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हस्तिनापुर में ही रुका अश्‍वमेघ का घोड़ा!

दिल्ली चुनाव के नतीजे की आसानी से और चंद शब्दों में व्याख्या करना फिलहाल किसी के लिए भी कठिन है। फिर भी तत्काल कहना जरूरी हो, तो कहा जा सकता है- अद्भुत.. अकल्पनीय! 70 में 67! खुद केजरीवाल और उनके साथी मान रहे हैं कि इस जीत की कल्पना उन्हें भी नहीं थी। भला कौन कल्पना कर सकता था कि महज 14 माह पहले विधानसभा की 32 सीटें और आठ माह पहले दिल्ली की सभी सात लोकसभा सीटें जीतनेवाली भाजपा तीन सीटों पर सिमट जायेगी। यह भी कोई कैसे सोच सकता था कि 1998 से 2013 तक दिल्ली पर राज करती रही कांग्रेस का खाता भी नहीं खुलेगा। कमाल है कि कांग्रेस और भाजपा फिलहाल, प्रकट में, अपनी दुर्गति पर रोने के बजाय एक दूसरे की फजीहत पर खुश हो रही हैं। हां, उनकी इस बात के लिए सराहना की जानी चाहिए कि इन दोनों ने विनम्रतापूर्वक अपनी पराजय स्वीकार करते हुए अरविंद केजरीवाल और ‘आप’ को उनकी जीत पर बधाई दी है। हालांकि भाजपा और कांगे्रस की हालत तो बीच बाजार में पकड़े गये उस चोर या पाकेटमार जैसी हो गयी है, जिसे पास से गुजरता हर राहगीर तमाचा लगा देता है।
इस जीत/जनादेश के तरह तरह से विश्लेेषण का सिलसिला तो लंबे समय तक चलेगा। मगर फिलहाल इतना स्वीकार किया जाना चाहिए कि यह महज ‘आम आदमी पार्टी’ की नहीं, दिल्ली के आम आदमी की जीत है। साथ ही यह भाजपा के अंहंकार, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आत्ममुग्धता व बड़बोलेपन को जनता का जवाब है। यह तो तथ्य है ही कि मोदी/शाह के अपराजेय दिखने या माने जा रहे विजय रथ को ऐन केंद्रीय सत्ता प्रतिष्ठान, यानी हस्तिनापुर की नाक के नीचे रोक दिया गया है।
लेकिन हमेशा की तरह ‘जो जीता वही सिकंदर’ की मान्यता और ‘उगते सूरज को पूजने की परंपरा के अनुरूप कल तक केजरीवाल की जम कर आलोचना करते रहे लोग व पत्रकार भी आज उनकी तारीफ में कशीदे काढ़ते दिख रहे हैं। केजरीवाल को बधाई देनेवालों का तांता लगा हुआ है। ‘आप’ की जीत को अभ्ाूतपूर्व तो कहा ही जा रहा है, जो वह एक तरह से है भी। मगर पाठकों की जानकारी के लिए इससे भी बड़ी जीत का एक अनोखा उदाहरण सिक्किम का है, जहां 2009 के चुनाव में सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट ने विधानसभा की सभी 32 सीटें जीत ली थीं। उसके पहले 2004 में उसे 31 सीटों पर जीत मिली थी। 2014 के चुनाव में भी वह 22 सीटें जीत कर सत्ता में बनी हुई है। हालांकि दिल्ली से सिक्किम की तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि वहां की आबादी बहुत कम है। वहां से लोकसभा की मात्र एक सीट है, जबकि दिल्ली में सात। फिर भी मुख्यमंत्री श्री चामलिंग की सफलता वव लोकप्रियता की चर्चा इसलिए नहीं हुई कि वे एक ऐसे राज्य के मुख्यमंत्री हैं, जिसे कथित मुख्यधारा की मीडिया में सामान्सतया स्थान ही नहीं मिलता, जब तक वहां कोई अनहोनी घटना न हो जाये। किसी ने कह दिया कि देश में पहली बार कुर्सी छोड़नेवाले को दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली है। यह भी गलत। 1984 के लोकसभा चुनाव में अपने राज्य कर्नाटक में पराजय मिलने पर जनता पार्टी के रामकृष्ण हेगडे (अब दिवंगत) ने नैतिकता के आधार पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर खुद विधानसभा चुनाव की सिफारिश की थी।; और 1985 में हुए चुनाव में पुन: जीत हासिल कर मुख्यमंत्री बने थे।
निश्चंय ही दिल्ली में ‘आप’ की इस जीत से एक बार फिर सिद्ध हुआ है कि वैकल्पिक राजनीति की बंजाइश अब भी है, कि कम पैसे और साधन से भी चुनाव लड़े और जीते जा सकते हैं; कि यदि जनता आपके साथ नहीं है, तो पैसा, लाठी या सत्ता, कुछ काम नहीं आता। ‘आप’ को मिले इस अपार बहुमत के साथ यह आशंका होनी स्वाभाविक है कि कहीं इसके नेताओं/समर्थकों में जीत का अहंकार न भर जाये और उसकी सरकार निरंकुश होने की भ्ाूल न करने लगे। मगर अच्छी बात है कि केजरीवाल सहित ‘आप’ के सभी बड़े नेताओं ने अपने समर्थकों को जीत पर इतराने के बजाय अहंकार से दूर रहने का अनुरोध किया है। साथ ही वे इस जीत को अपने लिए बड़ी चुनौती और जिम्मेवारी मानते हैं। वे इस चुनौती पर खरे उतरें। शुभकामनाएं। बधाई। ‘लुटियन्स’ की दिल्ली में ‘आम आदमी पार्टी’ का जो झाड़ू चला है, उम्मीद की जानी चाहिए कि वह दिल्ली सहित देश की राजनीति में फैली गंदगी को भी कुछ हद तक साफ कर सकेगी। ‘आप’ का दावा भी है कि वह भारतीय राजनीति का चरित्र बदलने का प्रयास करेगी। देश की राजनीति पर इसका कैसा और कितना प्रभाव पड़ेगा, यह तो वक्त बतायेगा। वैसे भी केजरीवाल की शैली से अन्य दलों का तालमेल आसानी से हो सकेगा, इसमें संदेह है। मगर केजरीवाल का प्राथमिक काम तो दिल्ली की जनता से किये गये लंबे चौड़े वायदों को पूरा करना ही है। जनता, खास कर शहरी जनता का धैर्य आजकल बहुत जल्द टूटता है। अपने देश में अपने नायकों को महानायक, क्रांतिकारी और भगवान का दर्जा दिये जाने की पुरानी और गलत परंपरा रही है। अन्ना के साथ यही हुआ। आशंका है कि केजरीवाल के साथ भी ऐसा हो सकता है। आशा करें कि केजरीवाल सचमुच आम आदमी बने रह कर उनकी उम्मीदों को पूरा करने के काम में लगे रहेंगे।
दोषपूर्ण चुनाव प्रणाली : जहां तक किसी दल का ‘सूपड़ा साफ’ होने की बात है, तो सीटों के लिहाज से सफाया हो जाने या हाशिये पर चले जाने की बात है, यह इस चुनाव प्रणाली का दोष है कि किसी दल को मिले वोट और उसे मिली सीटों में कोई तालमेल नहीं होता। आजादी के बाद से संभवत: एक बार नेहरूजी के समय कांग्रेस को 50 फीसदी से अधिक मत मिला था। अन्यथा आज तक दरअसल अल्पमत की ही सरकारें बनती रही हैं। सीटों और प्राप्त मत में इस विषमता और विडंबना का सबसे तीखा एहसास 2014 के लोकसभा चुनाव में हुआ, जब भाजपा महज 32 फीसदी वोट पाकर लोकसभा की करीब 55 फीसदी सीटें जीत गयी; जिसे देश की जनता द्वारा ‘जाति-धर्म से ऊपर उठ कर दिया गया ‘अभ्ाूतपूर्व’ जनादेश बताया गया। दिल्ली के चुनाव में भी मात्र 53.5 प्रतिशत मत पाने वाले ‘आप’ को 95 प्रतिशत सीटें मिल गयी हैं। भाजपा को करीब 31 फीसदी मत मिलने के बावजूद महज तीन सीटें मिलीं; और नौ फीसदी से अधिक मत मिलने पर भी कांग्रेस के हाथ जीरो लगा! यह कतई आदर्श स्थिति नहीं है। जाहिर है, 56.5 फीसदी उन मतदाताओं के मत की अवमानना होगी जिन्होंने ‘आप’ को वोट नहीं दिया। यहां इस बात को उठाने का मकसद यह नहीं है कि ‘आप’ की जीत के महत्व को कम करके आंका जाये- क्योंकि हर चुनाव में किसी दल को इसका लाभ और किसी को नुकसान झेलना पड़ता है- बल्कि यह है कि लोकतंत्र को और वास्तविक प्रभावी बनाने के लिए इस चुनाव प्रणाली में सुधार, यानी समानुपातिक चुनाव प्रणाली अपनाने पर गंभीरता से विचार किया जाये। बल्कि, ऐन वक्त यह प्रसंग स्वयं अरविंद केजरीवाल उठाते तो शायद उनके राजनीतिक कद में इजाफा होता और मुद्दे को और भी गंभीरता मिलती।
अंत में राहुल गांधी से एक अपील : भरतीय राजनीति में कांग्रेस की उपयोगिता और सकारात्मक भ्ाूमिका की जरूरत व गुंजाइश अब भी है। मोदी/भाजपा के ‘कांग्रेस मुक्त भारत के कथित लक्ष्य को सफल करने पर तुल गये हो यार! कांग्रेस और अपने देश पर एक एहसान कर दो, साथ ही गौरवशाली अतीतवाले अपने परिवार पर भी। यह मान लेने से इज्जत नहीं चली जायेगी कि राजनीति मेरे बस की बात नहीं है। - श्रीनिवास

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