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Opinion

Article by our Columnists

अराजक होती न्याय व्यवस्था

गुआहाटी हाईकोर्ट के गत आठ नवंबर के एक फैसले से भ्रष्टाचार या अन्य संगीन आपराधिक मामलों में फंसे लोगों, नेताओं व नौकरशाहों की ‘बांछें’ (वे शरीर में जहां भी होती हों) खिल गयी हैं. इसलिए कि हाईकोर्ट की एक दो सदस्यीय बेंच ने देश की सबसे प्रमुख और एकमात्र जांच एजेंसी सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेटिंग या केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) को असंवैधानिक करार दे दिया है!

नरेंद्र दाभोलकर को सलाम!‘

समाज से अज्ञान और अंधविश्वासस का अंधेरा दूर करने के लिए आजीवन लड़ते रहे सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर की गत 20 अगस्त को पूना में हत्या कर दी गयी। वे सुबह की मार्निंग वाक पर निकले थे, तभी बाइक पर सवार दो लोगों ने उन्हें गोली मार दी। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक हत्यारों का कोर्इ सुराग नहीं लग

इन फैसलों पर ताली बजाने से पहले..

|| श्रीनिवास ||
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीन कथित ऐतिहासिक फैसलों पर राजनीतिक दलों, मीडिया और नागरिक समाज के मान्य बौद्धिकों की प्रतिक्रिया को देख, सुन और पढ़ कर मैं कुछ शर्मिंदगी और संकोच का अनुभव कर रहा हूं। इसलिए कि मैं ताली बजानेवालों की इस भीड़ में शामिल नहीं हो पा रहा हूं। फिर भी अच्छी नीयत से दिये गये इन अतिवादी फैसलों से अपनी विनम्र असहमति व्यक्त करने की कोशिश और सुधी पाठकों से इस पर थोड़े ठंडे दिमाग से विचार करने की गुजारिश करना चाहता हूं।

आदिवासियों की लाश पर विकास की इमारत

- ग्लैडसन डुंगडुंग- 2 जनवरी, 2006 को ओडिसा के जजपुर जिले स्थित कलिंगानगर में टाटा कंपनी के प्रस्तावित ग्रीन फिल्ड परियोजना का विरोध करने वाले आदिवासियों पर बम एवं बंदूक से हमला किया गया, जिसमें 19 आंदोलनकारी मारे गए। इतिहास बताता है कि जहां-जहां आंदोलनकारी शहीद हुए हैं वहां उनकी जमीन बच गई है।

विलंबित न्याय, यानी अधूरा न्याय

|| श्रीनिवास ||
आखिरकार वर्ष 1993 के मुंबई सीरियल बम विस्फोट मामले में अंतिम, यानी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया। सुप्रीम कोर्ट ने यायूब मेनन की फांसी की सजा को बरकरार रखते हुए दस अन्य लोगों को टाडा कोर्ट से मिली मृत्यु दंड की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। मगर वे मृत्यु पर्यंत जेल में रहेंगे। अशर्फुल रहमान अजिमुल्ला की उम्रकैद को दस वर्ष में तब्दील कर दिया, जबकि इम्तियाज घावटे को बरी कर दिया। लेकिन मीडिया में इन सबके बजाय सिने अभिनेता संजय दत्त छाये हुए हैं। उनकी ख्याति को देखते हुए यह एक हद तक तो स्वाभाविक है, मगर इस कारण इस मामले से जुड़े अन्य तमाम मुद्दे गौण हो गये हैं।

पूरब (बांग्लादेश) से आती बदलाव की आहट

|| श्रीनिवास ||
भारत में ऐसा कहा और माना जाता रहा है कि बंगाल जो आज सोचता है, देश बाद में उसका अनुसरण करता है। हालांकि अब यह धारणा कहावत के रूप में ही रह गयी है। मगर पिछले कुछ दिनों से सुदूर बंगाल, यानी बांग्लादेश, से उक्त धारणा के अनुरूप सकारात्मक खबरें मिल रही हैं, जो धार्मिक जुनून और असहिष्णुता के इस दौर में विरल ही होती जा रही हैं।

अफजल को फांसी : न्यायिक या राजनीतिक?

|| श्रीनिवास ||
संसद पर हमले की साजिश में शामिल अफजल गुरू को फांसी की खबर यूं तो पुरानी हो चुकी है, मगर इसका असर लंबे समय तक महसूस किया जायेगा। उल्लेखनीय है कि अफजल को दिये जाने पर देश और जम्मू-कश्मीर में दो तरह की और परस्पर विपरीत प्रतिक्रिया हुई है, मगर इससे हमारे ‘राष्ट्रभक्त’ जरा भी परेशान नहीं हैं। लेकिन इस फांसी दिये में बरती गयी जल्दबाजी और गोपनीयता से कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं, जिसका संतोषप्रद जवाब भारत सरकार और इस फांसी पर जश्‍न मना रहे लोगों की ओर से अब तक नहीं दिया गया है। ये सवाल कानून और राजनीति से संबद्ध हैं। मृत्युदंड से जुड़े नैतिक-मानवीय सवाल तो इतर हैं।

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