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एक मतदाता की दुविधा : वोट किसे और क्यों दें

बीते नौ नवंबर को मैंने भी, हमेशा की तरह, अपना मत डाल दिया। यह और बात है कि मेरे वोट से लोकतंत्र कैसे मजबूत होगा या झारखंड की तसवीर व तकदीर कैसे बदल जायेगी (जैसा कि मतदाताओं को जागरूक करने के अभियानों के तहत बताया जाता रहा है), न मैं समझ पाया हूं और न जानता हूं। हालांकि मैं भी मानता हूं कि एक नागरिक और मतदाता होने के नाते मतदान करना हम सबों का कर्तव्य है। लेकिन यह नहीं समझ पाता हूं कि कम मतदान होने से राज्य या देश में कमजोर या बुरी सरकार क्यों और कैसे बन जायेगी; इसी तरह मतदान का प्रतिशत अधिक होने से अच्छी-मजबूत सरकार कैसे बन जायेगी। वैसे भी जिस प्रत्याशी और दल के पक्ष में मैंने मतदान किया है, उसके जीत पाने की संभावना बहुत कम है। जीत भी जाये, तो उस दल की सरकार बन जायेगी, इसकी गारंटी नहीं है। तो क्या मैंने अपना मत बर्बाद कर दिया? मैं ऐसा नहीं मानता। जीत या हार के आधार पर मतदान की उपयोगिता नहीं मापी जा सकती। मतदान कर हम एक तरह से देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपनी जरूरी भ्ाूमिका का निर्वाह करते हैं। कोई जीते या हारे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

जीतने वाला उम्मीदवार अन्य के मुकाबले अधिक लोगों की पसंद तो होता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह सबसे अच्छा ओर योग्य भी हो। आजाद भारत के चुनावी इतिहास को देख लें, तो पराजितों की लंबी सूची में एक से बढ़ कर देश के बड़े और सफल व लोकप्रिय नेता मिल जायेंगे; इसी तरह निवा्रचित माननीयों में एक से बढ़ कर एक चिरकुट टाइप लोग मिल जायेंगे। चिरकुटों का नाम गिनाना तो उचित नहीं होगा, वैसे उनमें भी सबकी अपनी अपनी सूची हो सकती है। पर पराजितों की सूची बनायें, तो वह भी काफी लंबी होगी। उनमें डॉ लोहिया से लेकर डॉ आंबेडकर तक, आचार्य कृपलानी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक और इंदिरा गांधी से लेकर सोमनाथ चटर्जी तक मिल जायेंगे। यानी संासद या विधायक होना संबद्ध नेता की संबद्ध चुनाव क्षेत्र में लोकप्रियता का तो प्रमाण है, मगर योग्यता का नहीं।

जो भी हो, हर बार मतदान के दौरान या चुनाव घोषित होने के बाद से ही मैं एक दुविधा में रहता हूं- अपना मत 'अच्छे' प्रत्याशी को दूं या कि अच्छी पार्टी को। इस बार भी था। जागरूकता अभियान चलाने वाले एक ओर तो योग्य प्रत्याशी चुनने की सलाह देते हैं, दूसरी और ‘स्थिर’ व ‘मजबूत’ सरकार चुनने का भी। अब यह दोनों लक्ष्य एक साथ कैसे हासिल हो सकता है, यह भी समझ से परे है। नेतागण और ‘स्टार प्रचारक’ भी अपने दल के उम्मीदवारों के पक्ष में आंख मूंद कर मत डालने की अपील करते हैं। एक दल का तो नारा ही है, ‘॥ ॥ के साथ।’ यानी प्रत्याशी की योग्यता, छवि, पृष्ठभ्ाूमि को मत देखो, मेनीफेस्टो भी मत देखो (वैसे भी घोषणापत्र को पढ़ कर या अलग अलग दलों के घोषणापत्र की तुलना कर कितने लोग वोट देते हैं?), बस हमारे उस चमत्कारी नेता और उसके चमकते तेजस्वी चेहरे पर भरोसा करो। तमाम दलों के नेता अपने दल या अपने प्रत्याशी की खासियत बताने की तुलना में दूसरों की बुराइयां गिनाने में अधिक लगे रहते हैं। किसने अपने शासन काल में कम या अधिक लूटा, इसका हिसाब करते रहिये। उधर हर दल के नेता के पास अतीत में बेहतर काम न कर पाने के बचाव में ‘ठोस’ तर्क है। ब्रिटेन के चर्चित प्रधानमंत्री चर्चिल ने कहा भी था कि सफल राजनीतिज्ञ वही है, जो जनता से कोई भी वायदा कर दे; और उन्हें पूरा न कर पाने पर जनता को उन कारणों को बता कर अपने तर्कों से आश्वंस्त (कनविंस) भी कर सके। ऐसा लगता है, अपवादों को छोड़ भारत का प्रत्येक नेता चर्चिल की उक्त परिभाषा को जानता है और उस पर अमल भी करता है। ऐसे नेताओं की सफलता का एक कारण भारतीय समाज में विद्यमान व्यक्ति पूजा की परंपरा भी है।

आदर्श स्थिति तो यही है कि हम अपना मत अपनी पसंद के प्रत्याशी या दल को ही दें। मगर कई बार हमारी प्राथमिकता किसी दल की जीत के मुकाबले किसी दल की हार भी हो जाती है। मैं खुद इस तरह के लक्ष्य को लेकर मतदान करता रहा हूं; और मेरा खयाल है, मैं अकेला नहीं हूं। इसे आप नकारात्मक मतदान कह सकते हैं। मगर मुझे इसमें कुछ गलत नहीं लगता। इसलिए कि जिस दल और उसकी नीतियों को मैं देश और समाज के लिए गलत व विनाशकारी मानता हूं, उसकी पराजय सुनिश्चिलत करना क्या मेरा दायित्व नहीं हो सकता? मगर ऐसा करते हुए भी कई बार एक दुविधा हो जाती है- क्या उस लक्ष्य, यानी उस दल को सत्ता से बाहर रखने के लिए किसी जाने हुए भ्रष्ट, अपराधी चरित्र के और लंपट प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करना सही है? मेरा जवाब है- नहीं। वैसे अब तो हमारे पास ‘नोटा’ का विकल्प भी है। किसी नेता-रहनुमा के कहने पर; या अपनी पसंद के दल की जीत या नापसंद दल कर हार के लिए उस हद जाना अपने विवेक को मार कर ही संभव हो सकता है। प्रसंगवश, मुझे 1977 का वह ऐतिहासिक चुनाव याद आ रहा है, जब पूरे उत्तर भारत में कांग्रेस के कुशासन या कहें इंदिरा गांधी के तानाशाही रवैये खिलाफ गुस्से की लहर थी और नतीजतन पहली बार केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी। तब 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए बिहार आंदोलन के कारण ही प्रधानमंत्राी इंदिरा गांधी ने घबरा कर 25 जून 1975 की रात इमरजेंसी लगा कर देश पर तानाशाही थोप दी थी। जाहिर है, वह चुनाव लोकतंत्र की रक्षा और पुनर्स्थापना का चुनाव बन गया था। फिर भी जब जेपी ने अपने किसी भाषण में लोगों से आंख मूंद कर जनता पार्टी को वोट करने की अपील की, तो प्रखर पत्रकार, कवि सर्वेश्वअर दयाल सक्सेना ने, जो यूं जेपी और आंदोलन के समर्थक ही थे, उस समय के प्रतिष्ठित हिंदी साप्ताहिक दिनमान के अपने नियमित कॉलम में जेपी की आलोचना की। उन्होंने लिखा था कि बेशक हम जेपी का सम्मान करते हैं, उनकी बात पर भरोसा भी, फिर भी उनका ‘आंख मूंद कर’ किसी दल या प्रत्याशी के पक्ष में मतदान की अपील करना लोकतांत्रिक मूल्यों मान्यताओं के खिलाफ है।

यह और बात है कि, जैसा कि चुनाव नतीजों से जाहिर हुआ, कम से कम उत्तर भारत के मतदाताओं ने मानो ‘आंख मूंद कर’ कर ही वोट डाला। ऐसे कि, बंगाल से लेकर पंजाब तक कांग्रेस को सिर्फ तीन सीटें नसीब हुईं। वैसे वह लोगों के गुस्से का प्रकटीकरण भी था। लेकिन क्या इस तरह हवा या लहर के प्रभाव में वोट उालते हुए हम अपने विवेक को छोड़ नहीं देते हैं? जेपी को हमारे जैसे लाखों करोड़ों लोग अपना प्रेरणास्रोत और नायक मानते रहे हैं, आज भी मानते हैं। फिर भी मैं सर्वेश्वरर दयाल सक्सेना की आलोचना से सहमत हूं। हालांकि जेपी और उस समय के हालात की तुलना आज के नेताओं व हालात से नहीं की जा सकती। मगर सच यही है कि इस देश के मतदाता अक्सर इस या उस नेता पर आंख मूंद कर ही भरोसा करते रहे हैं।

दिवंगत कवि दुष्यंत ने कितना सटीक कहा था,
‘रहनुमाओं की अदाओं पर फिदा है दुनिया,
इस बहकती हुई संभालो यारो॥

- श्रीनिवास

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Role: author
जानिये श्रीनिवास जी को.. वरिष्ठ पत्रकार श्रीनिवास पिछले तीन दशकों तक रांची से प्रकाशित झारखंड का प्रमुख हिन्दी 'प्रभात खबर' से जुड़े रहे हैं। अखबार के संपाकीय पृष्ठ इन्हीं की देखरेख और योगदान से तैयार होता रहा। अब वह वहां से सेवानिवृत हो चुके हैं। आजकल प्ढ़ना और समसामयिक विषयों पर विश्लेषण कर उसे भिन्नं अखबारों में प्रकाशित करना उनकी दिनचर्या है। श्रीनिवास 'न्यूंज विंग' के लिए भी नियमित लिखते रहे हैं। खासकर न्यूज विंग साप्ताहिक समाचारपत्र में वह शुरूआती अंक से ही योगदान करते रहे हैं। न्यूज विंग को उनसे काफी मार्गदर्शन मिलता रहा है।

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