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झारखंड के मुख्यमंत्री सचिवालय में हो एक विशिष्‍ट कोषांग

झारखंड में इन दिनों अपराध बढ़े हैं। उग्रवादी गतिविधियों में भी इजाफा देखा जा रहा है। लॉ एंड ऑर्डर की समस्या सुर्खियों में हैं। ऐसे में अक्सर राजनीतिक फेंका फेंकी ही अधिक होने लगती है। पुलिस महकमा पर ऊंगलियां उठना लाजिमी है। आपा धापी मचती है। घटना घट जाने के बाद कुछ मामले पुलिस सुलझा भी रही है। लेकिन, विकासशील माने जानेवाले झारखंड के लिए क्या यह सब पर्याप्त है? विकास की राह आसान तभी होगी जब कानून व्यवस्था चाक चौबंद हो। राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ ही यह एक तकनीकी मसला है। जिसका समाधान इस पेशे का कोई दिग्गज ही दे सकता है। कुछ इसी नजरिये से हम मिले डॉ डी एन गौतम से। गौतम एक दिन की निजी यात्रा पर रांची में थे। बिहार में डीजीपी पद से सेवानिवृत गौतम के कार्यकाल का बड़ा हिस्सा झारखंड भी रहा है। वह झारखंड में मुख्यमंत्री के सुरक्षा सलाहकार भी रह चुके हैं। इन दिनों वे पुलिसिंग कार्य से विमुक्त हैं। जाहिर है, उनसे आंकड़ों और घटनाओं पर चर्चा नहीं की जा सकती। लेकिन एक तेज तर्रार बेदाग पुलिस अधिकारी का ईमानदार सुझाव व्यवस्था के लिए सहयोगी साबित हो सकता है। प्रस्तुत है झारखंड में बिगड़ती कानून व्यवस्था पर डॉ डी एन गौतम से कुछ सवाल और पुलिस कार्यप्रणाली में मौलिक सुधार की दिशा में उनके सुलझे हुए सुझावः

झारखंड में अचानक क्राइम बढ़ता दिख रहा है.. हर तरह से.. नक्सल गतिविधियां बढ रही हैं, जेनरल क्राइम में बढ़ोतरी होती जा रही है। ..आम धारणा थी कि बहुमत की सरकार आ गई है अब कानून व्यवस्था पर नियंत्रण आसान होगा। लेकिन, इसके उलट क्राइम की दर बढ़ती दिख रही है। पुलिसिंग में आपका लंबा अनुभव रहा है। राजनीति को भी नजदीक से देखते रहे हैं। झारखंड में इस उभरते आपराधिक माहौल पर क्या कहेंगे?

पुलिसिंग के बारे में आम धारणा है कि यह बड़ा सिम्पल सब्जेक्ट है। ऐसा है नहीं। पुलिसिंग को समझना और पुलिस को कंट्रोल करना और सुपरवाइज करना.. यह स्पेशल काम है। यह किसी जर्नलिस्ट के वश की बात नहीं है.. और पॉलिटिकल लेवेल पर इसको सुपरवाइज करने और कंट्रोल करने की कॉम्पीटेन्स दुर्भाग्यवश डेवेलॉप नहीं हुई है। ..वह कहीं नहीं है।.. अबतक यह होता था, मुख्यमंत्री अपने डीजी (पुलिस) की सदाशयता पर निर्भर करता रहा है। और डीजी इनको सही पिक्चर देते रहे हैं। उससे काम चल जाता था। ..दूसरी चीज, मुख्य मंत्री को एक बड़ा ऐडवान्टेज होता है, अगर उस ऐडवान्टेज को यूज करना जानता है.. चूंकि वह पब्लिक फिगर है तो उसको पब्लिक ऐक्सेस होती है, इन्फॉरमेशन की। जनता से उसके पास ज्यादा सूचनाएं प्राप्त होती हैं। उस जानकारी के आधार पर वह पुलिस को कंट्रोल करता है। लेकिन अगर उसके पास जानकारी का यह वैकल्पिक स्त्रोत नहीं है तो वह कभी भी पुलिस को कंट्रोल नहीं कर पायेगा! .. यही बात एसपी के बारे में भी सच है। एसपी अगर सिर्फ दारोगा की दी हुई जानकारी पर आश्रित है तो वह कभी पुलिस को कंट्रोल नहीं कर पायेगा। वह कभी भी अपनी पुलिस टीम को सुपरवाइज नहीं कर पायेगा। उसको पब्लिक के साथ जुड़ना पड़ेगा। उसके पास जानकारी उस तेजी से नहीं पहुंचती है जितनी दारोगा के पास पहुंचती है, तो दारोगा एसपी को कंट्रोल करेगा, एसपी क्या दारोगा को कंट्रोल कर पाएगा?!!.. अभी यही है, नीचेवाला ऊपरवाले को कंट्रोल कर रहा है। इसलिए वह जो कहानी-पट्टी पढ़ाता है... उसे यह तो लगता है कि कुछ गड़बड़ है, लेकिन वह वहां ऊंगली नहीं रख पाता कि क्या गड़बड़ है.. कहां गड़बड़ है। उसको पता नहीं है.. कामकाज होता कैसे है! कैसे पकड़ा जाए।

केवल पावर प्वायंट प्रेजेन्टेशन समीक्षा नहीं..

आये दिन सुनने में आता है कि सीएम पुलिस अधिकारियों के साथ कानून व्यवस्था की समीक्षा के लिए बैठकें करते हैं। उसमें भी खुलासा होना चाहिए हालात का..?

(व्यंग्य की मुद्रा में..) एक और बीमारी निकली है.. पावर प्वॉयन्ट प्रेजेन्टेशन.. बड़ा ही धूर्त किस्म की टेक्निक है यह! .. क्योंकि आप सामनेवाले को जो बताना चाहते हैं, कहना चाहते हैं, बस वही बनाकर डाल देते हैं उसमें। सामनेवाले के सवालों का उसमें जवाब नहीं होता है, लेकिन वह उसमें ही उलझ जाता है। ..हमने कभी पावर प्वॉयन्ट प्रेजेन्टेशन परमिट नहीं किया। ..एकबार ऐसे ही.. जब मैं झारखंड में ऐडवाइजर (मुख्यमंत्री का सुरक्षा सलाहकार) था मुख्यमंत्री जी ने पदाधिकारियों की एक मीटिंग बुलाई थी, उससे पहले मैंने पदाधिकारियों को पचास साठ सवालों की लिस्ट दी.. कि जो लोग ब्रिफिंग करें इन सवालों के उत्तर बनाकर लायें। ..लेकिन वे लेकर आ गए पावर प्वॉयन्ट प्रेजेन्टेशन। उसमें मेरे किसी सवाल का उत्तर नहीं था। उन्होंने दे डाला वह प्रेजेन्टेशन। पूरी मीटिंग का उद्देश्य ही खत्म हो गया। जब सब खत्म हो गया तो हमने कहा, सर हम किसे बेवकूफ बना रहे हैं! इससे किसको फायदा है। अंततः अपराधकर्मी को ही फायदा है। ..तो हमें जानना चाहिए कि हम चाहते क्या हैं।

अक्सर ऐब्सकॉन्डर्स भुला दिये जाते हैं..

अच्छा बताइये, अचानक क्राइम बढ़ने के क्या कारण होते हैं, जैसा इन दिनों झारखंड में देखा जा रहा है?

देखिये, क्राइम क्यों बढ़ता है! गंभीर क्राइम जैसे बैंक डकैती या अन्य सीरियस क्राइम क्यों बढ़ने लगता है! ..कोई केस होता है तो आप देखे होंगे कि लोग (पुलिसवाले) कहते हैं कि गैंग डिटेक्ट हो गया, पांच आदमी पकड़े गए। गौर करने की बात होती है कि हर केस जिसमें पुलिस द्वारा चार्जशीट हुआ है, बिना अपवाद के, हर केस में या तो गैंग लीडर या कोई इम्पॉर्टेन्ट गैंग मेम्बर ऐब्सकॉन्डिंग (फरार) होगा। और वह ऐब्सकॉन्डिंग मेम्बर फिर से गैंग तैयार करके डकैती डालना शुरू कर देता है। ..इन ऐब्सकॉन्डर्स की गिरफ्तारियों का काम नहीं होता है! और ये कहते हैं कि गैंग पकड़ी गई। नतीजा यह है कि वह फरार सदस्य बेरोकटोक क्राइम करने लगता है। क्राइम बढ़ने का सबसे बड़ा कारण है ऐब्सकॉन्डर्स पर आपका लगाम न कस पाना! ..आप ऐब्सकॉन्डर्स की लिस्ट चेक कीजिए और देखिये कि कौन कब से ऐब्सकॉन्ड कर रहा है। आपको ताज्जुब होगा कि बहुत सारे ऐब्सकॉन्डर्स तो आपको कलेक्टरेट के पास चाय पीते मिलेंगे, चाय बनाते मिलेंगे! ..अगर आपको क्राइम कंट्रोल करना है तो आपको अपने इलाके के क्रिमिनल्स की जानकारी होनी चाहिए। यानी जो चिन्हित अपराधी हैं उनकी पहचान की जानकारी आपके पास होनी चाहिए.. उनके फोटोग्राफ्स हों, फिंगरप्रिंट्स हों।

पुलिस में नियमित रिपोर्टिंग प्रणाली ठप्प है..

क्या पुलिस किसी भी आरोपी की पहचान एकत्र कर सकती है अथवा पहचान हासिल करने को लेकर भी तो कोई कानून होगा?

कानून के अनुसार, जब कोई आरोपी पुलिस की पकड़ में आता है और उसे दो वर्ष से अधिक की सजा होती है तो उसे फॉरवॉर्ड करने से पहले आप उसकी पहचान ले सकते हैं। लेकिन एक बार वह जेल चला गया तब आप यह नहीं कर सकते। तब आपको मजिस्ट्रेट के पास जाना होगा। ..फिर कन्विक्शन (सजा होने) के बाद कर सकते हैं जिनका दो साल का कन्विक्शन हो गया है। ..लेकिन पता कर लीजिए, कितने लोगों का फोटोग्राफ होता है, कितने लोगों का फिंगरप्रिंट होता है!.. एक भी नहीं होता है।
एक सिस्टम होता था, जेल परेड। पुलिस वाले जेल में जाते थे, अपराधकर्मियों की चेकिंग होती थी। उसकी एक खास प्रक्रिया थी। और जेल परेड स्टेटमेंट एसपी को खुद देखना पड़ता था। यह काम प्रोसिक्युटर के रूप में खुद पुलिस के जिम्मे था। अभी प्रोसिक्युशन पुलिस से अलग है। सिस्टम खत्म!
एक और प्रक्रिया थी.. इन्सपेक्टर स्टेट हेडक्वार्टर्स में रिपोर्ट भेजता था, पेन्डिंग केसेज की रिपोर्ट। कहलाती थी डेली रिपोर्ट। बाद में वह वीकली आने लगी। फिर मन्थली हुई और अब मुझे नहीं पता कि वह आ भी रही हैं कि नहीं! क्योंकि मैं जब यहां ऐडवाइजर था और मैंने उस रिपोर्ट की चर्चा की तो हमारे बहुत सारे पदाधिकारियों को आश्‍चर्य हुआ कि इस नाम की कोई चीज होती भी है!

वह रिपोर्ट ओरिजिनेट कहां होती थी और उसका डेस्टिनेशन क्या होता था?

पुलिस इंस्पेक्टर वह रिपोर्ट तैयार करता था और वह एसपी, डीआइजी, जोनल आईजी, सभी डीजीपी ऑफिस में पहुंचती थी। इन ऑफिसों में उनकी जांच की जाती थी। वहां पता चल जाता था कि कितने केस कब से पेन्डिंग हैं, सुपरविजन के लिए कितने पेन्डिंग हैं.. इससे पूरे हालात का पता चलता रहता था।

आपको नहीं लगता है वर्तमान प्रशासन को उस रिपोर्टिंग सिस्टम को फिर से शुरू करना चाहिए?

जाहिर है, इसके अलावा आपके पास टूल क्या है?!.. शासन चलाने के लिए व्हाट इज द बेसिक थिंग, जिसपर शासन चलता है?.. रिपोर्ट्स!.. चाहे वह रिपोर्ट्स नीचे से ऊपर जा रही है या ऊपर से नीचे। चाहे इंस्पेक्शन रिपोर्ट्स हो, चाहे केस रिपोर्ट्स हों.. सारी इन्फॉरमेशन रिपोर्ट्स के फॉर्म में ही चलती हैं। हालात तो रिपोर्ट में ही न कैप्चर होते हैं!.. उसका कोई भी नाम दे दीजिए।

मुख्यमंत्री सचिवालय में हो एक विशिष्‍ट कोषांग..

इस हालात में मुख्यमंत्री को क्या करना चाहिए?

हमको लगता है कि मुख्यमंत्री सचिवालय में काफी हाई लेवेल रिप्रेजेन्टेशन होना चाहिए, जिसमें वे अपने किसी कम्पीटेन्ट पुलिस ऑफिसर को रखें जो सेवा में हो। जिसकी लम्बी सेवा बाकी हो, ताकि उसको सिस्टम में स्टेक्स भी होना चाहिए। जिसकी कम सेवा अवधि बाकी होगी या रिटायर्ड को रखेंगे तो उसका स्टेक तो वहां बने रहने में है, न कि सेवा करने में।

यानी मुख्यमंत्री सचिवालय में लॉ एंड आर्डर के लिए एक कोषांग बनना चाहिए..?

वह कोषांग काफी तगड़ा हो।

अननेचुरल डेथ जैसे गंभीर मामलों में रह जाती है जांच अधूरी..

अभी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है?

अभी कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है। सीएम को डीजी के अतिरिक्त ऐसी कोई इन्डिपेन्डेन्ट ऐडवाइस नहीं मिलती है। ..विकल्प के तौर पर उसे दूसरे लेवेल से इन्डिपेन्डेन्ट ऐडवाईस मिल सकती है बशर्ते वह सक्रिय हो जाए, जो कम जगह ही मिल पाती है, वह है स्पेशल ब्रान्च। स्पेशल ब्रान्च और सीआईडी की ब्रीफिंग्स हों। लेकिन इनकी अपनी लिमिटेशन्स है। आफ्टरऑल इनको तो अपने डीजी के अन्डर में काम करना है। यह एक समस्या है। वह डीजीपी को बाइपास करके सीधा सीएम सेक्रेटेरियट में जा नहीं सकता। इसलिए मैं कहूंगा कि सीएम के पास एक स्वतंत्र और स्ट्राँग सिस्टम होना चाहिए, जैसे, क्राइम एंड लॉ एंड ऑर्डर सेल। उस सेल को यहां दो ब्रान्च में भाग कर दें, क्राइम अलग और नक्सल अलग। और देखिये, क्राइम एंड इन्वेस्टिगेशन ठीक हो जाएगा तो इसका नक्सल पर भी असर पड़ेगा।
..जिस समय मैं ऐडवाइजर था तो देखा कि यहां मर्डर बहुत हो रहे हैं। उसका कारण खोजने की कोशिश की। मैंने रांची डिस्ट्रिक्ट का सैम्पल सर्वे कराया।, इन्वेस्टिगेशन का, एक साल का। और यह पाया कि एक साल में जितने मर्डर केसेज हुए थे उनमें अधिकांश केसेज में फाइनल/क्लोजर रिपोर्ट हो गई थी। तो, जब आपके सारे मर्डर केस क्लोज हो जा रहे हैं तो मर्डर तो होंगे! क्योंकि मर्डरर का पता ही नहीं लगाया आपने। ..उसमें मैंने एक और स्टडी करायी थी, अननेचुरल डेथ के केसेज की। अननेचुरल डेथ के सारे केसेज पेन्डिंग थे, कोई इन्वेस्टिगेशन हुआ ही नहीं था। नियम यह है कि अननेचुरल डेथ का मामला चौबीस घंटे से ज्यादा पेन्डिंग रह जाए तो उसको रेगुलर मर्डर केस की तरह ही इन्वेस्टिगेट करना आवश्यक है। लेकिन कुछ नहीं..! अब आप देखिये, किसी ने मर्डर किया और रेलवे की पटरी पर लाकर रख दिया, क्लेम निकल गई कि कट गई। केस को हमने दर्ज कर लिया अननेचुरल डेथ। और उसका आगे कोई इन्वेस्टिगेशन नहीं हुआ। इसका मतलब हुआ कि आपने लोगों को एक आमंत्रण दिया कि किसी को मारना हो तो मार डालो और पटरी पर रख देा। ..तो मर्डर भी बढ़े और यूडी (अननेचुरल डेथ) केसेज भी बढ़े। तो, आपको पकड़ना है कि कहां कैच है!
फिर, रजिस्ट्रेशन में लड़ाई.. आप देखियेगा कि बड़े बड़े केस दो थानों की सीमा पर होते हैं।

थानों के सीमा का विवाद बेतुका है..

हां, यह भी एक समस्या है..?

नहीं, यह कोई समस्या नहीं है। जो भुक्तभोगी है वह पहले जिस थाना पर पहुंचेगा उस थाने को केस दर्ज करना ही पड़ेगा, भले ही उसके एरिया का नहीं हो। उसे इन्वेस्टिगेशन भी शुरू करना होगा। बाद में मामला जिस ज्युरिडिक्शन का है वहां सीनियर ऑफिसर को रेफर कर दे वह तय कर लेगा। ..हमने एक ऑर्डर भी निकाला था, छपरा में.. अगर कोई आदमी लंदन में लुट के आया है और छपरा में आकर कहता है कि उसे लंदन में लूट लिया गया था, केस दर्ज नहीं कर पाया तो छपरा वाला पुलिस स्टेशन उसका केस दर्ज करेगा और रिकॉर्ड करके लंदन भेज देगा। अब आप कल्पना कीजिए कोई डाक्टर है, अपना क्लीनिक चलाता है और पेशेन्ट को देखते ही झल्ला कर गरियाने लगे यह कौन चला आया.. तो क्या उसका क्लीनिक चलेगा! जैसा डॉक्टर का प्रोफेशन वैसा ही पुलिस का। आपके यहां केस आता है.. क्राइम का कोई विक्टिम है वही न आयेगा.. और आप कहेंगे, कहां से मुसीबत आ गई.. ऐसे में कैसे चलेगा!
एक और चीज हमेशा दिखती है.. क्राइम, उग्रवाद, आतंकवाद.. इसमें अपराधी जितनी तेजी से आधुनिक तरीकों का इश्तेमाल करते हैं, पुलिस पिछड़ जाती है। पुलिस केवल अपने पुराने अनुभवों और पुराने मामलों तक ही सोच पाती है। उनका अपग्रेडेशन नहीं किया जाता। क्या इसमें सुधार संभव नहीं?

पुलिस आधुनिकीकरण सुस्त, कारण है नौकरशाही..

ऐक्चुअली, इस मामले में पुलिस डिऐक्टिव है। लेटेस्ट टेक्नोलॉजी एडॉप्ट करने के लिए क्रिमिनल गैंग को किसी की सैंक्शन लेने की जरूरत नहीं। पुलिस को कितने कितने डिपार्टमेन्ट.. कहां कहां फाइल चक्कर मारेगी.. जबतक वह पुरानी टेक्नोलॉजी सैंक्शन होगी, नई टेक्नोलॉजी आ जाएगी। इसका बहुत मजेदार उदाहरण है, पोलनेट। पुलिस नेटवर्क का सिस्टम शुरू हुआ था पूरे देश में। नेटवर्क को क्रिएट करते करते वह खुद ही थक कर गिर गया। वह बन ही नहीं पाया। कुछ जगह चला। डिस्ट्रिक्ट टू डिस्ट्रिक्ट चला, वह थाना लेवेल पर इंटिग्रेट नहीं हो पाया। बाद में पता चला कि यह इतनी घटिया टेक्नोलॉजी है कि इसको चलाया ही नहीं जाना चाहिए। यह टेलिकॉम डिपार्टमेन्ट की रिजेक्टेड टेक्नोलॉजी थी, जिसको उन्होंने पुलिस के गले बांध दिया था। और पुलिस विभाग ने सोचा यह फ्री में मिल रही है चलो इसे लगा लेते हैं। हालांकि फ्री नहीं थी, उसपर करोड़ों खर्च हो गए। ..अब एक नई टेक्नोलॉजी आयी है, सीसीटीएनएस यानी क्राइम किमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क सिस्टम। यह नए नाम से चल रहा है.. पता नहीं क्यों लंबे लंबे नाम देते हैं!.. अब जो बेसिक क्राइम रेकॉर्ड मेन्टेन करनेवाली बात है, फिंगरप्रिंट लेनेवाली बात है.. कैप्चर वाला काम नहीं होगा तो तुम्हारे तार खींच देने से क्या हो जाएगा। सैटेलाइट क्या कर लेगा!.. सैटेलाइट डज नॉट क्रिएट डाटा.. वह तो आपको माध्यम दे रहा है, प्लेटफॉर्म दे रहा है, डाटा तो आपको एकत्र करना है। ..आप देख लीजिए यहां हर साल कितने फिंगरप्रिंट्स कलेक्ट हो रहे हैं!!.. 2005 मैं जब सीआईडी में एडिशनल डीजी था तो एक बार यहां फिंगर प्रिंट लैबोरेट्री गया। अंतिम फिंगरप्रिंट्स 1980 में लिया गया था। पूरे हिंदुस्तान में यह बात नहीं है, दक्षिणी राज्य बहुत अच्छे हैं इस मामले में, दिल्ली भी बहुत अच्छा चल रहा है। लेकिन.. यहां आप देख लीजिए!

मालखाना बेहिसाब, छूट जा रहे हैं अपराधी..

और..?

और कुछ चीजें तो ऐसी हैं.. जैसे मालखाना। मालखाना पर बहुत कुछ इसलिए नहीं बोलूंगा क्योंकि इसका लाभ सारे क्रिमिनल्स ले लेंगे.. और उनके सारे केस न कहीं छूट जाएं! इसलिए इसपर मैं विस्तार से नहीं बोलूंगा.. मैं केवल हाकिम लोगों से अपील करूंगा कि इसको छोड़ देने से नहीं होगा, कुछ उपाय निकालना पड़ेगा। लोगों ने छोड़ दिया है इसको क्यों कि इसको छुएं ही तो विस्फोट ही विस्फोट होने हैं, इसमें कोई शक नहीं। मालखानों का तो कोई हिसाब ही नहीं है!.. रजिस्टर नहीं लिखा गया.. अनुसंधानकर्ता साथ में मालखाना लिए घूम रहा है। ट्रायल के लिए मामला आ गया और मालखाना उपलब्ध हो गया तो ट्रायल में एक्जिबिट हो गया!.. इसलिए आप देखियेगा कि धड़ाधड़ ऐक्विटल (रिहाई) हो रहे हैं। क्योंकि आरोपी के खिलाफ प्रमाण पेश करने के लिए एक्जिबिट्स ही नहीं होते हैं। इससे, गंभीर से गंभीर मामले में भी एक्विटल हो जाते हैं।

तब तो यह बहुत संवेदनशील मामला है मालखानों का!?..

अरे यहां के मालखाना के ढ़ेर सारे एक्जिबिट्स बिहार में पड़े हुए हैं। जब डिविजन हुआ तो मैंने बड़ी कोशिश की। जब मैं वहां (बिहार में) डीजीपी हुआ तो बीडी राम साब को कहा, आपके तो सारे केस फेल हो जाएंगे, एक्जिबिट्स तो यहां पड़े हुए हैं! कोई रेस्पॉन्ड ही नहीं कर रहा है।.. तो उन्होंने कहा, भिजवा दीजिए, हम ले लेंगे..। हमने ट्रक में लोड करवाकर भिजवा दिया। यहां (झारखंड में) ट्रक आया, कई दिनों खड़ा रहा, फिर वापस लौट गया।

फिर वापस पटना..!?

यहां कोई लेने को तैयार नहीं!

-किसलय
(साक्षात्कारकर्ता किसलय रांची से प्रकाशित साप्ताहिक अखबार ‘न्‍यूज विंग’ के संपादक हैं।

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