कर लेने पर खर्च होते हैं। विकास थम गया है। सबसे पिछड़े राज्यों की पंक्ति में खड़ा है झारखंड।

यह दशा साल दो साल में नहीं, दशकों से चली आ रही उपेक्षा का नतीजा है। समीक्षा होती है, और सभी मानते हैं कि झारखंड में सरकारी मशीनरी आम लोगों के हित को नजरंदाज करती रही है। भ्रष्टाचार का बोलबाला, और फिर हाशिये पर धकेल दिये जाते गरीब गुरबा। नक्सलवाद माओवाद के लिए इससे उर्वर जमीन और क्या होगी! 2000 में अलग राज्य बना। लेकिन, हालात तो और भी बदतर होते चले गए! आज पूरे सूबे पर हिंसक उग्रवाद फन काढ़े हुए है। केंद्र से लेकर राज्य तक के तमाम संसाधनों एवं अरबों खर्च के बाद भी झारखंड से उग्रवाद क्यों टस से मस नहीं हो रहा है? कारणों को समझना है तो कई जिलों की तरह चतरा भी एक ‘आदर्श’ उदाहरण हो सकता है।

चतरा की गिनती उन चंद इलाकों में होती रही है जहां से झारखंड में उग्रवाद की घुसपैठ हुई थी। ठीक है कि आज नक्सलवाद माओवाद वहां कमजोर हुआ, बिखराव की ओर है, लेकिन इसके पीछे उनकी अंदरूनी कलह कारण है, न कि सरकारीतंत्र को दिया जाने लायक कोई श्रेय। भ्रष्टाचार बदस्तूर जारी है। नेता-माफिया-अधिकारी गंठजोड़ आज भी सशक्त दिखाई दे रहा है। गरीब गुरबों के हित में आवाज उठती है, ऊपर तक पहुंचती भी है लेकिन शासन के शीर्ष पर बैठे अधिकारी, नेता, मंत्रियों की संवदेनशीलता जैसे कुंद पड़ चुकी है। केंद्र प्रायोजित ‘आइएचएसडीपी’ यानी इंटिग्रेटेड हाउसिंग एंड स्लम डेवेलॉपमेंट प्रोग्राम (मलिन बस्ती आवास योजना) के तहत चतरा नगर पर्षद को पहले फेज में मिली 19 करोड़ की राशि का महीनों बंदरबांट होता रहा। उसी योजना से कई पैसेवालों ने नये मकान बनवा लिये। जबकि योजना के मानदंड के अनुसार यह विशेष लाभ गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर कर रहे एसटी, एससी, ओबीसी एवं अल्पसंख्यक वर्ग के परिवारों को मिलना था।

पूरी रिपोर्ट:

जब बाड़ ही खा गए खेत!
एक देशी कहावत हैः जब बाड़ ही खा गई खेत! कुछ ऐसा ही हुआ चतरा के गरीब गुरबों के साथ। केंद्र प्रायोजित ‘आइएचएसडीपी’ यानी इंटिग्रेटेड हाउसिंग एंड स्लम डेवेलॉपमेंट प्रोग्राम (मलिन बस्ती आवास योजना) के तहत चतरा नगर पर्षद को पहले फेज में 19 करोड़ की राशि मिली। तय हुआ कि इस राशि से गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे 932 परिवारों को पक्का छत उपलब्ध कराया जाएगा। जिम्मेवारी सौंपी गई स्थानीय वार्ड पार्षदों पर। परिकल्पना थी कि पार्षद तो जमीन से चुनकर आये जनप्रतिनिधि होते हैं। आम जनता से रोज का मेल जोल होता है। एक दूसरे का दुःख दर्द अच्छी तरह समझते हैं। लेकिन, पैसे की चमक ने सारी इंसानियत को दरकिनार कर दिया। 600 घर अब तक बन चुके हैं अथवा निर्माणाधीन हैं। जानकारों की मानें तो ये असली हकदार की जगह पैसेवालों ने हासिल कर लिये, घूस और भाई भतीजावाद के जरिए। इस घोटाले को लेकर कुछ स्थानीय लोगों, संस्थाओं ने ही आवाज उठायी। स्थानीय उपायुक्त से लेकर नगर विकास विभाग के सचिव, मंत्री मुख्यमंत्री, राज्यपास सहित तमाम जांच एजेंसियों के पास गुहार लगायी गई। लेकिन, सभी चुप्पी साधे रहे।

आज राज्य भर में नगर निकाय चुनाव होने जा रहा है। इसे दिखाकर, सरकारी नीतिकार अधिकारों के विकेंद्रीकरण और अंतिम पायदान पर मौजूद संस्थाओं के सशक्तिकरण का दंभ कर रहे हैं। लेकिन, चतरा के इस घोटाले में वहां के निकाय और चुने गए वार्ड पार्षद से लेकर अन्य पदधारियों की अंतर्लिप्तता ही सामने आयी है। अब फिर चुनाव हो रहा है। क्या गारंटी की वही भ्रष्ट लोग, गरीबों का हक मारनेवाले तिकड़मबाज फिर से उन कुर्सियों पर कब्जा न कर लें?

चतरा की बदहाल झुग्गी झोपड़ियों में रहनेवालों के लिए केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित आइएचएसडीपी के तहत प्रति परिवार 1.48 लाख दिये जाने की घोषणा हुई। डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) के तहत पहले चरण में चतरा नगरपालिका के वार्ड क्रमांक1 से 12 तक (वार्ड 10 को छोड़कर) में 932 परिवारों का लाभुक के रूप में चयन किया गया। कुल लागत करीब 19 करोड़ थी। काम शुरू हुआ। लेकिन चयन में कुछ तकनीकी अड़चनें आने पर राज्य सरकार ने एक पत्र (क्रमांक1565, दिनांक 14.05.11) जारी किया और कहा कि अयोग्य व्यक्तियों को हटाकर जरूरतमंदों को ही चुना जाए। जरूरी हो तो दूसरें वार्डों से भी जरूरतमंदों का चयन हो सकता है। गरीबों के हिस्से के सरकारी सहयोग पर बिचौलियों की नजर तो पहले से थी ही, इस पत्र की आड़ में सरकारी मशीनरी को भी जैसे बहाना मिल गया। स्थानीय नागरिक मोर्चा के शिकायतकर्ताओं के अनुसार, आवास के लिये निर्गत राशि का भुगतान मनमानी तरीके से किया जाने लगा। लाभुकों के चयन एवं अनुमोदन की जिम्मेवारी नगर पर्षद अध्यक्ष, वार्ड पार्षद, नगरपालिका के कार्यपालक पदाधिकारी, संबंधित विभाग के अभियंता तथा स्थानीय उपायुक्त की होती है। मोर्चा के अनुसार, इस आवास सुविधा के लिए बोलियां लगने लगीं। 20 हजार से लेकर 40 हजार तक घूस लिया जाने लगा। यही नहीं, उस अनुमोदन समिति में शामिल कई पदधारियों ने अपने रिश्ते नाते और चहेतों के नाम लाभुकों में शामिल कर लिया। हालिया स्थिति यह है कि अब तक करीब साढ़े सात सौ लोगों के नाम पर आबंटन हो चुका है। इनमें एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनके पास पहले से ही पक्का मकान था। घूस के बूते, इस सरकारी सुविधा का लाभ उठाकर उन्होंने निर्धारित सरकारी जमीनों पर कई मंजिली इमारतें खड़ी कर लीं हैं। और झोपड़ियों में रह रहे गरीब और उनकी बस्तियां पहले की तरह ही बदहाल हैं।

पार्षदों ने वसूला, आधा खुद रखा आधे में बाकी अधिकारियों को बांटा : डा जावेद

नगर पर्षद के निवर्तमान उपाध्यक्ष डा सलीम जावेद के अनुसार, अबतक करीब छह सौ मकान बन चुके हैं या लेआउट हुआ अथवा दूसरी खेप की राशि आबंटन के इंतजार में अधूरा है। अधिसंख्य लोगों से 30 से 40 हजार रूपये घूस के तौर पर लिया गया। अधिकांश मकान डीपीआर में तय नक्शे को पूरी तरह नजरंदाज करते हुए बनाये जा रहे हैं। डा जावेद बताते हैं कि कुछ लोगों ने घूस की रकम देने से इनकार किया तो उनकी दशा आज भी ज्यों की त्यों बदहाल है। उनमें पुराना वार्ड 12 के आलम दर्जी भी हैं, जिन्हें अंततः मकान निर्माण की राशि नहीं मिली। उसी तरह अब्दुल रशीद का नाम भी है डीपीआर में है लेकिन मकान नहीं बना सके। मुस्तरी खातुन को एग्रीमेंट के बाद 25 हजार मिला लेकिन पार्षद को पैसा नहीं दिया तो उनका मकान अधूरा पड़ा है। डा जावेद ने इस मुद्दे को दूर तक ले जाने की कोशिश की। लेकिन, माफिया गंठजोड़ ने उनके ही अधिकार सीज करवा दिये। स्थानीय अधिकारियों ने रांची मुख्यालय में नगर विकास सचिवालय से एक आदेश जारी करवा कर उपाध्यक्ष को उस समिति से अलग करवा दिया जो चयनित लाभुकों का अनुमोदन करता है। विरोधियों ने नगर पर्षद उपाध्यक्ष डा जावेद पर कई मुकदमें जड़ दिये हैं। डा अख्तर पेशे से होम्योपैथी डाक्टर हैं और झारखंड विकास मोर्चा (मरांडी) की केंद्रीय कमिटी के सदस्य भी हैं। 

डा जावेद कहते हैं कि कुछ लाभुकों को छोड़ दें तो पार्षदों ने अधिकांश से 30 से 40 हजार वसूला। आधी रकम खुद रखते और शेष हिस्से से पर्षद और जिला प्रशासन के अधिकारियों को जाता। रिश्‍वत मांगनेवालों का कहना होता था, सरकार डेढ़ लाख दे रही है, चालीस पचास भी खर्च कर दो तो बाकी बचे एक लाख तो तुमको बैठे बिठाये मिल रहा है! जिसने नहीं दिया उनका मकान आज तक नहीं बना।

डा जावेद का दावा है कि उन्हीं के प्रयास से निगरानी ने एक पार्षद गुलाम मेंहदी को रिश्‍वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा था। डा जावेद ने एक और आवेदन देकर स्लम आवास योजना घोटाले में पूरे चतरा नगर पर्षद के खिलाफ जांच की मांग की है। डा जावेद चतरा नागरिक मोर्चा के संयोजक भी रहे हैं। लेकिन, आपसी मतभेदों के कारण वह अब उस पद पर नहीं हैं। डा जावेद बताते हैं कि चतरा नगर पर्षद के तत्कालीन कार्यपालक अधिकारी के खिलाफ 8 फीसदी कमिशनखोरी की शिकायत राज्यपाल से की थी। लेकिन, माफिया गंठजोड़ ने उनके जाली हस्ताक्षर करके उनके खिलाफ ही मामले को मोड़ दे दिया। नौबत गिरफ्तारी तक की आयी। लेकिन जांच में उन्हें बरी कर दिया गया।

चतरा जिला नागरिक मोर्चा ने भी घोटालेबाजों के खिलाफ जंग छेड़ी 
स्लम बस्ती आवास योजना में घोटाले को लेकर चतरा जिला मोर्चा ने नीचे से ऊपर तक अधिकारियों नेताओं मंत्रियों के यहां गुहार लगायी। जिले के उपायुक्त से शिकायत की। जांच का आश्‍वासन भी मिला। लेकिन, जांच नहीं हुई। इसके अलावा उत्तरी छोटानागपुर के प्रमण्डीलीय आयुक्त, नगर विकास सचिव, पुलिस महानिदेशक, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री व राज्यपाल एवं नगर विकास मंत्री को आवेदन दिया। लेकिन कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई। मुख्यमंत्री ने जांच का आदेश भी दिया लेकिन सबकुछ ठंढ़े बस्ते में जाता रहा। इस बीच एकमात्र निगरानी विभाग ने एक वार्ड पार्षद गुलाम मेंहदी को रिश्‍वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा। निवर्तमान पार्षद और मोर्चा के सदस्य गोविंद राम के अनुसार, अब वह आरोपी पार्षद छूट चुका है ऐर फिर से उसी धंधे में लिप्त है। मोर्चा का आरोप तो यहां तक है कि पार्षद मेंहदी अकेला नहीं पर्षद के अधिकांश सदस्यों के हाथ इसी काली कमाई से रंगे हुए हैं। 28 अगस्त 2012 को निगरानी ब्युरो के अपर महानिदेशक को सौंपे गए आवेदन में मोर्चा सदस्यों ने अपनी जान माल और प्रतिष्ठा की रक्षा की गुहार भी लगाई है। उनका कहना है कि भ्रष्टचारियों के खिलाफ अभियान छेड़ने से उनके खिलाफ साजिश रची जा रही है। आवेदनकर्ताओं में लक्ष्मीकांत शुक्ला, धनंजय प्रजापति, इमदाद अली, शैलेंद्र कुमार सिंह, उमाशंकर, कुलेश्‍वर यादव, आदि के नाम शामिल हैं। बताते चलें कि मोर्चा ने थक हार कर अंत में झारखंड के लोकायुक्त के यहां भी तमाम उपलब्ध दस्तावेजों आदि के साथ अर्जी लगायी है। (इनपुट्सः रणजीत वर्मा.) 

खुद जेएमएम में भी कुछ लोग हुए षडयंत्र का शिकार

|| न्यूज विंग || अर्जुन मुंडा से खास बातचीत.. 

झारखंड में राष्ट्रपति शासन की मुहर लग चुकी है। झामुमो (झारखंड मुक्ति मोर्चा) द्वारा समर्थन खींच लेने के बाद चुनी हुई मुंडा सरकार को हटना पड़ा। दरअसल, झामुमो को आशा थी कि कांग्रेस झट साथ मिलकर सरकार बना लेगी। लेकिन, तत्काल कुछ हुआ नहीं। बल्कि इसके उलट, शासन की बागडोर राज्यपाल को थमा दी गई।

अब झामुमो के नेता दिल्लीˆरांची किये हुए हैं। सरकार बनाने की उनकी आशाएं क्षीण होने लगी हैं। झामुमो सुप्रीमो शिबु सोरेन तो इतना तक कह चुके हैं, मुख्यमंत्री कोई बन जाए, सरकार बननी चाहिए। याद कीजिए, इसी मुख्यमंत्री पद के लिए, 28 28 महीने शासन की हिस्सेदारी और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपना कब्जा मांगते हुए झामुमो ने मुंडा सरकार से समर्थन खींच लिया था। इधर, मुख्यमंत्री की कुर्सी जाने के बाद अर्जुन मुंडा खाली पड़े हैं। लेकिन नहीं.. तीन तीन बार राज्य का शासन चला चुका कोई राजनेता यूं ही खाली पड़ा रहेगा!.. बड़ी सूर्खियां भले न बने, पर प्रेस मीडिया छोड़ेगी भला? न्यूज विंग ने भी कैफियत ली। न्यूज विंग के साथ एक लंबी बातचीत के दौरान मुंडा तरो ताजा लगे। जैसे, पुराना गिला शिकवा भूलकर नये सिरे से उर्जा एकत्र कर रहे हों। पिछले घटनाक्रम की चर्चा करने पर मुंडा कहते हैः ..खुद जेएमएम में भी कुछ लोग इस षडयंत्र का शिकार हुए हैं।.. भविष्य के चुनावों को मद्देनजर मुंडा के इस संयमित बयान के कई मतलब निकाले जा सकते हैं।

खुद मुंडा भी कहते हैं, उनका सारा ध्यान ‘मिशन 2014’ पर है। लेकिन, उनकी पार्टी?.. भाजपा!.. इन दिनों प्रदेश भाजपा में उफान आया हुआ है। सारा वितंडा नए प्रदेश अध्यक्ष के रूप में चुने गए रवींद्र राय को लेकर है। प्रदेश से लेकर केंद्र तक भाजपा के कई वरिष्ठ नेता इस चयन से नाखुश हैं, लामबंद हुए जा रहे हैं। इनमें कुछ तो खुद प्रदेशअध्यक्ष पद की रेस में थे। उन्हें बल मिल रहा है यशवंत सिन्हा, कड़िया मुंडा सरीखे वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी से। और, एकबार फिर निशाने पर हैं अर्जुन मुंडा। दरअसल, माना यह जा रहा है कि अपने प्रत्याशी रवींद्र राय के नाम की घोषणा करवाकर मुंडा ने एकबार फिर बाजी मार ली। उन्होंने पार्टी में फिर अपना कद साबित कर दिखाया। यशवंत सिन्हा तो इतना नाराज हैं कि उन्होंने पार्टी पदों से इस्तीफा देने तक की चेतावनी दे रखी है। इस बाबत पूछे जाने पर अर्जुन मुंडा का कहना है कि ‘कुछ लोग इसका राजनीतिकरण कर रहे हैं..’। यशवंत सिन्हा की उनसे नाराजगी के सवाल पर मुंडा कहते हैं, यशवंत सिन्हा समय समय पर मुखर होकर बोलते हैं। उन्होंने तो केंद्रीय अध्यक्ष पद पर रहे गडकरी जी और अडवाणी जी पर भी टिप्पणी की..

और क्या कुछ कहा अर्जुन मुंडा ने..

- जेएमएम ने अलग झारखंड के औचित्य को नजरंदाज किया
- राज्यपाल शासन पर टिप्पणी?.. कुछ चीजें हैं, अभी मैं देख रहा हूं!..
- अब चुनाव हो। सरकार बनाने की कोशिश जनहित में नहीं।
- हां, मेरी प्रॉयरिटी लिस्ट में थे रवींद्र राय - कुछ लोग इसका राजनीतिकरण कर रहे हैं
- यशवंत सिन्हा तो अडवाणीजी, गडकरीजी पर भी टिप्पणी करते रहे हैं..
- हां, रवींद्र राय झाविमो में गए थे, बाबूलाल को वापस लाने..
- मुझसे चूक हुई कि प्रदेशअध्यक्ष की घोषणा से पहले इस्तीफा दिया..
- बात ट्राइबल - नॉनट्राइबल सीएम की क्यों? योग्यता है तो सामने आयें!

न्यूज विंग के संपादक किसलय के साथ झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की यह लंबी बातचीत विस्‍तार से पढिये..

चलिए, भाजपा के वर्तमान हालात से शुरू करते हैं.. नये प्रदेश अध्यक्ष के रूप में रवींद्र राय के नाम की घोषणा के तुंरत बाद पार्टी में जबरदस्त खलबली देखी जा रही है। विरोध के स्वर उठ रहे हैं। कई बड़े नेता मुखालफत कर रहे हैं इस निर्णय का। यह सब क्यों?

देखिये.. राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के बाद प्रदेशों में तो चुनाव होना ही था। सभी प्रदेशों में हुआ है। यहां भी हुआ। यहां कुछ गलतफहमियां हुईं हैं, यह दूर हो जाएंगी।

लेकिन, बात छोटी सी नहीं। प्रदेश भाजपा में गुटबाजी दिखने लगी है। रवींद्र राय के चयन के खिलाफ यशवंत सिन्हा तो इस्तीफा तक की पेशकश कर रहे हैं..? 
देखिये, कुछ लोग इसका राजनीतिकरण कर रहे हैं, मीडिया में खबर आने के बाद। ..मीडिया में यह बात कैसे आयी?.. जबकि यह बड़ा गोपनीय मामला था।

इस बीच आपने भी तो विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा दे दिया। क्या यह भी इसी प्रकरण का हिस्सा नहीं?

मैंने स्वेच्छा से केंद्र से आग्रह किया कि मुझे सभी दायित्वों से मुक्त रखा जाए। मैं एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में दोगुणा समर्पण के साथ पार्टी के लिये काम करूंगा। ..यहां मुझे लगता है कि यह गलतफहमियां इसलिये हुईं चूंकि प्रदेश अध्यक्ष के नाम की घोषणा से पहले मैंने इस्तीफा दे दिया। यह बाद में देना था। ..हां, यह गलती शायद मुझसे हुई है। इसका मैंने ध्यान में नहीं रखा।

क्या अंतर पड़ता बाद में इस्तीफा देने से?

बाद में देने से यह विषय ही पैदा नहीं होता। पहले दे देने से कुछ लोगों के मन में ऐसा ख्याल आया है कि मैंने कोई दबाव.. (वाक्य पूरी करने की बजाय थोड़ा हंस देते हैं।)..

लेकिन, आपने अपनी कोई राय रखी तो होगी?

हां मैंने अपना मंतव्य दिया था केंद्र को। मैंने कई नाम दिये थे और कहा था कि इनमें से किसी को चुन ले केंद्र।

क्या आपने प्राथमिकता रवींद्र राय के नाम को दी थी?

उनमें एक नाम रवींद्र राय भी थे।

क्या आपने रवींद्र राय के नाम को प्रायॅरिटी (प्राथमिकता) दी थी?

हां, प्रायरिटी लिस्ट में रवींद्र राय भी थे।

चलिए आगे बढ़ते हैं.. इससे पहले भी कई बार देखा गया कि ऐसे मौके पर यशवंत सिन्हा प्रदेश की राजनीति में आपके खिलाफ नजर आये। यशवंत सिन्हा हमेशा आपकी ही मुखालफत क्यों करते हैं?

(हल्का ठहाका लगाते हैं मुंडा। फिर एकदम से सामान्य भाव मुद्रा बनाने की चेष्टा..) मुझे ऐसा नहीं लगता है। क्योंकि.. समय समय पर कई विषयों में वह मुखर होकर बोलते रहे हैं। उन्होंने अडवाणी जी के प्रकरण पर अपनी टिप्पणी की, राष्ट्रीय अध्यक्ष नितीन गडकरी जी के समय में भी उन्होंने टिप्पणी की, और भी ऐसे कई विषय रहे। उन्हें लगता है कि इस विषय पर कहना चाहिए तो वे बोलते हैं।

(थोड़ी चुटकी लेते हुए) आपके अंदाज और उदाहरणों से आपका एक यह भाव भी सामने आता है, ‘अडवाणी जी, गडकरी जी.. दो राष्ट्रीय अध्यक्षों पर उन्होंने टिप्पणी की और मुझपर भी किया..’ यानी कहीं न कहीं उन्होंने आपके कद में इजाफा..?

(बीच में ही, विषय को थोड़ा मोड़ते हुए..) देखिये.. उन्होंने हमारे ऊपर कुछ नहीं कहा.. मुझे नहीं लगता है कि मेरे ऊपर कुछ कहा। अगर मुझे ऐसा लगे कि उन्होंने मेरे ऊपर कुछ कहा तो मैं उनसे जरूर बात करूंगा.. (सामान्य होने की कोशिश में अपने खास अंदाजा में ठहाका लगा देते हैं!)

चलिये.. आपको नहीं लगता कि रवींद्र राय के लिए फिलहाल काफी बड़ी चुनौतियां हैं?.. इन दिनों प्रदेश भाजपा में विरोधाभासी हालात काफी दिख रहे हैं.. आपसी मतभेद बहुत हैं..?

देखिये, मैं इसको स्वाभाविक मानता हूं। इसलिए कि पार्टी में तो कोई ‘पेड सर्वेन्ट’ होता नहीं है। सभी वर्कर होते हैं और अपनी क्षमता के अनुसार नतीजा चाहते हैं। यह गलत भी नहीं, सबको अवसर भी मिलना चाहिए, लेकिन एक चीज पर जब फैसला हो जाता है तो उसे ही आगे लेकर चलने की प्रथा है।

यानी रवींद्र राय अपना काम कर पायेंगे?

हां करेंगे.. यह हम सबकी भी जिम्मेदारी है।

यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि पिछले दिनों रवींद्र राय भाजपा छोड़कर मरांडी जी के झारखंड विकास मोर्चा में चले गए थे। उसके बावजूद उन्हें अध्यक्ष का यह महत्वपूर्ण पद क्यों सौंपा गया?

(थोड़ा ठहरकर) ..देखिये, मेरा मानना है कि.. उनके उस कालखंड को देखें और बाकी के कालखंड को देखा जाए तो कहीं ऐसा नहीं लगता है कि ‘कार्यकर्ता’ (रवींद्र राय) में कोई कमी है। हां यह है कि उस समय की परिस्थिति में उन्होंने जो निर्णय लिया था.. मुझे जहां तक स्मरण है, वह हमेशा कोशिश करते रहे कि बाबूलाल जी को वापस संगठन में ले आयें, और संगठन फिर से काम करे। यह सूचना मुझे उस समय भी मिलती रहती थी, उनका यह प्रयत्न होता रहा था। लेकिन उसमें सफल नहीं हुए, और लौट आये। ..तो इस बार उनके चयन के वक्त लोगों ने इस पक्ष को भी जरूर देखा होगा.. खासकर उन पहलुओं को भी देखा होगा जिसमें उन्होंने (रवींद्र राय) लगातार लोगों के संपर्क में रहकर यह प्रयास करते रहे कि पार्टी में हमलोग (मरांडी जी के साथ) फिर से वापस आ जाएं। लेकिन उन दिनों यह परिस्थिति नहीं बन सकी। कई कारण होंगे.. कई बातें होंगी।

अब कुछ दूसरे सवाल.. जेएमएम (झारखंड मुक्ति मोर्चा) से आपके अलगाव का क्या कारण रहा?

देखिये, आप स्वतः इस बात का अनुमान लगा सकते हैं कि इस अलगाव का क्या कारण था!.. इस राज्य को अ-स्थिर.. (थोड़ा ठहरकर) क्या राज्यपाल शाषण सही है?.. फिर चुनाव कराने का क्या मतलब.. इसी शासन को मान लेना चाहिए इस देश में। यदि नहीं, तो कारण क्या था?.. (ठहरकर) मुझे ऐसा लगता है कि जेएमएम में भी कुछ लोग षडयंत्र के शिकार हुए। और जेएमएम खुद भी, इस राज्य के भविष्य को लेकर उन बातों का ध्यान नहीं रख सका कि झारखंड अलग राज्य बनाने का औचित्य क्या था। ..तात्कालिक चीजों को देखते हुए, दीर्घकालिक चीजों को नजरंदाज किया गया। मैं कहूंगा कि राज्य के अहम् दीर्घकालिक कार्यक्रम सामने हों तो तात्कालिक या अल्पकालिक विषयों को, जो निजी संबंध रखता हो, गौण करना चाहिए था।

थोड़ा और स्पष्ट करें.. मुख्य कारण क्या था आपके और जेएमएम के अलागाव का?

देखिये, मुझे ऐसा लगता है कि इस राज्य में दीर्घकालिक चीजों को देखते हुए समझ बढ़ाने की जरूरत है।

क्या आपको नहीं लगता कि जनता में यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि आखिर क्या कारण था कि अचानक एक चुनी हुई सरकार सत्ता से हट गई?

मैं पहले भी स्पष्ट कर चुका हूं। अब इससे आगे ‘वे’ ही ज्यादा अच्छा बता सकते हैं।

कौन?

जिनलोगों ने सरकार से समर्थन वापस लिया।

लोकसभा चुनाव सामने है। क्या आनेवाले समय में एकबार फिर जेएमएम और भाजपा एकजुट हो सकते हैं?

देखिये, यह इस समय कहना मुश्किल है!.. (थोड़ा हंसते हुए) लेकिन, केंद्रीय नेतृत्व क्या सोंचता है, नहीं सोंचता है, यह उस स्टेज की बात होगी। राज्यस्तर पर इस संदर्भ में कोई कमेंट नहीं किया जा सकता है।

अब थोड़ा झारखंड के बारे में.. मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के बाद, आज आपको कौन सी बातें सालती हैं। राज्य के लिए ऐसा कुछ महत्वपूर्ण काम जो आप नही कर पाये..?

देखिये, काम तो मैं ट्रैक पर लेकर आ गया था। क्योंकि हमलोगों को बिल्कुल अव्यवस्थित ढ़ांचा में मिला था यह राज्य। उसे व्यवस्थित करने में समय तो लगा, लेकिन ट्रैक पर आ गया। कई महत्वपूर्ण फैसले हुए, नीतियां बनीं और काम करने की पद्धत्ति जोर पकड़ी। आत्मविश्‍वास जगा.. जब मैं आया था तो झारखंड ‘पब्लिक आई’ (जनता के बीच छवि) में बहुत खराब था। कन्फिडेन्स लेवेल बहुत नीचे था। हमलोगों ने वह कन्फिडेंस बनाया। बहुत सारे पदाधिकारियों ने अच्छी भूमिका निभायी और काम आगे बढ़ा।

कौन सी चीजें बच गईं?

पावर में.. जो ऐक्चुअल ट्रान्समिशन का काम था वह तो अब पूरा हो जाएगा। इसी पर डिसिजन नहीं हो रहा था। मुझे दुःख इस बात का है कि इसपर डिसिजन लेने में नौ महीनों तक लोगों ने ‘इधर से उधर’ करने की कोशिश की। लेकिन हुआ!.. और कुछ योजनाएं.. देखिये, डेवेलॉपमेंट का ऐसा मॉडेल होना चाहिए कि जनता.. यूथ और यहां के इन्फ्रास्ट्रक्चरल डेवेलॉपमेंट को लिंक करने की जरूरत है। इससे आम युवा प्रोडक्टिव हो जाएगा। इसके लिए इन्फ्रास्ट्रक्चरल डेवेलॉपमेंट, मोटिवेशनल प्रोग्राम और यूथ स्किल डेवेलॉपमेंट को, सब एकसाथ चलाना होगा। वह हमने प्लान किया था। इसलिए मैंने यूथ में स्किल डेवेलॉपमेंट की बात की थी। आज कोई इसपर बात ही नहीं कर रहा है!..

आज की तारीख में राज्य में राष्ट्रपति शासन है। अब क्या होना चाहिए? क्या चुनाव से पहले सरकार बन पाएगी?

मेरा तो मत था कि विधानसभा भंग कर चुनाव कराया जाना चाहिए था। लेकिन, इस बीच सरकार बनाने की कोशिश होती है तो यह कोशिश राज्य की जनता के हित में नहीं होगी।

आपकी समझ में यह राष्ट्रपति शासन और कितना चलेगा.. क्या मांग करेंगे आप?

देखिये, छह महीना तो राष्ट्रपति शासन चलेगा। और एक एक्सटेंशन मिल गया तो एक साल। लेकिन मैं तो यही कहूंगा कि जल्द से जल्द चुनाव होने चाहिए।

चुनाव होता है तो भाजपा का गठबंधन किस किस के साथ होगा?

होगा। लेकिन अभी बताना जल्दबाजी होगी।

एक अनुभवी शासक होने के नाते वर्तमान शासनतंत्र को आप कोई संदेश देना चाहेंगे?

आज मैं जो देख रहा हूं.. कुछ दिनों पहले तीनों फ्लाईओवर निर्माण को ड्रॉप कर दिया गया था। अब खबरें आ रही हैं कि एक फ्लाईओवर को अनुमति दी गयी। जबकि, पिछली सरकार ने तीनों के निर्माण पर काफी काम किया था। कन्सल्टेंट बहाल करके फिजिबिलिटी हुई, पूरी डिटेलिंग के साथ, उसपर सैद्धांतिक सहमति दी गयी। इसके बावजूद उसको पूरा नहीं करते हैं तो यह समय जाया करना होगा। कल होकर पॉपुलर गवर्नमेंट आयेगी और उसे बनायेगी तो उसकी लागत बढ़ जाएगी। इसलिए मैं कहूंगा कि पहले से तैयार फाइव ईयर प्लान में किसी तरह की कटौती नहीं करनी चाहिए।

अभी इस राष्ट्रपति शासन के काम काज पर आपकी कोई खास टिप्पणी?

अभी मैं कुछ नहीं कहूंगा, जल्दबाजी होगी। कई चीजें हैं.. अभी मैं देख रहा हूं।

चलते चलते एक सवाल.. आपकी पार्टी के रघुवर दास गैर आदिवासी मुख्यमंत्री की बात बार बार उठाते हैं, क्या कहेंगे?

संविधान में न तो आदिवासी की बात की गई है न गैर आदिवासी की। नेता विधायक दल का चुनाव विधायक करते हैं। इसमें कोई भी हो सकता है। लेकिन, इसे इस रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि हर जाति को प्रतिनिधित्व का मौका मिले। देखिये, हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा जातियां हैं। उस हिसाब से पांच हजार साल लगेगा सब जाति को प्रतिनिधित्व देते देते। मुख्यमंत्री का चुनाव योग्यता पर होना चाहिए। क्षमता है तो सामने आये! 

..ताकि आतंक का मंजर नहीं मानवीयता मंजरित हो!

मंजर इमाम की गिरफ्तारी हुई। होनी चाहिए, अगर हैदराबाद बम ब्लास्ट या अन्य घटनाओं में उसकी संलिप्तता के पुख्ता सबूत जांच एजेंसियों के पास हैं। उसे जांच पड़ताल के लिए दक्षिण के उन राज्यों में ले जाया गया है जहां वह आतंकी घटनाएं हुई। बच गए हैं तो उसके परिवार के लोग। पांच युवा भाई, तीन बहनें और गंभीर बीमारी से ग्रस्त बूढ़ी मां। वे मानने को तैयार नहीं कि मंजर किसी भी गैरकानूनी घटना में शामिल हो सकता है। उर्दू में गोल्ड मेडलिस्ट मंजर तो क्रिकेटर बनना चाहता था। क्या से क्या हो गया!..

झारखंड की बेटियां मानव तस्‍करी के शिकंजे में

|| न्यूज विंग : रांची||
पांच साल पहले सिस्टर जेम्मा ने कहा था, हर साल झारखंड से 30 हजार लड़कियां दिल्ली व अन्य महानगरों में ले जायी जाती हैं। तब, सामाजिक कार्यकर्ता जेम्मा के उस बयान पर जबरदस्त विरोध के स्वर उभरे। सरकारी महकमे ने खंडन किया, प्रतिकियाएं दी। आधारहीन आंकड़ा बताया गया।

झारखंड के खूंटी में फिर से माओवादियों की दस्तक

न्यूज विंग रांची/खूंटी
झारखंड में माओवाद बेखौफ पसरता ही जा रहा है। कभी कभार पुलिस द्वारा नियंत्रण की कुछ कोशिशें होती हैं लेकिन नतीजा रेत की इमारत जैसा साबित हो रहा है। माओवादियों का तुरंत जवाब होता है.. तू डाल डाल, मैं पात पात!.. पुलिस ने खूंटी से दस कथित उग्रवादियों का आत्मसमर्पण करवाया। जवाब में माओवादी अब उसी खूंटी के गांवों में खुलकर दवाब बना रहे हैं, अपने दस्तों में नई बहालियों के लिए। झारखंड में ऐसा पहली बार नहीं हुआ। कई इलाकों में नक्सलियों के भय से युवा पुरूष अपना गांव छोड़ पलायन करते रहे हैं। गांव के गांव खाली होते रहे हैं। हालांकि, खूंटी में अभी वह नौबत नहीं। न्यूज विंग संवाददाता रणजीत वर्मा ने खूंटी के कुछ गांवों का भ्रमण कर यह रिपोर्ट तैयार की है।

जेएमएम सरकार से अलग, इस्‍तीफा सौंप मुंडा बोले भंग हो विधानसभा

|| रणजीत वर्मा ||
- मुंडा बने रहेंगे कार्यकारी सीएम -
- देर शाम कांग्रेस प्रदेश अध्‍यक्ष प्रदीप बलमुचू मिलेंगे गुरूजी से -
रांची : मंगलवार सुबह नौ बजे के बाद राजनीतिक परिस्थितियां बड़ी तेजी से बदलीं। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने गठबंधन सरकार से समर्थन वापस ले लिया है। और उसे लगता है नयी सरकार उसके नेतृत्‍व में बनेगी। पर अर्जुन मुंडा ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश राज्‍यपाल से कर दी है। यानी राज्‍यपाल तय करेंगे कि राज्‍य में नयी सरकार बनाने वाली पार्टी को मौका दिया जाए, तृतीय झारखंड विधानसभा भंग कर दी जाये या फिर राष्‍ट्रपति शाषण की अनुशंसा हो।

संकट में गठबंधन सरकार, झामुमो कल सौंपेगा समर्थन वापसी का पत्र

|| रणजीत वर्मा || रांची : दो दिनों से चल रहे सस्‍पेंस को तोड़ते हुए झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने मुंडा सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी है। जेएमएम प्रमुख शिबु सोरेन ने प्रेस प्रतिनिधियों से टूक कहा कि भाजपा से बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं बची है। इसलिए मंगलवार को पार्टी राजभवन में समर्थन वापसी का पत्र सौंपा देगी। जिसके बाद गठबंधन सरकार अल्‍पमत आ जाएगी। इधर भारतीय जनता पार्टी खेमे से खबर है कि झामुमो से पहले सीएम अर्जुन मुंडा राज्‍यपाल को अपना इस्‍तीफा सौंप सकते हैं।

28-28 महीने पर कोई बात नहीं हुई थी, कांग्रेस चाहे तो आगे आये सरकार बनाये: मुख्‍यमंत्री मुंडा

रांची, 03 जनवारी 2013: अचानक एक प्रेस कांफ्रेन्‍स बुलाकर मुख्‍यमंत्री अर्जुन मुंडा ने बताया कि उनकी सरकार में सहयोगी दल झामुमो की मांग पर उन्‍होंने लिखित तौर पर जवाब दे दिया है। मुंडा ने स्‍पष्‍ट किया कि सरकार बनाते वक्‍त 28 28 महीनों के शासन वाली कोई बात हुई ही नहीं थी। मुंडा ने मौके पर ही कह दिया कि कांग्रेस चाहे तो आगे आये और इस हालात में राज्‍य को स्थिर सरकार दे। रांची के कांके रोड स्थित मुख्‍यमंत्री आवास में खचाखच भरे प्रेस कान्‍फ्रेन्‍स में अर्जुन मुंडा राज्‍य के अस्थिर राजनीतिक माहौल पर अपना बयान दे रहे थे।

झारखंड राजनीतिक संकट : 10 जनवरी से पहले नहीं होगा कोई बड़ा फैसला

|| झारखंड में राजनीतिक संकंट ||
रांची : गहराते राजनीतिक संकट के बीच सीएम अर्जुन मुंडा, डिपुटी सीएम हेमंत सोरेन और झामुमो सुप्रीमो शिबु सोरेने के बीच घंटों चली बातचीत के बाद रविवार (30 दिसंबर) दोपहर स्‍पष्‍ट हो गया कि 10 जनवरी 2013 से पहले कोई बड़ा फैसला नहीं लिया जाएगा।

बांग्लादेश में फैक्टरी में आग, 112 मरे

ढाका | बांग्लादेश की राजधानी ढाका के बाहरी इलाके में कपड़े की आठ मंजिला फैक्टरी में आग लगने से कम से कम 112 लोगों की मौत हो गई। यह जानकारी एक अधिकारी ने रविवार को दी।