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BAU रैगिंग : प्रशासनिक व्यवस्था को कमजोर कर रहे कुछ अधिकारी!

- एक सप्ताह बीतने के बाद भी छात्रों में विश्‍वास नहीं जगा सका है विवि प्रशासन -
रांचीः पिछले दिनों बिरसा कृषि विश्‍वविद्यालय (बीएयु) हॉस्टल में छात्रों के साथ हुई रैगिंग की घटना विश्‍वविद्यालय प्रबंधन की लापरवाही और विश्‍वविद्यालय कानून की अनदेखी करने सहित कई सवाल खड़े कर रहा है। वहीं, दूसरी तरफ एक सप्ताह बीत चुका है, लेकिन, प्रबंधन पीड़ित छात्र गौतम को यह विश्‍वास नहीं दिला सका है कि कैंपस उसके लिए सुरक्षित है और वो यहां आ कर अपनी पढ़ाई शुरू कर सकता है। घटना के संबंध में बताते चलें कि 3 और 4 दिसंबर (2016) की रात के दरम्यान बीएयु के वानिकी संकाय के सीनियर छात्रों ने प्रथम वर्ष के छात्र गौतम और सात अन्य छात्रों की चार घंटे तक रैगिंग ली थी। इस दौरान उनके हाथ पैर बांधे गये, लात घूसों से पीटा गया, उनके कपड़े उतरवा कर रात एक बजे ठंढ़े पानी से नहलाया गया, उस्तरे से एक छात्र के सिर के बाल उतारे गये और उससे तीन चिट्ठियों में हस्ताक्षर करवाया गया। इस घटना के बाद पीड़ित छात्र गौतम को छोड़ बाकी लड़के रैगिंग होने की बात से पलट गये हैं। कहा जा रहा है कि प्रबंधन के दबाव में आकर वो कोई बयान नहीं देना चाहते। हालांकि चार दिसंबर को गौतम ने पुलिस को दिये अपने बयान में इन सात छात्रों के साथ रैगिंग होने की बात कही थी। गौतम के अभिभावक ने थाने में प्राथमिकी दर्ज करवायी गयी थी और विद्यालय प्रबंधन को कार्रवाई करने का आवेदन दिया गया था। जिसके बाद आरोपी तीन छात्रों को निष्काषित भी किया गया।
बहरहाल, पहले बात झारखंड कृषि अधिनियम 2000 की करते हैं जिसके तहत बीएयु के क्रियाकलापों का संचालन किया जाता है। इस अधिनियम की धारा 19 में स्पष्ट जिक्र है कि विश्‍वविद्यालय के प्रशासनिक अधिकारी मसलन रजिस्ट्रार, परीक्षा नियंत्रक, डीन और सभी डायरेक्टर्स को युनिवर्सिटी कैंपस में बने क्वार्टर में रहना है। इन अधिकारियों के युविवर्सिटी कैंपस में रहने के पीछे यह तर्क है कि परिसर के अंदर घटित होने वाली हर गतिविधि पर उनकी नजर होगी, और उन्हें किसी घटना की सूचना तुरंत मिल जायेगी। इसके एवज में उन्हें कुछ सुविधाएं उपलब्ध कराने के प्रावधान भी हैं। लेकिन, इस नियम को नजरअंदाज कर बीच का रास्ता निकालते हुए अधिकांश अधिकारी युनिवर्सिटी कैंपस से बाहर किराये के मकानों या फ्लैट में रहते हैं। अधिकारियों की इसी अनुपस्थिति का फायदा उठाकर कैंपस में अपनी पैठ जमा चुके (ग्रेजुएशन करने के बाद पीजी की पढ़ाई कर रहे छात्र) कुछ पुराने छात्र अपनी मनमानी करते जरा नहीं हिचकते। यहां बताते चलें कि ये सभी छात्र रांची से बाहर दूसरे जिलों के होते हैं जिन्हें अभिभावकों का डर नहीं होता। बीएयु से निष्काषित किये गये तीनों छात्र भी दूसरे जिलों के हैं। विश्‍वविद्यालय सूत्र बताते हैं कि कॉलेज हॉस्टल में बाहर से आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त रहने वाले युवकों को बुला कर हॉस्टल के कमरों में शराब और मांस का सेवन करना यहां आम बात मानी जाती है। तभी तो 4 दिसंबर को रैगिंग के पीड़ित छात्र गौतम की निशानदेही पर जांच के दौरान पुलिस ने हॉस्टल के एक कमरे में शराब की भरी बोतलें मिली थीं। एक विश्‍वविद्यालय सूत्र कहते हैं, ‘ऐसा नहीं है कि यहां (बीएयु) रैगिंग की घटनाएं नहीं होतीं। हर साल होती हैं, पर मामले प्रकाश में नहीं लाये जाते। पिछले साल वेटरनरी संकाय के एक छात्र के आत्महत्या करने की खबर सामने आयी थी लेकिन वो आत्महत्या नहीं था! उस छात्र के साथ भी रैगिंग हुई थी। पर मामले को दबा दिया गया।‘ इस कथन की पुष्टि इस तथ्य से भी की जा सकती है कि तीन और चार दिसंबर (2016) की रात के दरम्यान वानिकी संकाय के प्रथम वर्ष के छात्र गौतम कुमार से सीनियर छात्रों ने तीन अलग अलग कागज पर लिखे वक्तव्य पर उससे हस्ताक्षर करवाये और अंगूठे का निशान भी लगवाया। हद तो यह थी कि एक चिट्ठी में यह लिखा गया था कि पीड़ित छात्र गौतम डिप्रेशन में है और अगर वह आत्महत्या कर लेता है तब इसके लिए वह खुद जिम्मेवार होगा!
प्रशासनिक स्तर पर देखें तब विश्‍वविद्यालय प्रशासन की कार्रवाई करने के तरीके से यह शक होता है कि वो भी आरोपी छात्रों की मदद करने की हर कोशिश करता है। नहीं तो क्या वजह थी कि वानिकी संकाय के गौतम सहित सात दूसरे छात्रों के साथ हुई रैगिंग की घटना को रफा दफा करने का हर प्रयास किया गया? हालांकि छात्रों के विरोध और मीडिया के मौके पर पहुंचने के कारण इस मामले में कुलपति को आरोपी तीन सीनियर छात्रों के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी। रैगिंग की घटना को रफा दफा करने का संदेह इसलिए भी होता है कि चार दिसंबर को दोपहर करीब 12 बजे न्यूज विंग का यह संवाददाता बीएयु कैंपस में मौजूद था और कार्रवाई की मांग पर अड़े छात्रों को विभाग के डीन महादेव महतो कह रहे थे कि रविवार छुट्टी का दिन है इसलिए वो सोमवार को एक्शन लेंगे! पीड़ित छात्र के अभिभावक भाई से भी यही बात कही गयी। दरअसल, उस दिन विभाग के डीन अकेले इस मामले में कोई निर्णय नहीं लेना चाहते थे क्योंकि उनको ऐसे मामलों में निर्णय लेने का ‘अनुभव‘ ही नहीं रहा है। बात हाथ से निकलता देख डीन ने अन्य अधिकारियों को फोन पर सूचना दी। तब जाकर आधे और पौन घंटे के अंतर में विश्‍वविद्यालय के निदेशक (छात्र कल्याण) एन.के. राय और वार्डन डॉ एम.एस मल्लिक भी मौके पर पहुंच गये।
आगे बढ़ने से पहले निदेशक (छात्र कल्याण) श्री राय के काम करने के तरीके को समझते हैं। श्री राय के बारे में कहा जाता है कि वो उसे ही किसी संकाय का डिपुटी वार्डन बनाना पसंद करते हैं जो उनके इशारों पर काम करता रहे। वानिकी संकाय में अभी बसंत उरांव डिपुटी वार्डन का काम देख रहे हैं। श्री उरांव के बारे में संकाय के ही कुछ सूत्र बताते हैं कि वो कभी कक्षाएं नहीं लेते। बल्कि छात्रों पर दबाव बनवाकर यह कहने को प्रेरित करते हैं कि उन्हें किसी सब्जेक्ट का इंचार्ज बना दिया जाये। दबी जुबान में इन अधिकारियों पर कुछ चुनिंदा छात्रों को सह देने के भी आरोप लगाये जाते रहे हैं। अब रैगिंग की घटना के बाद विश्‍वविद्यालय के अंदर यह चर्चा हो रही है कि डिपुटी वार्डन और वार्डन को मोबाइल रिचार्ज के मद में प्रति महीने पांच सौ रूपये दिये जाते हैं। तब कौन सी वजह थी कि उन्हें छात्रों के साथ रैगिंग की जानकारी 10 घंटे बाद मिली?
चलिये समझते हैं कि बीएयु के कुछ संकायों का प्रशासन किस तरह संचालित किया जाता है। विश्‍वविद्यालय नियम के अनुसार निदेशक (छात्र कल्याण), संबंधित संकाय के वार्डन और डिपुटी वार्डन को लगातार हॉस्टल का निरीक्षण करना होता है। लेकिन, ऐसा सालों से नहीं हो रहा। वार्डन और डिपुटी वार्डन कभी हॉस्टल के अपने चैंबर में बैठते नहीं। वहीं निदेशक (छात्र कल्याण) किसी घटना के बाद या नये छात्रों की काउंसलिंग करना जरूरी नहीं समझते। जबकि यह उनके लिए जरूरी माना जाता है। विश्‍वविद्यालय की ओर से हॉस्टल मेंटनेंस और छात्रों के कौशल विकास के लिए फंड की व्यवस्था की गयी है, लेकिन विश्‍वविद्यालय सूत्र बताते हैं कि इन पैसों का उपयोग छात्र हित में किया ही नहीं जाता। बीएयु के चारों संकायों में प्राध्यापकों की संख्या की बात करें तब इसमें करीब 60 फीसद पद रिक्त हैं। चारों संकायों में प्राध्यापकों के 147 पद हैं जिसमें करीब 42 प्राध्यापक यहां अपनी सेवा दे रहे हैं। बाकी शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए पूर्व छात्रों को गेस्ट फैकल्टी के रूप में बुलाया जाता है। फिलहाल विश्‍वविद्यालय में पढ़ने वाले नये छात्र रैगिंग की घटना के बाद भयभीत हैं और उन्हें उम्मीद है कि भविष्य में ऐसी घटना न हो इसके लिए विश्‍वविद्यालय प्रबंधन हॉस्टल संचालन के नियमों में सुधार जरूर करेगा।
(रिपोर्ट - रणजीत, वरीय संवाददाता, न्यूज विंग.)

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