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पोस्टनेटल डिप्रेशन महिलाओं के लिए खतरनाक

 

रांची, 31 जुलाई: प्रेगनेंसी और उसके बाद बच्चे का जन्म, यह दौर कुछ ऐसा होता है, जिसमें कई तरह के हार्मोनल चेंजेज तो होते ही हैं, साथ ही रोजमर्रा के रूटीन में भी एक भारी बदलाव आता है. यह बदलाव अकसर महिलाओं में चिड़चिड़ेपन का कारण बनती है. छोटी-छोटी बात पर विवाद रूठना मनाना आम हो जाता है. वैसे तो यह एक आम समस्या है लेकिन सच तो यह है कि यह किसी भी महिला के लिए बहुत ही ज्यादा नुकसानदायक होता है, जो प्रेगनेंसी से शुरू हो कर बच्चे के जन्म के बाद भी कायम रहता है.

इसे कहते हैं पोस्टनेटल डिप्रेशन

मेडिकल फील्ड में इसे पोस्टनेटल डिप्रेशन कहा जाता है. डॉक्टरों के अनुसार यह डिप्रेशन सेहत को काफी नुकसान पहुंचा सकता है. बच्चे के जन्म के पहले और जन्म के बाद दोनों ही समय मां के शरीर में कई बदलाव आते हैं. जिसमें शरीर में हार्माेन्स के लेवल में बदलाव, तनाव, नींद पूरी न होना हैं. इसके अलावा इस समय डर, अत्याधिक भावुक होना, चिड़चिड़ापन और मनोदशा में बदलाव भी एक सामान्य बात है. यूं तो यह प्रेगनेंसी के शुरूआती महीनों से शुरू हो जाते हैं लेकिन महिलाओं में यह समस्या बच्चा होने के कई महीने बाद तक कायम रहता है. इसी स्थिति को पोस्टपार्टम या पोस्टनेटल डिप्रेशन कहा जाता है.

साइकोसिस का खतरा आनुवंशिक

 

डॉक्टरों के अनुसार, बच्चे के जन्म के बाद सिर्फ पोस्टपार्टम डिप्रेशन ही नहीं होता बल्कि इसके साथ ही पोस्टपार्टम फ्लू और साइकोसिस होने की भी संभावना रहती है. पोस्टपार्टम फ्लू कुछ समय ही रहता है. सबसे कम मामले साइकोसिस के होते हैं. इसका खतरा उन लोगों को ज्यादा होता है जिनके परिवार में आनुवंशिक रूप से यह समस्या होती है. जिसमें थकान महसूस करना, असहाय, खालीपन, दुखी होना या किसी भी बात पे आंसू आना, आत्मविश्वास खोना, अपराधबोध की भावना, खुद को नाकाम मानना, उलझन में होना, घबराहट, अपने बच्चे के लिए खतरा महसूस करना, अकेलेपन या बाहर निकलने का डर, सामाजिक कार्यों में दिलचस्पी न लेना, ज्यादा सोना या बिल्कुल ना सोना, बहुत ज्यादा खाना या बिल्कुल ना खाना, ऊर्जा की कमी महसूस करना, अपनी देखभाल पे ध्यान न देना, स्वास्थ्य में साफ-सफाई का ध्यान ना रखना, स्पष्ट सोच ना पाना, निर्णय लेने में मुश्किल, जिम्मेदारियों से दूर भागना. बच्चे के जन्म के बाद हार्माेनल चेंजेस में गड़बड़ी होने से ऐस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरॉन और कोर्टि सोलहार्माेन में गिरावट होती है. गर्भावस्था से पहले किसी तरह की मानसिक बीमारी से पीड़ित होना भी इसका एक कारण हो सकता है. इसके अलावा पति पत्नी के बीच दूरी महसूस होना, मां बनने के बाद करियर खत्म होने का टेंशन, मां बनने के बाद की जिम्मेदारियां, रोज के रूटीन में बदलाव, शारीरिक बदलाव जिसमें स्ट्रेच मार्क्स का आना वजन बढ़ना ये सभी ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से मां बनी महिला अत्यंत तनाव में आ जाती है.

पति परिवार का साथ है जरूरी

इस समय में डॉक्टरी इलाज से ज्यादा एक महिला को उसके पति और परिवार के सपोर्ट की जरूरत होती है. आपसी संबंधों में मधुरता बनाये रखना और मां बनी महिला की मन की उलझन को समझते हुए उसका साथ देना. बच्चे की देखभाल व अन्य कामों में परिवार का साथ महिला को इस स्थिति से उबारने में सहयोगी है.

 

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