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#JharkhandElection: 2019 के विधानसभा चुनाव में कई हैं ऐसे नेता जो जातो गंवाये और भातो नहीं खाये!

Akshay/Pravin

Ranchi: 2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव में अभी ना जाने कितने चीज और देखने को मिले. राज्य में बीजेपी का क्रेज ऐसा है कि ना जाने कितने लोगों ने टिकट की आस में भाजपा का दामन थाम लिया. लेकिन पार्टी भी क्या करे टिकट तो 81 सीटों पर ही दिया जा सकता है. साथ ही एक विधानसभा से दो लोगों को एक ही पार्टी नहीं दे सकती.

इस वजह से नेताओं की एक लंबी फेहरिस्त बन गयी. जिन्होंने पार्टी तो ज्वाइन की. लेकिन पार्टी की तरफ से उन्हें विधानसभा लड़ने का टिकट नहीं मिला. ऐसे में इनपर एक देहाती कहावत सटीक बैठ रही है कि ‘जातो गंवाये और भातो नहीं खाये’. जानते हैं उन नेताओं को जिनके साथ ऐसा हुआ.

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अरुण उरांव

एक सीनियर आइपीएस अधिकारी जिनका कांग्रेस में एक अच्छा कद था. वो लगातार कई सालों से छत्तीसगढ़ के कांग्रेस प्रभारी थे. लेकिन 23 अक्टूबर को विपक्ष के पांच विधायकों के साथ बीजेपी का दामन थाम लिया.

सूत्र बताते हैं कि अरुण उरांव इस बार गुमला या सिसई से चुनाव लड़ना चाहते थे. लेकिन बीजेपी की तरफ से उन्हें टिकट नहीं मिली. कांग्रेस से तो गए ही. बीजेपी में जो सोच कर आए थे वो भी नहीं हुआ.

सुखदेव भगत

काफी खींचतान के बाद बीजेपी ने इनका टिकट कन्फर्म किया है. सुखदेव भगत लोहरदगा से चुनाव लड़ते हैं. मुख्य रूप से इनकी राजनीतिक रंजिश आजसू नेता कमल किशोर भगत से है. दो बार कांग्रेस से लगातार केके भगत से हारे हैं. केके भगत को सजा होने के बाद सुखदेव भगत ने उनकी पत्नी को हरा कर उपचुनाव में जीत दर्ज की थी.

बीजेपी और आजसू गठबंधन के तहत लोहरदगा सीट अगर बीजेपी के खाते में जाती है तो सुखदेव भगत को आसानी से जीत मिल सकती थी. लेकिन केके भगत अब जेल से बाहर है. उन्होंने अपनी पत्नी का नामांकन भी आजसू पार्टी से करवा दिया है. इधर बीजेपी ने सुखदेव भगत को टिकट दे दिया है. लिहाजा सुखदेव भगत की सिर्फ पार्टी बदली लेकिन राजनीतिक हालात जस के तस हैं.

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गिरिनाथ सिंह

गढ़वा जिले का एक कद्दावर नाम. राजद के संस्थापकों में से एक. 1993 उपचुनाव में गढ़वा विधानसभा से पहली बार विधायक बने. इसके बाद 1995 और 2000 में जनता दल से चुनाव जीते तो 2005 में राजद से विधायक चुन कर आए. संयुक्त बिहार में राबड़ी देवी मंत्रीमंडल में पीएचईडी के राज्य मंत्री बने.

झारखंड बनने के बाद नौ दिन की शिबू सोरेन की सरकार में संसदीय कार्य मंत्री बने. चार बार लगातार चुनाव जीतने वाले गिरिनाथ सिंह को 2009 में बीजेपी से सत्येंद्र नाथ तिवारी से हार गए.

दस सालों तक राजद में रहकर संघर्ष करने के बाद वो 2019 में लोकसभा चुनाव से पहले अन्नपूर्णा देवी के साथ बीजेपी में शामिल हुए. करार था कि विधानसभा चुनाव में उन्हें गढ़वा से टिकट मिले. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बीजेपी ने तीसरी बार भी सत्येंद्रनाथ तिवारी को ही टिकट दिया है.

रेजी डुंगडुंग

सीनियर आइपीएस. झारखंड के सिमडेगा जिले के रहने वाले हैं. इन्होंने वीआरएस लेकर राजनीति में जाने की सोची. चुनाव से ठीक पहले इन्हें नौकरी से वीआरएस तो मिल गया. लेकिन कोई बड़ी पार्टी नहीं मिली जहां से वो टिकट लेकर विधायक का चुनाव लड़ते.

आखिर में इन्हें झारखंड पार्टी का साथ मिला. अटकलें थी कि रेजी डुंगडुंग बीजेपी या कांग्रेस से टिकट लेकर चुनावी मैदान में उतरेंगे. लेकिन ऐसा हो ना सका.

डीके पांडे

झारखंड के पूर्व डीजीपी रिटायर होने के बाद 23 अक्टूबर को पांच विधायकों के साथ बीजेपी में शामिल हुए. पुलिसिया नौकरी के दौरान इनपर संगीन आरोप लगते रहे. बावजूद इसके बीजेपी ने इन्हें पार्टी में शामिल किया. लेकिन किसी विधानसभा से टिकट लेने में अब तक सफल नहीं हो पाए हैं.

पार्टी ने इन्हें फिलहाल कोई पद भी नहीं दिया है. किसी शहरी क्षेत्र खास कर बोकारो विधानसभा क्षेत्र से टिकट लेने की लॉबिंग करने की खबर आ रही है. लेकिन इन्हें बीजेपी इस बार टिकट दे इसके आसार दिखाई नहीं दे रहे हैं.

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गणेश गंझू

2014 के विधानसभा चुनाव में सिमरिया से जेवीएम की टिकट पर जीत हासिल करने के बाद सरकार बनने वक्त अपने पांच जेवीएम के विधायक साथियों के साथ बीजेपी में शामिल हो गए. लेकिन सरकार में इन्हें जगह नहीं मिली. ना ही सरकार की तरफ से किसी महत्वपूर्ण पद पर रखा गया.
सबसे बड़ा सदमा इन्हें तब लगा जब बीजेपी ने इनका टिकट भी काट दिया. वैसे बाकी जेवीएम से आए विधायकों को पार्टी ने टिकट दिया. लेकिन ये ना जेवीएम के रहे और ना ही बीजेपी के.

योगेंद्र प्रताप सिंह

योगेंद्र प्रताप सिंह हर उस पार्टी में रहे हैं, जो बीजेपी की धुर विरोधी रही है. ये हाल ही में जेवीएम को छोड़ बीजेपी से जुड़े हैं. चतरा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की चाहत जेवीएम की तरफ से पूरी ना होने का दुख बर्दाश्त ना करते हुए इन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया.

इन्हें जानने वाले कहते हैं कि आगे भी ये चतरा से ही राजनीति करने की इच्छा रखते हैं. शायद इस चुनाव में भी चतरा जिले की किसी सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा पाले हुए थे. जेवीएम और तमाम बीजेपी विरोधी पार्टी में बतौर प्रवक्ता उन्होंने बीजेपी के खिलाफ अब तक के राजनीतिक जीवन में जहर उगलने का काम किया है.

बीजेपी में आने के बाद इन्हें इनाम स्वरूप चुनाव के दौरान पार्टी के प्रवक्ता का जिम्मा सौंपा गया. लेकिन टिकट नहीं दिया गया. अब ना ही जेवीएम के टिकट पर लड़ सकते हैं और ना ही बीजेपी के.

प्रदीप प्रसाद

हजारीबाग में प्रदीप प्रसाद जमीन व्यवसायी के तौर पर पहचाने जाते हैं. राजनीति में आने की चाह इन्हें लोकसभा चुनाव से हुई. इन्होंने लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ज्वाइन किया. लेकिन हजारीबाग से टिकट नहीं मिल पाया.

ऐसे में चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी का दामन थाम लिया. कहा जाता है कि इनकी इच्छा हजारीबाग जिले से चुनाव लड़ने की है. लेकिन बीजेपी ने भी इन्हें कहीं से टिकट नहीं दिया.

सुचित्रा सिन्हा

पूर्व आइएएस सुचित्रा सिन्हा झारखंड की राजनीति से इच्छा रखते हुए बीजेपी में शामिल हुईं. उनके बीजेपी में आने के बाद कहा जाने लगा कि वो ईचागढ़ विधानसभा से चुनाव लड़ने की चाह रखती है.

लेकिन इतनी जल्दी वो टिकट हासिल ना कर सकी. बीजेपी ने इटागढ़ से साधुचरण महतो को उम्मीदवार बना दिया है. ऐसे में अब उनके लिए सारी संभावनाएं खत्म हो चुकी है.

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