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Opinion

Article by our Columnists

आरक्षण : फिर वही बहस, फिर वही तर्क, फिर वही दुराग्रह!

आरक्षण पर इतनी बहस हो चुकी है कि इसके पक्ष और विरोध में नया कहने को कुछ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट इसे संविधानसम्मत ठहरा चुका है। फिर भी थोड़े अंतराल पर कोई न कोई इसके औचित्य पर सवाल खड़े कर देता है और एक बार फिर बहस प्रारंभ हो जाती है। अभी संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा करने की बात कहते ही

राजनीतिक अतिवाद बनाम न्यायिक अतिवाद

गत 26 मई को भाजपा या मोदी सरकार के एक साल पूरा कर लेने पर तमाम अखबारों में बड़े बड़े दावे करते, अपनी उपलब्धियां बखानते विज्ञापन छपे हैं। यह कोई नयी बात नहीं है। सभी सरकारें ऐसा करती रही हैं। नयी बात यह है कि इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ/अलावा किसी केंद्रीय या राज्य के मुख्यमंत्री या मंत्र

हस्तिनापुर में ही रुका अश्‍वमेघ का घोड़ा!

दिल्ली चुनाव के नतीजे की आसानी से और चंद शब्दों में व्याख्या करना फिलहाल किसी के लिए भी कठिन है। फिर भी तत्काल कहना जरूरी हो, तो कहा जा सकता है- अद्भुत.. अकल्पनीय! 70 में 67!

एक मतदाता की दुविधा : वोट किसे और क्यों दें

बीते नौ नवंबर को मैंने भी, हमेशा की तरह, अपना मत डाल दिया। यह और बात है कि मेरे वोट से लोकतंत्र कैसे मजबूत होगा या झारखंड की तसवीर व तकदीर कैसे बदल जायेगी (जैसा कि मतदाताओं को जागरूक करने के अभियानों के तहत बताया जाता रहा है), न मैं समझ पाया हूं और न जानता हूं। हालांकि मैं भी मानता हूं कि एक नागर

महज कर्मकांड नहीं है ‘छह दिसंबर’ को याद करना

कुछ शुभेच्छुओं का कहना है कि मैं खामखा मोदी-भाजपा-संघ के पीछे पड़ा रहता हूं, कि मूझे और कोई विषय ही नहीं सूझता लिखने के लिए। हालांकि मैं अन्य मुद्दों पर भी लिखता रहा हूं, फिर भी सोचा था कि इस बार किसी अन्य ज्वलंत मुद्दे पर लिखूं, मगर अचानक ‘छह दिसंबर’ आ जाने से खुद को रोक न सका। कुछ लोगों के लिए य

एक दल की सरकार बनाम खिचड़ी सरकार

मीडिया की भाषा में कहें तो झारखंड में दंगल जारी है। तमाम दल इस राज्य को स्वर्ग बना देने के दावे और वादे कर रहे हैं। चुनाव आयोग के साथ अनेक सामाजिक संगठनों व संस्थाओं के अलावा मीडिया वाले भी मतदाताओं को जागरूक करने के नेक काम में लगे हुए हैं। तमाम अखबारों में मतदाताओं को उनके कर्तव्य की याद दिलाते

अनिवार्य मतदान : अव्यावहारिक और असंवैधानिक भी

सफल लोकतंत्र की एक बुनियादी शर्त है जागरूक जनमत; और व्यवहार में इसका एक प्रमाण होता है अधिकाधिक मतदाताओं का मतदान में हिस्सा लेना। अफसोस कि इन पैमानों पर भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, जहां 50 से 60 फीसदी मतदान को ही ‘पर्याप्त’ मान लिया जाता है। मगर क्या इस कमी को अनिवार्य मतदान का कानून बना

झारखंड में आदिवासियों के वजूद का सवाल

एक लंबे संघर्ष के बाद झारखंडी जनता को उनका राज्य तो मिल गया लेकिन उनके अस्तित्व और अस्मिता का संकट बरकरार है। बल्कि उस पर खतरा और ज्यादा घनीभूत हो गया है। संसदीय राजनीति और पंचायती राज व्यवस्था उनके स्वशासन और स्वाबलंबन की मजबूत परंपरा को तो निरंतर कमजोर कर ही रही है, अबादी के एक बड़े हिस्से को भ्

काले धन पर कितने गंभीर हैं हम?

विदेशी बैंकों में जमा काले धन के मुद्दे पर जितना शोर हो रहा है, उससे यह आभास होता है, मानो सरकार, तमाम राजनीतिक दल और आम लोग भी मानते हैं कि अपने देश में कोई काला धन नहीं है। भारतीय नागरिकों ने अपनी सारी काली कमाई विदेशी बैंकों में जमा कर रखी है। जबकि सच इसके उलट है। विदेशों में कितने भारतीयों का

महान लोकतंत्र से गायब होते मुद्दे

देश में आम चुनाव का बिंगुल फूंका जा चुका है और राजनीतिक पार्टियां एक बार फिर से मैंगो पीपुल को लुभाना शुरू कर दी हैं। इस चुनावी अभियान में सबसे ज्यादा गौर करनेवाली बात यह है कि आम जनता के मुद्दे पूरी तरह से गायब हो चुके हैं और उसकी जगह व्यक्ति मुद्दा बन गया है। ऐसा लगता है कि या तो दुनियां का महा

1984 बनाम 2002

1984 हो या 2002, किसी भी तर्क से आजाद भारत के इन दो शर्मनाक व भयावह दंगों का औचित्य सिद्ध नहीं किया जा सकता; न ही इनकी भीषणता को कम या अधिक ठहराया जा सकता है। बल्कि इन्हें सही अर्थों में दंगा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इन दंगों में दो समुदायों के बीच मारकाट नहीं, लगभग एकतरफा कत्लेआम हुआ था। लूट

‘आप’ का अंदाज : अति सर्वत्र वर्जयेत

गत 25 जनवरी को पटना में रह रहे सचिन भाई (रिटायर्ड बैंक अधिकारी) से फोन पर बात हुई। मैंने मजाक में पूछा- ‘टोपी’ पहन लिये? उनका जवाब था- ‘गनीमत है कि नहीं पहने, पहन चुके होते तो और शॉक लगा होता।’ निश्‍चय ही सचिन भाई अकेले नहीं होंगे।

..और उन नौकरशाहों का 'क्या?' जो ईमानदार हैं!

नई दिल्ली: देश में भ्रष्टाचार को लेकर चली जोरदार बहसों के बीच नौकरशाहों को प्रमुख गुनहगार के रूप में देखा जाने लगा है। लेकिन क्या सिर्फ संदेह के कारण सभी नौकरशाहों को एक नजरिए से देखा जाना चाहिए?

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