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केवल शहरीकरण विकास नहीं!

हाल ही में राष्ट्रीय अंगेजी दैनिक अखबार में झारखंड की नयी डोमिसाइल नीति के खिलाफ लेख छपवाने वाले सरकारी डॉक्टर और साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक डॉ हाँसदा सौभेन्द्र शेखर ने न्यूज विंग के वरीय संवाददाता रणजीत से कई मुद्दो पर बात की। पढ़िये साक्षात्कार के मुख्य अंश:

आपने राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक में जो आर्टिकल लिखा था देशभर में इसकी खूब चर्चा है। लोग मान रहे हैं कि आपने बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाया है। इसपर आप कुछ कहना चाहेंगे?

हां.. क्रांतिकारी कदम है या नहीं, यह मैं नहीं कह सकता लेकिन मेरे मन में जो बात थी उसे मैंने एक्सप्रेस (अभिव्यक्त) किया है। बस यही बात है। मैं इस सवाल पर इतना ही कहना चाहूंगा।

शेखर जी, सरकारी नौकरी में रहते हुए इस तरह की गंभीर बातें लोगों के सामने रख देना अपने आप में बहुत बड़ी बात है। आपने कुछ तो सोचा होगा?

देखिये, मैंने कभी अपने आप को सरकारी नौकरी वाला या डॉक्टर या मेडिकल ऑफिसर के रूप में देखकर यह आर्टिकल नहीं लिखा। मैंने लोगों को जगाने के उद्देश्य से यह आर्टिकल लिखा। मेरे मन में डोमिसाइल पॉलिसी (स्थानीय नीति) के विरोध में जो ओपिनियन (राय) थी मैंने बस वहीं लिखा है। मेरे मन में जो आशंका है मैंने बस उसे बताना चाहा है।

आपने अपने आर्टिकल में डोमिसाइल पॉलिसी को बहुत सरल तरीके से समझाने की कोशिश की है। अभी झारखंड में आदिवासियों के सामने जो स्थिति है, उसपर कुछ कहना चाहेंगे?

(कुछ देर सोचने के बाद) स्थिति तो ठीक नहीं है... लेकिन इस विषय पर मैं ज्यादा कुछ नहीं कह सकता।

क्या आप ऐसा महसूस करते हैं कि झारखंड में आदिवासियों के मुद्दे को नजरअंदाज किया जा रहा है। उनके हित में काम नहीं किये जा रहे हैं?

देखिये, ये बात पूरी तरह सच नहीं है कि आदिवासियों के हित में काम नहीं किये जा रहे हैं। काम किया जा रहा है। हां, यह सच है कि बहुत सारे आदिवासियों तक इन कामों का लाभ नहीं पहुंच रहा है।

झारखंड की डोमिसाइल पॉलिसी के विषय में आपने जो आर्टिकल लिखा है। संक्षेप में कुछ बताना चाहेंगे?

मैं समझता हूं कि यह बेहतर होगा अगर पाठक इसे खुद ही पढ़ें।

आपने अपने आर्टिकल में भारतीय जनता पार्टी की नीति, मुख्यमंत्री पर गंभीर सवाल उठाये हैं। लोग इसकी चर्चा कर रहे हैं। आपके खिलाफ विभागीय कार्रवाही के लिए नोटिस जारी किया गया है। इसपर आप कुछ कहना चाहेंगे?

देखिये, अभी तक मुझे कोई नोटिस नहीं मिला है। इसलिए अभी इस विषय पर कुछ नहीं कह सकता। नोटिस मिल जाये उसके बाद देखते हैं...!

आपने अपने आर्टिकल में लिखा है कि किसी आदिवासी छात्र के पास 1932 का खतियान है, लेकिन उसने झारखंड के स्कूल से 10वीं की परीक्षा पास नहीं की है। वहीं दूसरी ओर एक गैर आदिवासी छात्र है, उसके पास 1932 का खतियान नहीं है लेकिन उसने झारखंड से 10वीं की परीक्षा पास की है। ऐसी परिस्थिति में नयी स्थानीय नीति के अनुसार फायदा गैर आदिवासी छात्र को मिल जायेगा? तब क्या यह पॉलिसी आदिवासियों के हित में नहीं है?

जैसा कि मैंने अपने आर्टिकल में लिख ही दिया है। और हां, यह बहुत स्पष्ट है कि यह पॉलिसी आदिवासियों के हित में नहीं है। इसपर मैं बस इतना ही कहना चाहूंगा।

आप एक साहित्कार भी हैं। आपको आपके उपन्यास ‘दि मिस्टिरियस एलमेंट ऑफ रूपे बास्के‘ के लिए साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी दिया गया है। भविष्य की योजनओं के संबंध में कुछ बताना चाहेंगे?

ये पुरस्कार मुझे नवंबर 2015 में दिया गया था। अब छह महीने बीत चुके हैं। मेरी दूसरी किताब भी छपकर बाजार में आ गयी है। इसका नाम है ‘दि आदिवासी विल नाट डांस‘। ये पुस्तक 10 कहानियों का एक संकलन है। इसमें सभी कहानियां आदिवासी समाज को केंद्र में रखकर लिखी गयी है। चूंकि मैं खुद भी संथाली हूं। और देश के अलग अलग हिस्सों में भी संथाल लोग बसे हैं। इसी से संबंधित कहानियां इस पुस्तक में पढ़ने को मिलेगी।

झारखंड में सीएनटी और एसपीटी एक्ट में संशोधन की तैयारी है। क्या ये आदिवासियों के हित में होगा?

देखिये, यह गंभीर विषय है। इस विषय पर मैं लिख कर ही बताना ज्यादा बेहतर समझूंगा। इतने कम समय में इसे विस्तार से बताया नहीं जा सकता है। इसके कई पहलू हैं। सभी की विस्तार से व्याख्या करनी होगी।

एक बडे पद पर कोई आदिवासी पहुंच जाता है, उसके बाद वो चुपचाप बैठ जाता है। आदिवासियों के हित में कुछ नहीं करता। उनपर आदिवासियों को ठगने के आरोप लगते हैं। बड़े अधिकारियों पर आदिवासियों की जमीन ठगने के भी आरोप लगे हैं। इसपर आपकी क्या राय है?

मैं आपको बताऊं कि मैं किसी बहुत ऊंचे पद पर नहीं हूं। मैं एक प्रखंड का डॉक्टर हूं। ...... और मैं समझता हूं कि मैंने कभी आदिवासियों की आवाज बनने की कोशिश भी नहीं की। मेरे मन को जो बात कचोट रही थी, उसे बस मैंने अपने शब्दों में जाहिर कर दिया। अगर इससे उन्हें कुछ फायदा हो रहा है तो बहुत अच्छी बात है।

जिस तरह की परिस्थितियां बन गयी हैं। उसका समाधान क्या हो सकता है? कोई राजनीति पार्टी भी आदिवासियों के मुद्दे पर बहुत ज्यादा गंभीर नहीं दिखती?

इस विषय में मैं ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहूंगा। राजनीतिक पार्टियां इसका बेहतर जवाब दे सकती हैं।

झारखंड को अलग राज्य बने डेढ़ दशक से ज्यादा समय बीत गया है। वर्तमान सरकार की कार्यशैली और पुरानी सरकारों की कार्यशैली से कैसी तुलना करते हैं?

(मुस्कराते हुए)...... 1300 शब्दों के एक आर्टिकल पर अगर नोटिस निकाला जाता है......! तो ......आगे आप खुद समझ ही सकते हैं? बस मैं इतना ही कहना चाहूंगा। (हंसते हुए चुप हो जाते हैं।)

ये ठीक है लेकिन बाकी की सरकारों की कार्यशैली को आपने किस तरह समझा है?

हां, उस समय मैंने 1300 शब्दों में आर्टिकल नहीं लिखा था। और उस समय मेरी आवाज इतनी बुलंद होती भी या नहीं यह मैं नहीं जानता। ठीक है लेकिन...... लेकिन ......लेकिन ..... इसे लेकिन तक ही रहने दें तो बेहतर होगा!

जिस मकसद से झारखंड राज्य का गठन हुआ। उस मकसद पर हम आगे बढ़ सके हैं या फिर उसे भुला दिया गया? या फिर जिनके लिए झारखंड बना, उनके हिस्से का फायदा कोई और उठा रहा है?

ये 2016 है और इसमें 2014 की सरकार लागू हो चुकी है। मुझे सच में आशंका है कि और यह संदेह भी कि मेरी बातों को किस तरह से लिया जायेगा। हां आपके सवाल पर मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि हम पहले जहां थे, अब भी हम वहीं हैं। बस इतना ही कहूंगा।

जिस मकसद से झारखंड बना वह सपना कैसे पूरा हो सकता है?

झारखंड बनने का सपना 2000 में उसके गठन के साथ पूरा हुआ था। लेकिन....,  इस झारखंड को आप किस रूप में लेते हैं। इस बात पर निर्भर करता है कि... (मुस्कराते हुए...) आप ये मानते हैं कि झारखंड बना है या नहीं!

क्या झारखंड बनने का मकसद पूरा हो सका है?

मकसद चाहे जो भी हो, इस मकसद को जिन्होंने पूरा किया है, अभी भी शायद वही लोग हैं! मैं आपके इस सवाल पर भी इससे ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहूंगा।

झारखंड के विकास की चर्चाएं चल रही हैं। कहा जा रहा है कि बड़ी बड़ी कंपनियां आयेंगी। कुछ सालों में झारखंड देश में सबसे ज्यादा विकसित राज्य बन जायेगा। इसको आप कैसे देखते हैं?

अगर विकास का मतलब शहरीकरण हैं तब मैं इसको विकास नहीं कहना चाहूंगा। क्योंकि जिस तरह के विकास की बात होती है वह शहरीकरण है। ठीक है। ऐसा नहीं है कि बस सड़कें बन जाने से या कारखाने, फैक्ट्रियां खुल जाने से विकास हो जाता है। विकास की अलग अलग परिभाषाएं हैं। इसके इंटरप्रिटेशन्स अलग अलग हैं। बस केवल शहरीकरण नहीं होना चाहिए।

आप पाकुड़ में रहकर लोगों को अपनी सेवाएं दे रहे हैं। हमारे राज्य का बहुत दूर का इलाका है। हमारे गांवों में स्वास्थ्य, पेयजल या फिर कोई सरकारी योजना का लाभ कितनी ईमानदारी से पहुंचता है?

हमलोग पाकुड़ को काला पानी भी कहते हैं। अब आपके सवाल पर आता हूं। सरकार की ओर से सुविधाएं दी जा रही हैं। लेकिन जनता में भी जागरूकता होनी चाहिए। पाकुड़ में हर समुदाय के लोग हैं। कुछ समुदाय के लोग बहुत जागरूक हैं। कुछ के नेता ज्यादा जागरूक हैं। वो लोगों को जाकर बताते हैं। इस तरह लोग योजना का लाभ लेने पहुंचते हैं। लेकिन कुछ समुदाय ऐसे हैं जिन्हें आप लाख समझाइये लेकिन पता नहीं क्यों....? इसमें जो सरकारी तंत्र है उन्हें कुछ समुदायों के बीच जाकर जागरूकता लाने की जरूरत है। पाकुड़ में वैसे सबसे ज्यादा समस्या पानी की है। गर्मी में यहां बिना पानी के लोग बेहाल हो जाते हैं। हमलोग खुद चापानल से पानी भरकर लाते हैं। फिलहाल ये पाकुड़ की सबसे बड़ी समस्या है।

आपकी समझ से लोगों को जागरूक करने के लिए क्या होना चाहिए?

देखिये, जागरूकता के लिए कोई कदम नहीं उठा सकता है। इंसान को खुद आगे आना पड़ता है। इंसान के मन में ही सवाल होना चाहिए कि उसकी समस्या क्या है और उस समस्या का समाधान किसके पास है। अगर ये उत्सुकता इंसान के मन में खुद आ जाये तब वो खुद जागरूक हो सकता है। उसके लिए किसी तरह के पोस्टर, बैनर की दरकार नहीं पड़ेगी।

जो भी हो आपके आर्टिकल की देशभर में चर्चा है। इसे लिखने से पहले मन में क्या सवाल था और इसके छपने के बाद मिल रही प्रतिक्रिया को किस रूप में लेते हैं?

आर्टिकल लिखने से पहले मन में यही चल रहा था कि क्या लिखूंगा? लिखने बैठा तो जो मन में आया उसे मैंने लिख दिया। अभी जब चर्चा हो रही है। तब मन में एक सवाल उठ रहा है कि क्या रांची में मेरे इस आर्टिकल को लोग पढ़ रहे हैं। पाकुड़ में मैं जहां रहता हूं वहां केवल हिंदी अखबार आते हैं। यहां बांग्ला भाषी लोग भी रहते हैं लेकिन यहां बांग्ला अखबार तक नहीं पहुंचता। मैं तो ये सोच ही नहीं सकता था कि रांची में भी मेरे इस आर्टिकल को लोग पढ़ेंगे।

आपसे मेरा आखिरी सवाल कि क्या हम ये अनुमान लगा सकते हैं कि भविष्य में आप राजनीति में आयेंगे। किसी पार्टी के साथ या फिर स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में?

(जोर से हंसते हुए...) देखिये, आप हथेली पर कैक्टस उगा रहे हैं। आपके इस सवाल का अभी यही जवाब दे सकता हूं।

चलिए, एक और सवाल कि आप ये तो बता सकते हैं कि किस राजनीतिक पार्टी के प्रति सहानुभूति रखते हैं?

इसका जवाब मैं यही दे सकता हूं कि या तो सिक्रेट बैलेट, या फिर नोटा। बस इतना ही।

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