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राजनीतिक अतिवाद बनाम न्यायिक अतिवाद

गत 26 मई को भाजपा या मोदी सरकार के एक साल पूरा कर लेने पर तमाम अखबारों में बड़े बड़े दावे करते, अपनी उपलब्धियां बखानते विज्ञापन छपे हैं। यह कोई नयी बात नहीं है। सभी सरकारें ऐसा करती रही हैं। नयी बात यह है कि इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ/अलावा किसी केंद्रीय या राज्य के मुख्यमंत्री या मंत्री की तसवीर नहीं छपी है!

संयोगवश, उसी दिन तमिलनाडु सरकार की चार साल की उपलब्धियां गिनाते अनेक पृष्ठों के विज्ञापन भी प्रकाशित हुए हैं। संयोगवश भ्रष्टाचार के आरोपों से बरी हो जाने के बाद सुश्री जे जयललिता ने एक दिन पहले ही पांचवीं बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। मगर उन विज्ञापनों में कहीं जयललिता की तसवीर नहीं है!

सुधी पाठक समझ रहे होंगे कि अचानक इस तरह के विज्ञापनों से हमेशा छपने चमकने वाले नेताओं-मंत्रियों के चेहरे गायब कैसे हो गये। दरअसल कुछ दिन पहले ही एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी किया था कि अब सरकारी खर्च पर छपनेवाले किसी विज्ञापन में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के अलावा किसी की तसवीर नहीं छपेगी। बहुतों को यह आदेश अच्छा लगा। जिन्हें नहीं लगा, यानी नेतागण, वे भी चुप्पी लगा गये। और मीडिया तो इस तरह की फिजूलखर्ची का मुख्य लाभ्ाुक ही है। वह भला इसे मुद्दा क्यों बनाये। उक्त पर आदेश पर अमल का ही नतीजा है कि मोदी सरकार के विज्ञापनों में सिर्फ प्रधानमंत्री की तसवीर है; उधर तमिलनाडु के विज्ञापन में वहां की ‘भ्ाूतो न भविष्यति’ मुख्यमंत्री जयललिता नजर नहीं आ रहीं।

फिलहाल मैं उक्त विज्ञापनों में दोनों सरकारों के दावों की सच्चाई या अतिवाद पर कोई टिपपणी नहीं करने जा रहा। मेरा मकसद आपका ध्यान इस ओर आकृष्ठ करना है कि कैसे एक अतिवाद दूसरे अतिवाद को जायज बना देता है। जैसे कई बार अपराध के बेकाबू हो जाने पर समाज फर्जी मुठभेड़ में पुलिस द्वारा अपराधियों या कथित अपराधियों/आतंकवादियों की हत्या का भी समर्थन करने लगता है। वैसे ही, राजनीतिक नेताओं या विधायिका की मनमानी से चिढ़ कर लोग अदालतों द्वारा उन्हें गैरजरूरी फटकार लगाने पर हम ताली बजाने लगते हैं, यह जानते और मानते हुए भी कि अदालतें अपनी सीमा से परे जाकर ऐसा कर रही हैं। यह मामला भी कुछ उसी तरह का है।

भाजपा और एआइडीएमके सहित तमाम राजनीतिक दलों और उनके नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के संबद्ध आदेश को इतनी सहजता से कैसे स्वीकार कर लिया? शायद इसलिए कि उक्त आदेश जन भावनाओं के अनुरूप है। इसलिए कि सरकारी खर्च पर अपनी सूरत और राजनीति चमकाने के ऐसे फूहड़ प्रयास की अति हो चली थी। किसी भी आम आदमी की तरह, जो संबद्ध दल का अंधसमर्थक न हो, ऐसे विज्ञापनों को देख कर मैं भी कुढ़ता भ्ाुनता रहा हूं। हालांकि सरकारी विज्ञापनों की जरूरत और उपयोगिता से मैं इनकार नहीं करता। जनहित में प्रारंभ हुई, चलायी जा रही योजनाओं की जानकारी देनेवाले विज्ञापनों पर कोई आपत्ति करता भी नहीं। मगर किसी पुल या कारखाने के शिलान्यास या उद्घाटन के मौके पर, उस समारोह को सरकारी खर्च पर सत्तारूढ़ दल/जमात का कार्यक्रम बना देना और सत्ता पक्ष के छोटे-बड़े नेताओं की तसवीरों के साथ विज्ञापन छपने का कोई औचित्य नहीं है। इसके अलावा सरकार के एक, दो या चार साल होने पर विज्ञापनों के जरिये अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटने का क्या अर्थ है? किसी सरकार ने कुछ अच्छा किया है, तो क्या वह जनता को खुद नहीं दिखता होगा या दिखना चाहिए? जरा सोचें कि झारखंड या बिहार के लोगों को यह बताने का क्या तुक है कि तमिलनाडु सरकार ने अपने राज्य में कितना और कैसा कमाल कर दिया है।

आम जनता तो कल्पना भी नहीं कर सकती कि ऐसे विज्ञापनों पर सरकारी, यानी उसके खजाने के कितने करोड़ आ अरब रुपये लुट जाते हैं। ऊपर जिन विज्ञापनों का उल्लेख हुआ है, उन पर सिर्फ एक दिन में करोड़ों रुपये खर्च हुए होंगे। इससे किसी राज्य या देश की आम जनता का कौन सा हित सध गया? बावजूद इन आलोचनाओं के मैं इस मामले में न्यायपालिका के हस्तक्षेप को सही नहीं मानता।

राजनीतिक या व्यवस्थापिका के अतिवाद का जवाब न्यायिक अतिावाद नहीं हो सकता। व्यवस्था के तीनों अंग संविधान से ही शक्ति पाते हैं। उनके अधिकार और उनकी सीमा भी निर्धारित है। ऐसे में, इस तर्क पर कि एक अंग सही ढंग से काम नहीं कर रहा, दूसरा उसके अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने लगे, यह संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।। जैसे एक अतिवाद दूसरे किस्म के अतिवाद को औचित्य प्रदान करता है, सुप्रीम कोर्ट का उक्त आदेश इसी का उदाहरण है। अदालतों की लेटलतीफी या दो अदालतों-जजों के फैसलों में विचित्र विरोधाभास के उदाहरणों की कमी नहीं है। ऐसे में कोई सरकार या पुलिस या कोई संगठन खुद से न्यायिक फैसले करने लगे, क्या यह उचित होगा?

इस फैसले से मेरी असहमति को दो मुख्य आधार हैं। एक तो मेरी समझ से यह विषय न्यायपालिका के क्षेत्र में नहीं आता। यह मूलत: राजनीतिक मामला है। संसद चाहे तो इस संबंध में कोई नियम बना सकती है। किसी सरकार की प्राथमिकता स्कूल बनाने की हो सकती है, किसी की अस्पताल या सड़क बनाने की। ऐसे मामलों में न्यायपालिका को पड़ना ही नही चाहिए। हर कथित जनहित याचिका पर सर्वोच्च अदालत सुनवाई और आदेश दे, यह कतई जरूरी नहीं है। वैसे भी अदालत का मूल काम न्यायिक फैसले करना है, आये दिन सरकारों को ‘आदेश’ देना या फटकार लगाना नहीं।

जनभावनाओं के आधार पर राजनीतिक फैसले हो सकते हैं, होते हैं, भले ही वे अनुचित लगें; मगर न्यायिक फैसले जन भावनाओं से प्रभावित नहीं होने चाहिए। अन्यथा हर बलात्कारी और हत्यारे को चौराहे पर सरेआम फांसी देनी पड़ेगी।

दूसरे, यह गैरजरूरी आदेश लोकातांत्रिक मान्यताओं की अनदेखी भी करता है। भारत एक संघीय राज्य है। अपने प्रदेश में जनता द्वारा निर्वाचित मुख्यमंत्री का उतना ही महत्व है, जितना देश के लिए प्रधानमंत्री का। ऐसे में केंद्र सरकार के खर्च पर छपे विज्ञापन में प्रधानमंत्री की तसवीर छपे, पर राज्य सरकार के विज्ञापन में मुख्यमंत्री की नहीं, ऐसे फरमान का औचित्य समझ से परे है।

इसके अलावा, ऐसे विज्ञापनों पर मूल आपत्ति तो इन पर होनेवाला अकूत सरकारी खर्च है। तसवीर न छपे, लेकिन खर्च पर कोई रोक नहीं है। साथ ही, सरकारी खर्च पर सत्तारूढ़ दल, मं़ित्रयों, संबद्ध मुख्यमंत्री की विरुदावली भी गायी जा सकती है! इस तरह जब बिना तसवीर के ही, सरकारी खर्च पर एक दल और उसके नेता की छवि चमकाने का काम चलता ही रहना है, तो इस आदेश से हासिल क्या हुआ?

आशा है, सुधी पाठक मेरे विचारों को न्यायपालिका की मंशा पर संदेह और चिरकुट नेताओं की तरफदारी के रूप में न लेकर लेख में उठाये गये सैद्धांतिक मुद्दों पर विचार करेंगे।

अंत में : लोकतंत्र की तमाम खामियों के बावजूद हमारे पास इसका कोई बेहतर विकल्प नहीं है। नेताओं व सरकारों की इस तरह की क्षुद्रता का इलाज भी सिर्फ जनता ही कर सकती है। जब तक नेताओं को उसका समर्थन हासिल है, वे उसका बेजा लाभ भी उठाते ही रहेंगे। यानी जब तक जनता ऐसे लोगों और उनके ऐसे कृत्यों को मजबूती से नहीं नकारेगी, यह सब चलता ही रहेगा। इसका कोई शार्टकट नहीं है। अदालती फैसलों से तो ऐसा स्थायी और सकारात्मक बदलाव न संभव है, न ही वांक्षित। और दुहराव का खतरा उठाते हुए भी मैं एक बार फिर कवि दुष्यंत की पंक्तियों को उद्धृत कर रहा हूं : ‘रहनुमाओं की अदाओं पे फिदा है दुनिया, इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो...’

श्रीनिवास

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जानिये श्रीनिवास जी को.. वरिष्ठ पत्रकार श्रीनिवास पिछले तीन दशकों तक रांची से प्रकाशित झारखंड का प्रमुख हिन्दी 'प्रभात खबर' से जुड़े रहे हैं। अखबार के संपाकीय पृष्ठ इन्हीं की देखरेख और योगदान से तैयार होता रहा। अब वह वहां से सेवानिवृत हो चुके हैं। आजकल प्ढ़ना और समसामयिक विषयों पर विश्लेषण कर उसे भिन्नं अखबारों में प्रकाशित करना उनकी दिनचर्या है। श्रीनिवास 'न्यूंज विंग' के लिए भी नियमित लिखते रहे हैं। खासकर न्यूज विंग साप्ताहिक समाचारपत्र में वह शुरूआती अंक से ही योगदान करते रहे हैं। न्यूज विंग को उनसे काफी मार्गदर्शन मिलता रहा है।

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