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Jharkhand

Articles on Jharkhand State

माओवादियों व टीपीसी के बीच मुठभेड़, 12 मरे

|| रणजीत वर्मा ||
रांची : भाकपा (माओवादी) संगठन को एक बड़ा झटका लगा है। उसके छह शीर्ष सदस्‍यों समेत दस लोग मार दिये गये हैं। इसी समूह से 2002 में छिटककर अलग हुए तृतीय प्रस्‍तुति कमिटी (टीपीसी) के उग्रवादियों ने चक्रव्‍यूह रचकर उनका कत्‍ल कर दिया। जिला पुलिस ने कहा कि इस संघर्ष में दो लोग और मारे गये हैं जो टीपीसी के सदस्‍य हो सकते हैं। छनकर आ रही खबरों के मुताबिक माओवादियों के इस दस्‍ते में टीपीसी का खबरी शामिल था जो इन्‍हें फंसाने की योजना रच चुका था।

गरीबों के हक का बंदरबांट!

रांची/चतरा: चतरा में गरीबों की 19 करोड़ की आवास योजना में पार्षदों अधिकारियों ने मचाई लूट! ऊपर से नीचे तक सभी चुप..

आज पूरा झारखंड, इसके सभी 24 जिले, उग्रवाद की चपेट में है। राज्य के अधिकांश संसाधन और कोष विकास कार्यक्रमों की बजाय उग्रवाद से टक्कर लेने पर खर्च होते हैं। विकास थम गया है। सबसे पिछड़े राज्यों की पंक्ति में खड़ा है झारखंड।

यह दशा साल दो साल में नहीं, दशकों से चली आ रही उपेक्षा का नतीजा है। समीक्षा होती है, और सभी मानते हैं कि झारखंड में सरकारी मशीनरी आम लोगों के हित को नजरंदाज करती रही है। भ्रष्टाचार का बोलबाला, और फिर हाशिये पर धकेल दिये जाते गरीब गुरबा। नक्सलवाद माओवाद के लिए इससे उर्वर जमीन और क्या होगी! 2000 में अलग राज्य बना। लेकिन, हालात तो और भी बदतर होते चले गए! आज पूरे सूबे पर हिंसक उग्रवाद फन काढ़े हुए है। केंद्र से लेकर राज्य तक के तमाम संसाधनों एवं अरबों खर्च के बाद भी झारखंड से उग्रवाद क्यों टस से मस नहीं हो रहा है? कारणों को समझना है तो कई जिलों की तरह चतरा भी एक ‘आदर्श’ उदाहरण हो सकता है।

चतरा की गिनती उन चंद इलाकों में होती रही है जहां से झारखंड में उग्रवाद की घुसपैठ हुई थी। ठीक है कि आज नक्सलवाद माओवाद वहां कमजोर हुआ, बिखराव की ओर है, लेकिन इसके पीछे उनकी अंदरूनी कलह कारण है, न कि सरकारीतंत्र को दिया जाने लायक कोई श्रेय। भ्रष्टाचार बदस्तूर जारी है। नेता-माफिया-अधिकारी गंठजोड़ आज भी सशक्त दिखाई दे रहा है। गरीब गुरबों के हित में आवाज उठती है, ऊपर तक पहुंचती भी है लेकिन शासन के शीर्ष पर बैठे अधिकारी, नेता, मंत्रियों की संवदेनशीलता जैसे कुंद पड़ चुकी है। केंद्र प्रायोजित ‘आइएचएसडीपी’ यानी इंटिग्रेटेड हाउसिंग एंड स्लम डेवेलॉपमेंट प्रोग्राम (मलिन बस्ती आवास योजना) के तहत चतरा नगर पर्षद को पहले फेज में मिली 19 करोड़ की राशि का महीनों बंदरबांट होता रहा। उसी योजना से कई पैसेवालों ने नये मकान बनवा लिये। जबकि योजना के मानदंड के अनुसार यह विशेष लाभ गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर कर रहे एसटी, एससी, ओबीसी एवं अल्पसंख्यक वर्ग के परिवारों को मिलना था।

पूरी रिपोर्ट:

जब बाड़ ही खा गए खेत!
एक देशी कहावत हैः जब बाड़ ही खा गई खेत! कुछ ऐसा ही हुआ चतरा के गरीब गुरबों के साथ। केंद्र प्रायोजित ‘आइएचएसडीपी’ यानी इंटिग्रेटेड हाउसिंग एंड स्लम डेवेलॉपमेंट प्रोग्राम (मलिन बस्ती आवास योजना) के तहत चतरा नगर पर्षद को पहले फेज में 19 करोड़ की राशि मिली। तय हुआ कि इस राशि से गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे 932 परिवारों को पक्का छत उपलब्ध कराया जाएगा। जिम्मेवारी सौंपी गई स्थानीय वार्ड पार्षदों पर। परिकल्पना थी कि पार्षद तो जमीन से चुनकर आये जनप्रतिनिधि होते हैं। आम जनता से रोज का मेल जोल होता है। एक दूसरे का दुःख दर्द अच्छी तरह समझते हैं। लेकिन, पैसे की चमक ने सारी इंसानियत को दरकिनार कर दिया। 600 घर अब तक बन चुके हैं अथवा निर्माणाधीन हैं। जानकारों की मानें तो ये असली हकदार की जगह पैसेवालों ने हासिल कर लिये, घूस और भाई भतीजावाद के जरिए। इस घोटाले को लेकर कुछ स्थानीय लोगों, संस्थाओं ने ही आवाज उठायी। स्थानीय उपायुक्त से लेकर नगर विकास विभाग के सचिव, मंत्री मुख्यमंत्री, राज्यपास सहित तमाम जांच एजेंसियों के पास गुहार लगायी गई। लेकिन, सभी चुप्पी साधे रहे।

आज राज्य भर में नगर निकाय चुनाव होने जा रहा है। इसे दिखाकर, सरकारी नीतिकार अधिकारों के विकेंद्रीकरण और अंतिम पायदान पर मौजूद संस्थाओं के सशक्तिकरण का दंभ कर रहे हैं। लेकिन, चतरा के इस घोटाले में वहां के निकाय और चुने गए वार्ड पार्षद से लेकर अन्य पदधारियों की अंतर्लिप्तता ही सामने आयी है। अब फिर चुनाव हो रहा है। क्या गारंटी की वही भ्रष्ट लोग, गरीबों का हक मारनेवाले तिकड़मबाज फिर से उन कुर्सियों पर कब्जा न कर लें?

चतरा की बदहाल झुग्गी झोपड़ियों में रहनेवालों के लिए केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित आइएचएसडीपी के तहत प्रति परिवार 1.48 लाख दिये जाने की घोषणा हुई। डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) के तहत पहले चरण में चतरा नगरपालिका के वार्ड क्रमांक1 से 12 तक (वार्ड 10 को छोड़कर) में 932 परिवारों का लाभुक के रूप में चयन किया गया। कुल लागत करीब 19 करोड़ थी। काम शुरू हुआ। लेकिन चयन में कुछ तकनीकी अड़चनें आने पर राज्य सरकार ने एक पत्र (क्रमांक1565, दिनांक 14.05.11) जारी किया और कहा कि अयोग्य व्यक्तियों को हटाकर जरूरतमंदों को ही चुना जाए। जरूरी हो तो दूसरें वार्डों से भी जरूरतमंदों का चयन हो सकता है। गरीबों के हिस्से के सरकारी सहयोग पर बिचौलियों की नजर तो पहले से थी ही, इस पत्र की आड़ में सरकारी मशीनरी को भी जैसे बहाना मिल गया। स्थानीय नागरिक मोर्चा के शिकायतकर्ताओं के अनुसार, आवास के लिये निर्गत राशि का भुगतान मनमानी तरीके से किया जाने लगा। लाभुकों के चयन एवं अनुमोदन की जिम्मेवारी नगर पर्षद अध्यक्ष, वार्ड पार्षद, नगरपालिका के कार्यपालक पदाधिकारी, संबंधित विभाग के अभियंता तथा स्थानीय उपायुक्त की होती है। मोर्चा के अनुसार, इस आवास सुविधा के लिए बोलियां लगने लगीं। 20 हजार से लेकर 40 हजार तक घूस लिया जाने लगा। यही नहीं, उस अनुमोदन समिति में शामिल कई पदधारियों ने अपने रिश्ते नाते और चहेतों के नाम लाभुकों में शामिल कर लिया। हालिया स्थिति यह है कि अब तक करीब साढ़े सात सौ लोगों के नाम पर आबंटन हो चुका है। इनमें एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनके पास पहले से ही पक्का मकान था। घूस के बूते, इस सरकारी सुविधा का लाभ उठाकर उन्होंने निर्धारित सरकारी जमीनों पर कई मंजिली इमारतें खड़ी कर लीं हैं। और झोपड़ियों में रह रहे गरीब और उनकी बस्तियां पहले की तरह ही बदहाल हैं।

पार्षदों ने वसूला, आधा खुद रखा आधे में बाकी अधिकारियों को बांटा : डा जावेद

नगर पर्षद के निवर्तमान उपाध्यक्ष डा सलीम जावेद के अनुसार, अबतक करीब छह सौ मकान बन चुके हैं या लेआउट हुआ अथवा दूसरी खेप की राशि आबंटन के इंतजार में अधूरा है। अधिसंख्य लोगों से 30 से 40 हजार रूपये घूस के तौर पर लिया गया। अधिकांश मकान डीपीआर में तय नक्शे को पूरी तरह नजरंदाज करते हुए बनाये जा रहे हैं। डा जावेद बताते हैं कि कुछ लोगों ने घूस की रकम देने से इनकार किया तो उनकी दशा आज भी ज्यों की त्यों बदहाल है। उनमें पुराना वार्ड 12 के आलम दर्जी भी हैं, जिन्हें अंततः मकान निर्माण की राशि नहीं मिली। उसी तरह अब्दुल रशीद का नाम भी है डीपीआर में है लेकिन मकान नहीं बना सके। मुस्तरी खातुन को एग्रीमेंट के बाद 25 हजार मिला लेकिन पार्षद को पैसा नहीं दिया तो उनका मकान अधूरा पड़ा है। डा जावेद ने इस मुद्दे को दूर तक ले जाने की कोशिश की। लेकिन, माफिया गंठजोड़ ने उनके ही अधिकार सीज करवा दिये। स्थानीय अधिकारियों ने रांची मुख्यालय में नगर विकास सचिवालय से एक आदेश जारी करवा कर उपाध्यक्ष को उस समिति से अलग करवा दिया जो चयनित लाभुकों का अनुमोदन करता है। विरोधियों ने नगर पर्षद उपाध्यक्ष डा जावेद पर कई मुकदमें जड़ दिये हैं। डा अख्तर पेशे से होम्योपैथी डाक्टर हैं और झारखंड विकास मोर्चा (मरांडी) की केंद्रीय कमिटी के सदस्य भी हैं। 

डा जावेद कहते हैं कि कुछ लाभुकों को छोड़ दें तो पार्षदों ने अधिकांश से 30 से 40 हजार वसूला। आधी रकम खुद रखते और शेष हिस्से से पर्षद और जिला प्रशासन के अधिकारियों को जाता। रिश्‍वत मांगनेवालों का कहना होता था, सरकार डेढ़ लाख दे रही है, चालीस पचास भी खर्च कर दो तो बाकी बचे एक लाख तो तुमको बैठे बिठाये मिल रहा है! जिसने नहीं दिया उनका मकान आज तक नहीं बना।

डा जावेद का दावा है कि उन्हीं के प्रयास से निगरानी ने एक पार्षद गुलाम मेंहदी को रिश्‍वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा था। डा जावेद ने एक और आवेदन देकर स्लम आवास योजना घोटाले में पूरे चतरा नगर पर्षद के खिलाफ जांच की मांग की है। डा जावेद चतरा नागरिक मोर्चा के संयोजक भी रहे हैं। लेकिन, आपसी मतभेदों के कारण वह अब उस पद पर नहीं हैं। डा जावेद बताते हैं कि चतरा नगर पर्षद के तत्कालीन कार्यपालक अधिकारी के खिलाफ 8 फीसदी कमिशनखोरी की शिकायत राज्यपाल से की थी। लेकिन, माफिया गंठजोड़ ने उनके जाली हस्ताक्षर करके उनके खिलाफ ही मामले को मोड़ दे दिया। नौबत गिरफ्तारी तक की आयी। लेकिन जांच में उन्हें बरी कर दिया गया।

चतरा जिला नागरिक मोर्चा ने भी घोटालेबाजों के खिलाफ जंग छेड़ी 
स्लम बस्ती आवास योजना में घोटाले को लेकर चतरा जिला मोर्चा ने नीचे से ऊपर तक अधिकारियों नेताओं मंत्रियों के यहां गुहार लगायी। जिले के उपायुक्त से शिकायत की। जांच का आश्‍वासन भी मिला। लेकिन, जांच नहीं हुई। इसके अलावा उत्तरी छोटानागपुर के प्रमण्डीलीय आयुक्त, नगर विकास सचिव, पुलिस महानिदेशक, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री व राज्यपाल एवं नगर विकास मंत्री को आवेदन दिया। लेकिन कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई। मुख्यमंत्री ने जांच का आदेश भी दिया लेकिन सबकुछ ठंढ़े बस्ते में जाता रहा। इस बीच एकमात्र निगरानी विभाग ने एक वार्ड पार्षद गुलाम मेंहदी को रिश्‍वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा। निवर्तमान पार्षद और मोर्चा के सदस्य गोविंद राम के अनुसार, अब वह आरोपी पार्षद छूट चुका है ऐर फिर से उसी धंधे में लिप्त है। मोर्चा का आरोप तो यहां तक है कि पार्षद मेंहदी अकेला नहीं पर्षद के अधिकांश सदस्यों के हाथ इसी काली कमाई से रंगे हुए हैं। 28 अगस्त 2012 को निगरानी ब्युरो के अपर महानिदेशक को सौंपे गए आवेदन में मोर्चा सदस्यों ने अपनी जान माल और प्रतिष्ठा की रक्षा की गुहार भी लगाई है। उनका कहना है कि भ्रष्टचारियों के खिलाफ अभियान छेड़ने से उनके खिलाफ साजिश रची जा रही है। आवेदनकर्ताओं में लक्ष्मीकांत शुक्ला, धनंजय प्रजापति, इमदाद अली, शैलेंद्र कुमार सिंह, उमाशंकर, कुलेश्‍वर यादव, आदि के नाम शामिल हैं। बताते चलें कि मोर्चा ने थक हार कर अंत में झारखंड के लोकायुक्त के यहां भी तमाम उपलब्ध दस्तावेजों आदि के साथ अर्जी लगायी है। (इनपुट्सः रणजीत वर्मा.) 

यशवंत और रघुवर पर भारी पड़े मुंडा

|| विनोद कुमार ||
खुद को ‘पार्टी विथ डिफरेंस’ कहने वाली भाजपा में भी कांग्रेस की तरह अध्यक्ष पद पर रवींद्र राय का मनोनयन हो गया। पार्टी झारखंड में उसी तरह गुटबाजी की शिकार है जिस तरह कांग्रेस। महज 18 विधायकों में सिमट गई इस पार्टी में कई खेमे हैं और उनमें गुटबाजी चलती रहती है। झामुमो के समर्थन वापस ले लेने के बाद अर्जुन मुंडा की सरकार गिर गई और पहले से चल रही गुटबाजी अचानक तीव्र हो गई। ताजा खबर यह कि अर्जुन मुंडा एक बार फिर यशवंत सिन्हा पर भारी पड़े और अपने मनमाफिक व्यक्ति को प्रदेश अध्यक्ष बनवा दिया। यशवंत सिन्हा ने पैतरा तो यहां तक दिया कि वे पार्टी से किनारा तक कर ले सकते हैं, लेकिन बाबूलाल मरांडी जैसा हौसला हर किसी में नहीं होता। रही रघुवर की बात, तो वे हमेशा भाजपा में ‘लो प्रोफाईल’ वाले नेता माने जाते रहे हैं।

दरअसल, यशवंत सिन्हा पार्टी में आदर के तो पात्र हैं और उनकी बातों को तवज्जो भी दिया जाता रहा है, लेकिन पार्टी के शीर्ष नेताओं की समझ है कि वे चुनाव के वक्त वोटरों को आकर्षित नहीं कर सकते। वे प्रशासनिक सेवा के बड़े अधिकारी थे जो कई दलों से होते हुए भाजपा में पहुंचे और भाजपा के शासन में वित्त मंत्री, विदेश मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे। लेकिन जो सांसद अपने संसदीय क्षेत्र में अपने नाम से कालोनी बनवाने के चक्कर में रहे, उसकी शक्ति और सीमा को सभी जानने समझने लगते हैं। इसके अलावा पार्टी अध्यक्षों को सामान्यत: क्षत्रप के रूप में अपने से कमजोर नेता की दरकार रहती है। यशवंत या कड़िया मुंडा जैसे सीनियर नेता की नहीं। यह अलग बात की सीनियर नेताओं की चाहत केंद्र में दूसरे स्थान की जगह अपने गृह प्रदेश में पहले स्थान पर रहने की होती है। माना जाता है कि यशवंत सिन्हा ने ऐलानिया कभी कहा नहीं, लेकिन वे झारखंड के मुख्यमंत्री या प्रदेश अध्यक्ष जैसे पदों के दावेदार रहे हैं। लेकिन गडकरी के मुकाबले खुद को खड़ा करने का पैंतरा देकर जिस तरह उन्होंने केंद्र में राजनाथ सिंह का रास्ता प्रशस्त कर दिया, उसी तरह यहां अर्जुन मुंडा के मुकाले खड़े हो कर उन्होंने रवींद्र राय का रास्ता प्रशस्त कर दिया। वैसे, रवींद्र राय के नाम की सिफारिश खुद अर्जुन मुंडा ने की थी जिसे राजनाथ सिंह ने झट मान लिया और उन्हें प्रदेश अध्यक्ष के पद पर मनोनीत कर दिया। यहां याद दिलाना जरूरी है कि इस लिहाज से भाजपा और कांग्रेस दोनों में कोई खास अंतर नहीं। दोनों पार्टियां लोकतंत्र का दम तो भरती हैं, लेकिन दोनों में पार्टी अध्यक्ष का चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया से नहीं, मनोनयन से होता है। खैर, बात हो रही है ‘पार्टी विथ डिफरेंस’ की। तो, भाजपा में हमेशा नेता की ‘डिगनिटी’ से ज्यादा महत्व उसके ‘मैनेज’ करने की क्षमता को दिया जाता है। झारखंड के गठन के बाद भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी बने। कमाऊ मंत्रिमंडल की खींचतान में जदयू नेताओं ने सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी दी। यही राजनाथ सिंह रांची आये। उनके सामने अवसर था कि वे सरकार खो कर अपनी पार्टी की गरिमा बचा लेते, लेकिन उन्होंने बाबूलाल की बलि दे कर सरकार बचा ली। अर्जुन मुंडा उनके आकलन पर खड़े उतरे और उन्होंने जदयू के भ्रष्ट नेताओं को मैनेज कर लिया।

पार्टी और सरकार को चलाने की कला अर्जुन मुंडा को आती है और इसका प्रमाण उन्होंने एक बार फिर 2005 के चुनाव के बाद दिया। एक कांख में सुदेश महतो को रखा और दूसरे कांख में निर्दलीय विधायकों-एनोस एक्का और हरिनारायण राय- को और दिल्ली राजस्थान की हवा खिला कर वापस झारखंड आये और विधानसभा में बहुमत साबित कर शिबू सोरेन की सात दिनी सरकार का पत्ता साफ कर दिया। टाटा की जमींदारी का नवीकरण किया और अपने चरित्र पर दाग नहीं लगने दिया। राजनाथ ही नहीं, पूरी भाजपा, यानी, ‘पार्टी विथ डिफरेंस’ उनकी कायल हो गई। लेकिन जनता कायल नहीं हुई। 2010 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के विधायकों की संख्या 30 से घट कर 18 पहुंच गई। अर्जुन मुंडा की ‘मैनेज’ करने की क्षमता एक बार फिर काम आई और राज्य में भाजपा और झामुमो की सरकार बन गई।

लेकिन 28 महीनें की करार पर तकरार के बाद झामुमो ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया और अर्जुन मुंडा सरकार का पतन हो गया। साथ ही संभावित विधानसभा और संसदीय चुनावों को देखते हुए पार्टी में गुटबाजी तेज हो गई। भाजपा के भीतर एक खेमा इस बात को प्रचारित करने में लग गया कि आदिवासी वोट तो भाजपा को एकमुश्त मिलने से रहा, फिर गैर आदिवासी वोट, खास कर अगड़े वोटों को भाजपा के पक्ष में गोलबंद करने के लिए पार्टी का नेतृत्व किसी अगड़े को क्यों न सौंप दिया जाये। पार्टी में एक मजबूत खेमा इस बात का भी पक्षधर है कि झारखंड का मुख्यमंत्री जरूरी नहीं कि आदिवासी ही हो। इस मुहिम को यशवंत सिन्हा, रघ्ाुवर दास और सरयु राय जैसे नेता बहुत पहले से चला रहे हैं। स्थिति को भांपते हुए अर्जुन मुंडा ने रवींद्र राय की चाल चल दी। अब सब बिलबिला रहे हैं। गौरतलब यह है कि राजनाथ और अर्जुन मुंडा के बीच पुराने संबंध हैं। अर्जुन मुंडा, झारखंड में राजनाथ सिंह के सबसे विश्‍वस्त व्यक्ति माने जाते हैं। इसलिए राजनाथ जब तक पार्टी के अध्यक्ष रहेंगे, तब तक झारखंड में अर्जुन मुंडा का पलड़ा भारी रहेगा। अर्जुन मुंडा प्रदेश अध्यक्ष रहे या न रहें। रवींद्र राय से बेहतर इस बात को और कौन जानता है? (लेखक विनोद कुमार राजनीतिक समीक्षक है)

व्यवस्था से ज्यादा व्यवस्था को बनाये रखने का खर्च

|| विनोद कुमार ||
वित्तीय वर्ष 2013-14 का झारखंड बजट इस बार संसद में पेश और पारित होगा। अनुमानत: 40 हजार करोड़ का। चिंताजनक पहलु यह है कि इस बजट का ट्रेंड भी पिछले बजटों की तरह रहेगा, यानी योजना मद से ज्यादा गैर योजना मद पर राशि खर्च होगी। गैर योजना मद पर 23200 करोड़ की राशि जबकि योजना मद पर 16800 करोड़ की राशि।

झारखंड की बेटियां मानव तस्‍करी के शिकंजे में

|| न्यूज विंग : रांची||
पांच साल पहले सिस्टर जेम्मा ने कहा था, हर साल झारखंड से 30 हजार लड़कियां दिल्ली व अन्य महानगरों में ले जायी जाती हैं। तब, सामाजिक कार्यकर्ता जेम्मा के उस बयान पर जबरदस्त विरोध के स्वर उभरे। सरकारी महकमे ने खंडन किया, प्रतिकियाएं दी। आधारहीन आंकड़ा बताया गया।

रेल बजट निराशाजनक : झारखंड चैम्‍बर

रांची: रेल बजट को लेकर झारखंड चेम्बर पदाधिकारियों की एक बैठक सम्पन्न हुई। जिसमें चेम्बर पदाधिकारियों ने इस बजट को निराशाजनक करार देते हुए कहा कि इस बजट में झारखण्ड राज्य की पूर्णत: अनदेखी की गर्इ है। राज्य को ना तो पर्याप्त ट्रेन मिली है, न ही यहॉं यात्री सुविधाओं के विकास के लिए या माल ढुलाई के लिए लगनेवाले आधारभ्ाूत संरचना के निर्माण के लिए पर्याप्त धन दिया गया। बिना प्लेटफॉर्म और शेड वाले स्टेशनों को भी विकसित करने की सोच बजट में दिखार्इ नहीं दी। रेलवे की कोई भी परियोजना झारखण्ड को नहीं मिली।

न्याय नहीं मिला तो.. बंदूक उठा लेंगे.. बन जायेंगे माओवादी!

|| रणजीत वर्मा || रांची : केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री आर. पी. एन. सिंह ने पिछले सप्ताह अपने रांची दौरे में बयान दिया था कि हम वह परिस्थिति ही नहीं बनने देंगे कि लोग बंदूक उठा लें। पर न्याय के लिए भटकती और सजा काट रहे माओवादी अभिषेक सिंह की बीवी गीता देवी आजीज आकर कहती है, इंसाफ के लिए हम भीख मांग रहे हैं। और यदि इंसाफ नहीं मिलेगा। तो पति तो छह साल से जेल में हैं ही हमको नहीं मरना है। बंदूक उठा लेंगे ... बन जायेंगे माओवादी। गीता देवी मूलत: अति उग्रवाद प्रभावित लातेहार जिला में विशुनबाग गांव में जालिमा की रहनेवाली हैं।

जेएमएम सरकार से अलग, इस्‍तीफा सौंप मुंडा बोले भंग हो विधानसभा

|| रणजीत वर्मा ||
- मुंडा बने रहेंगे कार्यकारी सीएम -
- देर शाम कांग्रेस प्रदेश अध्‍यक्ष प्रदीप बलमुचू मिलेंगे गुरूजी से -
रांची : मंगलवार सुबह नौ बजे के बाद राजनीतिक परिस्थितियां बड़ी तेजी से बदलीं। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने गठबंधन सरकार से समर्थन वापस ले लिया है। और उसे लगता है नयी सरकार उसके नेतृत्‍व में बनेगी। पर अर्जुन मुंडा ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश राज्‍यपाल से कर दी है। यानी राज्‍यपाल तय करेंगे कि राज्‍य में नयी सरकार बनाने वाली पार्टी को मौका दिया जाए, तृतीय झारखंड विधानसभा भंग कर दी जाये या फिर राष्‍ट्रपति शाषण की अनुशंसा हो।

संकट में गठबंधन सरकार, झामुमो कल सौंपेगा समर्थन वापसी का पत्र

|| रणजीत वर्मा || रांची : दो दिनों से चल रहे सस्‍पेंस को तोड़ते हुए झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने मुंडा सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी है। जेएमएम प्रमुख शिबु सोरेन ने प्रेस प्रतिनिधियों से टूक कहा कि भाजपा से बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं बची है। इसलिए मंगलवार को पार्टी राजभवन में समर्थन वापसी का पत्र सौंपा देगी। जिसके बाद गठबंधन सरकार अल्‍पमत आ जाएगी। इधर भारतीय जनता पार्टी खेमे से खबर है कि झामुमो से पहले सीएम अर्जुन मुंडा राज्‍यपाल को अपना इस्‍तीफा सौंप सकते हैं।

28-28 महीने पर कोई बात नहीं हुई थी, कांग्रेस चाहे तो आगे आये सरकार बनाये: मुख्‍यमंत्री मुंडा

रांची, 03 जनवारी 2013: अचानक एक प्रेस कांफ्रेन्‍स बुलाकर मुख्‍यमंत्री अर्जुन मुंडा ने बताया कि उनकी सरकार में सहयोगी दल झामुमो की मांग पर उन्‍होंने लिखित तौर पर जवाब दे दिया है। मुंडा ने स्‍पष्‍ट किया कि सरकार बनाते वक्‍त 28 28 महीनों के शासन वाली कोई बात हुई ही नहीं थी। मुंडा ने मौके पर ही कह दिया कि कांग्रेस चाहे तो आगे आये और इस हालात में राज्‍य को स्थिर सरकार दे। रांची के कांके रोड स्थित मुख्‍यमंत्री आवास में खचाखच भरे प्रेस कान्‍फ्रेन्‍स में अर्जुन मुंडा राज्‍य के अस्थिर राजनीतिक माहौल पर अपना बयान दे रहे थे।