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Opinion

Article by our Columnists

विलंबित न्याय, यानी अधूरा न्याय

|| श्रीनिवास ||
आखिरकार वर्ष 1993 के मुंबई सीरियल बम विस्फोट मामले में अंतिम, यानी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया। सुप्रीम कोर्ट ने यायूब मेनन की फांसी की सजा को बरकरार रखते हुए दस अन्य लोगों को टाडा कोर्ट से मिली मृत्यु दंड की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। मगर वे मृत्यु पर्यंत जेल में रहेंगे। अशर्फुल रहमान अजिमुल्ला की उम्रकैद को दस वर्ष में तब्दील कर दिया, जबकि इम्तियाज घावटे को बरी कर दिया। लेकिन मीडिया में इन सबके बजाय सिने अभिनेता संजय दत्त छाये हुए हैं। उनकी ख्याति को देखते हुए यह एक हद तक तो स्वाभाविक है, मगर इस कारण इस मामले से जुड़े अन्य तमाम मुद्दे गौण हो गये हैं।

पूरब (बांग्लादेश) से आती बदलाव की आहट

|| श्रीनिवास ||
भारत में ऐसा कहा और माना जाता रहा है कि बंगाल जो आज सोचता है, देश बाद में उसका अनुसरण करता है। हालांकि अब यह धारणा कहावत के रूप में ही रह गयी है। मगर पिछले कुछ दिनों से सुदूर बंगाल, यानी बांग्लादेश, से उक्त धारणा के अनुरूप सकारात्मक खबरें मिल रही हैं, जो धार्मिक जुनून और असहिष्णुता के इस दौर में विरल ही होती जा रही हैं।

अफजल को फांसी : न्यायिक या राजनीतिक?

|| श्रीनिवास ||
संसद पर हमले की साजिश में शामिल अफजल गुरू को फांसी की खबर यूं तो पुरानी हो चुकी है, मगर इसका असर लंबे समय तक महसूस किया जायेगा। उल्लेखनीय है कि अफजल को दिये जाने पर देश और जम्मू-कश्मीर में दो तरह की और परस्पर विपरीत प्रतिक्रिया हुई है, मगर इससे हमारे ‘राष्ट्रभक्त’ जरा भी परेशान नहीं हैं। लेकिन इस फांसी दिये में बरती गयी जल्दबाजी और गोपनीयता से कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं, जिसका संतोषप्रद जवाब भारत सरकार और इस फांसी पर जश्‍न मना रहे लोगों की ओर से अब तक नहीं दिया गया है। ये सवाल कानून और राजनीति से संबद्ध हैं। मृत्युदंड से जुड़े नैतिक-मानवीय सवाल तो इतर हैं।

गर्व से कहो, हम ‘असहिष्णु’ हैं

|| श्रीनिवास ||
हम यह कहते नहीं अघाते कि भारत विश्‍व का ‘सबसे बड़ा’ लोकतांत्रिक देश है। यह और बात है कि ‘सबसे बड़ा’ कोई इतरानेवाला विशेषण नहीं है, बल्कि तमाम प्रयासों के बावजूद आबादी वृद्धि की रफ्तार रोक पाने में हमारी विफलता के कारण हमारी विशाल जनसंख्या है। सच यह है कि हमने लोकतांत्रिक शासन प्रणाली अपना भर ली है, लोकतांत्रिक मूल्यों को हम पूरी तरह आत्मसात नहीं कर पाये हैं। सभी जानते और मानते हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी लोकतंत्र और सभ्य समाज व व्यवस्था की आवश्यक शर्त है। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि असहमति और खुद से भिन्न विचार के प्रति सम्मान व सहिष्णुता लोकतंत्र की मूल मान्यता है। लेकिन हाल की कुछ घटनाओं से सिद्ध हो गया है कि हम भारत के लोग मूलत: असहिष्णु हैं और लगातार और भी असहिष्णु होते जा रहे हैं।

स्वतंत्र पुलिस या पुलिसिया राज?

|| श्रीनिवास || 
भारत में तरह तरह के सुधारों - राजनीतिक सुधार, न्यायिक या कानूनी सुधार, प्रशासनिक सुधार, चुनाव सुधार तथा पुलिस सुधार आदि - की चर्चा अक्सर होती रहती है। दिल्ली में हुए गैंग रेप के बाद पुलिस सुधार पर अधिक जोर है। उस हादसे के बाद गठित जस्टिस वर्मा कमेटी ने जो सुझाव दिये, उनमें भी एक प्रमुख सुझाव यह था कि पुलिस को सरकार के नियंत्रण से मुक्त कर दिया जाये; और इस पर, टीवी चैनलों पर जारी बहसों के दौरान, अमूमन आम सहमति दिख रही है। इसलिए कि लोगों की नजर में राजनीतिक जमात की साख बेहद खराब हो चुकी है; और देश-समाज की तमाम गड़बड़ियों के लिए हम सत्ता प्रतिष्ठान या अपने शासकों को जवाबदेह मानने लगे हैं। नतीजतन हम यह भी भूल जाते हैं कि इसी पुलिस पर हम आये दिन संवेदनहीन, भ्रष्ट, जनविरोधी व जुल्मी होने के आरोप लगाते रहते हैं। तो क्या पुलिस में ये सारी गड़बड़ियां महज इस कारण हैं कि वह सरकार, यानी राजनीतिक नेतृत्व के नियंत्रण में है? और क्या नियंत्रण मुक्त होते ही हमारी वही पुलिस ईमानदार, जनपक्षी और सक्षम हो जायेगी?

अपने गेम प्लान में कांग्रेस कामयाब

|| विनोद कुमार ||

कांग्रेस की जो मंशा थी वह पूरी हुई। उनके ही पियादे की बदौलत भाजपा ने झारखंड की राजनीति में जो उन्हें लगड़ी मारी थी, झारखंड में सरकार बना कर उन्हें जो शिकस्त दी थी, उसका बदला उन्होंने ले लिया। झामुमो के छोटे सरकार की पीठ थपथपा कर पहले तो अर्जुन मुंडा की सरकार गिरा दी, राष्ट्रपति शासन की आड़ में झारखंड की सत्ता पर काबिज हो गये और अब झामुमो को उनकी औकात बताई जा रही है।

Bribes don't always work, says NRI academic

London : New research by an Indian-origin academic has shown that companies bribing their way to contracts underperform for up to three years before and after securing the work for which the bribe was paid.

Role of Wives : Friend? Philosopher? Guide? or All?

|| Swati Bhardwaj ||
Most of the audience would not contest the traditional bread-winning roles of the husband irrespective of their genders. Of late, there has been a trend for the ladies to come in professional domains as Indira Nooyis and Chandra Kochers have proliferated but the statistics is largely skewed towards men.

The Buck Stops at Your Door Mr. Chidambaram

|| Gladson Dungdung ||
The Adivasis live and die with the Nature. They believe in the super natural God, therefore; they worship the Nature in every occasion. The Adivasis’ economy is totally based on the Agriculture and Forest, which also depends merely on rainfall. Therefore, the villagers get together and pray to their Super Natural God before and after the harvesting.

Development without Displacement is possible

|| Stan Swamy ||
People at the grassroots should plan & implement development programmes with technical & financial assistance from the government -