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चार साल में नहीं लगा एक भी स्टील प्लांट, हुअा 1.60 लाख करोड़ के निवेश का नुकसान - दो

NEWS WING

RANCHI, 12 AUGUST : 2012 में झारखंड सरकार ने नई उद्योग नीति लागू की थी. तब कहा गया था कि पुरानी नीति नए दौर में बेकार और अप्रासांगिक है. दावा किया गया था कि इससे राज्य में उद्योग-धंधे चौतरफा फले-फूलेंगे. नीति का मकसद उद्योग स्थापना की बाधाओं को दूर कर प्रशासनिक प्रक्रियाओं को आसान बनाना था. ताकि निवेशक अाकर्षित हो. 2014 से ही सरकार "ईज ऑफ डूइंग बिजनेस" इनिसिएटिव का ढिंढोरा हर तरफ पीट रही है. लेकिन सरकारी दावों के बीच सीएजी ने असलियत को सामने रख दिया है. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में जिन तथ्यों का खुलासा किया है, वह चौंकाने वाला है. हालात यह है कि वर्ष 2012 से लेकर 2016 तक राज्य में एक भी स्टील प्लांट नहीं लगाया जा सका. लाखों करोड़ रुपये के निवेश के लिए एमअोयू किए गए, लेकिन सिर्फ 4493 करोड़ रुपये का निवेश हो पाया. सीएजी इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि सही तरीके से काम नहीं होने के कारण राज्य को 1.6 लाख करोड़ रुपये के निवेश नुकसान हुअा है.

सीएजी की पूरी रिपोर्ट पढ़ें 
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9  ( सुनिये/देखिये वित्तीय गड़बड़ी के बारे में क्या कहा सीएजी नें )

सीएजी रिपोर्ट के मुख्य अंश

- नई उद्योग नीति के बाद केवल 4,493 करोड़ रुपये निवेश हो पाए, जबकि वर्ष 2012 से पहले 28,424 करोड़ का निवेश हुअा था.

- उद्योग स्थापना के लिए जमीन न मिलने और सरकार के उदासीन रवैये के कारण करीब 48 प्रतिशत एमओयू रद्द हो गए. इस कारण झारखंड 62,879 करोड़ रुपये के बड़े निवेष से वंचित रह गया.

- वर्ष 2012 से 2016 तक राज्य में एक भी स्टील प्लांट नहीं लग पाया. इस कारण राज्य को 1.6 लाख करोड़ रुपये निवेश की हानि हुई.

- कई निवेशक तो 10 साल तक भूमि, जलापूर्ति, बिजली, फॉरेस्ट क्लियरेन्स, सुरक्षा व्यवस्था आदि को लेकर जूझते रहे. मगर सरकारें निवेशकों को सुविधाएं देने में असफल रहीं. इसका नतीजा हुआ कि निवेशक अन्य राज्यों का रुख करने को विवश हुए.

- सिंगल विन्डो सिस्टम अपने मकसद में पूरी तरह असफल रहा. वन स्टॉप क्लियरेन्स की घोषणा धरातल पर नजर नहीं आई. कई-कई निवेशकों के एमओयू चार से 13 साल तक क्लियरेन्स के इंतजार में हैं.

- सरकार निवेशकों को आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे भूमि उपलब्ध कराना, भूमि बैंक की स्थापना, निर्बाध बिजली अापूर्ति, पानी और कच्चा माल की सुविधा देने में नाकाम रही. साथ ही स्पेशल इकोनॉमिक जोन यानी सेज की भी स्थापना नहीं की जा सकी.

- उद्योग नीति-2012 के सफल क्रियान्वयन के लिए सीएम के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई जानी थी, जो नहीं बनाई गई. इस कारण नई उद्योग नीति की न तो कोई उच्च स्तरीय निगरानी हो सकी और न ही कोई समीक्षा.

- 2015 में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के विभिन्न मानकों पर झारखंड को राष्ट्रीय स्तर पर तीसरा स्थान प्राप्त हुआ था. जबकि सीएजी ने अपने मूल्यांकन में आठ में से छह मानकों पर झारखंड को कई राज्यों के मुकाबले काफी पिछड़ा पाया.

- एसोचैम ने भी अपनी रिपोर्ट-2015 में इस बात का जिक्र किया था कि झारखंड में निवेश की गति काफी नीचे आई है. 2010-11 के दौरान जहां निवेश वृद्धि 25.7 प्रतिशत थी वह 2014-15 में गिरकर 10.10 प्रतिषत पर आ गई.

- सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ल्ड बैंक ने झारखंड को ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के समग्र पैमाने पर तीसरा स्थान दिया था. मगर जमीनी हकीकत इससे काफी अलग है. फेडरेशन ऑफ झारखंड चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज, झारखंड स्मॉल इंडस्ट्रीज एसोशिएसन और न ही एसोचैम वर्ल्ड बैंक की उस रैंकिंग को पूरी तरह सही ठहराते हैं.

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