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एक बार फिर लुट जाएंगे झारखंडी!

सीएनटी और एसपीटी एक्ट में जो अमेंडमेंट हुए हैं, रघुवर दास सरकार उसका गलत प्रचार कर रही है। बदलाव कुछ हुए हैं और प्रचार कुछ और किया जा रहा है..!..     -डॉ करमा उरावं (इंटरव्‍यू)

न्यूज विंग: रांची- सदियों से उपेक्षित झारखंड में अब देश दुनिया की तरक्की देख मुख्य धारा से जुड़ने की तड़प स्पष्ट दिख रही है। इस रत्नगर्भा धरती पर लंबे समय से प्रयोग होते रहे। औद्योगिक, राजनीतिक, सामाजिक!.. झारखंड के मूल निवासी हर बार आंखों में सुधार के सपने संजोते लेकिन हालात जस का तस। अलग राज्य आंदोलन के बाद मिला झारखंड। लेकिन डेढ़ दशक हो गए, सपने टूटते बिखरते रहे। दो साल से चल रही भारी बहुमत वाली भाजपानीत रघुवर सरकार से लोगों में आस जगी। अब जहां एक ओर प्रशासन और सरकार की संजीदगी दिख रही है तो दूसरी ओर यहां के लोगों में एक बेचैनी भी। राज्य में संसाधन तो उभर रहे हैं लेकिन स्थानीय निवासियों की आंखों में सवालों का रेला है। निश्‍चिंतता का माहौल तो नहीं ही कहेंगे। कुछ उन्हीं सवालों के साथ हम रूबरू हुए जानेमाने आदिवासी बुद्धिजीवी, नेता, चिंतक और सामाजिक विश्‍लेषक डॉ करमा उरावं से। झारखंडी अस्मिता मसलों के विशेषज्ञ माने जानेवाले डॉ उरावं दर्जनों बार देश विदेश में झारखंड का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। डॉ उरावं की चर्चा उन झारखंडियों में होती है जिसने यहां के सामाजिक तानेबाने को नजदीक से महसूसा है। छात्र राजनीति से लेकर मुख्यधारा में इनकी एक राजनीतिक पहचान रही है। वर्तमान में केंद्र सरकार के जनजातीय मामलों के मंत्रालय की 'स्‍टैंंडिग कमिटी फॉर ट्राइबल वेलफेयर (एससीटीडब्लू)' के एक्सपर्ट मेम्बर डॉ करमा उरावं से न्यूज विंग के वरीय संवाददाता रणजीत ने लम्बी बातचीत की। पढ़िये बातचीत के प्रमुख अंश:

आपके नजरिये से, झारखंड के मूल मुद्दों को लेकर क्या प्रगति है?

देखिये, वर्तमान की बात करूं कि झारखंड की जो राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां बनी हुई हैं यहां के लोगों के लिए अप्रत्याशित है। लोगों ने इसकी उम्मीद नहीं की थी। झारखंड जब अलग राज्य बना तो यह सोचा गया था कि यहां के आदिवासियों और मूलवासियों का उत्थान होगा और इस उत्थान में उनके सहभागिता की जरूरत होगी। लेकिन.. ऐसा हुआ नहीं। इन मुद्दों को सरकार आज एड्रेस नहीं कर पा रही है। इसके कारण यहां की परिस्थितियां जटिल हो गयी हैं।

सरकार की कार्यशैली और सामाजिक राजनीतिक संगठनों के रूख को आप किस रूप में देखते हैं?

झारखंड बनाने के लिए यहां के आदिवासी मूलवासी समाज ने एक सदी तक संघर्ष किया है। इन्हें उम्मीद थी कि झारखंड बनने के बाद सामाजिक, आर्थिक विकास होगा और राजनीति में इनकी प्रत्यक्ष सहभागिता होगी। ..यहां की जो मूल आबादी है, उनको फोकस कर विकास के मॉडल बनेंगे। विकास की परियोजनाएं यहां की जनसंख्या के अनुकूल होगी। ..पर अब झारखंड के लोग समझने लगे हैं कि झारखंड बनने के बाद उनकी जो उम्मीद और आकांक्षाएं थीं, वह सभी धरी की धरी रह गयीं। यह छिपा नहीं है कि बाहरी तत्व झारखंड बनने से पूर्व भी सक्रिय थे। झारखंड के लोगों ने इनसे छुटकारा पाना चाहा था। लेकिन वो शक्तियां फिर से हावी हो गयी हैं। अब यही शक्तियां झारखंड के इश्यूज (मुद्दों) के दावेदार के रूप में काम करने लगी हैं। राजनीति वहीं की वहीं रह गयी..!

आप कई राष्ट्रीय स्तर पर बनी समितियों के सदस्य हैं। वहां आप एक्सपर्ट मेंबर के तौर पर हैं। जैसे स्टैंडिंग कमिटी फॉर ट्राइबल वेलफेयर में। ..और भी कई संगठनों से जुड़े हैं। आप अपने वहां के अनुभव के बारे कुछ बतायें?

देखिये, इन समितियों में मुझसे झारखंड के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में राय ली जाती है। पर मेरा अपना अनुभव कहता है कि झारखंड के आदिवासियों और मूलवासियों के जो अधिकार हैं वो संवैधानिक दृष्टिकोण से काम नहीं कर रहे हैं। विशेषकर ’अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग‘, इन तीनों वर्गों के आरक्षण के जो संवैधानिक अधिकार हैं.. उसका ‘फेथफुल कंपलायंस‘ नहीं हो रहा है। कारण यह है कि झारखंड बनने के बाद जो भी सरकारें आयीं, उसने सभी विभागों में कांट्रैक्ट पर नियुक्तियां कीं। उस वख्त भी आरक्षण नियमों का पालन नहीं किया गया। राज्य और जिला स्तर पर जितने भी सरकारी विभाग हैं। सभी में नियुक्तियां हुई हैं। पर ये वैधानिक नहीं हैं। जिनकी नियुक्तियां हुईं वो कई सालों तक काम करते हुए ये दावा करने लगे कि उनकी नौकरी स्थायी की जाये। इस ओर सरकार ने सोचा भी और कहीं कहीं नौकरियां स्थायी भी की गयी हैं। राजभवन में हुई नियुक्तियों को, हेल्थ सेक्टर में 205 डॉक्टरों और एएनएम की बहाली को रेग्युलराइज किया गया है। इसी को आधार मानकर दूसरे विभागों में हुए हजारों नियुक्तियों को रेग्युलराइज करने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गयी है। इस तरह से यहां के लोगों का आरक्षण का जो संवैधानिक अधिकार था, वह घट गया। जिन्हें हक मिलना चाहिए था, नहीं मिला। पहले की सरकारों या अभी की सरकार ने भी राज्य में ये नहीं जानना चाहा कि इस राज्य के लोग चाहते क्या हैं? जहां तक मुझे याद है ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया। जब कोई नया राज्य अस्तित्व में आता है और वहां के लोग, सामाजिक, राजनीतिक संगठनों के साथ साथ यहां के सभी समुदाय के परंपरागत संगठन जिन्होंने झारखंड राज्य के लिए संघर्ष किया है, उनकी बात तो सुनी भी नहीं जा रही..! उनसे समागम करने का कोई तरीका, किसी भी सरकार ने ईजाद नहीं किया। बातचीत का माहौल बनने पर यह बात उभरकर सामने आती कि यहां के लोग क्या चाहते हैं? ऐसा नहीं होने से यहां कि जो जन आकांक्षाएं, अपेक्षाएं और भावनाएं थीं वह प्रस्फुटित नहीं हो सकीं।

अभी के माहौल में.. या कहें कि पिछले 16 सालों में यहां के मूलवासी आदिवासियों ने जो देखा सुना अपने इस अनुभव से वो क्या सोचते हैं?

देखिये, वो लोग (मूलवासी व आदिवासी) ठगा सा महसूस कर रहे हैं। ये सोचने की बात है कि कोई भी सरकार सत्ता में रही हो, उनके मन में कहीं न कहीं ये बात अटकी है कि झारखंड अलग राज्य बनने से पहले की ही सरकारें ’अच्छी’ थीं। ..क्योंकि वहां सुनवाई होती थी। ..पर झारखंड अलग राज्य बनने के बाद आज तक कोई ऐसा फैसला नहीं हो सका है, जो यहां के हित में हो। अब तक ऐसा कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया है।

सरकार यह दावा कर रही है कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी ऐक्ट) संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी एक्ट) में जो बदलाव या ’सरलीकरण’ किया जा रहा है वो आदिवासियों मूलवासियों के हित में है? ..फिर इसका विरोध क्यों हो रहा है?

देखिये, सीएनटी और एसपीटी एक्ट में जो अमेंडमेंट हुए हैं, रघुवर दास सरकार उसका गलत प्रचार कर रही है। बदलाव कुछ हुए हैं और प्रचार कुछ और किया जा रहा है..! सरकार कह रही है कि उसने सरलीकरण किया है। पर उन्होंने इन कानूनों की आत्मा को मार दिया है।

आत्मा को मार दिया गया है? इसे कैसे समझ सकते हैं?

मैं बताता हूं, जैसे सीएनटी एक्ट की धारा 21 और एसपीटी एक्ट की धारा 13 में बदलाव का प्रस्ताव है। इसे विधानसभा में पारित भी करवा लिया गया। वहां कैसे पास हुआ सभी ने यह देखा। इस बारे में सरकार का कहना है कि झारखंड में जो 23 प्रतिशत कृषि योग्य जमीन है उसे गैर कृषि योग्य जमीन में बदलना है। जबकि यहां की आबादी, चाहे वो आदिवासी हो या मूलवासी, 80 प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं। दूसरे क्षेत्र में उनकी सहभागिता नहीं है, उनकी एक्सपर्टिज (विशेषज्ञता) भी नहीं है। सरकार के सामने बंदिश है कि वो कृषि योग्य जमीन को ट्रांसफर नहीं कर सकती है। एक्ट में बदलाव होने के बाद सरकार जमीन के स्टेटस को बदल कर जब मर्जी आये किसी भी भौगोलिक क्षेत्र को नोटिफाइ (अधिसूचित) करके उस जमीन को जन उपयोगी या सरकारी कामकाज के लिए या इंडस्ट्री या अन्य कंपनियों को मुहैया करायेगी। यहां की जो ’एग्रकल्चिरिस्ट’ आबादी है वो अब तक दूसरे क्षेत्र में ट्रांसफॉर्म नहीं कर सकी है। .. इतनी जल्दी कर भी नहीं सकती। ..और सरकार इंडस्ट्री का जाल बिछाना चाहती है। यह जानते हुए कि यहां की आबादी इसके लिए तैयार ही नहीं है। सरकार को समझना होगा कि ये आबादी उस संस्कृति को बर्दाश्त नहीं कर सकेगी। तब फिर क्या प्रतिफल होगा .. बताइये? ..आप उनकी कृषि योग्य जमीन को गैर कृषि में बदलकर इस 23 प्रतिशत कृषि योग्य जमीन को दूसरों के हाथ में दे दीजियेगा तब यहां की आबादी कहां जायेगी? वो अपना जीवन यापन कैसे करेगी?

क्या यही वजह है कि हजारीबाग के बड़कागांव और रामगढ के गोला में लोग जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं?

इन जगहों पर क्या हुआ वो सभी ने देखा। आप ’वीकर सेक्शन ऑफ सोसाइटी’ हैं, आज भी यहां के राजपूत ब्राह्मण झारखंड के रीति रिवाज को अच्छी तरह नहीं जानते हैं। ..छोड़िये, वो फारवर्ड भी नहीं है। तब आप क्या आदिवासी, मूलवासी ओबीसी की बात करेंगे..? जो यहां के फारवर्ड कहे जाने वाले लोग हैं वो भी यहां की संस्कृति से परिचित नहीं हैं। वो भी स्किल्ड नहीं हैं। जब बड़ी संख्या में बाहर की आबादी यहां आयेगी, इंडस्ट्री लगेंगे, हमारा वहां पार्टिसिपेशन (भागीदारी) नहीं होगा, वो हो भी नहीं सकता क्योंकि हम स्किल्ड नहीं हैं, तब फिर हमारा हाल क्या होगा..? पूरा समाज चरमरा जायेगा।

आपके कहने का मतलब कि झारखंड के आदिवासियों, मूलवासियों के अंदर इस बदलाव को लेकर गुस्सा है जिसे नजरअंदाज किया जा रहा है?

गुस्सा.., रोष.. साफ दिख रहा है। ..और किसी आदिवासी समुदाय, संगठन या फिर किसी राजनीति पार्टी की मांग के बिना ही रघुवर सरकार जबरदस्ती कानूनों में बदलाव कर रही है। आप कह रहे हैं कि हम इंडस्ट्री सेट अप करेंगे ही! इसके लिए हम आपकी जमीन लेंगे ही। चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े। तब आपकी मंशा क्या है? आप यहां की आबादी को डेवलप नहीं करना चाहते हैं। आप तो बाहर की आबादी को यहां प्रतिस्थापित कर रहे हैं। इंडस्ट्री लगेगा, बाहर से स्लिल्ड लेबर आयेंगे, तकनीशियन आयेंगे, इंजिनियरिंग सेट अप आयेगी। ये सभी इस क्षेत्र में आ कर भर जायेंगे। हमारी जमीन चली जायेगी और हम देखते रह जायेंगे। मालिकाना हक रहेगा लेकिन वो पूर्व के छोटानागपुर काश्तकरी अधिनियम के प्रावधान के तहत। तब आपने कोई नयी बात तो कही नहीं है! सरकार ने कहा है कि मालिकाना हक उस रूप में रहेगा जो छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट में कही गयी है। मैं बताऊं कि उसमें यही कहा गया है कि इंडस्ट्रीज लगेंगे। अधिग्रहण होगा, लेकिन अगर वह जमीन पांच सालों तक उपयोग में नहीं आयेगी तब रैयतों को वापस कर दी जायेगी। मैं पूछना चाहता हूं कि झारखंड में अब तक किसी की जमीन वापस की भी गयी है? एचईसी की खाली जमीन में कुछ नहीं बना तब क्या यह जमीन रैयत को वापस किया गया? तब क्या गारंटी है कि भविष्य में जमीनें लौटायी जायेंगी..? ..सरकार ने कोई नयी बात नहीं कही है। झारखंड में आज तक जमीन लौटायी नहीं गयी है। एक तरफ एचईसी क्षेत्र में जमीन लौटने की मांग की जा रही है वहीं उस जमीन में दूसरी सरकारी परियोजनाओं को लाने का प्रस्ताव तैयार किया गया। हाई कोर्ट बन रहा है, विधानसभा बनना है। खेलगांव बन रहा है। इस तरह की गैर जिम्मेदाराना परिस्थित बन जाती है जिसे आदिवासी पहचान चुका है। एक और डर बना हुआ है। एचईसी के चारों ओर जितने सेटलमेंट विलेजेज हैं, आप वहां घूम कर देखिये। उनकी सामाजिक, आर्थिक स्थिति देखिये। वो लोग गुलगुलिया से कम नजर नहीं आयेंगे। देखिये, सरकार की ओर से विकास का कुछ ऐसा पैमाना तय होता है, जो समझ के परे है। आप देखिये कि झारखंड में जमीन को लेकर अब तक क्या हुआ? सेल, मेकॉन और एजी ऑफिस का उदाहरण यहां देना चाहूंगा। इन्होंने पूरी आबादी में से 100 लोगों की एक सोसाइटी रजिस्टर्ड करवायी। इस तरह उन्होंेने संस्था बनायी और कहा कि उनको जमीन चहिए। तब इन्होंने हरमू कॉलोनी, एजी कॉलोनी और अशोक नगर बना लिया। आपको ये भी सोचना चहिए कि वहां की आबादी को अपने कहां रिहेबिलिएट (पुनर्वासित) किया? आपने वहां की मूल आबादी को हटा कर दूसरों को बसा दिया है। ये किस तरह का जस्टिस है। आदमी की कीमत बराबर होनी चाहिए। ये कैसा कानून है? एचईसी के संबंध में मैं आपको बताना चाहता हूं कि वहां बहुत बड़े अधिगृहित जमीन पर जहां घर बने हैं, उसको आपने वहां के पुराने कर्मचारियों को 90 साल की लीज पर दे दिया। यानी आपने एक तरह से घर को बेच दिया। ये पब्लिक पर्पस के लिए थे आपने व्यक्तिगत पर्पस के लिए दे दिये। ये कैसा नियम है? इस तरह की आपकी साजिश और कुचक्र है, जिसे आदिवासी और मूलवासी समाज समझ चुका है।

राज्य में बडे बडे उद्योग लगने वाले हैं..। सरकार इंवेस्टर्स मिट की तैयारी कर रही है..? 

अब देखिये, मैंने कहा कि 23 प्रतिशत आबादी है यहां। ये सौभाग्य है कि जहां भी यहां के आदिवासी और मूलवासी बसे हैं.. वह पहाडों में कंदराओं में भी रह रहे हैं। वहीं रत्नगर्भा है। देश की 40 प्रतिशत खनिज संपदा वहीं हैं। देश के साथ साथ पूरी दुनिया की निगाहें झारखंड के इस रत्नगर्भा धरती पर टिकी हैं। बात साफ है। वह यहां के नैचुरल रिसोर्सेज का दोहन करना चाहते हैं। और दोहन भी ऐसी रफ्तार से करना चाहते हैं कि यहां का जो सामाजिक ताना बाना है वो समाप्त हो जाये। बताइये यहां अर्बनाइजेशन होगा, इंडस्ट्रियलाइजेशन होगा, आप यहां के पॉपुलेशन को नजरअंदाज करके काम करेंगे। उनके सामाजिक आर्थिक परिस्थिति का जो सेटअप है.. जो इकोलॉजिकल सेटिंग है उसको आप दरकिनार करके काम करेंगे। इससे यहां की आबादी पलायन के लिए मजबूर हो जायेगी। उसके सामने और भी कई परेशानियां आ जायेंगी। धनी वर्ग के लोगों को गरीबों की दुनिया में बसाना ये आपकी कौन सी नीति है। सरकार इसको बढावा दे रही है।

अभी आप देख रहे हैं यहां मोमेंटम झारखंड की चर्चा हो रही है। सरकार इंवेस्टर्स समिट की बात कर रही हैं। सरकार ने कहा है कि इनवेस्टर्स को एक लाख एकड़ जमीन दी जायेगी। ये जमीन लैंड बैंक से दी जायेगी। अब सवाल है कि ये लैंड बैंक क्या है? ऐसा है कि प्रत्येक गांव में गैर मजरूआ जमीन है, परती जमीन है। वहां कुछ गरीब लोग बस गये हैं। गांव के पुरखा दर पुरखा ने इस जमीन को संजो कर रखा है। दातुन पत्तई के लिए परता रखा है। चारागाह के लिए जगह रखी है। सामाजिक कार्यों के लिए जगह है। तालाब का पानी पीने के लिए जगह रखी है। ये जमीनें गैर मजरूआ हैं जो कम्युनिटी प्रॉपर्टी के रूप में जानी जाती है। सामुदायिक संपत्ति परिसंपत्ति के रूप में जानी जाती हैं। उन तमाम संपत्तियों को आपने नोटिफाई कर दिया है। गरीब गुरबा का जो सेटलमेंट हुआ उसको भी नोटिफाई कर दिया है। आपने कहा कि ये सभी संपत्तियां सरकार की हैं। उनकी कुछ नहीं हैं। इसी जमीन को रघुवर सरकार ने लैंड बैंक में डाल दिया है। और अब सरकार कह रही है कि उसने राज्य के विकास का पूरा नक्शा तैयार कर दिया है। कह रही है कि लाखों एकड़ जमीन उसके लैंड बैंक में है। सरकार ने ये नहीं देखा कि जो यहां के आदिवासी या मूलवासी भाई हैं, उनका जो रेवेन्यु विलेज में सेटलमेंट है जो उनका सोशल, इकोनॉमिक फैबरिक है, और उसका सेट अप है जो उसने पुरखा दर पुरखा बचा कर रखा है। उसको आप इंडस्ट्री को देना चाह रहे हैं। लैंड बैंक से एक्विजिशन भी कर लिया है। यहां के जो सोशल सेट अप हैं जिसे यहां के लोगोें ने दशकों से एनज्वाय किया है। क्या उसपर हमला नहीं हो रहा है? तब ये किस तरह का न्याय है? आप क्यों नहीं एलाव करते हैं कि झारखंड की मूल आबादी इसको अपने अनुसार डेवलप करे? विकास का खाका तैयार करे?

पर कई मौकों पर ऐसे बयान दिये जाते हैं कि कुछ लोग या संगठन राज्य के विकास में सरकार का साथ नहीं देना चाहते?

अभी झारखंड में जो राजनीतिक परिस्थिति है, आपकी पार्टी (भाजपा) के लोग कुछ कहने के लिए तैयार नहीं हैं। इतनी निरंकुशता है कि पार्टी के लोग उफ तक नहीं कह पा रहे। आप पार्टी के लोगोें को हांक रहे हैं। धमकियां दे रहे हैं। सबसे बडी बात कि आजादी के पहले और उसके बाद भी सरकारों ने आदिवासियों मूलवासियों कि भावनाओं की कद्र की है। उनके मामलों में सरकारें बहुत संवेदनशील रही हैं। लेकिन, रघुवर सरकार सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, स्थानीय नीति, जमाबंदी कानून और लैंड बैंक जैसे इश्यूज् को लेकर बहुत पैथेटिक है। जैसे अफ्रिका और आस्ट्रेलिया में अर्थाइट्स हुआ था सरकार वैसा ही कर रही है। ऐसे में आदिवासी क्या करेगा? वो जान रहा है कि हमारी जीविका छीनी जा रही है। वो प्रतिकार करेगा ही। आप चींटी को भले कुचल दीजियेगा मगर वो आपको काटता जरूर है..! इस तरह की नीति सरकार लेकर आयी है। वो सोच ही नहीं रही है कि यहां के लोग किस परिस्थिति में रहते हैं। ये ताना बाना सैकडों बरसों में बना है। एकबारगी आप उसमें परिवर्तन लाना चाहते हैं। ऐसा परिवर्तन जिसके लिए यहां का समाज तैयार नहीं है। आपको देखना चाहिए कि यहां विकास का कौन सा पैमाना सूट करेगा। यहां वैकल्पिक विकास का मॉडल सूट करेगा। इसपर किसी का ध्यान नहीं है।

क्या आदिवासियों मूलवासियों के हक की बात करने वाले संगठन उनकी भावनाओं को सही तरीके से रख पा रहे है, और क्या वो एकजुट हैं। क्योंकि कई मौकों पर ऐसा देखा गया है उनमें वैचारिक मतभेद है?

देखिये, भाजपा के एमएलए, मंत्री, या दूसरे नेता को छोडकर कौन युनाईट नहीं है..? पूरा समाज और पूरा विपक्ष युनाईट है। भाजपा से जुड़े लोग भी इनके पक्ष में बोल रहे हैं। शीतल ओहदार भाजपा से जुडे हैं। उनका संगठन भी एक्ट में बदलाव के खिलाफ आंदोलन कर रहा है।

आपका इशारा इस ओर तो नहीं कि इस तरह के विरोध को प्रचार माध्यमों में जगह नहीं मिल पा रही है?

देखिये, मीडिया माध्यमों में रघुवर दास की 15 लाख की फोटो छपती है। इतने पैसे की बर्बादी की जा रही है। पेड न्यूज की बात जनता जान चुकी है। इस मुगालते में नहीं रहें कि जो फील गुड कहा जा रहा है, वह सही है..! मीडिया भी निरपेक्ष नहीं है। साफ साफ कहूं कि अगर आज चुनाव हो जाये तब झारखंड से भाजपा गायब है! यहां की राजसत्ता को यहां की मूल आबादी के इंटरेस्ट को सेफगार्ड करना चाहिए। पांचवीं अनुसूची के तहत भारतीय संविधान की धारा 244 के तहत सिड्युल एरिया में ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल का बड़ा रोल होता है। पर सरकार टीएसी के सदस्यों को डिक्टेट करती है ...! इतना ही नहीं विधानसभा में भी डिक्टेट किया जा रहा है। चूंकि सरकार बहुमत मेें है इसलिए बिना चर्चा के एज्युम कर लेना कि कानून पारित हो गया, क्या सही है? आपने वोटिंग नहीं करायी, अवसर भी नहीं दिया और विधानसभा अध्यक्ष ने नियमन दे दिया कि विधेयक पास हो गया। विधानसभा के भीतर इस तरह की जो परिस्थित खडी हुई हैं, उसपर सरकार का संवेदनशीन नहीं होना बहुत दुखदायी है। आप इस तरह से ’रूथलेस’ गवर्नमेंट चलाना चाहते हैं। इससे किसी का भला होने वाला नहीं है।

क्या यही वजह है कि पार्टी के भीतर का मतभेद सार्वजनिक हो रहा है?

 देखिये, जब से झारखंड बना है बाहरी तत्व इसे चारागाह के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। आप जानते ही हैं कि किस काम के लिए चारागाह बनाना चाहते हैं..! एक लॉबी हमेशा से सरकार को प्रभावित करना चाहती रही है। बाबुलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, हेमंत सोरेन को प्रभावित नहीं कर सकी..। लेकिन .. अभी के मुख्यमंत्री बाहरी हैं ना..! यहां के मूल निवासी नहीं हैं। ये आदमी छत्तीसगढ का रहनेवाला है। इसको झारखंड से माया, मोह, ममता नहीं है। अब बाहरी लॉबी के लिए अच्छा समय है। यही भाजपा का हिडन एजेंडा भी है। एजेंडा क्या है कि इस क्षेत्र की जो विविधात्मक शक्तियां हैं। उनके विश के खिलाफ काम कर रही हैं। वो कह रही हैं कि आदिवासी मूलवासी को ऐसे एक्ट के जाल मेें फंसा दो कि वो उफ न बोल सके।.. उसको धमकी दो।.. उनको आघात पहुंचाओ। इस तरह का वातावरण तैयार किया जा रहा है। ताकि बाहरी आबादी आ जाये और ये लोग फिर अपना घर बार छोड कर पलायन कर जायेें।

आपने चारागाह की बात कही। इस साजिश के पीछे कौन लोग हो सकते हैं..?

अब हर दिन मोदी जी पुष्पक विमान से घूम रहे हैं और आज देश मोदी मोदीमय हो गया है। लोगों की आशा थी कि बहुत परिवर्तन होगा। पर झारखंड के लोग नहीं जानते थे कि मोदी सरकार और भाजपा की सरकार से इतनी बडी विपत्ति उन्हें घेर लेगी। भाजपा के चुनाव प्रचार में जो खर्च हुआ वह पैसा बीजेपी के पास कहां से आया था? एक तरह से पूरे बिजनेसमैन का वेंचर हुआ। गुजरात के जैसा मॉडल झारखंड के लिए जारी किया गया। इस योजना के साथ कि गुजरात में काफी इंडस्ट्रीज हैं। इसी तरह झारखंड में भी फायदा होगा। यही सोचकर लोगों ने पैसा लगाया! बीजेपी को अकूत संपत्ति दी। प्रचार प्रसार में मदद किया। अब बीजेपी की सरकार है तब वो अपना हिस्सा मांग रहे हैं। इंडस्ट्री लगाने का वातावरण तैयार करने का दबाव बना रहे हैं। इसके लिए यहां के आदिवासियों और मूलवासियों को सबसे ज्यादा फोकस किया गया क्योंकि ये कमजोर वर्ग हैं। तभी वो यहां की रत्नगर्भा का दोहन कर सकेंगे।.. और यहां के लोग ..यहां के लोग फिलर बनेंगे! कोई बफेट बनेगा! कोई मार्क जुकरबर्ग बनेगा! दुनिया को बतायेंगे कि हम धनी हैं। हम सबसे ज्यादा संपत्ति वाले हैं! कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को लेकर चलनेवाली सरकारें ऐसा सोच रहीं हैं! क्या हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने ऐसा सोचा होगा? सपना तो समाजवादी वातावरण बनाने की थी। यहां तो राइटिस्ट ब्रेन के लोग हो गये। अब यहां संपत्ति को बढा रहे हैं। इंडस्ट्री में कुछ लोगों को नौकरी लगती है। वो भी उसे जो कुशल श्रमिक होते हैं। हमारे देश में चार हजार या पांच हजार करोड का मकान एक व्यक्ति का है। हमारे देश की संस्कृति ये नहीं थी न ही ऐसे देश की कल्पना की गयी थी।

कई स्थानीय मुद्दों को लेकर दूसरे राज्यों में सामाजिक आंदोलन जोर पकड़ता दिख रहा है। क्या झारखंड के मुद्दों को लेकर भी ऐसे प्रयास हो रहे हैं?

आपको बताऊं कि एक जमाने में गुजरात में आदिवासी मुख्यमंत्री हुआ करते थे अमर सिंह चौधरी। अब तो वहां आदिवासियों की हालत बहुत खराब हो गयी है। वहां के आदिवासियों का जीना दुभर हो गया है। एक तरफ हमलोग झारखंड में प्रतिकार करने के लिए छटपटा रहे हैं, संघर्ष कर रहे हैं, और सरकार बता रही है कि विकास का दर यहां बढा है। यहां मोमेंटम झारखंड की बात कही जा रही है। 50 हजार करोड रूपये का निवेश आ रहा है। मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि निवेशक पांच लाख करोड रूपया देने वाले हैं।.. अरे भाई यहां के आदिवासी और मूलवासी का क्या होगा जिसने चारों तरफ की दुनिया देखी ही नहीं है? हम कहते हैं कि पहले यहां के लोगों को तैयार करो। जिस तरह से जापान और चीन और कोरिया में क्रांति हुई है। उस तरह से सोचें। आप यहां कुटीर उद्योग का जाल बिछा सकते हैं। इसके लिए स्किल्ड लेबर तैयार करें उसके बाद इंडस्ट्री बनाओ या कुछ और बनाओ। तब यहां के अनुकूल जो सरकार बनेगी वो खुद लोगों के विकास का खाका तैयार करेगी। लेकिन इस तरह की हठाथ, जबरदस्ती, जब तक दम है कर लें ..यहां की मूल आबादी आपको कभी स्वीकार नहीं करेगी। 

देखिये, जो भी सरकार आती है अपने कुछ गुर्गे रखती है। ये सरकार का प्रचार प्रसार करने के साथ साथ उसे डिफेंड भी करती है। लेकिन इससे हमारा कोई आंदोलन कमजोर नहीं हुआ है। अभी तो भाजपा के विधायक, नेताओं की हालत खराब है। वो किसी गांव में घुस नहीं रहे हैं। आप सिंहभूम, खूंटी, गुमला या किसी दूसरे जिले के किसी गांव में चले जाइये..! यहां रांची से 50 किलोमीटर दूर तोरपा में मुख्यमंत्री को काला झंडा दिखा दिया। सराइकेला में उन्हें कूदा दिया। इससे ज्यादा प्रतिकार क्या हो सकता है। ये जनता की भावनाएं हैं। ऐसा होगा ही। ऐसी घटनाएं और बढेंगी। सरकार कितने लोगों को जेल में बंद कर देगी। बताइये मुख्यमंत्री को खुले तौर पर कहना पडता है कि धारा 353 के तहत जेल भेजेंगे। जेल में तो खाना भी मिलेगा। लेकिन इस धमकी से सरकार नहीं चलेगी। रघुवर दास भी इसी हाड़ मांस का व्यक्ति हैै। उसको एक सरकारी तंत्र मिल गया है। कार्यपालिका मिल गयी है। पुलिस मिल गयी है। इसलिए वो धमकी दे रहा है। कल को हम उनको छत्तीसगढ की तरफ मुखातिब कर देंगे। 

पिछले साल आपको क्षेत्रीय जनजातीय विभागाध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पडा था? इसके पीछे क्या वजह रही थी?

मैं जो भी कर रहा हूं। मेरे साथ 50 हजार या लाख आदमी खडे हैं। मैं उनके एक्सप्रेशन को कैरी कर रहा हूं। जहां तक इस्तीफा देने की बात है।.. रघुवर सरकार को मेरा वहां रहना सूट नहीं कर रहा था। (ठहाका मारकर हंसते हैंे) इसी का अप्रत्यक्ष हमला मुझपर किया गया। उनको लगा कि क्षेत्रीय जनजातीय विभाग में अगर करमा उरांव रहेगा। तो हो सकता है कि वहां के लोग विद्रोही हो जायेेंगे। मैं यहां बताना चाहूंगा कि बंगला भाषा को लेकर छात्रों का मूलवासियों का एक्सप्रेशन, संघर्ष जब बांग्लादेश मेें हुआ, तब पाकिस्तान बंट गया। ये भाषाई आंदोलन था। झारखंड में जमीन का आंदोलन हो रहा है। लोग कटने मरने के लिए तैयार हैं। लोग जमीन के सिवा कुछ नहीं चाहते हैं। आप वहां इंडस्ट्री बनाना चाहते हैं। इंडस्ट्री किसका बनेगा इसको देखकर लोग सिहर गये हैं। वैसी अवस्था यहां आने नहीं दी जायेगी। सरकार चाहे कितने भी मामेंटम कर ले। यहां की आबादी उसकी मंशा को समझ गयी है। दुख यह है कि सरकार के पास और तीन साल हैं। तीन सालों में आप जितना बर्बाद करना चाहें कर लें..! तीन साल के बाद.. या उससे पहले भी.. रघुवर दास को झारखंड की मिट्टी से बाहर करना पड़ेगा।

मोमेन्टम झारखंड तो औद्योगिकरण और खुशहाली का प्रयास बताया जा रहा है। आखिर इसपर आप रघुवर दास से क्यों नाराज हैं?

रघुवर दास और उनके दो तीन मंत्री जान रहे हैं कि उनमें से कोई बिहार का है, कोई छत्तीसगढ़ का, तो कोई वैसी ‘शक्ति‘ के लोग हैं जिस ‘शक्ति‘ के विरोध में हमने झारखंड बनाया। मैं दावे से कहता हूं कि आज भी वैसा ही वातावरण हैं जो झारखंड बनने के पहले था। मेेरे घर को.. मेरे बारी को तो मैं ही सजाउंगा! मेरे गांव और शहर को भी मैं ही सजाउंगा। बाहर के लोग हमारे घर को सजा कर ठेकेदारी करने आये हैं क्या? मैं एकैडमिशियन हूं, तीस चालीस देशों का दौरा किया है। वहां की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक परिस्थिति को नजदीक से देखा है। शैक्षणिक परिस्थिति को देखा है। डेवलपमेंट के इनोवेटिव ट्रेंड्स को देखा है। ..पर हमारे यहां ब्युरोक्रैसी हावी है। मुख्यमंत्री कितने जानकार हैं? यहां के आईएएस, आईपीएस उन्हें जो पढ़ा रहे हैं, वो तोता जैसे सुन रहे हैं। मुख्यमंत्री इसी में उछल कूद भी रहे हैं। क्या विकास के नाम पर यहां के ब्युरोक्रैसी को बोलने का अधिकार पहले था क्या? जो राजनैतिक एक्सप्रेसंश हैं, विकास के एक्सप्रेसंश हैं वो राजनीतिक व्यक्ति ही बोलता था। पर अधिकारी प्रेस कांफ्रेंस कर रहे हैं। चीफ मिनिस्टर से ज्यादा बोल रहे हैं। यहां की ब्युरोक्रैसी दुलकी घोड़ी है! ..दुलकी घोड़ा होता है जिसपर सवार व्यक्ति को कब फेंकेगा यह पता नहीं। रघुवर दास की राजनीतिक परिस्थिति वही है। ये दुलकी घोड़ा में चढ़ा हुआ है। कब भाजपा सरकार को पटखनी दिलवायेंगे, ये कोई नहीं जानता..! ब्युरोक्रैसी के सबसे उच्च पदाधिकारी के काम देखिये। उसके सामने कोई मंत्री लगता है क्या? भाजपा के एक भी नेता वर्तमान भाजपा सरकार से खुश नहीं हैं। लेकिन चाबुक के बल से सभी मजबूर हैं। ये प्रजातंत्र में ज्यादा दिन चलता नहीं है। इंदिरा जी का नहीं चला इसका क्या चलेगा! हमलोग तो इसको (वर्तमान मुख्यमंत्री) फिरंगी मानते हैं, परदेशी मानते हैं। आदिवासियों का राजभवन से भी भरोसा उठ रहा है। उनके विधानसभा अभिभाषण से लोग निराश हैं। भयभीत भी हैं। पर हमलोग लड़ने के लिए तैयार हैं। छह मार्च को हमारी रैली है। संसद मार्च करेंगे। झारखंड आदिवासी संघर्ष मोर्चा और अन्य संगठन इस महीने 15 को रघुवर दास का राज्यभर में पुतला दहन होगा। 16 को राजभवन के समझ धरना देंगे। मुझे लगता है कि एक नया वातावरण बनेगा और हम अपना मकसद हासिल करेंगे।

शिक्षा व्यवस्था बदहाल है!

विभागों में शोध का जो माहौल होना चाहिए था वैसा दिखता नहीं है? इसकी क्या वजह है? क्या अब जिज्ञासु छात्र नहीं मिलते या रिसर्च को लेकर शैक्षणिक माहौल ही नहीं बन सका है?

देखिये, यहां छात्र डिग्री के लिए आते हैं। रिसर्च का मकसद समाज को बदलना होता है। दुनिया में नयी बात सामने लाने के लिए होता है ताकि समाज में बदलाव हो, समाज का कोई इनोवेटिव डेवलपमेंट हो। ..वह यहां नहीं हो रहा है। लेक्चरर बनने के लिए पीएचडी चाहिए, इसलिए विद्यार्थी आ रहे हैं। यह भी सच है क हम भी रिसर्च की क्वालिटी एन्श्योर नहीं कर पा रहे हैं।

ऐसी कौन सी वजह है..?

कारण है कि वैसा वातावरण तैयार नहीं हो पा रहा है। रिसर्च के लिए वातावरण जैसे - लैबरोरेट्री चाहिए, इनफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, अध्यापन में गुणवत्ता चाहिए, साथ ही लगन भी चाहिए। मैं इसकी कमी महसूस करता हूं। चूंकि रिसर्च सिर्फ विश्‍वविद्यालय के लिए नहीं होता है। रिसर्च एक इनोवेशनल फिनोमेनन  है। ये देश और दुनिया के पैमाने पर चलता है। लेकिन विकसित देशों में जो हो रहा है, हम उस पैमाने को स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। रिसर्च के जो ..मेथडोलॉजी हैं ..टेकनीक है, इन चीजों को हम अपने विश्‍वविद्यालयों में स्थापित करने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं। ये एक अलग परिस्थिति है। हम यहां साक्षरता चाहते हैं। हम नहीं चाहते हैं कि यहां के लोग शिक्षित हों। अब आप ही सोच सकते हैं कि सरकार रोज नये निर्णय ले रही है। यहां की स्कूली शिक्षा को देख लीजिये..। फेल पास करने की जो पद्धति थी उसे समाप्त कर दिया गया, 75 प्रतिशत हाजिरी चाहिए, उसे भी आपने खत्म कर दिया है। आप बच्चों को मैट्रिक में सीधे अपियर कर रहे हैं। ..आपने शिक्षकों को कह दिया कि अगर उनके स्कूल से फर्स्ट डिविजन से बच्चे पास नहीं करेंगे, तब शिक्षकों का इंक्रीमेंट रोक दिया जायेगा। तब क्या कोई शिक्षक कड़ाई से पेश आयेगा क्या? ऐसे में क्वालिटी एजुकेशन कैसे? थर्ड डिविजन में पास करने वाला फर्स्ट डिविजन में पास कर रहा है। इस शिक्षा व्यवस्था से आप दक्ष मानव की कल्पना नहीं कर सकते हैं। यही स्थिति आपके पूर्ववर्त्ती सरकारों ने की, वर्तमान सरकार भी इसी दिशा में काम कर रही है। इसलिए झारखंड में मानव संसाधन विकास का जो पैरामीटर होना चाहिए, किसी ने इसपर जोर नहीं दिया। आप आदिवासियों के आवासीय विद्यालय चले जाइये, टाना भगत आवासीय विद्यालय चले जाइये, वहां कुक को छोड़ कोई और कभी नहीं जाता.. । एक छात्र ने मुझे बताया था। वहां कोई शिक्षक नहीं रहते। कोई पर्यवेक्षण नहीं होता। जनप्रतिनिधि किसी मास्टर को यह कहने को तैयार नहीं है कि तुम क्लास नहीं लेते हो! क्योंकि वो जानता है कि ऐसा करने पर वोटिंग के समय उसके पक्ष में वोट नहीं जायेगा। ये जनप्रतिनिधि भी कमजोर हैं, प्रशासनिक अधिकारी भी कमजोर हैं। मैं आपको दावे के साथ कहता हूं कि जो पर्यवेक्षक हैं जो ब्लॉक स्तर पर उपस्थिति का निरीक्षण करते हैं, वो पैसे लेते हैं। ऐसी लचर व्यवस्था में दक्ष मानव संसाधन का निर्माण असंभव है। और जब तक इस क्षेत्र में दक्ष मानव नहीं होगा, तब तक यहां के अनुकूल विकास को ढाल पाना बहुत मुश्किल होगा। यह भी सच है कि यहां के लोग ही यहां का विकास कर सकते हैं, बाहर के लोग नहीं।

 

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