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कसाब के मृत्युदंड पर सर्वोच्च न्यायालय की मुहर

नई दिल्ली | सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब के मृत्युदंड पर मुहर लगा दी। मुम्बई पर 26 नवम्बर 2008 को हमला करने वाले 10 आतंकवादियों में से कसाब एकमात्र ऐसा आतंकवादी है, जिसे जीवित पकड़ा गया था। इस हमले में 166 लोग मारे गए थे।

न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति सी.के. प्रसाद की पीठ ने कहा, "हम इस रुख को बरकरार रखने के लिए बाध्य हैं कि फांसी ही एकमात्र ऐसी सजा है, जिसे इस मामले की स्थितियों में दी जा सकती है।"

निचली अदालत ने कसाब को मृत्युदंड सुनाया था और बाद में बम्बई उच्च न्यायालय ने उसकी सजा को बरकरार रखा था। इसके बाद उसने मृत्युदंड के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी।

न्यायालय ने कसाब के इस तर्क को खारिज कर दिया कि मुम्बई पर हुआ आतंकवादी हमला भारत सरकार के खिलाफ युद्ध था, न कि भारत या यहां के लोगों के खिलाफ।

न्यायालय ने कहा कि भारत सरकार, देश का एकमात्र निर्वाचित अंग और सम्प्रभु सत्ता का केंद्र है। इसके बाद न्यायालय ने कहा, "आरोपी का प्राथमिक और मुख्य अपराध भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ना ही था।"

सर्वोच्च न्यायालय ने कसाब के उस तर्क को स्वीकार नहीं किया, जिसमें उसने कहा था कि गिरफ्तार किए जाने के तत्काल बाद उसे वकील न मुहैया कराए जाने से पूरी प्रक्रिया बिगड़ गई।

न्यायालय ने यह भी कहा कि कसाब को वकील मुहैया कराने की कोशिशें की गईं, लेकिन उसने यह कहते हुए हर बार इंकार कर दिया कि उसे भारतीय वकील की आवश्यकता नहीं है।

फैसले में कहा गया है कि कसाब के वकील को दिया गया समय पर्याप्त था।

न्यायालय ने कसाब का वह तर्क भी खारिज कर दिया, जिसमें उसने कहा था कि पुलिस के समक्ष इकबालिया बयान उसने अपनी मर्जी से नहीं दिया था। फैसले में कहा गया है, "इकबालिया बयान बिल्कुल अपनी मर्जी से दिया गया था।"

कसाब के मृत्युदंड को बरकरार रखने के अतिरिक्त कारण गिनाते हुए एक सहमति वाले फैसले में न्यायमूर्ति सी.के. प्रसाद ने कहा कि मौखिक और दस्तावेजी सबूतों से बिल्कुल स्पष्ट है कि 26/11 के हमले की साजिश पाकिस्तानियों द्वारा पाकिस्तान में रची गई थी और उसे मुम्बई में अंजाम दिया गया, जिसमें भारी तबाही हुई।

न्यायालय ने फहीम अंसारी और सबाउद्दीन अहमद को बरी किए जाने के फैसले को भी बरकरार रखा, जिनपर 26/11 हमले के पहले कसाब और उसके साथियों को मुम्बई के स्थलों के बारे में जानकारी मुहैया कराने का आरोप था।

महाराष्ट्र सरकार ने फहीम और अंसारी को बम्बई उच्च न्यायालय द्वारा बरी किए जाने को चुनौती दी थी।

बम्बई उच्च न्यायालय ने 21 फरवरी, 2011 को कसाब का मृत्युदंड बरकरार रखा था। इसके पहले मुम्बई की एक अदालत ने छह मई, 2010 को उसे फांसी की सजा सुनाई थी। अन्य आरोपों के अलावा उसे राष्ट्र के खिलाफ युद्ध छेड़ने का दोषी पाया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने लगभग तीन महीने से अधिक समय तक चली बहस के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। मामले की सुनवाई 31 जनवरी से शुरू हुई थी।

कसाब और उसके नौ साथी कराची से समुद्र मार्ग से मुम्बई पहुंचे थे। उसके बाद उन्होंने एक निजी भारतीय नौका एम.बी. कुबेर को अगवा कर लिया था और उसके नाविक अमर चंद सोलंकी को मार डाला था।

This Article Posted on: August 29th, 2012 by admin in : Sections.

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