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दवे को नर्मदा बांध विस्थापितों की मदद नहीं करने दी गई : मेधा पाटकर

कोलकाता: नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़ीं समाज सेविका मेधा पाटकर और सम्मानित पर्यावरणविद् प्रफुल्ल सामंत्रा का मानना है कि नर्मदा बांध परियोजना के कारण विस्थापित लोगों की मदद के लिए केंद्रीय पर्यावरण अनिल दवे को उनकी योजनाओं पर उन्हें काम करने की अनुमति नहीं दी गई। गोल्डमैन एन्वायरन्मेंट पुरस्कार विजेता सामंत्रा ने नर्मदा बांध परियोजना के कारण 45,000 हजार लोगों के विस्थापन की ओर इशारा करते हुए कहा, "उन्हें कुछ भी करने की अनुमति नहीं दी गई, क्योंकि सबकुछ प्रधानमंत्री कार्यालय कर रहा है। भारत सरकार किसी भी मंत्रालय को महत्व नहीं दे रहा। यही त्रासदी है। वह लोगों को नहीं बचा सके। उन्हें विस्थापित होने को मजबूर किया गया।"

दवे के निधन पर संवेदना जताते हुए मेधा पाटकर ने कहा, "वह अलग प्रकृति के व्यक्ति थे। वह बेहद मृदुभाषी थे। यह भी संभव है कि हालिया नर्मदा सेवा यात्रा में उन्हें उनकी भूमिका निभाने न दी गई हो।"

मेधा ने हालांकि शोक जताया कि दवे ने बांध के निर्माण पर कोई विरोध नहीं किया। उन्होंने कहा, "उन्होंने कई नर्मदा महोत्सव को बरकरार रखा। लेकिन नर्मदा बांध जैसे बड़े निर्माण पर उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया।"

उन्होंने कहा, "हालांकि मंत्री बनने के बाद उन्होंने हमारे मामले को पेश करने का हमें मौका दिया, इसके अलावा और कुछ नहीं हुआ।"

मेधा ने कहा, "हो सकता है, उन्होंने अपनी आवाज अंदर (केंद्र सरकार के समक्ष) उठाई हो और उनकी नहीं सुनी गई हो, क्योंकि नर्मदा मुद्दे को अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान देख द रहे हैं..मुझे ज्यादा नहीं पता।"

'नर्मदा बचाओ आंदोलन' नर्मदा नदी पर बड़े-बड़े बांध बनाए जाने के विरोध में आदिवासियों, किसानों, पर्यावरणविदों तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का सामाजिक आंदोलन है। यह नदी मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर बहती है।

इस नदी पर सबसे बड़ा बांध गुजरात में सरदार सरोवर बांध है। आंदोलन के दौरान सबसे पहले इसी पर ध्यान केंद्रित किया गया था।

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