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नोटबंदी सही तो शराबबंदी क्यों नहीं

उच्चतम न्यायालय के एक आदेश के अनुपालन में हाईवे और राजमार्गो के किनारे स्थित भिन्न-भिन्न कोटि के मदिरालय एक अप्रैल से हटा दिए गए। मुख्य मार्गो पर बढ़ रही दुर्घटनाओं को रोकने और नागरिकों के जान माल की सुरक्षा के उद्देश्य से उठाए गए इस साहसिक कदम की जहां एक तरफ मुक्त कंठ से सराहना हो रही है, वहीं दूसरी तरफ मदिरा व्यवसाइयों और प्रशासन को जनाक्रोश का सामना भी करना पड़ रहा है।

ऐसा इसलिए क्योंकि, तमाम अराजकता की जड़ मानी गई शराब जो अब तक चौराहों और बाजारों में खुले ठेकों पर उपलब्ध थी, वह रिहाइशी इलाकों में मिलनी शुरू हो गई है। जहां पियक्कड़ों का जबरदस्त जमावड़ा होने लगा है।

शराबियों की उद्दंडता से भयभीत नागरिक जिस तरह जगह-जगह विरोध पर उतरे हैं, उससे यह स्वत: सिद्ध हो गया है कि शराबबंदी अब आवश्यक है। खासतौर से आधी आबादी ने विरोध का जो हथकंडा अपनाया है, उसकी गूंज योगी आश्रम होते हुए मोदी महल तक पहुंच ही गई होगी। ऐसे में जनभावनाओं की कद्र करते हुए पूर्ण शराब बंदी पर सरकार को विचार करना ही चाहिए।

लगभग चरमरा चुके देश के आर्थिक ढांचे को सुधारने, भ्रष्टाचार और आतंकवाद पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से साल 2016 के आठ नवंबर की रात आठ बजे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस असीम साहस का परिचय देकर नोटबंदी का ऐतिहासिक फैसला लिया, उसी भांति अब एक और ऐतिहासिक फैसले की आवश्यकता है।

यह फैसला अब शराबबंदी को लेकर होना ही चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि नोटों के जरिए जिस तरह देश खोखला हो रहा था उसी तरह शराब देशवासियों के स्वास्थ्य के साथ सामाजिक ढांचे को भी खोखला कर रहा है। हां इतना अवश्य है कि नोटबंदी का असर कुछ समय के लिए देश के नागरिकों पर पड़ा था, जबकि शराबबंदी का व्यापक असर सरकार के राजस्व पर पड़ेगा। फिर भी देश और समाज हित में ठोस फैसले की आवश्यकता है। यदि नोटबंदी का फैसला देश हित में सही था तो शराब बंदी क्यों नहीं।

यह सही है कि शराब और अन्य मादक द्रव्यों से देश के खजाने में राजस्व का एक बड़ा हिस्सा आता है। इसका मतलब यह कतई नहीं हुआ कि आर्थिक ढांचे को मजबूत करने के लिए सामाजिक ढांचे से खिलवाड़ किया जाए और देश की जनता का स्वास्थ्य जर्जर होता रहे। यदि देखा जाए तो आज देशवासियों की औसत आयु काफी कम हुई है, जिसके पीछे कहीं न कहीं शराब व अन्य मादक द्रव्य ही प्रमुख कारण है।

यह भी सत्य है कि सिर्फ कानून के बल पर पूर्ण शराबबंदी की कल्पना नहीं की जा सकती। फिर भी प्रयास तो होना ही चाहिए। आज शराब निर्माताओं व सत्ता के बीच के आर्थिक तालमेल ने देश में अराजक गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया है। शराब और अपराध एक-दूसरे के पूरक बन गए हैं। एक बार शराब की लत लग जाने के बाद उसकी पूर्ति के लिए लोग गलत रास्ते अपना लेते हैं। बड़े-बड़े अपराधों के पीछे भी कहीं न कहीं शराब ही कारण है।

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि नशे की लत में व्यक्ति की न सिर्फ चेतना प्रभावित होती है, बल्कि उसकी उत्तेजना बढ़ जाती है और व्यक्ति सुध-बुध खो बैठता है। ऐसे में हत्या, लूट, दुष्कर्म जैसे जघन्य कृत्य भी मामूली लगते हैं। घटना अंजाम देने के बाद व्यक्ति जीवन भर पश्चाताप की आग में झुलसता रह जाता है।

नशाखोरी एक ऐसी लत है, जिससे व्यक्ति नैतिक व चारित्रिक पतन की ओर दिनों दिन अग्रसर होता जाता है। हंसता खेलता परिवार इसका शिकार होने के बाद बर्बादी की ओर बढ़ जाता है। शराबी पतियों को जब उनकी पत्नियां समझाने की कोशिश करती हैं तो जबरदस्त घरेलू हिंसा का शिकार भी होती हैं। यह क्रम कुछ दिन चलने के बाद शेष आयु घुट-घुट कर जीना पड़ता है। घर के गहने, मकान और खेती-बाड़ी तक की बर्बादी का सूत्रधार यही नशाखोरी है।

ऐसे में बच्चों की अच्छी शिक्षा व परवरिश पर ग्रहण लगना स्वाभाविक है। नशाखोरी के शिकार व्यक्ति को कई तरह की हानियां उठानी पड़ती हैं। पहले धन की बर्बादी, फिर तन की बर्बादी के बीच सामाजिक प्रतिष्ठा समाप्त हो जाती है। एक पियक्कड़ व्यक्ति कितना ही विद्वान क्यों न हो उसकी बात कोई नहीं मानता। खासतौर से निम्न और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए शराब किसी अभिशाप से कम नहीं है। मैंने ऐसे सैकड़ों परिवार देखे हैं, जिनकी हंसती खेलती जिंदगी शराब के चलते तबाही के भंवर में फंस कर रह गई।

जिस देश में कभी दूध दही की नदियां बहती थी, उसी देश में 'गली-गली गोरस बिके, मदिरा बैठ बिकाय' की कहावत चरितार्थ हो गई है। अकेले उत्तर प्रदेश में देसी शराब की 14 हजार 21 दुकान, अंग्रेजी शराब की पांच हजार 741 दुकान, ठंडी बियर की चार हजार 518 दुकानों सहित बियर के 415 मॉडल शॉप हैं।

इससे न्यूनतम 15 हजार करोड़ रुपये का राजस्व लाभ प्रतिवर्ष सरकार को प्राप्त होता है। जो कुल प्राप्त राजस्व का 18 प्रतिशत के करीब है। अर्थात राजस्व लाभ के मामले में आबकारी महकमा दूसरे स्थान पर है। इसके अलावा दूसरे प्रदेशों से आने वाली नकली शराब की खेप के साथ नदियों के किनारे बसे गांव में निकाली जाने वाली कच्ची और अप्रमाणित शराब की खपत भी होती है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि शराब का सेवन परिवार चलाने वालों के लिए समस्या पैदा करने वाला है और स्वास्थ्य के लिए गंभीर रूप से हानिकारक है। यह जानते हुए भी पूर्ववर्ती सरकारों ने राजस्व मोह में आबकारी नीतियों में संशोधन किया। दुकानों के लिए लाइसेंस जारी करते समय कभी भी तय मानक का ध्यान नहीं रखा गया। धार्मिक स्थल, शिक्षण संस्थान, हाईवे और घनी आबादी का ध्यान यदि पहले रखा गया होता तो शायद आज इतना बवाल न होता।

आज जब इस महामारी के खिलाफ आधी आबादी ने जनांदोलन खड़ा कर दिया है, तब सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने का साहस तो करना ही चाहिए। ऐसा तब, जब प्रदेश से लेकर केंद्र तक भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार है। मोदी और योगी की जोड़ी जिस तरह राष्ट्रवाद को लेकर भ्रष्टाचार और आतंकवाद के खात्मे को संकल्पित है, उसी तरह नशाखोरी के विरुद्ध भी कमर कसना होगा। यदि यह जोड़ी शराबबंदी का साहस दिखा ले जाती है, तो अधिकांश जनता के दिलों पर राज करने से उसे कोई नहीं रोक सकता।

महात्मा गांधी ने 1927 में कहा था कि भारत का गरीब होना स्वीकार है परंतु देशवासी शराबी हो, यह कतई स्वीकार नहीं। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि आज उनके अनुयाई ही उनके संकल्पों को भूल गए।

नतीजा यह हुआ कि देश में शराब की दुकानों के साथ शराबियों की तादाद दिन दूना, रात चौगुना बढ़ती रही। आज कोई भी भोज संबंधी आयोजन बिना शराब के पूरा नहीं समझा जाता। अतिथियों को भोजन भले न दिया जाए, परंतु यदि शराब पिला दी जाए तो इज्जत बढ़ जाती है। आज उस परदेसी की काफी पूछ होती है जो साल में एक दो बार गांव आता है और युवाओं की फौज के बीच शराब की महफिल सजाता है।

सच पूछा जाए तो शराब पीना उतना खराब नहीं है, जितना कि उसका शिकार होना है। आज गरीब, मजदूर और कमजोर तबके के लोग इसके सर्वाधिक शिकार हैं। इसके प्रभाव को देखकर कई राज्यों में शराबबंदी के प्रयास हुए। खासकर महिलाएं इसके लिए कुछ ज्यादा ही सक्रिय रहीं। दिलचस्प पहलू यह है कि पूर्ण शराबबंदी के लिए हो रहे प्रयास के बीच सरकारें राजस्व मोह में फंसकर शराब कारोबारियों के चंगुल में जकड़ी हुई हैं।

शायद यही वजह है कि आजादी के सात दशक में भी पूर्ण शराबबंदी लागू नहीं हो सकी। आज जब शराब बंदी के पक्ष में जनमानस खड़ा हो गया है तब सरकार को ठोस निर्णय लेना ही चाहिए। आम नागरिकों के साथ सरकार को साहस और ²ढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए जनहित में शराबबंदी का ऐतिहासिक फैसला ले लेना चाहिए।

गुजरात और बिहार ने शराबबंदी के मामले में मॉडल राज्य बन कर यह साबित कर दिया कि पूर्ण शराबबंदी लागू कर के भी सरकार चलाई जा सकती है। ऐसे में सांसारिक मोह-माया से परे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पूर्ण शराबबंदी का निर्णय ले ही लेना चाहिए। योगी और मोदी जैसे सशक्त राजनीतिज्ञों के लिए शराबबंदी से होने वाले राजस्व घाटे से पार पाना बहुत मुश्किल भी नहीं होगा। रही बात पीने वालों की तो शुरुआती दौर में थोड़ा कष्ट जरूर होगा, परंतु धीरे-धीरे आदत छूट जाने के बाद नैतिक चरित्र और सामाजिक ढांचे को पूर्ण मजबूती मिलेगी। (आईएएनएस/आईपीएन)

-घनश्याम भारतीय
(लेखक युवा पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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