Skip to content Skip to navigation

आरक्षण : फिर वही बहस, फिर वही तर्क, फिर वही दुराग्रह!

आरक्षण पर इतनी बहस हो चुकी है कि इसके पक्ष और विरोध में नया कहने को कुछ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट इसे संविधानसम्मत ठहरा चुका है। फिर भी थोड़े अंतराल पर कोई न कोई इसके औचित्य पर सवाल खड़े कर देता है और एक बार फिर बहस प्रारंभ हो जाती है। अभी संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा करने की बात कहते ही वही दौर शुरू हो गया है। चूंकि अभी बिहार का चुनाव सामने है, इसलिए इस पर राजनीति होनी ही थी। लालू प्रसाद ने चुनौती दे दी कि हिम्मत है तो केंद्र सरकार आरक्षण हटा कर दिखाये। भाजपा को भी तत्काल यह कहना जरूरी लगा कि वह आरक्षण के प्रति प्रतिबद्ध है! वैसे भाजपा कह रही है-संघ भी ऐसा स्पष्टीकरण दे चुका है- कि श्री भागवत ने आरक्षण के खिलाफ कुछ नहीं कहा है, साथ ही सफाई भी दे रही है! जाहिर है, वोट का चक्कर है। हालांकि बिहार की आरक्षण समर्थक जातियां आज बंटी हुई हैं और जरूरी नहीं कि वे थोक रूप में किसी एक दल या गंठबंधन को वोट दें। मगर उन्हें अपने पाले में रखने की जुगत सभी बिठा रहे हैं।

जो भी हो, दुहराव ही सही, आरक्षण को नये सिरे से समझने का प्रयास करते हैं। इस विवाद में एक बात बिल्कुल साफ है। अपवादों को छोड़ आरक्षण समर्थक वे हैं, जो इसके लाभ्ाुक हैं। और विरोधी वही, जिन्हें इसका ‘नुकसान’ हो रहा है, जिन्हें लगता है कि आरक्षण के कारण ‘प्रतिभा’ होने के बावजूद उनके या उनके बच्चों की जगह ‘अयोग्य’ को शैक्षणिक संस्थानों में दाखिला मिल रहा है, उनके हिस्से की नौकरियां मिल रही हैं। वैसे आरक्षण शब्द में ही एक तरह का नकारात्मक भाव है, जो समानता के आदर्श के उलट है।

.. इसके बजाय विशेष अवसर का सिद्धांत कहना अधिक उपयुक्त है, जो समाज के किन्हीं कारणों से पीछे रह गये तबकों को बराबरी पर लाने का सिद्धांत है। यदि आरक्षण से चिढ़ने वाले थोड़ी देर के लिए जातीय व भावनात्मक आग्रहों से ऊपर उठ कर विचार करें, तो बात आसानी से समझ में आ सकती है। कल्पना करें और याद करें कि हमारे घर का कोई बच्चा पढ़ाई में कमजोर है या उसकी सेहत ठीक नहीं रहती तो उसके लिए अलग से ट्यूशन का इंतजाम या इलाज के लिए अतिरिक्त खर्च करना क्या दूसरे बच्चों को अखरता है या अपने साथ नाइंसाफी लगती है? नहीं लगती, क्योंकि वे उस कमजोर बच्चे को अपने परिवार का अंग, अपना भाई या बहन मानते हैं। यदि हम समाज को भी अपना परिवार मान लें- प्रकट में ऐसा मानने का दावा तो करते ही हैं- तो शायद आरक्षण उतना बुरा नहीं लगेगा। कुछ लोग तर्क देते हैं कि पीछे रह गये तबकों को अच्छी शिक्षा देने की विशेष सुविधा तक तो ठीक है, रोजगार व नौकरियों में नहीं। वहां तो प्रतिभा का सम्मान होना ही चाहिए। यहां भी हम यह समझना नहीं चाहते कि सिर्फ अच्छी शिक्षा या डिग्री के आधार पर भारत में अच्छा रोजगार मिलना या स्वतंत्र व्यवसाय कर सफलता पाना आसान नहीं होता। एक कारण जन्मगत ऊंची व नीची जातियों में बंटा समाज और तद्जनित हमारा संस्कार भी है। कल्पना कीजिए कि एक दलित और एक सवर्ण युवा वकालत की डिग्री लेकर प्रैक्टिस शुरू करता है। कोर्ट कैंपस में सवर्ण वकीलों की, जो समर्थ भी हैं, बहुतायत के मौजूदा माहौल में क्या दलित जाति के नये वकील की तुलना में समान शिक्षा प्राप्त और प्रतिभाशाली नये सवर्ण वकील के सफल होने के अधिक अवसर नहीं हैं? इसी तरह, कोई दलित या कथित छोटी जाति का युवक यदि किसी शहर में, महानगरों को छोड़ दें, होटल खोलना चाहे तो क्या वह उतना ही सफल हो सकता है, जितना कोई सवर्ण, खास कर ब्राह्मण युवक? बड़े शहरों के उदाहरण से इस हकीकत को झुठलाया नहीं जा सकता कि अब भी भारत का बड़ा हिस्सा जन्मना ऊंची व नीची जातियों में बंटा हुआ है। और जब तक यह भेदभाव है, आरक्षण या विशेष अवसर का प्रावधान कोई भीख देना या किसी के साथ अन्याय नहीं है, यह समाज का सामूहिक दायित्व है। यह कोई गरीबी उन्मूलन योजना भी नहीं है। उसके लिए तो सरकार अनेक योजनाएं चलाती ही है। मगर समझ की कमी या आरक्षण विरोधियों का दबाव इतना प्रबल है कि सामाजिक न्याय की बात करने वाले नेता और दल भी समय समय पर सवर्ण समुदायों के गरीबों के लिए आरक्षण की बात करने लगते हैं, जो सिरे से अतार्किक है। सवर्ण बहुल और प्रभ्ाुत्व वाले दल तो ऐसा कहते ही हैं। अभी राजस्थान सरकार ने भी गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण की घोषणा की है।

एक सच यह है, जो नकारात्मक ही है, कि आरक्षण समर्थकों/लाभ्ाुकों ने इसे हमेशा जारी रहनेवाली व्यवस्था मान लिया है, जबकि ऐसा नहीं है। इसका लक्ष्य तो यही है कि एक समय ऐसा आयेगा, जब किसी को आरक्षण की जरूरत नहीं रह जायेगी। संसद भी दस साल बाद इसकी समीक्षा करने के बाद ही इसे आगे जारी रखने का निर्णय करती है। हालांकि वोट का लालच या दबाव ऐसा है कि समीक्षा की औपचारिकता ही पूरी की जाती है; और बिना किसी बहस के अगले दस साल तक आरक्षण जारी रखने का प्रस्ताव पारित हो जाता है। दूसरी ओर आरक्षण विरोधियों- मुख्यत: सवर्ण हिंदू- ने कभी भी मन से इसे स्वीकार नहीं किया। यही कारण है कि दोनों प्रमुख राजनीतिक दल- कांग्रेस और भाजपा- अपने सामाजिक आधार (आज भी इनकी सर्वाधिक लोकप्रियता सवर्ण जातियों के बीच ही है) और नेतृत्व के सवर्णवादी चरित्र और सोच के कारण मूलत: आरक्षण विरोधी रहे हैं। यह और बात है कि इनके बड़े नेता सार्वजनिक बयान देते समय सावधानी बरतते हैं। काका कालेलकर आयोग ने पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की सिफारिश तो कांग्रेस के शासन काल में ही की थी। मगर उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। फिर 1979 में चरण सिंह की सरकार द्वारा गठित मंडल आयोग ने भी वैसी ही अनुशंसा की। मगर 1980 में पुन: सत्ता में आयी कांग्रेस सरकार ने फिर उसे दराज में बंद कर दिया। अंतत: 1989 में प्रधानमंत्री बने वीपी सिंह ने 1991 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का- उनका मकसद जो भी रहा हो- निर्णय किया। देश में मानो भ्ाूचाल आ गया। जिस ‘वीपी’ की तुलना ‘जेपी’ से की जा रही थी, वह अचानक गद्दार हो गया। देश आरक्षण विरोधी आंदोलन की आग में झुलसने लगा। हालांकि सवर्ण युवाओं के उस पिछड़ा विरोधी आंदोलन का सर्वाधिक प्रभाव उत्तर भारत, उसमें भी यूपी और बिहार में अधिक था। सवर्णों के उस उग्र व फूहड़ आंदोलन ने ही बिहार और यूपी में क्रमश: लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव को पिछड़ों और वंचितों का हीरो बना दिया। 1991 को भ्ाूल कर जरा 1978 को याद करें, जब बिहार की कर्पूरी ठाकुर सरकार ने पिछड़े वर्गों के लिए नौकरियों में आरक्षण का फैसला किया। दो दिन पहले तक के जननायक कर्पूरी ठाकुर अचानक खलनायक बन गये! यह नारा भी लगा- ब्राह्मण हरिजन भाई भाई, पिछड़ी जाति कहां से आई; करपुरिया की माय बियाई। तो यह है समाज के कथित फारवर्ड और संभ्रांत माने जानेवालों की मानसिकता का स्तर! फिर भी आरोप लगाया जाता रहा है कि इन राज्यों में जातिवाद लालू, मुलायम और वीपी सिंह की देन है। मानो इनसे पहले समाज और राजनीति में जातिवाद था ही नहीं! और जरा यह भी पता कर लें कि वे आंदोलनकारी आज किस दल या विचारधारा के करीब या समर्थक हैं।

कुछ लोग आरक्षण के लिए सिर्फ आर्थिक आधार को पैमाना मानने की वकालत करते हैं। वे समझ नहीं पाते कि किसी व्यक्ति, परिवार या समुदाय की आर्थिक स्थिति स्थायी नहीं होती। आज जो गरीब है, कल अचानक उसके नाम लाखों करोड़ों की लॉटरी निकल सकती है; किसी निर्धन परिवार के होनहार युवा को अच्छी नौकरी मिल सकती है। इसी तरह, आज जो धनी है, किसी आपदा, लूट, व्यवसाय में नुकसान आदि के कारण अचानक निर्धन की श्रेणी में पहुंच सकता है। ऐसे में आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात बेतुकी है। कमाल यह भी है कि सवर्ण जातियों की जो युवतियां समता के सिद्धांत के आधार पर आरक्षण का विरोध करती हैं, उन्हें महिलाओं के लिए आरक्षण में कुछ गलत नहीं लगता! इसी तरह मेरिट की बात करनेवालों को निजी मेडिकल या अन्य तकनीकी संस्थानों में लाखों रुपये डोनेशन देकर दाखिला पाने में मेरिट की अवहेलना नजर नहीं आती!

इसी तरह कुछ लोग- निश्चडय ही आरक्षण विरोधी- इस बात का रोना रोते हैं कि आरक्षण का कोई लाभ नहीं हुआ है। ऐेसे लोग या तो जमीनी हकीकत से कटे हुए हैं या सच को देखना और स्वीकारना नहीं चाहते। मेरा दावा है कि आज सरकारी अमले में जो दलित और आदिवासी नजर आ रहे हैं, वे दारोगा और बीडीओ बन सके हैं, तो यह आरक्षण का ही नतीजा है। ऐसे लोग इस बात से भी परेशान हैं कि आरक्षण की सुविधा संबद्ध जातियों/तबकों के चंद लोग ही उठा रहे हैं। ‘वास्तविक’ जरूरतमंदों तक इसका लाभ नहीं पहुंच रहा। ऐसे लोगों से इतना ही कहना है कि इसके लिए आप क्यों परेशान हो रहे हैं। ऐसी मांग उन्हीं तबकों से उठेगी कि हमारे कोटे का सारा लाभ चंद जातियां या परिवार उठा रहे हैं, तो अवश्य उस पर विचार होगा। आपकी चिंता में तो जलन की ही बू आती है, जो आपकी शाश्वरत आरक्षण विरोधी मानसिकता का ही एक रूप है।

एक और जरूरी बात। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत तय कर दी है और उसका निर्णय बाध्यता है। मगर मेरी विनम्र राय में यह सही नहीं है। पूर्वोत्तर के कई राज्यों, जहां जनजातियों की आबादी 70 से 80 फीसदी तक है, में 50 प्रतिशत की सीमा का क्या अर्थ है? वैसे भी दक्षिण के अनेक राज्यों में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण लागू है और नवीं सूची में में डाल कर ऐसे कानूनों को अदालती समीक्षा के दायरे से बाहर कर दिया गया है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे कानून यदि संविधान के खिलाफ हैं, तो अदालत उनकी समीक्षा कर सकती है।
आज जरूरत इस बात की है कि पीढ़ियों से आरक्षण का लाभ उठा रहे और इस कारण समर्थ हो चुके समुदाय या परिवार खुद कहें कि अब हमें आरक्षण की जरूरत नहीं है; कि ऐसे लोगों को आरक्षण से वंचित करने का कोई तर्कसंगत तरीका खोजा जाये, इस पर खुली बहस हो। मगर जब इस श्रेणी से बाहर के समर्थ समुदाय भी आरक्षण की मांग करने लगे हैं, तब आरक्षण के लाभ्ाुकों से ऐसी अपेक्षा फिलहाल कैसे की जा सकती है। निश्चमय ही यह दुखद व चिंताजनक है कि सामाजिक न्याय स्थापित करने के एक- एकमात्र नहीं- उपाय को राजनीतिक लाभ-हानि के राजनीतिक खेल में बदल दिया गया है।

Top Story

नई दिल्ली, 28 जुलाई: डिजाइनर अनीता डोंगरे ने भारतीय फैशन को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने मे...

New Delhi: While many wait for the monsoon season to arrive, mucky roads and gloomy weather have...

मुंबई, 29 जुलाई: फिल्मकार उमंग कुमार का कहना है कि आगामी फिल्म 'भूमि' का निर्देशन करना सम्मान की...

गॉल, 29 जुलाई - टीम इंडिया ने श्रीलंका ने 304 रनों से हरा कर गॉल टेस्ट जीत लिया है. इसी के साथ ही...