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सीता की जन्मभूमि 'सीतामढ़ी' को लेकर विवाद क्यों?

पटना: केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा द्वारा राज्यसभा में सीता की जन्मभूमि 'सीतामढ़ी' को लेकर दिए गए बयान के बाद 'वैदेही' की जन्मभूमि को लेकर एक बार फिर नई बहस प्रारंभ हो गई है।

कई इतिहासकार इसे आस्था और भावना से जोड़कर देख रहे हैं तो कई जानकारों का स्पष्ट कहना है कि सीतामढ़ी ही मां सीता की जन्मभूमि है। कई जानकार केंद्रीय मंत्री के बयान को उनकी अज्ञानता बता रहे हैं।

बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे आचार्य किशोर कुणाल कहते हैं कि केंद्रीय मंत्री द्वारा ऐसा बयान उनकी अज्ञानता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि आदिकाल से ही सीतामढ़ी सीता की जन्मभूमि मानी जाती है।

उन्होंने कहा, "वहां एक पाकड़ का पेड़ है, जिसकी आयु की जानकारी किसी को नहीं है। इस पेड़ की कई धार्मिक ग्रंथों में भी चर्चा की गई है। मंत्री उसी की वैज्ञानिक जांच करा लें, स्पष्ट हो जाएगा।"

उन्होंने स्पष्ट कहा कि ऐसे मामलों को लोग बेवजह तूल देते हैं। उन्होंने कहा कि वाल्मीकि 'रामायण' में सीता की जन्मस्थली मिथिला क्षेत्र ही बताई गई है।

दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में संस्कृत के प्रोफेसर पंकज मिश्रा ने आईएएनएस को फोन पर बताया कि ऐसी चीजों को भावनात्मक और इतिहास दो तरह से देखना चाहिए।

उन्होंने कहा, "इतिहास की बात हो या धार्मिक ग्रंथों की बात हो तो कहीं भी सीता की जन्मभूमि के रूप में सीतामढ़ी का उल्लेख नहीं है परंतु लोगों की भावना है कि सीतामढ़ी ही सीता की जन्मभूमि है।"

उन्होंने कहा, "ऋग्वेद में सीता की भूमि की देवी के रूप में चर्चा है जबकि वाल्मीकि रामायण में जनकनंदनी के रूप में उल्लेखित है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि सीता का जन्म मिथिला में हुआ है, इसे कोई नकार नहीं सकता है, जनकपुर भी तब मिथिला के अंतर्गत था।"

उन्होंने कहा, "सीतामढ़ी को प्रमाणिक तथ्यों से सीता की जन्मभूमि के तौर पर भले ही नहीं देखा जा सकता है परंतु इतना तय है कि सीता की जन्मभूमि तब की मिथिला प्रदेश ही रही है, जिसका एक हिस्सा आज नेपाल में है।"

मिथिला संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था मिथिलालोक फाउंडेशन के अध्यक्ष डा़ बीरबल झा ने कहा कि सीता का जन्मस्थान वर्तमान बिहार प्रदेश का सीतामढ़ी क्षेत्र है। उन्होंने केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा के राज्यसभा में दिए गए उस बयान पर दुख व्यक्त किया जिसमें उन्होंने कहा था कि "सीता की जन्मभूमि का मामला केवल आस्था का विषय है और इस संबंध में हमारे पास कोई ऐतिहासिक या पुरातात्विक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।"

झा ने कहा कि वाल्मीकि कृत महाकाव्य 'रामायण' में जिस राजा जनक का उल्लेख हुआ है, उनका क्षेत्र आज का सीतामढ़ी है, जिसे कई साक्ष्यों द्वारा समय-समय पर प्रमाणित किया जाता रहा है।

झा ने कहा, "सीता का जन्मस्थान जो 'सीताकुंड' के नाम से प्रसिद्घ है, वह सीतामढ़ी जिले से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जहां साल भर हिंदू श्रद्घालुओं का आना-जाना लगा रहता है। यहां देश ही नहीं, बल्कि विदेश से भी लोग आते रहते हैं और यह स्थान श्रीराम के जन्मस्थान अयोध्या की तरह ही हिंदुओं के लिए एक पवित्र तीर्थस्थल रहा है।"

झा कहते हैं कि केंद्र सरकार द्वारा जिस 'रामायण सर्किट' के निर्माण की बात की जा रही है, उसमें सीता जन्मभूमि यानी सीतामढ़ी को भी शामिल करने की योजना है, ऐसे में मंत्री का यह बयान समझ से परे है।

'हिस्ट्री ऑफ पूर्णिया' के लेखक इतिहासकार प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र कहते हैं कि मंत्री के ऐसे बयान किस मकसद से दिए गए हैं, यह उनकी समझ से परे है। उन्होंने कहा कि सीता का संबंध मिथिला से रहा है, तभी उनका नाम 'मैथिली' था। उन्होंने कहा कि तब मिथिला नगर और विदेह राज्य हुआ करता था।

उन्होंने भी माना कि इतिहास की कई बातें मिथकों की श्रेणी में ही आती हैं, इसलिए ऐसी बातों से विवाद होना लाजिमी है। उन्होंने कहा कि सीतामढ़ी को लोग सीता की जन्मभूमि से ही जोड़ कर देखते हैं और यह लोगों की आस्था है। उन्होंने कहा कि सभी बातें इतिहास से सिद्घ नहीं की जा सकती हैं।

उल्लेखनीय है कि राज्यसभा में भाजपा सांसद प्रभात झा ने सवाल किया था कि माता सीता के जन्मस्थल सीतामढ़ी के विकास के लिए सरकार क्या कर रही है? वहां तो राम जन्मभूमि की तरह कोई विवाद भी नहीं है।

इस पर जवाब देते हुए केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने कहा था कि सीता की जन्मस्थली आस्था का विषय है जो प्रमाण पर निर्भर नहीं करता। बाद में उन्होंने अपने लिखित बयान में कहा, "सीतामढ़ी में अब तक पुरातत्व विभाग ने कोई खुदाई शुरू नहीं की है, इसलिए उनके पास सीता की जन्मस्थली को लेकर कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।"
-मनोज पाठक

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