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2016-17 का 9,124 करोड़ रुपये का मनरेगा भुगतान बकाया

रांची: देश भर में 2016-17 में हुए मनरेगा कामों से सम्बंधित 9,124 करोड़ रुपये का भुगतान अभी तक बकाया है. इस राशि का का 63 प्रतिशत सामग्री भुगतान का है, 35 प्रतिशत मज़दूरी का और बाकी 2 प्रतिशत प्रशासनिक खर्च का (अनुलग्नक 1 देखें). भुगतान न होने के मुख्य तीन कारण हैं: (1) भुगतान के लिए आवश्यक प्रकियाओं का सम्पन्न न होना, जैसे वेतनसूची व फंड ट्रांसफर ऑर्डर (FTOs) का सृजन; (2) तकनीकी कारणों से FTOs “अस्वीकार” (reject) हो जाना व (3) FTOs का पब्लिक फाइनैंस मैनेजमेंट सिस्टम (PFMS, केंद्र सरकार की एक ऑनलाईन व्यवस्था जिसके ज़रिए कई सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों के तहत मिलने वाली राशियों का भुगतान होता है) द्वारा FTOs प्रोसेस न होना.

जिन मज़दूरों को काम करने के 15 दिनों के अन्दर अपनी मज़दूरी नहीं मिलती, उन्हें देरी के हर दिन, लंबित मज़दूरी के 0.05 प्रतिशत के तुच्छ दर से मुआवज़ा मिलना है. इस हिसाब से 2016-17 में देश भर में हुए कुल मज़दूरी भुगतान में विलम्ब के लिए 411.72 करोड़ रुपये का मुआवज़ा बनता है, जिसका अभी तक केवल 2.5 प्रतिशत का ही भुगतान हुआ है. इसका मुख्य कारण है केंद्र सरकार द्वारा ज़िला स्तरीय मनरेगा कर्मी को MIS द्वारा स्वतः गणित मुआवज़े की राशि को “अस्वीकार” (reject) करने की छूट देना, जबकि मनरेगा कानून में ऐसी कोई छूट का प्रावधान नहीं है. जैसा कि अपेक्षित है, इस छूट का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया जा रहा है; 2016-17 में देरी से हुए भुगतान के लिए दिए जाने वाले मुआवज़े का मात्र 4 प्रतिशत ही स्वीकार किया गया है (अनुलग्नक 2).

और तो और, मुआवज़े की गणना FTO पर हस्ताक्षर होने पर समाप्त हो जाती है, जिसके कारण इस प्रक्रिया के बाद हुए विलम्ब के लिए मज़दूरों को मुआवज़ा नहीं मिलता. 23 मार्च 2017 के बाद से 1 प्रतिशत से कम FTOs PFMS द्वारा प्रोसेस हुए हैं (अनुलग्नक 3). इस घोर अनीयमितता के कारण तो मंत्रालय को ही पता हैं और इसके कारण मज़दूरों को अपनी मज़दूरी मिलने में जो विलम्ब हो रहे हैं, उनको उनके लिए मुआवज़ा भी नहीं मिलेगा. साथ ही साथ, पिछले कुछ दिनों से असम, बिहार, झारखंड, केरल, महाराष्ट्र, पुडुचेरी और सिक्किम के FTOs कोई “hardware failure” के कारण सृजित नहीं हो रहे हैं। -अंकिता अग्रवाल

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