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Opinion

Article by our Columnists

देवयानी बनाम नौकरानी

कहा जाता है कि कमजोर को जल्दी और ज्यादा गुस्सा आता है। अमेरिका स्थित भारतीय दूतावास की एक अधिकारी देवयानी खोबरगडे के साथ हुई कथित बदसलूकी पर भारत सरकार सहित पक्ष विपक्ष के नेताओं की ‘कड़ी’ प्रतिक्रिया से भी इस बात की पुष्टि होती है। अब तक अमेरिका की धौंस सहते और लगभग चापलूसी करते रहे भारत का मौजूद

सेक्स, समलैंगिकता और हमारा पाखंड

इतिहास और साहित्य में भी ऐसे रिश्तों का उल्लेख बहुतायत में मिलता है. हम सभी इसे जानते हैं, यह और बात है कि इसे स्वीकार करने और इस पर चर्चा करने से कतराते हैं.

धारा 370 पर बहस के बहाने..

इतिहास-भूगोल  के मामले में नरेंद्र मोदी भले ही कोरे (तक्षशिला, चंद्रगुप्त, सिकंदर और जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि पर उनका ‘ज्ञान’ सर्वविदित है) हैं, इसका मतलब यह नहीं कि वे बुद्धि से भी पैदल हैं। कब और क्या बोलना है, जिससे देश और समाज में विवाद की स्थिति पैदा हो और आरएसएस के घोषित-

‘आप’ में खूबियां तो हैं, मगर..

देश के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों से ऊब चुके लोगों-समूहों के लिए आम आदमी पार्टी (आप) एक उम्मीद की तरह उभरती नजर आ रही है। ’74 के जेपी आंदोलन के बहुतेरे कार्यकर्ता, डॉ लोहिया के हताश अनुयायियों की जमात और कल तक राजनीति और सामाजिक सरोकार से दूर रहनेवालों का एक समूह उनके साथ जुड़ गया है और ऐसे लोग दि

अराजक होती न्याय व्यवस्था

गुआहाटी हाईकोर्ट के गत आठ नवंबर के एक फैसले से भ्रष्टाचार या अन्य संगीन आपराधिक मामलों में फंसे लोगों, नेताओं व नौकरशाहों की ‘बांछें’ (वे शरीर में जहां भी होती हों) खिल गयी हैं. इसलिए कि हाईकोर्ट की एक दो सदस्यीय बेंच ने देश की सबसे प्रमुख और एकमात्र जांच एजेंसी सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेटिंग या केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) को असंवैधानिक करार दे दिया है!

नरेंद्र दाभोलकर को सलाम!‘

समाज से अज्ञान और अंधविश्वासस का अंधेरा दूर करने के लिए आजीवन लड़ते रहे सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर की गत 20 अगस्त को पूना में हत्या कर दी गयी। वे सुबह की मार्निंग वाक पर निकले थे, तभी बाइक पर सवार दो लोगों ने उन्हें गोली मार दी। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक हत्यारों का कोर्इ सुराग नहीं लग

इन फैसलों पर ताली बजाने से पहले..

|| श्रीनिवास ||
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीन कथित ऐतिहासिक फैसलों पर राजनीतिक दलों, मीडिया और नागरिक समाज के मान्य बौद्धिकों की प्रतिक्रिया को देख, सुन और पढ़ कर मैं कुछ शर्मिंदगी और संकोच का अनुभव कर रहा हूं। इसलिए कि मैं ताली बजानेवालों की इस भीड़ में शामिल नहीं हो पा रहा हूं। फिर भी अच्छी नीयत से दिये गये इन अतिवादी फैसलों से अपनी विनम्र असहमति व्यक्त करने की कोशिश और सुधी पाठकों से इस पर थोड़े ठंडे दिमाग से विचार करने की गुजारिश करना चाहता हूं।

आदिवासियों की लाश पर विकास की इमारत

- ग्लैडसन डुंगडुंग- 2 जनवरी, 2006 को ओडिसा के जजपुर जिले स्थित कलिंगानगर में टाटा कंपनी के प्रस्तावित ग्रीन फिल्ड परियोजना का विरोध करने वाले आदिवासियों पर बम एवं बंदूक से हमला किया गया, जिसमें 19 आंदोलनकारी मारे गए। इतिहास बताता है कि जहां-जहां आंदोलनकारी शहीद हुए हैं वहां उनकी जमीन बच गई है।

विलंबित न्याय, यानी अधूरा न्याय

|| श्रीनिवास ||
आखिरकार वर्ष 1993 के मुंबई सीरियल बम विस्फोट मामले में अंतिम, यानी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया। सुप्रीम कोर्ट ने यायूब मेनन की फांसी की सजा को बरकरार रखते हुए दस अन्य लोगों को टाडा कोर्ट से मिली मृत्यु दंड की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। मगर वे मृत्यु पर्यंत जेल में रहेंगे। अशर्फुल रहमान अजिमुल्ला की उम्रकैद को दस वर्ष में तब्दील कर दिया, जबकि इम्तियाज घावटे को बरी कर दिया। लेकिन मीडिया में इन सबके बजाय सिने अभिनेता संजय दत्त छाये हुए हैं। उनकी ख्याति को देखते हुए यह एक हद तक तो स्वाभाविक है, मगर इस कारण इस मामले से जुड़े अन्य तमाम मुद्दे गौण हो गये हैं।

पूरब (बांग्लादेश) से आती बदलाव की आहट

|| श्रीनिवास ||
भारत में ऐसा कहा और माना जाता रहा है कि बंगाल जो आज सोचता है, देश बाद में उसका अनुसरण करता है। हालांकि अब यह धारणा कहावत के रूप में ही रह गयी है। मगर पिछले कुछ दिनों से सुदूर बंगाल, यानी बांग्लादेश, से उक्त धारणा के अनुरूप सकारात्मक खबरें मिल रही हैं, जो धार्मिक जुनून और असहिष्णुता के इस दौर में विरल ही होती जा रही हैं।

अफजल को फांसी : न्यायिक या राजनीतिक?

|| श्रीनिवास ||
संसद पर हमले की साजिश में शामिल अफजल गुरू को फांसी की खबर यूं तो पुरानी हो चुकी है, मगर इसका असर लंबे समय तक महसूस किया जायेगा। उल्लेखनीय है कि अफजल को दिये जाने पर देश और जम्मू-कश्मीर में दो तरह की और परस्पर विपरीत प्रतिक्रिया हुई है, मगर इससे हमारे ‘राष्ट्रभक्त’ जरा भी परेशान नहीं हैं। लेकिन इस फांसी दिये में बरती गयी जल्दबाजी और गोपनीयता से कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं, जिसका संतोषप्रद जवाब भारत सरकार और इस फांसी पर जश्‍न मना रहे लोगों की ओर से अब तक नहीं दिया गया है। ये सवाल कानून और राजनीति से संबद्ध हैं। मृत्युदंड से जुड़े नैतिक-मानवीय सवाल तो इतर हैं।

गर्व से कहो, हम ‘असहिष्णु’ हैं

|| श्रीनिवास ||
हम यह कहते नहीं अघाते कि भारत विश्‍व का ‘सबसे बड़ा’ लोकतांत्रिक देश है। यह और बात है कि ‘सबसे बड़ा’ कोई इतरानेवाला विशेषण नहीं है, बल्कि तमाम प्रयासों के बावजूद आबादी वृद्धि की रफ्तार रोक पाने में हमारी विफलता के कारण हमारी विशाल जनसंख्या है। सच यह है कि हमने लोकतांत्रिक शासन प्रणाली अपना भर ली है, लोकतांत्रिक मूल्यों को हम पूरी तरह आत्मसात नहीं कर पाये हैं। सभी जानते और मानते हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी लोकतंत्र और सभ्य समाज व व्यवस्था की आवश्यक शर्त है। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि असहमति और खुद से भिन्न विचार के प्रति सम्मान व सहिष्णुता लोकतंत्र की मूल मान्यता है। लेकिन हाल की कुछ घटनाओं से सिद्ध हो गया है कि हम भारत के लोग मूलत: असहिष्णु हैं और लगातार और भी असहिष्णु होते जा रहे हैं।

स्वतंत्र पुलिस या पुलिसिया राज?

|| श्रीनिवास || 
भारत में तरह तरह के सुधारों - राजनीतिक सुधार, न्यायिक या कानूनी सुधार, प्रशासनिक सुधार, चुनाव सुधार तथा पुलिस सुधार आदि - की चर्चा अक्सर होती रहती है। दिल्ली में हुए गैंग रेप के बाद पुलिस सुधार पर अधिक जोर है। उस हादसे के बाद गठित जस्टिस वर्मा कमेटी ने जो सुझाव दिये, उनमें भी एक प्रमुख सुझाव यह था कि पुलिस को सरकार के नियंत्रण से मुक्त कर दिया जाये; और इस पर, टीवी चैनलों पर जारी बहसों के दौरान, अमूमन आम सहमति दिख रही है। इसलिए कि लोगों की नजर में राजनीतिक जमात की साख बेहद खराब हो चुकी है; और देश-समाज की तमाम गड़बड़ियों के लिए हम सत्ता प्रतिष्ठान या अपने शासकों को जवाबदेह मानने लगे हैं। नतीजतन हम यह भी भूल जाते हैं कि इसी पुलिस पर हम आये दिन संवेदनहीन, भ्रष्ट, जनविरोधी व जुल्मी होने के आरोप लगाते रहते हैं। तो क्या पुलिस में ये सारी गड़बड़ियां महज इस कारण हैं कि वह सरकार, यानी राजनीतिक नेतृत्व के नियंत्रण में है? और क्या नियंत्रण मुक्त होते ही हमारी वही पुलिस ईमानदार, जनपक्षी और सक्षम हो जायेगी?

अपने गेम प्लान में कांग्रेस कामयाब

|| विनोद कुमार ||

कांग्रेस की जो मंशा थी वह पूरी हुई। उनके ही पियादे की बदौलत भाजपा ने झारखंड की राजनीति में जो उन्हें लगड़ी मारी थी, झारखंड में सरकार बना कर उन्हें जो शिकस्त दी थी, उसका बदला उन्होंने ले लिया। झामुमो के छोटे सरकार की पीठ थपथपा कर पहले तो अर्जुन मुंडा की सरकार गिरा दी, राष्ट्रपति शासन की आड़ में झारखंड की सत्ता पर काबिज हो गये और अब झामुमो को उनकी औकात बताई जा रही है।

Corruption is necessary in a globalised, liberalised, privatised economy

|| Stan Swamy ||
The celebrated Swedish economist and nobel laureate Gunnar Myrdal in his eventful book Asian Drama (1968) wherein he analysed the reasons for the mass poverty in the countries of South Asia, categorized India as a “soft state”. By that he meant India is a state which can make policies and laws but cannot carry them out.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नाम नंदीग्राम डायरी के लेखक का खुला पत्र

'सुश्री ममता जी, नंदीग्राम में खड़े होकर बंगाल और भारत को देखने की कोशिश करिए तो आपको विराट बंगाल के भीतर विराट भारत दिखेगा. ग्रामेर मानुष, कृषक मानुष की समृद्धि के बिना बंगाल और भारत का उद्धार संभव नहीं है. नंदीग्राम में छूटी हुई आकाँक्षाओं को अंजाम दीजिये और अपनी चूकों के लिए भूल-सुधार व क्षमायाचना सार्वजनिक करिए...'

लूट के महाभोज में सबने छक कर अपना पेट भरा

|| अरुण कुमार झा ||
बोलने और सुनने में बड़ा प्यारा लगता है कि ‘‘शिक्षा वही, जो सच्चा इंसान बनाए’’, लेकिन क्या ऐसा कभी संभव है? समाज और राज के चरित्रा में दिनों-दिन क्षरण जारी है। उनका नैतिक क्षरण बहुत तेजी से हो रहा है। जिन पर कानून बनाने की जिम्मेदारी है, वही घोड़े की तरह बिक रहे हैं। इस खरीद-फरोख्त के रेस में वे गर्व से शामिल होते हैं। तनिक लज्जा नहीं कि मनुष्य होकर भी जानवरों की तरह बिकते हैं। ये कैसी विडंबना है?

Is setting up IIM / Law University more important than the life of 5000 Adivasis?

|| Stan Swamy ||
Nagri is a village to the north of Birsa Agriculture University, Kanke. It seems that in the mid fifties the then Rajendra Agriculture University had started a process of land acquisition for seed farm at the Nagri village. Despite the claim that the Government had done the needful in terms of the notification for the purpose, but people of the Nagri village say that the process was not complete as they still cultivate their lands and have been paying taxes to the Government for the last 60 years.

Mallika Sarabhai Writes on Gladson Dungdung, and Pathos of Jharkhand

|| Gladson’s burden ||
 
By Mallika Sarabhai
 
Gladson is an Adivasi living in the war-torn Jharkhand. When he was a year old, his family—farmers owning 20 acres of fertile land—became homeless. Their ancestral land disappeared when a dam was built on the Chinda river. As compensation, the family was paid ∃11,000. When their neighbours and they protested they were sent to Hazaribagh Jail. Could a family of six ensure food, education, housing and health care for their entire life with ∃11,000? They headed for the forests. They bought a small piece of land, tilled it, collected forest produce and tried to make a go of it. There was no way of recovering the prosperity they had enjoyed, but with the additional income from their livestock, they got by.

टीम अन्‍ना के लिए ट्रांसपैरंसी के दो पैमाने

सरकार और सिविल सोसायटी के लिए नैतिकता और डेमोक्रेसी के दो अलग-अलग पैमाने नहीं हो सकते। टीम अन्ना से मुफ्ती शमीम काजमी के निष्कासन ने लोगों के मन में अचानक कई सवाल खड़े कर दिए हैं। काजमी को टीम से निकाले जाने के पीछे वजह यह बताई गई है कि वे टीम की बैठक की विडियो रेकॉर्डिंग कर रहे थे। टीम अन्ना पारदर्शिता को अपना मूलमंत्र बताती रही है। कई बार उसने इस बात पर जोर दिया कि सरकार के साथ उसकी जो भी बातचीत हो, उसकी बाकायदा विडियो रेकॉर्डिंग की जाए ताकि जनता को सच का पता चल सके। लेकिन वही अपनी बैठक की विडियो रेकॉर्डिंग से इतनी नाराज हो गई।

Is Media Party to anti-CNT Act Movement in Jharkhand?

|| By Gladson Dungdung ||
The Media is known as forth realm of the democracy though it has not been mentioned in the Constitutional or legal document. Since, the Media plays a role of watchdog (free, fair and fearless) therefore, it has the legitimacy of being called the forth realm of the Democracy. However, in the era of globalization, the media is in the hands of few vested interest groups. Today, the Jharkhandi media is one of the crucial examples of how it is being used to protect the vested interest in the state.

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