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Opinion

Article by our Columnists

महान लोकतंत्र से गायब होते मुद्दे

देश में आम चुनाव का बिंगुल फूंका जा चुका है और राजनीतिक पार्टियां एक बार फिर से मैंगो पीपुल को लुभाना शुरू कर दी हैं। इस चुनावी अभियान में सबसे ज्यादा गौर करनेवाली बात यह है कि आम जनता के मुद्दे पूरी तरह से गायब हो चुके हैं और उसकी जगह व्यक्ति मुद्दा बन गया है। ऐसा लगता है कि या तो दुनियां का महा

1984 बनाम 2002

1984 हो या 2002, किसी भी तर्क से आजाद भारत के इन दो शर्मनाक व भयावह दंगों का औचित्य सिद्ध नहीं किया जा सकता; न ही इनकी भीषणता को कम या अधिक ठहराया जा सकता है। बल्कि इन्हें सही अर्थों में दंगा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इन दंगों में दो समुदायों के बीच मारकाट नहीं, लगभग एकतरफा कत्लेआम हुआ था। लूट

तंगदिल दिल्ली

दुनियाभर में रंगभेद और नस्लीय भेदभाव के सबसे प्रखर विरोधी व 'अफ्रीका के गांधी' नेलशन मंडेला ने एक बार अदालत में बयान देते हुए कहा था कि "...मैंने गोरों के प्रभुत्व के खिलाफ लड़ाई लड़ी है और मैंने काले के प्रभुत्व के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी है। मैं एक जनतांत्रिक और सद्भाव की आदर्श स्थित के लिए संघर्षर

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मुंबई: अभिनेत्री ऋचा चड्ढा की पहली पंजाबी फिल्म 'खून आली चिट्ठी' 25 अप्रैल को रिलीज होने की उम्मी...

मुंबई: राकेश ओम प्रकाश मेहरा की फिल्म 'मिज्र्या' से अपने करियर की शुरुआत करने वाली अभिनेत्री सैया...

मराठी मुलगी श्रद्धा कपूर को अपनी भाषा और अपनी संस्कृति से खास लागाव है और इसकी खास झलक देखने मिली...

पुणे: दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फिनिशर माने जाने वाले महेंद्र सिंह धौनी ने एक बार फिर बताया कि उन्हें...

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