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आज वे भू-माफिया होते जा रहे हैं..

‘अब संगठन के लोग बिनोद भगत के पास क्यों नहीं आ रहे, क्योंकि बिनोद भगत तो बाइक और बोलेरो देगा नहीं..! वो खुद भी आलू प्याज बेचेगा और हमें भी कहेगा कि तुम भी बेचो..! - विनोद भगत (इंटरव्‍यू)

न्यूज विंग: रांची- चंद रोज पहले झारखंड के अखबारों मीडिया में एक चौंकानेवाली खबर सुर्खियां बनीं। सत्ताधारी गठबंधन वाले दल आजसू (ऑल झारखंड स्टूडेन्ट्स यूनियन) के पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष विनोद भगत इन दिनों आलू प्याज बेचकर गुजारा कर रहे हैं। खबर छपते ही कई नये पुराने राजनीतिक चेहरे उनकी दुकान पर पहुंचे। अखबारों ने फिर हेडलाइन्स बनायीं। उनके फोटो छापे। बयान छापे। सोशल मीडिया पर भी विनोद भगत चर्चा में रहे। अधिकांश बयान विनोद भगत के लिए सहानुभूति दर्शा रहे थे। उनके शख्सियत की दाद दे रहे थे। लेकिन क्या विनोद को एक स्वाभिमानी झारखंडी बताकर इस खबर से हाथ झाड़ लेना पर्याप्त है? इस खबर का दूसरा पहलू भी है। क्या इसकी चर्चा-समीक्षा नहीं होनी चाहिए? न्यूज विंग ने तय किया कि इस पहलू को स्वयं विनोद भगत से सुनी जाए और आपको बतायें। न्यूज विंग के वरीय संवाददाता रणजीत ने विनोद भगत से लम्बी बातचीत की। इकॉनॉमिक्स में एमए, विनोद ने अपने पुराने अनुभवों के साथ ही वर्तमान सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक हालात पर अपनी राय हमसे साझा की। विनोद भगत ने एमए के अलावा जर्नलिज्म कोर्स भी किया है। विनोद की बातों में आज भी झारखंड की बदहाली को लेकर गहरा दर्द है, जो उनके युवाकाल में गुस्सा और आक्रोश हुआ करता था। कैसे, झारखंडी हितों पर कुटिल राजनीतिक शक्तियां कब्जा करती रहीं, जो आज भी जारी है। वह बताते हैं कि तब, कैसे पुलिस अधिकारियों को पीट देना उनके लिए कोई बड़ी घटना नहीं थी। उनके इस दुःस्साहस के पीछे अपार युवा शक्ति और झारखंडी जनसमर्थन कारण था। लेकिन क्या आज कोई नेता ऐसा दावा कर सकता है? दो टूक कहें, नहीं! ..आज के इसी हालात को विनोद भगत ने विस्तार से बताया है। विनोद जिस पार्टी के शीर्ष नेता थे वह पार्टी आज भी है जो झारखंड बनने के बाद हमेशा सत्ता के आस पास रही। जाहिर है, विनोद की समीक्षा इस दल के नेताओं के आज के चेहरे को भी उजागर कर रही है। तो चलिए स्वयं विनोद भगत से सुनते हैं उनकी कसक और बचा-खुचा गुस्सा.. जो उन्होंने न्यूज विंग से साझा किया। 

आप जुझारू आंदोलनकारी रहे हैं, 90 के दशक में झारखंड अलग राज्य आंदोलन का स्वरूप कैसा था, इस बारे में कुछ बतायें ...?

हमारी मांग थी कि झारखंड अलग राज्य बने। यहां की समस्याओं का समाधान हो जाये। देखिये, झारखंड के लिए संवैधानिक और कानूनी प्रावधान हैं। बावजूद इसके झारखंडियों को उसका लाभ नहीं मिल रहा था। अविभाजित बिहार के समय जब बिहार सरकार बजट बनाती थी, उसमें ट्राइबल सब प्लान के पैसे से छोटानागपुर, संथाल परगना में डेवलपमेंट के काम होते थे। उस वख्त भी झारखंड उपेक्षित था। इन्हीं समस्याओं को दूर करने की प्रेरणा लेते हुए, मैंने छात्र जीवन में एक निर्णय लिया कि हमारे गांव घरों और शहरों में जो समस्याएं हैं, उसके समाधान के लिए बड़े कदम उठाने होंगे। इसी विचारधारा को मूर्त रूप देकर हमने एक संगठन खड़ा किया। नाम रखा ‘छोटानागपुरी युवा छात्र संघ।‘ इसकी सफलता को देख कुछ दिनों के बाद दूसरी पहल भी की। हमने ऑल झारखंड स्टूडेंट्स युनियन (आजसू) संगठन बनाया। चुंकि मैं युनिवर्सिटी में लीडर था। और सैंकड़ों लोग मुझपर भरोसा करते थे। मुझे आजसू को अस्तित्व में लाने का प्रस्ताव मिला। मैं राजी हुआ पर शर्त रखी कि इसमें जुड़ने वालों को कमिटेड होना होगा। ये शॉर्ट टर्म आंदोलन नहीं होगा। छात्रों की समस्याओं को स्टूडेंट्स लीडर सुलझाकर निकल जायेंगे। फिर दूसरी समस्या को टेक ओवर कीजियेगा। लेकिन, झारखंड जैसे अलग राज्य के संवैधानिक अधिकार को हासिल करने के लिए गवर्नमेंट के राजी होने तक दबाव बनाना होगा। मैंने उनसे कहा कि इसके लिए शॉर्ट टर्म और लांग टर्म रणनीति पर काम करना होगा। शार्ट टर्म रणनीति में सभी स्टूडेंट्स को कनविंस करना था। लांग टर्म आंदोलन के लिए गांव के लोगों को इससे जोड़ना की योजना थी। 

उस समय जब हमलोगों ने काम शुरू किया तब झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) हुआ करता था। लेकिन, झामुमो सिर्फ संथाल परगना में सीमित था। उसके पास मात्र सात विधायक थे। झामुमो वहां से आगे नहीं खिसक पा रहा था। लेकिन हमारे आंदोलन के बाद ..यानी आजसू के ‘विनोद भगत‘ ने जो कर दिखाया, उसका असर रांची विश्‍वविद्यालय के अंतर्गत दुमका, धनबाद, बोकारो, जमशेदपुर, डालटगंज के सभी कॉलेजों में दिखने लगा। हमें यहां आसानी से छात्रों का समूह मिलने लगे। हमारी संख्या बढ़ती जा रही थी। जब युवा छात्र वैचारिक रूप से समझने लगे कि तिलका मांझी शहीद हो सकते हैं, तब संथाल परगना के छात्र या सदान (मूलवासी) को भी अपने हक के लिए सामने आना होगा। तब हमारा काम और भी आसान हो गया। फिर छोटानागपुर में हमारे आंदोलन का असर दिखा। हमने बिरसा मुंडा, सिदो कान्हु, चांद भैरव, जतरा भगत, वीर बुधू भगत के आंदोलन को कनक्लुड करके विद्यार्थियों के सामने रखा था। विद्यार्थियों को हमने बताया कि इन शहीदों ने आंदोलन किया क्योंकि समाज में अत्याचार बढ़ रहा था। ... और इन्होंने आगे बढ़कर पब्लिक को प्रोटेक्शन दिया। हमलोग उस वख्त खूब पढ़ते थे। जानकारियां इकट्ठा करते थे। स्टूडेंट्स को नयी नयी जानकारियां देते थे।

महिलाओं के साथ अभद्रता, झूठे मुकदमों का गुस्सा और आंदोलन

झारखंड के बाजार हाट की परंपरा को समझिये.. ये एक त्योहार की तरह होता है। सप्ताह में एक दिन लगता है। लोग सुबह से ही इसकी तैयारी करते हैं। पैदल आते जाते हैं। अभी कुछ सवारियों की सुविधा है पर उस वख्त ऐसा नहीं था। लोगों को साइकिल भी बहुत मुश्किल से मिलती थी। हमलोगों ने देखा कि बाजार आने जाने में महिलाओं के साथ बहुत अभद्रता होती थी। वन विभाग के लोग जलावन की लकड़ी ले जाने पर भी महिलाओं पर मुदकमा कर देते थे। उन्हें जेल भेज देते थे। जबकि वहीं की लकड़ी माफिया ट्रकों में भरकर ले जाते थे। उनको कोई चेक नाका, कोई रेंजर नहीं पकड़ता था। न ही उन्हें कोई डीएफओ पकड़ता था। ऐसे अत्याचार हो रहा था। मैंने कह दिया कि इस अत्याचार का एक ही समाधान है। अलग राज्य ले लो ये पुरानी मांग भी है। फिर आंदोलन करने की बात आयी। अपने कंधों में एक जिम्मेदारी लेकर हमारे बहुत साथी आये।

बेसिकली मैंने पूरी तरह इस संगठन (आजसू) को खड़ा किया। सरकार को एक चुनौती देने के लिए ‘गैर लोकतांत्रिक तरीका‘ या ‘हिंसक तरीका‘ ‘आतंकी तरीकों‘ को अपने आंदोलन में इंप्लीमेंट किया। उस वख्म हमारे आंदोलन से जुड़कर जो भी आवाज उठाता था। एक साजिश के तहत पुलिस उसपर झूठा मुकदमा लगाकर जेल भेज देती थी। कई बार तो मैंने सरेआम ‘एसपी‘ ‘डीसी‘ पर भी हाथ उठाया। मारने के बाद मुझे भी जेल भेजा गया। पूरी लश्कर के साथ पुलिसवाले हमें जेल छोड़ने जाते थे। हमारा बेल नहीं होने देते थे। पर हम जेल के अंदर बंद लोगों को भी ट्रेनिंग देने लगे। वहां लोगों को आजादी, झारखंड का इतिहास बताते थे। वही लोग जब वो बाहर निकलते थे, पूरी तरह से आंदोलनकारी बन जाते थे। इसी तरह हमारे संगठन की मजबूती बढ़ रही थी।

यानी अलग झारखंड राज्य का आंदोलन और ज्यादा उग्र होता जा रहा था ...?

ऐसा ही समझ सकते हैं। जेल से बाहर आने के बाद लड़के पुलिस से डरना छोड़ देते थे। हालत यह थी कि जो कुछ बोले उसको पटक के मार दे। यह बोलते कि ‘तू का कर लेगा रे। हम खुद जेल चल जायेंगे। जेल में खाना बनाने वाला से लेकर पानी भरने वाला सब खुश रहता है।‘ जब जेल का भय खत्म हुआ, वो पुलिस के खिलाफ हो गये। पुलिस के कितने भी बड़े अफसर आईजी, डीआईजी इनके सामने आने से डरते थे। ये के्रज था..! उसका कारण भी था कि अगर वो कुछ कार्रवाई करते, हमारे पास स्टूडेंट्स की काफी संख्या थी। हमारे पास मास था। हम कहते थे कि डीजीपी के घर की एक एक ईंट हम झारखंड में बंटवा दें। उसका अस्तित्व यहां खत्म हो जायेगा। बात साफ थी कि मेरे (झारखंडियों) लिए  कानून है उसको तुम लागू नहीं कर रहे हो जबकि इसे तुम्हें ही लागू करना है। और ऊपर से हमें ही सिखा रहे हो कि जेल भेज देंगे। झूठा मुकदमा करवा देंगे। मैं उनसे यही कहता था कि ऐसे हजार मुकदमें लड़ लेंगे लेकिन तुमको बर्दाश्त नहीं करेंगे..! इस तरह रेवोल्युशन की हवा चल पड़ी थी..! 

1986 से 1989 तक ये आंदोलन चरम पर था, इसी दौरान 1989 में भारत सरकार से वार्ता शुरू हो गयी। वार्ता होने के बाद ‘कमिटी ऑन सिओसिअन‘ बना। उसमें गृह मंत्रालय के ज्चाइंट सेक्रेटरी के नेतृत्व में एक कमिटी बनी जिसने झारखंड का दौरा किया। पूरा काम करने के बाद इन्होंने डेढ़ दो सालों में सरकार को रिपोर्ट भी दे दी। उसमें तीन सुझाव दिये गये थे। लिखा गया था कि या तो ऑटोनोमस फुल फ्लेज्ड राज्य दे दीजिये या फिर युनियन टेरेटरी दे दीजिये लीडरों को नॉमिनेट करके एक गर्वनर दे दीजिये। या इलेक्शन करवा कर बहुमत वाली पार्टी की सरकार बनवाइये। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने इस फाइल को सालों तक दबाये रखा। 1992 से 1997 तक। इन्हीं सालों में हमने अपने आंदोलन को और भी ‘तीखा‘ कर दिया था। आर्थिक नाकेबंदी होने से दिल्ली तक इसका असर दिखता था। दिल्ली में बदरपुर पावर स्टेशन है, वहां 72 घंटे का कोयला बचा हुआ था। हम यहां से कोयला जाने नहीं दे रहे थे। सरकार की मजबूरी हो गयी इसलिए प्रधानमंत्री ने खुद अलग राज्य की मांग पर कमिट किया।

उस दौर में आपके सामने अलग झारखंड राज्य का सपना पूरा होने जा रहा था? कैसे बदलाव दिख रहे थे?

देखिये, राजीव गांधी के समय से वार्ता शुरू हुई थी। उसके बाद चंद्रशेखर, वीपी सिंह, देवी लाल, गुजराल, नरसिम्हा राव की सरकारों तक वार्ता होती रही। इतनी प्रक्रिया चलते चलते भारतीय जनता पार्टी ने यह शिगुफा छोड़ा कि अलग राज्य होना चाहिए लेकिन उसका नाम ‘वनांचल‘ हो। भाजपा का जो शाब्दिक खेल था, हम समझ गये थे। मैंने कह दिया कि आपके दिल में कुछ काला है। आप आंदोलन को डायवर्ट करना चाहते थे। आप हमारे मिशन को तोड़ना चाहते हैं। लेकिन, बहुमत के आगे उनकी नहीं चल सकी। दिल्ली में जब वाजपेयी जी की सरकार आयी और उन्होंने वायदा किया था कि केंद्र में उनकी सरकार आयेगी तो वो झारखंड अलग राज्य बनायेंगे। उसका स्वरूप क्या होगा इसको अधिकारियों से तय कराने की बात थी। यहां बताना चाहूगा कि हमारी मांग थी कि बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों को मिलाकर झारखंड बने। ये ट्राइबल डॉमिनेटेड क्षेत्र थे। पर अन्य राज्यों का कनसेंट नहीं मिल रहा था। उन्होंने कहा था कि बिहार सरकार विधानसभा से अपना कनसेंट दे दे तब हम अलग राज्य बना देंगे। उसी समय एसेंबली इलेक्शन हुआ और कांग्रेस और रिजनल पार्टी के कुछ विधायक चुन कर बिहार विधानसभा गये। संयोग ऐसा हो गया कि इनके सपोर्ट के बिना बिहार में सरकार नहीं बन सकती थी। हम लोगों ने इन विधायकों पर दबाव बनाया कि सरकार में अगर कोई समर्थन करता है, और झारखंड अलग राज्य का बिल नहीं पास होगा तब उसको झारखंड में वापस नहीं आने देंगे। हमारा संगठन स्ट्रांग था, विधायकों की हैसियत नहीं हुई कि वो लोग हमारे खिलाफ जा सकें। उन्होंने विधानसभा में मांग कर दी कि सरकार में तभी शामिल होंगे जब विधानसभा से अलग राज्य का प्रस्ताव पारित किया जायेगा। लालू जी ने देखा कि मांग नहीं मानी तो सरकार बनेगी नहीं। और अलग राज्य का बिल पास हुआ। तब छोटानापुर, संथाल परगना को मिलाकर अलग राज्य बना।

नये राज्य के पास दो आप्शन थे जो वर्तमान विधायक थे उनको मिलाकर सरकार बनायी जाये या फिर नया इलेक्शन कराया जाये। मेरी मांग थी कि ऐसा नहीं कर अंतरिम तौर पर आंदोलनकारियों को रेकोग्नाइज कर, उनको गर्वनर के साथ सरकार चलाने का जिम्मा दे दिया जाये। वो खुद ही विकास का रोडमैप तैयार कर लेंगे। पर कुछ लोगों के दिल में खोट था, उन्होंने कहा कि जो इलेक्टेड एमएलए हैं, उन्हीं के बीच बहुमत में सरकार बनायी जाये। हम मान गये क्योंकि हमें पद नहीं मिलता पर मुद्दा पूरा हो रहा था। भाजपा के पास बहुमत में 32 विधायक थे। 40 से उपर संख्या दिखानी थी। उसने मैनेज कर सरकार बना ली। झारखंड में जैसे ही 32 प्लस विधायकों की बात आयी। हमारे आजसू के कुछ लोग शामिल हो गये। कुछ निर्दलीय भी सरकार में शामिल हो गये। नया राज्य बना, लेकिन आब्जेक्ट्स डाइवर्ट हो गये। काम कुछ और होने लगे। इसी डायवर्सन के चलते कोई रोडमैप तैयार नहीं हुआ है।

सतरह साल हो गये। जो दल यहां ज्यादा समय तक सरकार में रही है, उसके पास भी कोई कान्सेप्ट नहीं है। ..अब यहां क्या हो गया कि नेता कमा रहा है। ..आईएएस कमा रहा है। ...इंजीनियर कमा रहा है। ..डॉक्टर कमा रहा है। ..दवा तक बेच दे रहे हैं। ..अस्पताल के कुर्सी टेबल बेच दे रहे हैं। इंजीनियर अपने घर की खिड़की का चौखट बेच रहा है। ..आईएएस, आईपीएस जितनी बार अपना डेरा चेंज कर रहे हैं, पर्दा तक उठा कर ले जा रहे हैं। नैतिकता इतनी गिर गयी है इस प्रदेश में..! 

यानी यह कहा जा सकता है कि उसी वख्त से आजसू टूटने लगा था.. मतलब पार्टी की विचारधारा को लेकर..?

यह सही है कि इसी के बाद से वैचारिक रूप से आजसू ध्वस्त हो गया। वहां पैसा कमाना, अर्निंग करना मुख्य उद्देश्य बन गया। बाकी जो नहीं आये वो बेवकूफ हो गये..। जैसे बिनोद भगत..! मैं उनसे बार बार कहता रहा कि तुम्हारे पास बहुत बड़ा टास्क है। आने वाली जिंदगी के बारे सोचो। अपनी जिंदगी जी लोगे पर उद्देश्य का क्या होगा? आप बंबई फिल्म इंडस्ट्री में पूंजी निवेश कर दोगे, टाटा बिड़ला, सहारा के शेयर होल्डर बन जायेंगे, पर आपके मर जाने के बाद आपको कौन याद रखेगा? रांची के मीनाक्षी सिनेमा हॉल का उदाहरण ले लीजिये। मानकी मुंडा जिस समय कस्टम का आफिसर था। उसके पास खूब पैसा था। उन्होंने गुप्ता जी को पैसे दिये कि मीनाक्षी हॉल बनावा लें पैसे वो दे देंगे। छापा पड़ने के बाद जब उसकी बुरी स्थिति हो गयी, और उसने अपना हिस्सा मांगा तब गुप्ता जी ने उन्हें कागज दिखाया और कहा कि मीनाक्षी सिनेमा हॉल उनका है। देखिये, यही हाल सभी का होना है यहां के नेताओं का। हरिनारायण राय को सजा हुई। ..कुछ और नेताओं का मामला फंसा है! जब तक सत्ता में हैं तब तक बचे रहेंगे। ..दूसरी सरकार आयेगी, इन्हें भी लपेट लेगी। आप इंसान को धोखा दे सकते हैं, भगवान को नहीं। उसे धोखा दे रहे हैं तब आपमें मानवता खत्म हो गयी है। इसलिए आज ऐसा करो कि भविष्य में कह सको कि हमने गलत नहीं किया। जब आदमी की नैतिकता समाप्त हो जायेगी, तब सामाजिक संकट पैदा हो जाता है। आज झारखंड में यही स्थिति है।

आप हमें अपनी निजी जिंदगी के बारे कुछ बतायें। ..आपने आजसू को इतनी ऊंचाई तक पहुंचाया। फिर आपने अचानक पार्टी छोड़कर सामान्य जीवन जीने का फैसला कर लिया?

मैं रांची युनिवर्सिटी में पढ़ाई करने आया था। यहां छात्रों की बहुत समस्यायें थीं। ये भगवान का ही देन था कि गलत निर्णय का प्रतिकार करना और निर्दोष को न्याय दिलाने की शुरूआत इसी समय हो चुकी थी। किसी का कॉलेज का काम जो नहीं होता था लोग हमसे मदद लेते थे। मेरे जाने पर अधिकारी और प्रिंसिपल रिगार्ड करते थे। ऐसे करते हुए मैं समझने लगा कि बिहार सरकार में हमारी बहुत उपेक्षा थी। झारखंड अलग राज्य की मांग पहले से की जा रही थी। बजट में पैसे नहीं दिये जाते थे। केवल आदिवासी उपयोजना के पैसे होते थे। उसमें भी लूट खसोट थी। तब मैंने सोचा कि अलग राज्य की मांग जो एक पुराना आंदोलन है उसको ताकत लगाकर अलग राज्य बनवा दिया जाये। मैंने 1980 से ही छात्र जीवन की राजनीति शुरू की थी। 1986 में आजसू बनाया। बनाने वालों में एक मैं, बेसरा जी कुछ और साथी भी थे। लेकिन इसको पूरी तरह से मैंने ही हैंडल किया। इसको ‘टेरर‘ रूप दिया। प्रेशर बनाने के लिए हमने कुछ आतंकी गतिविधि भी कीं। गाड़ियां जलाना, किसी को मार देना, तोड़फोड़ करना। मकसद था इससे केस हो और सरकार पर दबाव बने। लॉ एंड आर्डर का मामला क्रिएट हो।

आज की आजसू पार्टी को आप किस रूप में देखते हैं? वो लगभग हर सरकार के साथ साथ रही है?

जब से झारखंड अलग राज्य बना उस समय 32 प्लस अदर्स का समीकरण था। उसमें आजसू के चुने हुए विधायक को भी सरकार में जगह मिली। ये लोग सरकार में आने के बाद बार्गेनिंग करने लगे..। विभाग भी लिया। जिस विभाग मेंगये वहां सिर्फ नाश हुआ..। वहां काम नहीं हुआ। खुल्लमखुल्ला पैसा लिया गया। इसकी जानकारी इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को भी है। सीबीआई जांच हुई, कई मंत्री जेल गये। ..कुछ लोग नहीं भी गये ..उनके हाई अप्रोच हैं जिसके कारण वो बचे हुए हैं..! ये भी लूट खसोट का बड़ा मामला है। देखिये, नेता का मददगार स्वाभाव होना चाहिए, गांव में कहां सड़क बननी है, पीएचईडी मिनिस्टर हैं तब पानी की व्यवस्था करनी है। इरीगेशन, एग्रीकल्चर में भी ऐसे ही काम होने चाहिए। लेकिन जो भी जिस विभाग में गया वहां लूट खसोट हुई। इस कारण वो जनता की आवाज नहीं बन सके।

क्या यही वजह रही कि आपने खुद को आजसू से अलग कर लिया?

जहां तक आजसू की बात है और जो लोग अभी इसका संचालन कर रहे हैं। उनको मैंने बहुत नीचे से, गांव घर से उठा कर पार्टी से जोड़ा था। इनके पिता बहुत गरीब थे। कोई फोर्थ ग्रेड में नौकरी करते थे। कोई बेरोजगार था। ऐसे लोगों को मैंने आजसू से जोड़ा। आने के बाद इनका रूतबा बढ़ गया, ये शिष्टाचार भूल गये, अपनी संस्कृति संस्कार भूल गये। ..बड़ा छोटा का आदर करना भूल गये। ..किसी के प्रति संवेदना जताना भी भूल गये। मैं कहना चाहता हूं कि राजनीति करने के लिए एक बढ़िया टीम होनी चाहिए। इसके बिना आप राजनीति नहीं कर सकते। उसके उद्देश्य के बिना आप राजनीति नहीं कर सकते। चुनाव जीत कर लूटने के लिए टीम बनी हो ऐसी राजनीति करने से क्या फायदा..? 

अभी झारखंड में छात्र आंदोलन किस दिशा में जा रहा है? ..क्या झारखंड के मुद्दों को लेकर ऐसा कोई आंदोलन दिखता है?

देखिये, छात्र आंदोलन में अभी जितनी भी पार्टियों के छात्र संगठन हैं, उन्होंने रांची विश्‍वविद्यालय में कुछ किया हो। ऐसा मुझे नहीं दिखता है। क्या नहीं दिखता है..। मेरा कहना है कि हमको आईटी चाहिए। आईटी पढ़ने यहां के विद्यार्थी साउथ, उड़ीसा जा रहे हैं। जब यहां जमीन खाली है आप आईटी के बड़े बड़े संस्थान क्यों नहीं खोलते? सिर्फ एक आईआईएम से काम नहीं चल सकता। इसी तरह नर्सिंग, हेल्थ, एजुकेशन में भी विद्यार्थियों की जरूरत होगी। जब उसको एजुकेशन ही बढ़िया नहीं मिलेगा तब उसको तनख्वाह कितना मिलेगा? छात्र को क्लास में टीचर कोर्स पढ़ाते हैं। रीयल लाइफ जीने के लिए छात्र जीवन में कॉलेज के जीवन में ही सीखा जाता है। आप टीचर बनेंगे तो कैसा टीचर बनेंगे? आफिसर बनेंगे तो उसमें आपको क्या करना होगा? आईएएस, आईपीएस की तैयारी कैसे करेंगे? ये चीजें आपको कॉलेज के दरम्यान सीखने को मिलती है। मेरा ये कहना है कि नेतरहाट स्कूल से कोई पढ़ा है और वो आईएएस या आईपीएस बनता है तो राज्य में और ऐसे स्कूल खोलो। यहां के लोग यहीं नौकरी करेंगे। विदेशी दूतावासों में जायेंगे। पर छात्रों के पास ये मुद्दे ही नहीं हैं।

आप लोगों के प्रयासों से झारखंड अलग राज्य मिला। अब वर्तमान सरकार के कामकाज को किस रूप में देखते हैं?

आज देखिये यहां विधानसभा में 28 सीटें आरक्षित हैं। क्योंकि आदिवासियों की आबादी 28 प्रतिशत है। जिस दिन 20 प्रतिशत आबादी हो जायेगी सीटें 20 कर दी जायेंगी। जिस दिन शून्य आबादी हो जायेगी सीटें भी शून्य हो जायेंगी। यहां पांचवीं अनुसूची लागू है। सीएनटी एसपीटी एक्ट लागू है। और अगला को बोलने की हैसियत नहीं है..! सीएम छत्तीसगढ़ के हैं। इनके बड़े भाई वहां विधायक हैं। इसमें भी कोई दोष नहीं है। लेकिन, आप गलत क्यों कर रहे हैं? आप पांचवीं अनुसूची का मतलब नहीं समझते तब पूछिये किसी से..। सिड्युल फाइव और सिड्यल सिक्स दो चीजें होती हैं। नार्थ इस्ट में जो ट्राइबल ऐरिया है वहां सिड्युल सिक्स लागू है। वहां आप जा सकते हैं, रह सकते हैं, रोजी रोजगार कर सकते हैं, लेकिन आपकी मृत्यु के बाद आपको वहां से लाश लेकर वापस जाना पड़ेगा। क्रिमेशन नहीं कर सकते हैं। ऐसा इसलिए किया गया कि अलग अलग समुदाय जैसे गुजराती, असमिया, बंगाली, राजस्थानी और उड़िया हैं ऐसा जो आईडिंटिफिकेशन है उसको सेफ करके रखना है। यदि कानून सहारा नहीं देगा तब वो लोग इतने सरल हैं कि जो भी वहां जायेगा वो उसे अपने घर में जगह दे देंगे। वो जब तक रहेंगे अपने काम छोड़कर वो उसकी सेवा करेंगे। यही नतीजा है कि आज झारखंड में न ठीक से रोड़ बन पा रहा है। न हाइवे बन पा रहा है। और लोगों को बताया जा रहा है कि आदिवासी जमीन नहीं मिलेगा तब विकास नहीं होगा। सबसे पहली बात है कि आपके पास कितनी आदिवासी जमीन है? दूसरी बात की सरकारी जमीन कितनी है? ऊपजाऊ नहीं है तो ऊपजाऊ बनाने लायक कितनी जमीन है और गैर उपयोगी जमीन कितनी है जहां अधिग्रहण करने के बाद सरकारी कार्यालय बने हैं? ... ये सरकार क्यों नहीं बताती है? आप सिर्फ एचईसी की जमीन की बात क्यों करते हैं? ..वो जमीन तो आदिवासियों से ली गयी है! आप ग्रीन लैंड जमीन कैसे ले लीजियेगा? पूरे हिंदुस्तान के अंदर ग्रीनलैंड एक्ट आपको एप्रुव नहीं करता है। अब एचईसी झारखंड सरकार को जमीन बेचेगी। वहां स्मार्ट सिटी बनेगा। ये कैसे हो सकता है? कहने का मतलब कि संविधान का मोड ऑफ बेसिक कानसेप्ट इन्हें नहीं पता है! ये एक्ट के प्रावधान नहीं जानते। विधानसभा में एक्ट पर निर्णय ले लिया ...!  विधानसभा को कोई अधिकार ही नहीं है कि वो आदिवासियों के मुद्दों पर कोई निर्णय ले। यह पावर ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल को दिया गया है। ये निर्णय लेकर गर्वनर के पास भेजेंगे और गर्वनर के बाद मामला राष्ट्रपति के पास जायेगा।

रांची में नगर निगम का उदाहरण ले लीजिये। होल्डिंग टैक्स की बात करते है। नगर निगम कमीश्‍नर के अनुमोदन या अनुमति के बिना आदिवासियों से होल्डिंग टैक्स ले ही नहीं सकता! आदिवासियों की जमीन का कोई भी मामला डिपुटी कमिश्‍नर देखते हैं। टैक्स लेना तो अलग बात हो गया। ..ये बड़ी बात हो गयी। नगर निगम अपराध कर रहा है। वो खुद को चालाक समझ रहे हैं। पर उनको ज्ञान की कमी है। ट्राइबल लैंड के कारण जिले में डिपुटी कमीश्‍नर नियुक्त किये जाते हैं। दूसरे जगहों में डीएम होते हैं। उसके बाद कमीश्‍नर होते हैं। ये सेस वसूलते हैं। इसी तरह ट्राइबल मैटर पर लोअर कोर्ट, फिर एसडीओ फिर डीसी के पास सुनवाई होती है। डीसी के बाद मामला सीधे कमीश्‍नर के पास जाता है। और ट्राइबल लैंड मामलों में कमीश्‍नर ही सुप्रीम कोर्ट हैं। कमिश्‍नर के पास गवर्नर और फिर सीधे राष्ट्रपति के पास मामला जाता है। बीच में किसी की कोई जगह नहीं है। ये अलग बात है कि आप जबरदस्ती इसमें घुस रहे हैं। ये कानूनी तौर पर वैध नहीं है।

इतना हो जाने के बाद यहां रियल स्टेट का बिजनेस शुरू हुआ। पहले राज्य में सीलिंग एक्ट का नियम था। शहर में कोई भी आदमी 50 डिसमिल से ज्यादा प्रोफेसनल जमीन नहीं रख सकता था। राज्य बना और बड़े कारपोरेट घरानों ने इस नियम को बदलवा दिया। जिससे एक अकेला आदमी पूरा झारखंड खरीद सकता है। सबके लिए समान अधिकार, समान अवसर मिलने का बैरियर खत्म हो गया। अब पूरी तरह पूंजीवादी व्यवस्था लागू हो गयी। यह राजा और जमींदार के राजकाल से भी ज्यादा खतरनाक स्थिति है। 

आपने हमें बताया कि एक दौर था जब यहां कि ब्युरोक्रैसी आंदोलनकारियों से भयभीत हो जाती थी। अभी झारखंड में ब्युरोक्रैसी कैसा काम कर रही है? 

देखिये, साफ साफ कहूं तो आज आईएएस का एक माफिया ग्रुप है, आईपीएस का अलग माफिया ग्रुप है, नेता का भी माफिया ग्रुप है। इस ग्रुप में गांव बस्ती के सभी पढ़े लिखे बेरोजगार युवक शामिल हैं। वो मुझसे कहते हैं ‘हम आईएएस ग्रुप के हियउ। हमलोग को जहां बोला जाता है वहां कब्जा कर लेते हैं।‘ इस काम के बदले उन्हें पैंट, शर्ट, जूता, मोबाइल, मोटरसाइकिल मिल जाता है। ..आज झारखंड की यही स्थिति है। ..जिसको अपना करियर बनाना था, आने वाले लोगों का करियर बनाना था, वो कारपोरेट व्यवस्था के चक्कर में पड़कर जमीन के दलाल बन गये। वो अपने ही भाई भतीजा की जमीन ठग रहे हैं। उसे बिक्री करने में लगे हैं। रांची के सभी थानों के पास कोई टास्क नहीं है, सिर्फ जमीन खरीद बिक्री का काम करवा रहे हैं। रांची में जो भी सीनियर एसपी या डीएसपी बने या थाना प्रभारी रहे उन्होंने पास पांच फ्लैट और दो अपार्टमेंट जरूर खरीदे हैं। आईएएस और आईपीएस के भी है। एक डीजीपी रिटायर होने के बाद सांसद बन गये हैं। ..ऐसा कहीं होता है? ..क्या ऐसा होना चाहिए? आप यहां कीजियेगा क्या? आपको कुछ पता है? सोशल आदमी ही जनता के सवाल उठा सकता है। आप तो पूरी जिंदगी तीमारदारी में लगे रहे..! उससे आपको सुविधा तो मिल रही है लेकिन जनता की बात आप वहां तक नहीं ले जा रहे हैं। ब्युरोक्रैट्स ने छह महीने में क्या काम किया उसके सर्विस बुक में लिखा जाना चाहिए। हर छह महीने में लिखना ही होगा। आप कब लिखते हैं जब उसको इंक्रीमेंट मिलना है। प्रोमोशन मिलना है। उनके गलत कामों, घोटालों के बारे क्यों नहीं लिखते? कार्मिक विभाग मेें जो जाता है वो भी आईएएस रहता है तब लिखेगा कौन?

विधायकों और दूसरे नेताओं के कामकाज का आकलन किस रूप में करना चाहेंगे?

आपको बताऊं कि यहां के सांसद, विधायकों को जितना मिल रहा है वो उसमें संतुष्ट नहीं हैं। ..जिनके पिता के पास ढंग के कपड़े नहीं थे, वो आज बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूम रहे हैं..! ..वो रंगा हुआ सियार बन गये हैं। जिनको यहां के लोगों की मदद करनी थी, उन्हें सुरक्षा देनी थी, वो अपनी सुरक्षा कर रहे हैं। वो व्यक्तिवादी हो गये हैं। देखिये, ..पांच पेज लिखने वाले खेत में पांच कुदाल चला कर देखें तब समानता समझ में आयेगी। जो नेता मंचों से प्रवचन देते हैं वो सात ढेला फोड़ कर देखे, तब उसको सच्चाई का पता चलेगा। किसानों को उनकी फसल का उचित दाम नहीं मिलता। 

यह स्पष्ट है कि झारखंड में उसकी जरूरत के हिसाब से रोडमैप ही तैयार नहीं किया गया। ट्रैफिक को ही देख लीजिये। ये लोग जमीन ढूंढ रहे हैं। क्या सड़कों के फ्लोर नहीं बनाये जा सकते। ये ‘डेड कानसेप्ट‘ के हैं। जब इन्होंने कहा कि कर्मचारियों को बैठने की जगह नहीं मिल रही है, हमने सरकार को लिखा था कि कितने कर्मचारियों को बैठने की जगह चाहिए। मैंने कहा था कि इतनी उंची इमारत बनवाउंगा जिसमें झारखंड की सरकार तो आ ही जायेगी, भारत सरकार को भी वहीं जगह दे दूंगा। दिल्ली का वजन कम हो जायेगा। मैंने उनसे कहा था कि आप वैसे आदमी हो जो पुल बनाते हो और वह बरसात के पहले बह जाता है। यहां कहना चाहिए कि राजनीति जीने, खाने, कमाने और लूटने की जगह बन गयी है। विधायिका में जो विधायक बोलता नहीं है, उसके काम की समीक्षा होनी चाहिए। कोई एक आयोग रहे जो उनके क्रियाकलापों का मूल्यांकन करे। उनको भी सस्पेंड करने का नियम होना चाहिए। मेरा कहना है कि कोयला, लोहा यहां निकल रहा है, हीरा, पन्ना, गोमेद जैसे रत्न हैं। तब फिर बिनोद भगत राज्य बना कर आलू नहीं बेचेगा तब क्या करेगा? या मुझे उनके साथ जुड़कर उनके जैसा बन जाना होगा, या इज्जत से दो रोटी कमानी होगी।

आजादी के वख्त कहा जाता था कि तोप, गोला, बंदूक नहीं खरीद सको तो एक अखबार निकालो। पर आज अखबार में भी सही आदमी बहुत कम हैं..! मैंने मीडिया को बहुत नजदीक से देखा है। आज लोग प्रेशर में काम करते हैं। एक जमाने में मैं दबदबे वाला के नाम से ज्यादा फेमस था। लोग कहते थे अरे इसी ने वीसी (वाइस चांसलर) को दो तमाचा जड़ा था। ..मैं अधिकारियों से साफ कहता था कि काम नहीं करोगे तो मारेंगे। फिर केस करो हम जवाब देंगे..! अरे, आपको किस चीज की तनख्वाह दी जाती है। ये सभी ताकत की चीज है। पर अब झारखंड को बिहारियों, युपी, उड़िसा, बंगाल, छत्तीसगढ़ वालों ने कब्जा लिया है। सबेरे यहां (मोरहाबादी में) रेजा कुली की मंडी लगती है। हम तो इन्हीं के लिए झारखंड बनाये थे ...! पर ये अब भी वहीं खड़े दिखते हैं। आप किसने डेवलपमेंट की बात करते हैं..? क्या हमने रोड बनाने के लिए राज्य मांगा था..? कि पांच लेन 10 लेन की सड़क बनेगी? क्या हमने प्लेन उतारने के लिए राज्य मांगा था? यहां के लोग ही नहीं चढ़ेंगे तब यहां एयरपोर्ट बनाने का मतलब क्या है...? 

अभी के बजट में भी यहां के लोगों के लिए कुछ नहीं है। देखिये, लेबर खुद काम करने के लिए घर से आ रहा है। उसको काम नहीं मिल रहा है। मेरा कहना है कि इससे मजदूरी मत करवाओ। इनके लिए छोटे उद्योग लगा दो। फुड प्रोसेसिंग के कई तरीके हैं। मॉल में बाहर से लाकर ये सामान बेचे जाते हैं। क्या यहां नहीं बन सकते?

राजनीति की बात करें ..तो आप विपक्ष की कैसी भूमिका में देखते हैं?

देखिये, विपक्ष जिन बातों को लेकर हो हंगामा करता है क्या वो लोग सच्चाई में ग्राउंड स्तर पर जाते हैं? सभी चुनाव के समय जाते हैं। आज आधार कार्ड में त्रुटि है, वृद्धा पेंशन नहीं मिलता है, महिलाओं को विधवा पेंशन नहीं है, कई तरह की बीमारियां हैं। कोई ये मुद्दे नहीं उठाता। दलों की राजनीति की कोई दिशा ही नहीं है। सिर्फ सत्ता पाना इनका लक्ष्य है। भारत के संविधान में राजनीति को जनता की सेवा के रूप में देखा गया है। पर यहां कोई सांसद और विधायक सेवक नहीं दिखता है। वो जनता के पास जाता है तो जनता ही उसको प्रणाम करती है। हाथ हिला कर ऐसे अहसान जता देता है कि देखो कम से कम हम तुमको दिख गये ना..!

चलिये, आप अपने परिवार के बारे में कुछ बतायें?

मेरे परिवार में हम पांच भाई और तीन बहनें हैं। भाईयों में मैं सबसे बड़ा हूं। तीन भाइयों की शादी हो गयी है। मेरी अपनी बच्ची क्लास टेन में पढ़ती है। झारखंड आंदोलन के कारण मैंने काफी देर से शादी की। क्योंकि मैंने शपथ ली थी।.. मैं किसान परिवार से आता हूं। लोगों की सेवा करना मैंने अपने परिवार से सीखा। मेरा गांव नेतरहाट के पास है। मैंने इकोनामिक्स में एमए किया है। उसके बाद जर्नलिज्म भी किया। मैंने अपनी पहल पर रांची युनिवर्सिटी में जर्नलिज्म डिपार्टमेंट खुलवाया। उस समय राम दयाल मुंडा जी वाइस चांसलर थे। इसके पीछे सोच थी कि झारखंड के बारे कोई लिखना नहीं जानता इसलिए यहां के लोग यहीं पढ़ाई करेंगे। मैंने मुंडा जी को बताया कि युजीसी से कनसेंट ले लीजिये। भारत सरकार सरकारी संस्थानों, अर्द्ध सरकारी संस्थानों, इसके अलावा ऑटोनोमस संस्थानों को भी मदद करती है। हमने उनसे कहा कि आप प्रोजेक्ट बना कर दीजिये। दिल्ली जाकर एचआरडी मिनिस्ट्री के किसी अधिकारी से मिल लीजिये और युजीसी को भी एक चिट्ठी दे दीजिये। 

इस तरह डिपार्टमेंट खुला। पर यहां डिग्री वाले टीचर भी नहीं थे जो यहां पढ़ा सके, इसलिए जो लोग अखबार में काम कर रहे थे, उनसे कक्षाएं लेने को कहा गया। मेरे साथ जिन्होंने पढ़ाई की अभी एडिटर इन चीफ, एडीटर, कोई ब्युरो चीफ, जैसे पदों पर हैं। ..पर सबसे बड़ी बात की कोई भी काम छोटा नहीं होता है। यहां के लोगों को यह समझने की जरूरत है। सबसे दुख की बात है कि यहां की महिलाएं हड़िया, सब्जी, लकड़ी बेच रही हैं और सरकार कहती है कि शौचालय बनवाइये, नहीं तो घर की इज्जत घट जायेगी। मेरा कहना है कि रांची में कहा शौचालय है.. ! बड़ी सोच के अलावा छोटी सोच का भी शौचालय भी तो बनवा दो।

क्या हमलोग भविष्य में जुझारू बिनोद भगत को फिर से राजनीति में एक नये रूप में देखेंगेे?

देखिये, बिनोद भगत एक शख्स का नाम है और बिनोद भगत वहीं जन्म लेता है, जहां सभी रास्ते हों। हर निराशाओं में, हर विफलताओं में, बिनोद भगत छिपा रहता है..। वहीं से कोई ऐसी किरण निकलती है, कि एक बिनोद भगत खड़ा हो जाता है। यही प्रकृति का नियम भी है। मेरा कहना है कि झारखंड के लोगों को ये समझना होगा कि कोई भी काम बुरा नहीं है। यहां पर जो आफिसर सरकार चला रहे हैं जो बड़े बड़े नेता बन गये हैं, उनको भी समझना होगा कि उनके माता पिता भी आलू प्याज बेचकर उनका पालन पोषण किया है। उन्हें पढ़ाया लिखाया और यहां तक पहुंचाया है। लेकिन ये लोग गद्दार निकल गये..! जो आपके लिए अनाज और सब्जियां उगाता है आपने उनके लिए एक भी नीति नहीं बनायी। आप अडाणी, अंबानी, टाटा, बिड़ला के लिए नीतियां बना रहे हैं। उनके हजारों करोड़ रूपये माफ कर रहे हैं। क्या ये पैसे यहां निवेश नहीं किये जा सकते? यहां लौह का भंडार है और यहीं के लोगों को लोहा खरीदने के लिए सोचना पड़ रहा है। यहां सिमेंट बनता है। तो झारखंड के लोगों को सिमेंट में कुछ रिबेट दे दो भाई। झारखंडियों को सपोर्ट करना ही सरकार का काम है।

वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसे संगठन के पास कानसेप्ट की कमी है। उसके साथ दिक्कत है कि सरकार तो बना सकता है लेकिन चला नहीं सकता। भाजपा के पास बहुमत है। सरकार भी बना ली और चला भी रहे हैं। लेकिन चलाने का कमान खराब ड्राइवर के पास है। ये अपने आप को ओवर इस्टीमेट कर देते हैं। जो भी काम करता है उसके पीछे अड़े रहता है। ‘लिबरालिटी कानसेप्ट ऑफ पीपुल्स‘ ‘साउंड ऑफ पीपुल्स‘ को समझना होगा। ये डेमोक्रैसी है। आप राजा हैं क्या कि जो बोल दिये वही होगा? जब झारखंड बन सकता है तब सीएनटी एक्ट अमेंडमेंट हट क्यों नहीं सकता है? आप क्या वाजपेयी जी से ज्यादा ज्ञानी हो गये हैं। कि आपका निर्णय नहीं बदलेगा? आपका निर्णय नहीं बदलेगा तो यहां की पब्लिक आपको बदल देगी। मैंने अपने जीवन में इंदिरा गांधी से लेकर यहां तक देखा है। मैंने नेताओं की हालत देखी है कि मंत्री पद से हटने के बाद इनके पास चाय पीने तक के पैसे नहीं होते हैं और बिनोद भगत इन्हें चाय पिलाता है।

अभी न्यायपालिका में लोअर कोर्ट के बाद हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में क्रिमिनल को बेल मिल जाता है। लेकिन गरीब आदमी जो लोअर कोर्ट के आदेश पर सजा काट रहा है। हिन्दुस्तान में उसका कोई माई बाप नहीं है क्या? ज्युडिशियरी कागनीजेंस लेती है बड़े मामलों में। जिसमें उनका कोई संबंधी या पहचान के लोग हों। पेंडिंग केस को नहीं निपटाते। हमने एडवाइस दिया था कि जो सीनियर एडवोकेट हैं बार से उनका लिस्ट मंगवाकर उनको आनरेरियम पर जज बना कर 45 दिनों का टास्क दीजिये और सभी केस डिस्पोज करवाइये। लेकिन आपकी इच्छाशक्ति हो तब न करेंगे..! 

हम जब संगठन बनाते थे, गांव में बिना बताये अटरेंडम जाते थे। पांच दस जितने भी लोग मिलते थे सभी को बैठा कर समझाते थे। उनसे मदद मांगते थे। इस तरह गांव गांव में संगठन खड़ा किया था। आजसू में जितने संगठन मेरे संथाल परगना और छोटानागपुर में बनाये हुए हैं वो मैंने जिम्मेदारी लेकर, गांव गांव का दौरा कर, पुलिस प्रशासन से लड़कर बनाये हैं। अब संगठन के लोग बिनोद भगत के पास क्यों नहीं आ रहे, क्योंकि बिनोद भगत तो बाइक और बोलेरो देगा नहीं..! वो खुद भी आलू बेचेगा और हमें भी कहेगा कि तुम भी बेचो..! यही लोग अब भू माफिया गिरोह में भी शामिल हो गये हैं। घर में खाने को नहीं और बाबू मोटरसाइकिल में घूम रहे हैं ...! यही झारखंड का ट्रेंड बन गया है। यहां छात्रों को मार्गदर्शन देने वाला कोई नहीं है..! उन्हें जिस दिशा में भेजा जाता है वो चले जाते हैं। ये काम युनिवर्सिटी को करना था पर वो नहीं कर रही है। पर मिशनरी कर रहे हैं। आज सभी चाहते हैं कि उनके बच्चे मिशनरी कॉलेज स्कूल में पढ़ें। तब सरकार ऐसी सुविधाएं क्यों नहीं देती? देखिये, मैं साफ कहता हूं कि जो मां बहन की इज्जत नहीं बचा सका वो मर्द नहीं है..! आज हमारी मां बहनें सड़कों के किनारे सब्जी, हड़िया बेच रही हैं सर्दी, गर्मी बरसात सभी मौसम में। क्या हमारे नेताओं को यह नहीं दिखता..? यहां के मंत्री विधायक कैसे लोग हैं...? वाह रे मानवता..! डिपुटी कमीश्‍नर, कमीश्‍नर, लीडर, चीफ मिनिस्टर ..शर्म करो..! इनके लिए योजनाएं क्यों नहीं बनाते? तुम्हारे पास मार्केटिंग बोर्ड है..!

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