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लगान पर लगाम

रांचीः राज्य के हर नागरिक के मन में एक सवाल हमेशा कचोटता रहा है कि आखिर कम खत्म होगा भ्रष्टाचार! पेंशन लेने, राशन कार्ड बनवाने, लाइसेंस जारी करवाने, नक्शा स्वीकृत करवाने और यहां तक कि सरकारी टैक्स, जैसे लगान चुकाने में भी आम नागरिक को भ्रष्टाचार से दो चार होना ही पड़ता है। जाहिर है इस व्यवस्था के आक्रोश का पहला निशाना सरकार और अधिकारी बनते हैं। पर यह भी एक सच है कि भ्रष्टाचार के रास्तों को बंद करने के प्रयास शुरू होते ही भ्रष्टाचार के पोषक दीमक की तरह इसे नष्ट करने की हर कोशिश मे लग जाते हैं। इन दिनों ऐसा ही हो रहा है राजस्व, निबंधन और भूमि सुधार विभाग में। विभाग के शीर्ष स्तर के अधिकारी चाहते हैं कि आम नागरिकों को भारी भरकम और जटिल प्रक्रिया से छुटकारा मिले। इसी प्रयास की कड़ी में लगान की राशि को नागरिक के अधिकार का दर्जा दिया गया है। यानी अब किसी जमीन का मालिक लगान की राशि इंटरनेट बैंकिंग के जरिये खुद से चुका सकता है। इसके लिए उसे कर्मचारियों के आगे पीछे घूमने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मगर ऐसे सकारात्मक प्रयास को विफल करने में ऐसा गुट भी सक्रिय है जो समस्याएं उत्पन्न कर रहा है। दरअसल, डिजिटल इंडिया लैंड रिकार्ड मॉर्डनाइजेशन प्रोग्राम के तहत ऑनलाइन म्युटेशन और ऑनलाइन लगान की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही अप्रत्यक्ष रूप से इसे निष्क्रिय करने के प्रयास शुरू हो गये थे। ट्रेनिंग देने के बाद भी निचले स्तर के कर्मचारी द्वारा आवेदक के नाम, उपनाम, खाता संख्या, पिता का नाम, खतियान, प्लॉट संख्या इत्यादि की गलत ऑनलाइन इंट्री करके डाटा में त्रुटियां कर देना और इसकी शिकायत करने पर समाधान नहीं करने जैसे कई असफल प्रयास कर जनता के मन में यह शक पैदा करने की कोशिश की गयी कि इस सिस्टम से काम ठीक ठाक नहीं हो रहा। इसलिए इसका विरोध करें। दूसरी तरफ भू अर्जन, भू अभिलेख एवं परिमाप निदेशालय के निदेशक राजीव रंजन जैसे कुछ पदाधिकारी भी हैं जो इस जिद पर अड़े हैं कि कुछ भी हो जटिल प्रक्रिया को जनता के लिए सरल और पारदर्शी बनाया जायेगा, साथ ही नागरिकों को उनके अधिकार उनके हवाले कर भ्रष्टाचार के स्रोत भी बंद होंगे।

यहां बताते चलें कि राज्य में ऑनलाइन प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही दो हजार से ज्यादा राजस्व कर्मचारियों को अतिरिक्त काम के बोझ से मुक्त कर दिया गया है जिससे अब वे भूमि अधिग्रहण और भूमि हस्तांतरण जैसे महत्वपूर्ण कामों में ज्यादा समय दे पा रहे हैं। पर एक कड़वा सच यह भी है कि राजस्व कर्मचारी से लेकर रेवेन्यु एडमिनिस्ट्रेशन के शीर्ष स्तर तक के कई अधिकारी जनता की मदद करने में कोई पहल नहीं कर रहे हैं जबकि ये काम उन्हें ही करना है। सवाल अब आम नागरिक के सामने ही है कि क्या जनता को अपने अधिकार जानने और उसका इस्तेमाल करने की पहल नहीं करनी चाहिए? कुछ ऐसे ही सवालों का उत्तर तलाशती न्यूज विंग के वरीय संवाददाता रणजीत की रिपोर्ट:-

‘कुछ समस्याएं आर्टिफिशियल हैं..’

पिछले कुछ महीनों से राज्यभर में रैयतों को जमीन से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कुछ अंचलों में ऑनलाइन लगान भुगतान पर अस्थायी रोक लगायी गयी है, जहां अवैध जमाबंदी, जीएम लैंड के मामले पाये गये हैं। इसके अलावा वैसे अंचलों में भी यह रोक प्रभावी है जहां के खतियान नहीं मिल रहे हैं। अधिकारी बताते हैं कि खतियान नहीं मिलने से यह पता नहीं चल पाता है कि संबंधित जमीन आदिवासी जमीन है या गैर आदिवासी। वहीं खतियान मिसिंग होने से इसमें हेर फेर कर दूसरे आवेदक के नाम से म्युटेशन की संभावना बनी रहती है। हालांकि इन परेशानियों का एक कारण यह भी बताया जा रहा है कि चूंकि कम से कम 2,000 राजस्व कर्मियों को राजस्व वसूली, राजस्व संग्रहण के कार्य से मुक्त कर दिया गया है जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप ये समस्याएं सामने आ रही हैं। विभागीय सूत्रों के अनुसार राजस्व से जुड़े विभाग में ऑनलाइन सेवा शुरू किये जाने के बाद राजस्व कर्मचारियों में बहुत रोष है। क्योंकि कर्मचारियों की बड़ी कमाई का जरिया उनसे छिन गया है। ऑनलाइन लगान जमा करने में आ रही परेशानियों, ऑनलाइन म्युटेशन के दौरान हो रही त्रुटियों, कुछ हल्कों में ऑनलाइन लगान भुगतान जमा पर रोक जैसी कई समस्याओं के संबंध में न्यूज विंग ने बातचीत की भू अर्जन, भू अभिलेख एवं परिमाप निदेशालय के निदेशक राजीव रंजन से। पढ़िये विस्तृत बातचीत:

क्या है लैंड रिकॉर्ड माडर्नाइजेशन प्रोग्राम?

डिजिटल इंडिया लैंड रिकार्ड माडर्नाइजेशन प्रोग्राम यानी राष्ट्रीय भू अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम जमीन से संबंधित विस्तृत जानकारी का कार्यक्रम है। यह एक बड़ी परियोजना है जिसमें सात से आठ परियोजनाओं को जोड़ा गया है। इस योजना के तहत लैंड रिकार्ड्स का डिजिटाइजेशन, आधुनिक रिकार्ड रूम का निर्माण, रजिस्ट्रेशन और रेवेन्यु विभाग के बीच समन्वय स्थापित करना, अंचल कार्यालयों में कनेक्टिविटी स्थापित करना, राजस्व कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण और कैपेसिटी बिल्डिंग की व्यवस्था करने के अलावा सबसे महत्वपूर्ण राज्यभर में ऑनलाइन लगान भुगतान की सुविधा शुरू करना है।

आपने जैसा बताया यह एक बड़ी परियोजना है। हमारे राज्य में अब तक कौन कौन से काम पूरे कर लिये गये हैं इस संबंध में कुछ बताना चाहेंगे?

मैं आपको इस योजना के पहले कंपोनेंट के बारे में बताऊं कि आज की तारीख में 24 जिलों के 191 अंचल पूरी तरह से डिजिटाइज्ड हैं। यानी इन अंचलों का आंकड़ा ऑनलाइन उपलब्ध है। रांची में शत प्रतिशत काम पूरा हो गया है। आगे हमारा लक्ष्य है कि राज्य स्थापना दिवस यानी 15 नवंबर से पहले झारखंड के सभी अंचल डिजिटाइज की श्रेणी में आ जायें। इस दिशा में हम बहुत आगे बढ़ चुके हैं। 264 अंचल में से 260 अंचल डिजिटाइज्ड बनने की ओर हैं। इस प्रोग्राम के दूसरा कंपोनेंट में मार्डन रिकार्ड रूम बनाये जाने हैं। हैदराबाद की कंपनी पहले फेज में 38 लोकेशन पर डिजिटाइजेशन का काम करवा रही है। मार्च 2017 तक कई रिकार्ड्स रूम बनकर तैयार हो जायेंगे। देखिये, यह परियोजना इसलिए भी जरूरी है कि रेकार्ड रूम में रेवेन्यु के सभी पुराने रिकार्ड रखे गये हैं। विवादित लैंड रिकार्ड का पता लगाने के लिए मॉर्डन रिकार्ड रूम काफी मददगार साबित होगा। क्योंकि एक कोडवर्ड से कितने भी पुराने दस्तावेज को ढूंढा जा सकेगा। परियोजना के तीसरे कंपोनेंट में इंटीग्रेशन (एकीकरण) का कॉनसेप्ट (अवधारणा) है। सालों पहले जमीन की खरीद बिक्री के बाद जब रजिस्ट्री ऑफिस में प्रापर्टी का ट्रांसफर होता था उसे रेवेन्यु डिपार्टमेंट में म्युटेट किया जाता है। प्रक्रिया पूरी होने के बाद खरीददार के नाम से जमाबंदी की जाती थी। इस योजना में अब हम लोगों ने इन दो डिपार्टमेंट के बीच इंटर लिंकेज स्थापित कर दिया है। अगर आज किसी प्रॉपर्टी का रजिस्ट्रेशन होता है, इससे संबंधित डाटा ऑटोमेटिक रेवेन्यु ऑफिस में शिफ्ट हो जायेगा। रेवेन्यु ऑफिस में एक बटन क्लिक करने पर जमीन मालिक के नाम से नोटिस जेनरेट होगा। यानी अब म्युटेशन की प्रक्रिया शुरू हो गयी। पहले होता यह था कि किसी ने एक प्रॉपर्टी खरीदी। उसने बाउंड्री करवायी और मकान बनाकर वहां रहने लगा। या फिर किसी ने प्रॉपर्टी खरीदी। बाउंड्री करवाकर वहां खेती करने लगा। यानी हमारे यहां दो ही किस्म की जमीनें हैं। एक आवासीय प्रकृति की है और दूसरी एग्रिकल्चर नेचर की। उस समय लोगों को दाखिल खारिज या फिर म्युटेशन कराने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। हां, उस स्थिति में म्युटेशन की जरूरत होती थी जब जमीन को बेचना हो, या फिर भाइयों के बीच में आपस में झगड़ा हो। अभी की बात मैं बताऊं कि हमने इन दोनों डिपार्टमेंट के बीच जो इंटीग्रेशन करवाया है वह काफी इंपॉर्टेंट है। अब किसी भी प्रापर्टी का रजिस्ट्रेशन होते ही इससे संबंधित सभी डाटा इंटरनेट के माध्यम से रेवेन्यु ऑफिस में आ जाता है। आवेदक को म्युटेशन के लिए अलग से आवेदन देने की आवश्यकता नहीं होती और अंचल कार्यालय तीन दिनों के अंदर नोटिस जारी कर म्युटेशन की शुरूआत कर देता है। 

चलिये, चौथे कंपोनेंट की बात करते हैं.. कनेक्टिविटी बिटविन द रेवेन्यु ऑफिसेज की। यह ऐसे स्थानों के लिए है जहां कनेक्टिविटी की समस्या है। वास्तव में झारखंड में कई जगहों पर कनेक्टिविटी की समस्या है। ऐसी स्थिति में हम लोगों ने वी-सेट के माध्यम से कनेक्टिविटी स्थापित करने का प्रयास किया है। इस परियोजना में सबसे इंपोर्टेंट पार्ट है ट्रेनिंग का। आप यकीन नहीं करेंगे, इसके लिए हमलोगों को कितने हर्डल्स (रूकावटें) पार करनी पड़ी हैं। रांची में श्रीकृष्ण लोक सेवा संस्थान है। स्कीपा को हमलोगों ने एनआरएलपी सेल के रूप में गठित किया था। यहां ट्रेनिंग देने की भी व्यवस्था है। मेरे आने से पहले राजस्व से जुड़े किसी अधिकारी या कर्मचारी को ट्रेनिंग दी ही नहीं गयी थी। ट्रेनिंग हो भी रहा था तो टुकड़ों में, जैसे एकाएक प्लान बनता था कि चतरा के सर्किल ऑफिसर (सीओ) को ट्रेनिंग देनी है क्योंकि वहां ऑनलाइन म्युटेशन शुरू होगा! ....साहेबगंज में ऑनलाइन म्युटेशन शुरू होने वाला है इसलिए वहां एक को ट्रेनिंग देनी है...। टेलीफोन से वार्ता होती थी ..... अच्छा हो गया (ट्रेनिंग)! ...क्यों नहीं शुरू कर रहे हैं ऑनलाइन म्युटेशन!.. पता चलता था ट्रेनिंग मिली ही नहीं..? ऐसा लगने लगा कि सिचुएशन (परिस्थितियां) बड़ा अजीब सा है! फिर हमने पता किया कि ट्रेनिंग होती कहां है? कितने दिनों की ट्रेनिंग है? ..पता चला एक सप्ताह की ट्रेनिंग होनी है। ..पर सीओ एक सप्ताह सभी काम छोड़कर ट्रेनिंग कैसे कर सकते हैं? समाधान निकालने के लिए मैंने दो बार बैठक बुलायी। एक सप्ताह की ट्रेनिंग को क्रंच करके दो दिनों का ट्रेनिंग शिड्युल बनवाया। टू डेज रेजिडेंसियल ट्रेनिंग की शुरूआत करवायी। इसी साल अप्रैल के फर्स्ट वीक से जून के एंड तक राज्य के सभी रेवेन्यु स्टॉफ के अलावा अफसरों की ट्रेनिंग पूरी करवा ली गयी है। आज के डेट में कोई सीओ,.. सर्किल इंस्पेक्टर (सीआई), ..कोई हल्का कर्मचारी, ... कोई कम्प्युटर ऑपरेटर ये नहीं कह सकता है कि उसे ट्रेनिंग नहीं दी गयी है। अब तक मैंने सभी की ट्रेनिंग पूरी करवा दी है। अब जानकारी नहीं होने जैसी कोई बात नहीं। ट्रेनिंग में उनको जानकारी दी गयी है कि ऑनलाइन म्युटेशन कैसे होगा? छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट (सीएनटी) और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट (एसपीटी) को कैसे लागू करवायें, वगैरह वगैरह। 

हमारे राज्य के सभी ऑनलाइन अंचलों में ऑनलाइन म्युटेशन लागू हो गया है। अब आवेदक दाखिल खारिज के लिए ऑनलाइन एप्लिकेशन जमा कर रहे हैं और उसका निपटारा भी ऑनलाइन तरीके से हो रहा है।

ऑनलाइन लगान नागरिक अधिकार के रूप में बड़ा लैंड रिफॉर्म

इस परियोजना में एक फ्रंट ऐसा भी है जहां मैं गर्वनमेंट ऑफ इंडिया से बात करता हूं। आज तक किसी भी स्टेट में लगान की राशि को सिटिजन के अधिकार के रूप में मान्यता नहीं मिली है। इसे सिटिजन का राइट नहीं बनाया गया है। ... ये बिजली का बिल नहीं है। इसे किसी भी तरीके के गवर्नमेंट बिल से हटकर देखना चाहिए। अंग्रेजों के जमाने से लेकर आज तक कभी भी लगान सिटिजन का राइट नहीं बन सका। आजादी के लगभग सात दशक बाद भी इसे नागरिक अधिकार के रूप में घोषित नहीं किया गया। इस चीज को हमारे स्टेट ने नहीं समझा ...! पहले गर्वनमेंट ऑफ इंडिया ने समझा ...। ...यही वजह है कि ये एक बहुत बड़े लैंड रिफार्म के रूप में सामने आया है। मैं कहना चाहूंगा कि आज की तारीख में ये सिटिजन का राइट है .... इसलिए क्रांति है। ... इसलिए क्रांति नहीं है कि भ्रष्टाचार खत्म हो गया। अब हमारे सिटिजन को ऐसा अधिकार मिल गया है जिससे वो भ्रष्ट कर्मचारियों को ठेंगा दिखा सकते हैं।

ऑनलाइन सुविधायें शुरू होने के बाद अब किसी जमीन का मालिक ऑनलाइन लगान का भुगतान कर सकता है। जमीन खरीद बिक्री के बाद म्युटेशन की प्रक्रिया बिना आवेदन दिये शुरू कर दी जा रही है। पर लोग नोटिस नहीं मिलने की शिकायत कर रहे हैं?

देखिये, आज की तारीख में हम लोगों ने 845 से ज्यादा लोगों को ट्रेनिंग दे दी है। हमेशा से यही शिकायत मिलती थी कि ट्रेनिंग नहीं दी गयी। ..लेकिन, अब कोई सीओ यह शिकायत नहीं कर सकता है। अगर बोले तब..!  ये उसकी जिम्मेदारी है कि काम कैसे पूरा करना है। क्या बताऊं मेरे पास इतने सारे प्लान्स थे.. कि.. मैं एक एक नागरिक तक पहुंच कर जानकारी दे देता.. लेकिन ..! कुछ दिन पहले जब मैंने चैम्बर ऑफ कामर्स कार्यालय में लोगों से मिला था उन्हें मैंने बताया कि ऐज ए बिजनेसमैन, बिल्डर और सेंसेटिव सिटिजन आपके पास ये अधिकार हैं आप जाइये और अंचल से कहिये कि जमीन का रजिस्ट्रेशन हो जाने के बाद भी नोटिस जारी क्यों नहीं कर रहे हैं? सोचिये कि हम लोगों ने मैक्सिमम तीन दिनों के अंदर नोटिस जारी करने का बाइंडिंग आर्डर करवाया है।

झारखंड में ऑनलाइन लगान भुगतान की शुरूआत की गयी है? पर लोगों के साथ इसमें कई तरह की समस्या भी है। कुछ लोगों के डाटा में पिछले 10 साल से बकाया राशि दिखायी जा रही है। कुछ इलाकों में ऑनलाइन भुगतान में रोक लगायी गयी है। इन समस्याओं के समाधान के लिए कुछ किया जा रहा है?

सबसे पहले मैं बताना चाहूंगा कि पहले लगान एक ऐसी चीज थी जिसे रैयत चुकाते थे। एक निश्‍चित राशि चुकाने के बाद आवेदक को लगान रसीद मिलती थी। यह एक प्रक्रिया थी। लेकिन, अब हमलोगों ने इस प्रोसेस को ऑनलाइन कर दिया। जमीन का मालिक या रैयत इंटरनेट बैंकिंग के माध्यम से अपना लगान चुका रहे हैं। भुगतान करने के लिए आवेदक मोबाइल एप्लिकेशन, प्रज्ञा केंद्र, इंटरनेट कैफे या फिर दूसरे माध्यम का इस्तेमाल कर सकते हैं। पहले यह प्रक्रिया जटिल थी। सरस्वती प्रेस कोलकाता से लगान का मैनुअल रसीद छपकर आता था। इसके बाद वोल्युम्स पहुंचते थे हेडक्वार्टर में। हेडक्वार्टर से ट्रकों में भरकर रसीद सभी जिलों में भेजी जाती थी। जिलों से सभी अंचलों में और अंचल अपने अपने हल्का कर्मचारी को वोल्युम संख्या और क्रम संख्या के अनुसार ये रसीद सौंप देते थे। इसके बाद कर्मचारियों को घूम घूमकर वार्षिक लगान काटना होता था। पर वो बैठ कर काट रहे थे.! अब जिन अंचलों में पंजी टू डिजिटाइज हो चुकी है। डिजिटाइजेशन कंप्लीट हो चुका है। वहां डाटा ऑनलाइन उपलब्ध है। हम उन जगहों पर ऑनलाइन लगान भुगतान शुरू कर चुके हैं। पहले लगान की कितनी राशि बाकी है ये पंजी टू की मदद से संबंधित कर्मचारी ही देख पाता था। अब वो ऑनलाइन हो चुका है। ये हमारे कम्प्यूटर को पता है। सिस्टम कैल्कुलेट करके बता देगा कि संबंधित खाता धाकर को कितना लगान चुकाना होगा। कहीं से भी आप इसे वेबसाइट पर देख सकते हैं। इसी साफ्टवेयर में एक पेमेंट गेटवे ऐड किया गया है। जहां से भुगतान किया जा सकता है। 

हालांकि मेरे कई प्लान्स थे जो पूरे नहीं हो सके। फिर भी हमने वेबसाइट के डिजाइन को यूजर फ्रैंडली बनवाया है। हमारी कोशिश ये थी कि कोई भी व्यक्ति अपने कम्युटर पर केवल झारभूमि टाइप करे और सीधे इस वेब पते पर पहुंच जाये। फिलहाल ये नहीं हो सका। एक बात बताना चाहूंगा कि बैंक डेबिट और क्रेडिट कार्ड से भुगतान का ऑप्शन नहीं है क्योंकि सभी विभागों ने सम्मिलित रूप से निर्णय लिया है कि सरकारी सेवाओं के बदले भुगतान के लिए डेबिट और केडिट कार्ड का ऑप्शन नहीं रखा जायेगा। यानी वित्त विभाग सभी विभागों के साथ कॉर्डिनेट करके एक ऐसा पेमेंट गेटवे बनाना चाह रहा है, जो पूरी तरह से इंटरनेट बैंकिंग के साथ जुड़ा हो। ये ज्यादा सेफ होता है।

दूसरी बात की पहले एक एक हल्का कर्मचारी 74 गांवों को देख रहा था। अब स्थिति ये है कि हमारे राज्य में प्रज्ञा केंद्र की संख्या हजारों में हो गयी है। साइबर कैफे की संख्या भी हजारों में है। हमारे पास भुगतान के ये माध्यम हैं। इनके केंद्रों में इंटरनेट की सुविधा पहले से है। अब लोग एंडरायड फोन भी रखते हैं साथ ही इंटरनेट कनेक्शन का विस्तार बढ़ा है। जैसे ही लगान का सिस्टम ऑनलाइन हुआ। हमारे सिटिजन जिनमें अधिकांश किसान हैं, कोई अशिक्षित है, अब खुद लगान का भुगतान कर रहेे हैं।

अब आपके सवाल पर आता हूं कि लोगों को समस्याएं हो रही हैं। मैं आपको बताऊं  किहमारे इस सिस्टम के शुरू होने से यहां सीओ से लेकर नीचे तक के सभी राजस्व कर्मचारियों के लिए यह बहुत बड़ी समस्या बन गयी है..! सच कहूं..तो कई लोग मुझे बहुत अलग तरीके से देखते होंगे..! मैं यह मानता हूं कि इस पूरे सिस्टम में पहली चुनौती ये है कि जो डाटाबेस है उसमें कुछ आंशिक त्रुटियां हैं। जैसे.. नाम की आंशिक त्रुटियां हैं। प्लॉट संख्या, खाता संख्या की त्रुटियां भी हैं। मुझे ऐसी भी शिकायतें मिल रही हैं कि लगान भुगतान करने के बाद भी दो, चार, दस साल का लगान बकाया दिख रहा है..!

कर्मचारियों और अधिकारियों को ऐसी समस्याओं के समाधान भी बताये गये होंगे?

देखिये, हमारे राज्य के 15 जिलों के 110 अंचलों में ऑनलाइन लगान लागू हो चुका है। हमलोगों ने कुछ जगहों पर रोक लगायी है।.. ऐसी जगहों पर जहां अवैध जमाबंदी है, ..जहां जीएम लैंड है इन अंचलों के ऑनलाइन पेमेंट को अस्थायी रूप से ब्लॉक किया गया है। यहां कहना चाहूंगा कि जब मैं ऑनलाइन लगान सिस्टम लागू करवा रहा था, कुछ एडिशनल कलेक्टर (एसी) और सीओ ने मुझसे कहा कि उन्हें ट्रेनिंग नहीं दी गयी है। मैंने उन्हें बताया कि वास्तव में इसमें ट्रेनिंग की कोई आवश्यकता है ही नहीं। हम ये चाहते ही नहीं हैं कि ऑनलाइन पेमेंट के संबंध में हमारे राजस्व कर्मचारी को किसी तरह की ट्रेनिंग दी जाये। ऑनलाइन लगान की जानकारी हमें नागरिकों को देनी है। राजस्व कर्मचारियों को बताना ही नहीं है तब इसकी ट्रेनिंग की आवश्यकता क्यों?

असल बात ये है कि हमलोगों ने एक साथ कम से कम 2,000 राजस्व कर्मियों जिसमें राजस्व कर्मचारी हैं, सीआई हैं, सीओ, एडिशनल कल्क्टर हैं, एसडीएम हैं, एलआरडीसी हैं, इन सभी को राजस्व वसूली, राजस्व संग्रहण के कार्य से मुक्त कर दिया है। पहले जिले की बैठक में ये बातें होती थीं कि राजस्व ग्रहण की मांग कितनी है? तुम्हारे अंचल का क्या सिचुएशन है? तुम लोगों ने इसको पूरा नहीं किया? अभी तक तुम लोगों ने 40 प्रतिशत ही वसूल किया है। कब तक पूरा होगा? हेडक्वार्टर से दबाव है? ..बस मीटिंग खत्म!.. अब कोई दबाव ही नहीं है। हेडक्वार्टर को मतलब ही नहीं है कि आप क्या कर रहे हैं? हमारे पास इसका एक पोर्टल बना हुआ है। हम अभी के अभी प्रत्येक दिन के लगान भुगतान के ट्रांजैक्शन को देख सकते हैं। किस जिले में, किस अंचल में, किस अनुमंडल में कितना ऑनलाइन लगान कटा है। हां, हमारे पास अब ये सिस्टम है।.. जरा सोचिये.. पूरे के पूरे राजस्व प्रशासन को राजस्व संग्रहण के दायित्व से मुक्त कर देना.. कोई आसान काम तो नहीं है..! इतना बड़ा डिसिजन लिया गया। तब उसमें समस्यायें आयेंगी। कई बार समस्यायें क्रिएट भी किये जाते हैं..!

मतलब अभी काफी चुनौतियां हैं और धीरे धीरे सिस्टम पटरी पर आयेगा?

मैं आपको बता रहा हूं कि हमारे सामने और भी चुनौतियां है और चुनौतियों को दूर कैसे करना है हमें ये भी मालूम है..। ..लेकिन, कुछ चीजों को बहुत रैडिकली (कट्टरता से) नहीं करना चाहिए! डिसिजन हमारा रैडिकल है कि हमने ऑनलाइन लगान लागू कर दिया है। ..पर लागू रैडिकली नहीं हो सका है.. क्योंकि अंदर ही अंदर कर्मचारियों में बहुत विरोध है..! आप देख लीजिये कि अभी तक राजीव रंजन ने जो लागू करवाया है क्या एक बार भी धरना प्रदर्शन हुआ?.. लेकिन, किसी का तो नुकसान हुआ है..! इसके पीछे की कहानी किसी को मालूम नहीं है। ..और सच्चाई यह है कि हम अभी भी कुछ समस्याओं से जूझ रहे हैं। हम धीरे धीरे आगे बढ़ रहे हैं.. आखिर क्यों?.. कुछ वजह तो होगी? कर्मचारियों का कई समूह मुझसे मिलने आ चुका है।.. और भी कई तरह की समस्याएं होती हैं जो लोग खुद ही समझते हैं..!

आंकड़ों को समझियेगा तब रांची में 175 राजस्व कर्मचारी हैं। इनके लिए मुझसे बड़ा दुश्मन कोई नहीं हो सकता क्योंकि इसके पीछे बड़ी वजह है। इतना हो जाने के बावजूद मुझपर सीधे आरोप नहीं लगाये जायेंगे..! वो बात को दूसरे तरीके से कहेंगे जैसे ..अरे आपको नहीं पता है वो दूसरे टाइप के पदाधिकारी हैं।.. अलग टाइप के हैं। यानी मुझपर दूसरा आरोप लगाया जायेगा।.. वो असली बात कभी नहीं बतायेंगे। ये कम से कम 20 सालों से नौकरी कर रहे हैं। आज योजना को लागू कराने के लिए कोई रैडिकल डिसिजन लेता भी हूं, किसी का विरोध नहीं होगा। अब सभी संट डाउन हो गये हैं। अब उन्हें पता चल गया है कि ये सिस्टम अब बैक नहीं जा सकता है। हमें किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है बाहर किसी को जानकारी नहीं होती। पर मैं भी दो जिलों का डीसी रह चुका हूं। सिमडेगा में लोकसभा और लोहरदगा में विधानसभा का चुनाव करवाया है। विधानसभा इलेक्शन करवाने के लिए मुझे एक सप्ताह का समय मिला था। वोटर टर्नआउट हुआ 69.28 प्रतिशत। और बाई इलेक्शन में 67 से ज्यादा वोट हुए। मेरे कहने का मतलब कि मैं मेहनत करता हूं। कर्मचारियों को भी समझता हूं। मैंने इस पद पर बैठते ही कह दिया था (राजस्व कर्मचारियों से) कि आपकी भूमिका मैं परिवर्तित कर दूंगा। मैं जानता था कि ऑनलाइन लगान से उनके मन में रोष है। पर मैंने उनको बताया कि मैंने ऑनलाइन लगान सिस्टम लागू करवा दिया है। लेकिन, आप राजस्व विभाग के पिलर हैं और कल भी बने रहेंगे। मैं आपकी भूमिका में परिवर्तन करने जा रहा हूं और मुझे आपका सपोर्ट चाहिए। ये तब की बात थी। अब इसको लागू करवाने के लिए मैं चार कर्मचारियों को सस्पेंड भी कर दूंगा कोई बैनर काम नहीं करेगा..।  आप जल्द देखियेगा कि डाटा बेस की त्रुटियों को दूर करने के लिए हमलोग जो कैंप आयोजित कर रहे हैं। वह फिर लगेगा। सारा पोर्टल ऑपेन है। नाम है, प्लॉट संख्या है। कहीं भी सुधार की आवश्यकता होगी इसे किया जायेगा। 

अंचलों में लगने वाले कैंप में लोग अपनी शिकायत लेकर जाते हैं। लेकिन, उनकी समस्या का समाधान नहीं हो रहा? लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं कि अब वो क्या करें? 

ये समस्या हो सकती है।.. लेकिन, संबंधित आवेदक को भी थोड़ी मेहनत करनी होगी। उसे अपने अधिकार समझने होंगे। कैंप में तुरंत उसकी समस्या का समाधान करना है। इसे वो संबंधित कर्मचारी और सीओ को बताये। मैं मानता हूं कि शुरूआती दौर में चुनौतियां है लेकिन आप मानकर चलिये कि ये बड़ा रोबस्ट (पुख्ता) सिस्टम है। पेमेंट का गेटवे भी हमारा बहुत स्ट्रांग है।

लोगों की ये भी शिकायत है कि रांची के कुछ हल्कों में पेमेंट गेटवे ब्लॉक किया गया है? वो ऑनलाइन लगान जमा नहीं कर पा रहे हैं?

हां, कुछ जगहों में हमने ब्लॉक किया है जिन अंचलों में रैयत का खतियान नहीं मिल रहा है। इससे समस्या खड़ी हो रही है कि खतियान नहीं मिलने से ये पता नहीं चल पाता है कि संबंधित जमीन आदिवासी जमीन है या गैर आदिवासी। ऐसे अंचलों में कुछ खतियान मिसिंग भी है। ... हो सकता है कोई इसमें छेड़छाड़ कर दे। मतलब छेड़छाड़ कर किसी दूसरे व्यक्ति के नाम से म्युटेशन करवा ले...! हालांकि, ये अनंतकाल तक चलनेवाला नहीं है। हम सिर्फ इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि हमें हल्का कर्मचारी, सीओ और संबंधित जिला लिख कर दे दें कि हमारे फलां फलां हल्का का खतियान मिसिंग है। हम हम उन अंचलों में पेमेंट गेटवे को ओपन करवा देंगे।लेकिन, लिख कर नहीं देंगे.. और आज हमने ओपन करवा दिया.. इधर, आदिवासी लैंड के मामले में किसी और ने रैयती दिखा कर उसकी रसीद कटवा ली तब..?

..पर जिला और क्या सीओ ऐसा लिख कर देना चाहेंगे?.. लिख कर नहीं देंगे तब तब जमीन मालिक लगान का भुगतान नहीं कर सकेगा?

क्यों नहीं..? इसके लिए हम लोगों ने टाइम बांड (समय निर्धारित) कर दिया है। देखियेगा एक समय आयेगा जब सभी सिस्टम सुधर जायेगा और अधिकांश बुराइयां खुद ब खुद खत्म हो जायेंगी। अंचलों को आदेश दिया गया है कि पंजी टू और खतियान का ऑनलाइन डाटाबेस ठीक ठाक कर लें। अब अगर सीओ सही तरीके से इंटरटेन (विचार) नहीं कर रहे हैं.. चलिये ये बात भी है तब मान लीजिये रांची में मैं जा कर काम करवा सकता हूं पर आवेदक साहेबगंज या गढ़वा का रहनेवाला होगा ऐसी स्थिति में मेरे लिए क्या संभव है? मेरा ये कहना है कि जिला स्तर पर रेवेन्यु एडमिनिस्ट्रेशन के जो हेड हैं। चाहे वो डीसी (उपायुक्त) हों, चाहे एडिशनल कल्क्टर हों, चाहे वो एसडीएम हों चाहे एलआरडीसी हों। उनकी भी जिम्मेदारी बनती है कि आयोजित कैंप को संवेदनशीलता से लें..! डाटा को सही तरीके से कलेक्ट करवायें।.. और सही तरीके से लोगो को कोपरेट (सहयोग) करें। ... हम हर चीज को एक लिमिटेशन से बियांड जाकर नहीं कर सकते हैं!.. हेडक्वार्टर हर चीज को मॉनिटर नहीं कर सकता है। जब सिस्टम इनकार्पोरेट (सम्मिलित) करने की बात होती है, तब हमें उसके बारे में भी सोचना है जो हमारे पहुंच से बाहर है।

मान लीजिये.. राजस्व कर्मचारी ने इंट्री के समय सिंह को सिन्हा लिख दिया है.. या फिर चौधरी को उरांव लिख दिया है। इसके लिए कोई आवेदक एफिडेविट लेकर तो नहीं जायेगा..! ये उसकी (कर्मचारी की) गलती है। इसे सुधरवाने के लिए आवेदक को लिखित आवेदन के अलावा कोई दूसरे दस्तावेज देने की आवश्यकता नहीं है। ये बात सभी अंचलों को बता दिया गया है। इसके बावजूद भी गलती नहीं सुधारी जा रही हो तब क्या कहा जा सकता है..? ..पंजी टू आपके पास है। ..खतियान आपके पास है। आपने डाटा ऑनलाइन इंट्री की। ...हम (आवेदक) आपकी गलती को बता रहे हैं। .... और आप हमसे एफिडेविट मांग रहे हैं? ऐसे में उनको.. क्या कहूं!!.. इसलिए मैं कहता हूं कि ये जानकारियां लोगों तक प्रचारित प्रसारित करने की बहुत जरूरत है। इसके लिए मेरे पास काफी प्लान हैं जिसे डिपार्टमेंट अप्रूव कर दे तब इन जानकारियों के प्रचार में तेजी आयेगी। एक साथ दर्जनों जगहों पर कैंप आयोजित करने की योजना है। इसकी शुरूआत हो गयी होती तब अभी तक सभी समस्याएं समाप्त हो गयी होतीं। .. मेरे अपने लिमिटेशंस (सीमायें) हैं। मेरे चार पांच प्रस्ताव अभी पेंडिंग हैं जो जन प्रचार से संबंधित हैं। हर जनता को पता होना चाहिए कि उन्हें सिर्फ एक आवेदन देना है। जिसने डाटा में त्रुटि की है उसे वो ही सुधारेगा। आवेदक अपनी शिकायत लेकर आपके पास आ रहा है। आप काम नहीं कर रहे हैं.. ये एक्सेप्टेबल (स्वीकार योग्य) नहीं है।.. दूसरी ओर जनता को उनका अधिकार भी समझना होगा। जिला में इस योजना को हेड कर रहे अधिकारियों को भी अपने दायित्व को समझना होगा। कोई भी चीज सिस्टम से चलती है तब ज्यादा बेहतर होता है। अब देखिये भविष्य में बहुत कम समय में इस योजना का कायाकल्प कर दिया जायेगा। जनता के लिए अभी भी कैंप खुला है।

डाटा में आ रही त्रुटियों को ऐसे सुधरवायें: 

  • रैयत या आवेदक सादे कागज में त्रुटि से संबंधित स्पष्ट जिक्र करते हुए आवेदन लिखकर अपने अंचल कार्यालय में जमा करेंगे।
  • हल्का के अनुसार आवेदन लेने के लिए अंचल कार्यालय मे एक डेस्क बनाया जायेगा। आवेदन जमा करने के बाद एक प्राप्ति रसीद दी जायेगी।
  • शिविर के दौरान प्रत्येक अंचल निरीक्षक/हल्का कर्मचारी शिकायतों पर कार्रवाई करेंगे। ये कर्मचारी अपने हल्का से संबंधित त्रुटियों को सुधारने के लिए तुरंत भौतिक भू दस्तावेजों से मिलान करेंगे और तुरंत इसे अंचलाधिकारी को देंगे। वे त्रुटि संशोधन के संबंध में तुरंत अपनी रिपोर्ट अंचलाधिकारी को सौंपेंगे।
  • अंचलाधिकारी अपने हल्का कर्मचारी से प्राप्त संशोधनों को तुरंत ठीक करेंगे। अंचलाधिकारी इस काम को प्राथमिकता देंगे। क्योंकि डाटाबेस में त्रुटियां अंचलाधिकारी के लॉगइन आईडी और पासवर्ड या डिजिटल सिग्नेचर से हो रही हैं।

ऑनलाइन लगान भुगतान ऐसे करें:

  • सबसे पहले अपने इंटरनेट ब्राउजर के एड्रेस बार पर jharbhoomi.nic.in टाइप करें।
  • इसके बाद ऑनलाइन लगान आप्शन पर क्लिक करें।
  • यहां आपको चार आप्शन दिखेंगे। पहला आप्शन व्यु रजिस्टर टू, दूसरा व्यु योर करेंट ड्यु, तीसरा आप्शन व्यु योर प्रिवियस पेमेंट और चौथा आप्शन पे योर लगान का होगा।
  • पहले आप्शन यानी व्यु रजिस्टर टू में आप जमाबंदी का विस्तृत ब्यौरा देख सकते हैं। जैसे जिला का नाम, अंचल, हल्का और मौजा का नाम।
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