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'बेगम जान' में मैंने देश बंटने से उपजे गुस्से को दिखाया : श्रीजीत मुखर्जी

नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान के इतिहास में 'विभाजन' एक दुखदायी वास्तविकता है। इसी पृष्ठभूमि पर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता फिल्मकार श्रीजीत मुखर्जी ने हिंदी में फिल्म 'बेगम जान' बनाई है। दो साल पहले वह इसी कहानी पर बांग्ला फिल्म 'राजकहिनी' बना चुके हैं।

मुखर्जी ने मुंबई से आईएएनएस को फोन पर बताया, "फिल्म का विषय बहुत संवेदनशील है। एक घटना के रूप में विभाजन को दर्शाने के लिए उसी प्रकार के भाव दर्शाने पड़ते हैं। सआदत हसन मंटो और इस्मत चुगताई की किताबों में विभाजन की कहानियों को पढ़ने और लोगों के जीवन पर पड़े इसके प्रभाव को जानकार मैं गुस्से से भर जाता था और आहत हो जाता था। मैं बेगम जान के जरिए वही गुस्सा दिखाना चाहता था।"

फिल्म में विद्या बालन एक वेश्यालय की मालकिन बनी हैं। देश विभाजन के बाद किस तरह मालकिन और वेश्यालय की लड़कियों का जीवन प्रभावित होता है और उन्हें किन समस्याओं से जूझना पड़ता है, उसे इस फिल्म में दिखाया गया है।

फिल्म के बांग्ला संस्करण में जहां अधिकांश जाने-पहचाने चेहरे थे, वहीं हिंदी संस्करण में कई अनजाने व नए चेहरे हैं।

मुखर्जी कहते हैं, "मुझे महज सुंदर दिखने वाले चेहरे नहीं चाहिए थे, मुझे ऐसे चेहरे (अभिनेत्रियां) चाहिए थे, जो कहानी को दमदार बना सकें।"

इस कहानी पर बांग्ला में बनी फिल्म ने जहां अच्छा प्रदर्शन किया, वहीं हिंदी फिल्म कुछ खास नहीं कर पाई।

मुखर्जी का कहना है कि फिल्म ने उत्तर भारत में अच्छा प्रदर्शन किया है, हालांकि यह देश भर में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई।

उन्होंने कहा कि संभवत: इसका कारण फिल्म का दुखदायी घटनाओं पर आधारित होना है और इसमें बहुत कम मनोरंजन का होना है।

मुखर्जी को यह भी लगता है कि फिल्म में दुखदायी दृश्यों को कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है, जिसे शायद शहरी दर्शक पचा नहीं पाए। विभाजन की त्रासदी ने पूरे देश को समान रूप से प्रभावित नहीं किया।

मुखर्जी ने बांग्ला फिल्म 'ऑटोग्राफ' (2010) से फिल्मी दुनिया में कदम रखा था। -अपराजिता गुप्ता

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