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Opinion

Article by our Columnists

क्यों न अमेरिका की तरह अपनाई जाए राष्ट्रपति प्रणाली?

नई दिल्ली: आज अपने देश में अमेरिका की तर्ज पर राष्ट्रपति शासन प्रणाली अपनाए जाने की जरूरत महसूस की जाने लगी है, क्योंकि हमारी मौजूदा संसदीय प्रणाली में ऐसी कई खामियां हैं जो हमें इसका विकल्प तलाशने को कह रही हैं। इस बारे में कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो हर भारतीय के जहन में उठ रहे हैं। इन सवालों के जवाब

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मोदी सरकार की सबसे बड़ी असफलता बनने की ओर कश्मीर

देश में आर्थिक विकास को गति देने, उद्योगों को बढ़ावा देने, निवेश को आकर्षित करने और देश के अंदर सकारात्मक माहौल तैयार करने को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर शायद ही संदेह किया जा रहा हो, लेकिन जम्मू एवं कश्मीर के मौजूदा हालात में सुधार के लिए अगर जल्द ही कोई कदम नह

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Conundrum over Triple Talaq!

Ever since Rashtrya Muslim Mahila Manch, an outfit of RSS, approached the Supreme Court of India in 2016, the NDA Union Government has been indulging in aggressive campaign against Muslims over instant Triple Talaq and how it endeavours to get Muslim women justice with equity and fair-play.

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तमिलनाडु : बदहाल हैं अम्मा के किसान पुत्र

देश की अर्थव्यस्था में कृषि का व्यापक योगदान है, लेकिन कृषि और किसान कभी भी राजनीति की चिंता नहीं बना, हालांकि उसकी बदहाली पर राजनीति खूब की जाती है और घड़ियाली आंसू बहाए जाते हैं। किसानों की अंतहीनपीड़ा को केवल वोट बैंक तक सीमित रखा जाता है।

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माल्या को ला पाने की राह नहीं आसां

विजय माल्या ने शराब कारोबारी से उद्योगपति की बनने की चाह में अपने फरेबी पंखों से यूं उड़ान उड़ी कि चुटकियों में देश को 9 हजार 400 करोड़ रुपये का चूना लगा दिया। शराब कारोबारी को भारत में अच्छी निगाह से नहीं देखा जा रहा था, सो उसने दूसरी ओर रुख किया और देश छोड़कर लंदन में जा बसा।

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नोटबंदी सही तो शराबबंदी क्यों नहीं

उच्चतम न्यायालय के एक आदेश के अनुपालन में हाईवे और राजमार्गो के किनारे स्थित भिन्न-भिन्न कोटि के मदिरालय एक अप्रैल से हटा दिए गए। मुख्य मार्गो पर बढ़ रही दुर्घटनाओं को रोकने और नागरिकों के जान माल की सुरक्षा के उद्देश्य से उठाए गए इस साहसिक कदम की जहां एक तरफ मुक्त कंठ से सराहना हो रही है, वहीं द

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ईसाई कार्डिनल टोप्‍पो का मास्‍टर स्‍ट्रोक और भयभीत भाजपा

झारखंड के भूमि रक्षा कानूनों - छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियम 1908 एवं संताल परगना काश्तकारी अधिनियम 1949 का भाजपा सरकार के द्वारा जनभावनाओं के खिलाफ किये गये संशोधनों पर ईसाई धर्मगुरू कार्डिलन तेलेस्फोर पी.

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आरक्षण : फिर वही बहस, फिर वही तर्क, फिर वही दुराग्रह!

आरक्षण पर इतनी बहस हो चुकी है कि इसके पक्ष और विरोध में नया कहने को कुछ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट इसे संविधानसम्मत ठहरा चुका है। फिर भी थोड़े अंतराल पर कोई न कोई इसके औचित्य पर सवाल खड़े कर देता है और एक बार फिर बहस प्रारंभ हो जाती है। अभी संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा करने की बात कहते ही

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राजनीतिक अतिवाद बनाम न्यायिक अतिवाद

गत 26 मई को भाजपा या मोदी सरकार के एक साल पूरा कर लेने पर तमाम अखबारों में बड़े बड़े दावे करते, अपनी उपलब्धियां बखानते विज्ञापन छपे हैं। यह कोई नयी बात नहीं है। सभी सरकारें ऐसा करती रही हैं। नयी बात यह है कि इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ/अलावा किसी केंद्रीय या राज्य के मुख्यमंत्री या मंत्र

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हस्तिनापुर में ही रुका अश्‍वमेघ का घोड़ा!

दिल्ली चुनाव के नतीजे की आसानी से और चंद शब्दों में व्याख्या करना फिलहाल किसी के लिए भी कठिन है। फिर भी तत्काल कहना जरूरी हो, तो कहा जा सकता है- अद्भुत.. अकल्पनीय! 70 में 67!

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एक मतदाता की दुविधा : वोट किसे और क्यों दें

बीते नौ नवंबर को मैंने भी, हमेशा की तरह, अपना मत डाल दिया। यह और बात है कि मेरे वोट से लोकतंत्र कैसे मजबूत होगा या झारखंड की तसवीर व तकदीर कैसे बदल जायेगी (जैसा कि मतदाताओं को जागरूक करने के अभियानों के तहत बताया जाता रहा है), न मैं समझ पाया हूं और न जानता हूं। हालांकि मैं भी मानता हूं कि एक नागर

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महज कर्मकांड नहीं है ‘छह दिसंबर’ को याद करना

कुछ शुभेच्छुओं का कहना है कि मैं खामखा मोदी-भाजपा-संघ के पीछे पड़ा रहता हूं, कि मूझे और कोई विषय ही नहीं सूझता लिखने के लिए। हालांकि मैं अन्य मुद्दों पर भी लिखता रहा हूं, फिर भी सोचा था कि इस बार किसी अन्य ज्वलंत मुद्दे पर लिखूं, मगर अचानक ‘छह दिसंबर’ आ जाने से खुद को रोक न सका। कुछ लोगों के लिए य

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एक दल की सरकार बनाम खिचड़ी सरकार

मीडिया की भाषा में कहें तो झारखंड में दंगल जारी है। तमाम दल इस राज्य को स्वर्ग बना देने के दावे और वादे कर रहे हैं। चुनाव आयोग के साथ अनेक सामाजिक संगठनों व संस्थाओं के अलावा मीडिया वाले भी मतदाताओं को जागरूक करने के नेक काम में लगे हुए हैं। तमाम अखबारों में मतदाताओं को उनके कर्तव्य की याद दिलाते

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अनिवार्य मतदान : अव्यावहारिक और असंवैधानिक भी

सफल लोकतंत्र की एक बुनियादी शर्त है जागरूक जनमत; और व्यवहार में इसका एक प्रमाण होता है अधिकाधिक मतदाताओं का मतदान में हिस्सा लेना। अफसोस कि इन पैमानों पर भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, जहां 50 से 60 फीसदी मतदान को ही ‘पर्याप्त’ मान लिया जाता है। मगर क्या इस कमी को अनिवार्य मतदान का कानून बना

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झारखंड में आदिवासियों के वजूद का सवाल

एक लंबे संघर्ष के बाद झारखंडी जनता को उनका राज्य तो मिल गया लेकिन उनके अस्तित्व और अस्मिता का संकट बरकरार है। बल्कि उस पर खतरा और ज्यादा घनीभूत हो गया है। संसदीय राजनीति और पंचायती राज व्यवस्था उनके स्वशासन और स्वाबलंबन की मजबूत परंपरा को तो निरंतर कमजोर कर ही रही है, अबादी के एक बड़े हिस्से को भ्

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काले धन पर कितने गंभीर हैं हम?

विदेशी बैंकों में जमा काले धन के मुद्दे पर जितना शोर हो रहा है, उससे यह आभास होता है, मानो सरकार, तमाम राजनीतिक दल और आम लोग भी मानते हैं कि अपने देश में कोई काला धन नहीं है। भारतीय नागरिकों ने अपनी सारी काली कमाई विदेशी बैंकों में जमा कर रखी है। जबकि सच इसके उलट है। विदेशों में कितने भारतीयों का

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