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Opinion

Article by our Columnists

ये अखिलेश की जीत नहीं माया की हार है

|| अमलेन्दु उपाध्याय ||
ऐन होली से पहले उत्तर प्रदेश में छप्परफाड़ मिली सफलता से समाजवादी पार्टी में खुशी का माहौल है। हो भी क्यो न? आखिर लगातार पांच साल सत्ता से बाहर रहकर पहली बार पार्टी प्रदेश की सरकार में आ रही है। लेकिन जितना खुशी का माहौल सपा में है उससे कई लाख गुना खुशी का माहौल हमारे मीडिया में व्याप्त है। बड़े-बड़े दिग्गज सपा की इस जीत पर युवराज अखिलेश की शान में कसीदे पढ़ रहे हैं और अखबारों के मुखपृष्ठ पर विशेष संपादकीय लिखकर ये बताने का कार्य किया जा रहा है गोया प्रदेश में कोई बहुत बड़ी क्रांति हो गई है और बस उत्तर प्रदेश अब उत्तम प्रदेश बन गया है।

Indian cricket team is due for a revamp

|| P. Vijay Raghavan ||
Ranchi: Dhoni’s brigade no longer appears to be even a shade of their World Cup form. The recently concluded test series against both England and Australia exposed their brittleness. Though to an extent it was repaired by the clean sweep against the visiting English Team, the cracks started to seriously emerge in Australia.

झारखंड के आदिवासियों को संवैधानिक एवं कानूनी सुरक्षा

|| स्टेन स्वामी ||
वैधानिक तरीके से चुनी गयी एक सरकार को हमेंशा संविधान और देश के कानून की रक्षा करनी चाहिए। चलिये हम एक एक करके विश्लेषण करें:
1. संविधान की पांचवी अनुसूची अनुच्छेद 244 (1) कहता है कि प्रत्येक राजय में जहां अनुसूचित क्षेत्र है एक जनजातीय सलाहकार परिषद की स्थापना होगी। जिसके सदस्यों की संख्या 20 से कम नहीं होगी और जिसमें तीन चैथाई सदस्य राज्य के विधान सभा के आदिवासी विधायक होंगे (4. (1)) यह जनजातीय सलाहकार परिषद का कत्र्तव्य होगा कि राज्य के आदिवासियों के कल्याण और प्रगति के मुद्दों पर सलाह देना जैसे कि राज्य के राज्यपाल द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है। (4.(2)) राज्य का राज्यपाल जमीन हस्तांतरण को आदिवासियों के मध्य या किसी अन्य के लिये प्रतिबंधित या सीमित कर सकता है (5.(2).(र) और कोई नियम नहीं बनाया जायेगा जब तक कि नियम बनाने वाले राज्यपाल जनजातीय सलाहकार परिषद से सलाह मशविरा कर न ले (5.(5))

Where Ants Drove Out Elephants

by Stan Swamy
|| Story of people’s resistance to displacement in Jharkhand ||
Displacement is painful for any body. To leave the place where one was born and brought up, the house that one built with one’s own labour can be even more painful. Even more, when no alternate resettlement has been worked out and one has nowhere to go, it is most painful. And when it comes to the Indigenous Adivasi People for whom their land is not just an economic commodity but a source of spiritual sustenance, it can be heart-rending.

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