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'आरएसएस सरकार' प्रगतिशील लेखकों को कभी स्वीकार नहीं करेगी : नयनतारा सहगल

नई दिल्ली: भारत की नारीवादी लेखिकाओं में से एक नयनतारा सहगल ने अपना साहित्य अकादेमी पुरस्कार 2015 में देश में असहिष्णुता बढ़ने के मुद्दे पर लौटा दिया था। यह पूछे जाने पर कि क्या वह सरकार से फिर से कोई सम्मान स्वीकार करेंगी? उन्होंने कहा, 'कभी नहीं।'

उपन्यास 'रिच लाइक अस' के लिए प्रशंसित लेखिका नयनतारा सहगल को 1986 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वह पुरस्कार के बारे में मौजूदा सरकार की सोच पर हंसती हैं।

नयनतारा ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, "भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार 'आरएसस की सरकार' है। रूढ़िवादी आरएसएस के लिए प्रगतिशील लेखकों को स्वीकार कर पाना संभव नहीं है।

उन्होंने कहा, "मैं अपने पूरे जीवन में किसी भी पुरस्कार, नौकरी या किसी चीज के लिए लाइन में नहीं खड़ी हुई.. और मैं इस शासन में ऐसा कुछ भी नहीं करूंगी।"

नयनतारा सहगल (89) ने आगे कहा कि निजाम बदला तो साहित्य अकादेमी का रुख भी बदल गया। वह देश में अभिव्यक्ति की आजादी के लिए साहित्य अकादेमी के तरफ से समर्थन का कोई संकेत नहीं देख रही हैं।

उन्होंने कहा, साहित्य अकादेमी ने अकादेमी पुरस्कार विजेता नरेंद्र दाभोलकर की हत्या पर कुछ भी नहीं कहा। उन्होंने अगर लेखकों और तर्कसंगत विचारक रखने वालों के अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ किया है, तो सिर्फ 'चुप रहने' का काम किया है।

बदले हुए निजाम में क्या लेखकों की बिरादरी पर कोई खतरा है? यह पूछे जाने पर नयनतारा ने कहा, "तीन लेखकों की हत्या की गई। पेरुमल मुरुगन को उनके घर से निकाल दिया गया, उन्हें धमकी दी गई कि यदि तुम यहां रहोगे हम तुम्हें मार देंगे, हम तुम्हारे परिवार की हत्या कर देंगे। जो लेखक हिंदुत्व की विचारधारा से असहमत हैं, उन्हें तथाकथित गौरक्षकों से जान का खतरा है।"

लेखिका ने इस बात पर जोर दिया कि लेखक अपनी कहानियों के जरिए दिखाएं कि वह किस विचारधारा के समर्थन में हैं, लेकिन यह ध्यान रखें कि यह एक व्यक्तिगत चीज है, क्योंकि कहानियां इंसानों के बारे में होती हैं, विचारों के बारे में नहीं। बहुत सी कहानियों में राजनीतिक बातें या समसामयिक मुद्दे हो सकते हैं, लेकिन कहानी तो उन चरित्रों की होती है जो समाज में मौजूद होते हैं।

नयनतारा सहगल साहित्य आकादेमी के बोर्ड ऑफ इंगलिश की 1972 से 1975 तक सलाहकार रही हैं। उनकी मां विजयलक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट्र में भारत की पहली राजदूत रही हैं। उनके चाचा जवाहरलाल नेहरू देश के प्रथम प्रधानमंत्री हुए। उनकी भतीजी इंदिरा गांधी देश की तीसरी प्रधानमंत्री बनीं। वह मानती हैं कि उनके लेखन पर राजनीति और इतिहास का प्रभाव है।

साहित्य अकादेमी पुरस्कार के अलावा उन्हें वर्ष 1985 में ब्रिटेन का सिनक्लेयर प्राइज और 1987 में यूरेशिया का कॉमनवेल्थ राइटर्स अवार्ड मिल चुका है। वह 1981 से 1982 तक वाशिंगटन स्थित व्रूडो विल्सन इंटरनेशनल सेंटर फॉर स्कॉलर्स की फेलो रह चुकी हैं। -साकेत सुमन

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