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देवबंद: अपनी पुस्तक 'दि सैटेनिक वर्सेज' विवादित भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक सलमान रूश्दी के साहित्य पर शोध के लिए यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) ने पोस्ट डॉक्टोरल फेलोशिप को मंजूरी दी है। यह बात संज्ञान में आते ही दारूल उलूम देवबंद की त्यौरियां चढ गई। उसने इसका पुरजोर विरोध शुरू कर दिया है। देवबंद ने इसे तत्काल रद्द करने और इस तरह की अनुचित प्रक्रिया में सुधार करने की मांग कर डाली है। दारूल उलूम देवबन्द का कहना है कि विवादित लेखक सलमान रूश्दी पर शोध को मंजूरी देना अल्पसंख्यकों की भावनाओं से खुला खिलवाड है जिसका विरोध दारूल उलूम करता है। दारूल उलूम देवबंद के प्रवक्ता अशरफ उस्मानी ने कहा, इस तरह के फैसले से मुसलमानों को ठेस पहुंचेगी।
सलमान रूश्दी की किताब हमेशा के लिए है और हम हमेशा ही इसका विरोध करेंगे। जिस लेखक की किताब पर पाबंदी है उसके लेखन पर शोध परियोजना को मंजूरी देना यूजीसी जैसी संस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाता है।
देवबंद के अलावा कई और संगठनों ने भी यूजीसी द्वारा इस शोध परियोजना को मंजूरी देने के फैसले पर नाराजगी जताई है और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और मेरठ विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अर्थात् यूजीसी ने हाल ही में मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में डॉ प्रभा परमार को पोस्ट डॉक्टोरल फेलोशिप के तहत विवादित उपन्यास दि सैटेनिक वर्सेज के लेखक सलमान रूश्दी पर शोध करने को मंजूरी दे दी है। इसके तहत अमिताभ घोष, विRम सेठ और सलमान रूश्दी की कहानियों में जादुई यथार्थ के भाव पर शोध किया जाना है।
गौरतलब है कि 1988 के अन्त में सलमान रूश्दी लिखित उपन्यास द सेटेनिक वर्सेस ने दुनिया भर मुस्लिम-समुदाय में कोहराम मचा दिया था। दुनिया के मुस्लिम बहुल देशों में इस उपन्यास का भारी विरोध हुआ था और इस उपन्यास की प्रतियां जलाई गई थीं। उस समय दि सैटेनिक वर्सेज को भारत, बांग्लादेश, सूडान, दक्षिणी अफ्रीका, श्रीलंका, केन्या, थाईलैंन्ड, तन्जानिया, वेनेजुएला, पाकिस्तान, इंडोनेशिया तथा सिंगापुर जैसे देशों में प्रतिबंधित कर दिया गया था। इसके अलावा ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च आध्यात्मिक नेता अयातुल्ला खुमैनी ने 14 फरवरी 1989 को सलमान रूश्दी के विरूद्ध तौहीने इस्लाम किए जाने के आरोप में मौत का फतवा जारी किया था।
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