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Opinion

Article by our Columnists

राज्यसभा की कार्यवाही में कुछ भी असाधारण नहीं : सोमनाथ

कोलकाता, 30 दिसम्बर | लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने शुक्रवार को कहा कि राज्यसभा में गुरुवार रात को जो कुछ भी हुआ, वह असाधारण नहीं था। वास्तव में सरकार के साथ-साथ विपक्षी दल भी राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश में जुटे थे। चटर्जी ने कहा, "इसमें कुछ भी असाधारण नहीं था। मैं यह नहीं कह रहा कि इस तरह की चीजें नियमित तौर पर होती हैं, लेकिन ऐसा होता है। इसमें भी कुछ भी ऐतिहासिक नहीं है.. इसे लेकर अनावश्यक ही शोर मचाया जा रहा है।"

Lokpal Is Still A Long Haul, But Anna Damages His Cause

- by Amulya Ganguli
Considering that Anna Hazare is dissatisfied with the Lokpal bill presented to parliament, it is obvious that a quick resolution of the confrontation between him and the government is not feasible. In fact, the scene can take a turn for the worse if, for one, Anna's fast has an adverse effect on his health, as his doctors have warned. And, for another, if the proposed protest outside Sonia Gandhi's and Rahul Gandhi's houses leads to violence.

2014-कौन बनेगा प्रधानमंत्री? : आपकी धड़कनें शुरू होती हैं अब

|| अमलेन्दु उपाध्‍याय || 
2014 का लोकसभा चुनाव अभी बहुत दूर है लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ से ही चुनाव की तैयारियां जारी हैं। भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में 'पीएम इन वेटिंग लिस्ट के अपने प्रतिद्वंदी नरेंद्र मोदी की गरिमामयी अनुपसिथति में लालकृष्ण अडवाणी ने गर्जना की कि बहुत जल्द मध्‍यावधि चुनाव होंगे। अब मध्‍यावधि चुनाव भले ही हों या न हों लेकिन देश के सियासी माहौल को देखकर लग तो यही रहा है कि चुनावी युद्ध का मैदान सज चुका है। हालांकि ऐसा माहौल बनने के लिए अकेले भाजपा ही दोषी नहीं है बलिक काफी हद तक यूपीए सरकार के अयोग्य और जनाधारविहीन मैनेजर तथा 10 जनपथ और सात रेसकोर्स के बीच बढ़ता तनातनी का माहौल भी जिम्मेदार है।

दो आंदोलनों की दास्तान

मणिपुर वूमेन गन सर्वायवर्स नेटवर्क की संस्थापक बीनालक्ष्मी नेप्राम ने मुझसे अपनी सुपरिचित व्यग्रता के साथ पूछा: ‘आप इरोम शर्मिला के एक दशक से चल रहे अनशन का कवरेज उतनी ही मुस्तैदी से क्यों नहीं करते, जैसा आपने अन्ना हजारे के तेरह दिन के अनशन का किया था?’ एक लाइव प्रोग्राम में स्टेज पर पूछे गए इस सवाल से बच निकलने की कोई गुंजाइश नहीं थी। मैंने एक कमजोर-सा जवाब दिया: ‘शायद इम्फाल की तुलना में रामलीला मैदान टीवी स्टूडियो के अधिक निकट है।’

Killing, Denial And Manipulation

|| by Gladson Dungdung || 
30 year-old Mangri Honhanga along with her 4 month-old son Dula Honhanga and other family-members had desperately come to Ranchi the capital city of Jharkhand after travelling for more than 6 hours right from Saranda forest in West Singhbhum district of Jharkhand last week with the hope of getting justice. Both the mother and child have been suffering from illness – Dula is grade-3 malnourished patient and Mangri has been suffering from anaemia but they have no choice rather than facing all kinds of sufferings.

क्‍या भारतीय इतना मैच्‍युअर हुए हैं कि लोकतंत्र चला सके?

अन्‍ना के बहाने..
अब तो सचमुच यह संदेह गहराने लगा है कि क्‍या भारत वाकई अभी लोकतंत्र का हकदार था? क्‍या हम भारतीयों में लोकतंत्र प्रणाली की समझ है, इस प्रणाली के जरिए प्रबंधन का माद्दा है हममें? ..हम भी विचित्र हैं. हर पांच साल बाद लोकतंत्रीय प्रणाली से चुनाव का मौका मिलता है. लेकिन, मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की संख्‍या लगातार गिरती जा रही है. शहरों तक में मतदान का प्रतिशत बामुश्किल 35-40 पहुंचने लगा है. नतीजन, संसद-विधानसभाएं

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