DBT पर विभागीय मंत्री हमसे कुछ, मीडिया से कुछ और  शायद सीएम से भी कुछ और ही बोलते होंगे : ज्यां द्रेज

Publisher NEWSWING DatePublished Fri, 04/13/2018 - 16:13

Pravin Kumar

Ranchi :  झारखंड सरकार के द्वारा रांची जिले के नगड़ी प्रखंड में खाद्य सुरक्षा के लिए DBT  स्कीम लायी गयी. जिससे प्रखंड के 12 हजार लाभुकों का समय और पैसा दोनों बैंकप्रज्ञा केन्द्र और राशन दुकानों के चककर लगाने में जाया होने की बात सामने आ चुकी है. आज भी नगड़ी के पीडीएस लाभुकों को उम्मीद है कि सरकार DBT को वापस लेगीजिससे पुन: कार्डधारियों को राशन दुकान से एक रुपये प्रति किलो की दर से चावल मिलना शुरू हो जायेगा.  इन तमाम विषयों पर देश की जाने-माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज से न्यूजविंग के वरीय संवाददाता प्रवीण कुमार ने बातचीत की. यहां प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश :

न्यूजविंग: क्या है DBT?  नगड़ी में इसके प्रयोग से क्या सामने आया है.

ज्यां द्रेज: DBT को समझने के लिए हमें केंद्र सरकार के सामाजिक सरोकार संबंधी क्रियाकलाप को देखना होगा. केंद्र सरकार के द्वारा सामाजिक सरकारों पर पिछले चार-पांच साल से कुछ खास रुचि नहीं दि‍खती है. सरकार का मकसद सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों से पैसे बचाना है. स्वच्छ भारत अभियान में जरूर कुछ काम हो रहा है, लेकिन बाकी योजनाओं में पैसे बचाने का काम किया जा रहा है. सरकार के द्वारा राशन जैसी योजना से हजारों करोड़ बचाने का प्रचार किया जा रहा है. नगड़ी में DBT डायरेक्ट कैश ट्रांसफर नहीं, बल्कि इनडायरेक्ट फूड ट्रांसफर की योजना चल रही है. जिसमें राशन का पैसा बैंक खाते में आता है और फिर उस पैसे को निकाल कर लाभुक को 32 रुपए किलो की दर से पीडीएस दुकान से चावल खरीदना पड़ रहा है. नगड़ी में DBT के कारण ग्रामीणों की हालत काफी खराब है. नगड़ी जाकर कोई भी राशन के मामले में हजारों लोगों की परेशानी देख सकता है. पीडीएस का लाभ लेने के लिए गरीब गुरबे को बैंकप्रज्ञा केंद्र, राशन दुकानों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं. ऐसे में उनका पैसा और समय बेवजह जाया हो रहे हैं. कई बार देखा गया है कि राशन लेने में इतना पैसा और समय खर्च हो जाता है कि उसके बदले बाजार से राशन लेना सस्ता पड़ता है. डीलर के द्वारा राशन लेने के लिए मजबूर भी किया जाता है. लाभुक अगर किसी परेशानी की वजह से राशन नहीं उठा पाते हैंतो राशन कार्ड से नाम काट दिये जाने की बात कही जाती है. मैं समझता हूं कि इस तरह का प्रयोग नगड़ी की जनता पर अत्याचार की तरह है. सरकार झारखंड में DBT  को लेकर प्रयोग कर रही हैपर इसके पूर्व किसी तरह का सिस्टम तैयार नहीं किया गया; बस घोषणा के साथ इसे लागू कर दिया गया है. सरकार इस तरह का प्रयोग करना ही चाहती हैतो उसे तैयारी के साथ एक-दो गांव में करना चाहिए.

न्यूजविंग: सरकार के मंत्री सरयू राय से इस संबंध में आपसे क्या बातचीत हुई थी?

ज्यां द्रेज : DBT को लेकर विभाग के मंत्री हमसे कुछ अलग बोलते हैं. मीडिया से कुछ और बोल रहे हैं और शायद मुख्यमंत्री से कुछ और बात करते होंगे. उन्होंने कहा था कि, मार्च में DBT को लेकर सोशल ऑडिट कर लिया जायेगा. जो मार्च में नहीं हुआअब शुरू किया गया है. सोशल ऑडिट को ईमानदारी से अगर पूरा किया जाता है तो हमलोग के द्वारा किये गये सर्वे के अनुसार ही नतीजे आयेंगे. राशन में DBT को नगड़ी के ग्रामीण रिजेक्ट कर चुके हैं.

न्यूजविंग : DBT के विरोध में आंदोलन के बाद भी सरकार ने इस योजना को वापस नहीं लिया. अब नगड़ी के ग्रामीण क्या सोचते हैं?

 ज्यां द्रेज: जब आम जनों के द्वारा इस योजना का प्रोटेस्ट किया गयाइसके बाद से मैं नगड़ी नहीं गया हूं. सरकार के द्वारा सोशल ऑडिट के नतीजे का इंतजार कर रहा हूं; आज भी नगड़ी प्रखंड की जनता राशन को लेकर परेशान है. अब ग्रामीणों को लग रहा है कि उनकी परेशानी से मुक्ति दिलाने में सरकार को रूचि नहीं है. सरकार उनकी बात नहीं सुन रही है. अब इससे आगे क्या किया जायेगा,  सभी संगठनों के द्वारा यह मिल बैठकर तय किया जायेगा.

न्यूजविंग: राशन में DBT को लेकर लाभुकों का आक्रोश एवं नाराजगी सरकार के प्रति आज भी कायम है. DBT का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों और जन संगठनों की अब आगे क्या योजना है. ?  

ज्यां द्रेज:  सरकार के द्वारा देर से शुरू की गयी सोशल ऑडिट की नतीजे आने के बाद हम लोग उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार इसे वापस लेगी. नगड़ी में प्रयोग बंद किया जायेगा. अगर राशन में DBT को बंद नहीं किया जाता है तो आगे संघर्ष की रणनीति सभी लोग मिल बैठकर तय करेंगे.

न्यूजविंग: नगड़ी प्रखंड के पीडीएस लाभुकों की परेशानी देश भर के मीडिया में छायी रहीलेकिन अभी भी लाभुकों की परेशानी वैसी ही है. सरकार भी नहीं सुन रही है ?  

ज्यां द्रेज :  मीडिया में खबरें 26 जनवरी के प्रदर्शन के बाद से आनी शुरू हुई.  इस मुद्दे पर हम जैसे कुछ लोग लिखने लगेतब जाकर के मीडिया का ध्यान इस ओर गया. इसके पूर्व मीडिया राशन में DBT को लेकर सिर्फ सरकार की ही बात कर रही थी. आम लोगों की परेशानी सामने लाने का काम काफी बाद में किया गया. मैं न्यूजविंग की बात नहीं कर रहा हूं. अन्य दूसरे मीडिया की बात कह रहा हूं.

न्यूजविंग: नगड़ी के ग्रामीण कह रहे हैं कि राशन में DBT के मामले में सभी जन संगठन अब निष्क्रिय हो गये हैं. सरकार के दबाव में संगठन चुप हो गये हैं. जबकि परेशानी पहले की तरह बरकरार है?   .

ज्यां द्रेज: मुझे लगता है कि ऐसी बात नहीं. 26 जनवरी के प्रदर्शन के बाद अभी ज्यादा समय नहीं गुजरा, लेकिन सरकार ने कहामार्च के अंदर सोशल ऑडिट करायेंगे. जिसे सरकार ने अभी शुरू किया, इसके नतीजे आने के बाद फिर से संघर्ष की रणनीति संगठनों द्वारा तैयार की जायेगी.

न्यूजविंग: झारखंड के ग्रामीण परिस्थितियों को देखते हुए सरकार की जन सरोकार की योजना सही ढंग से लागू करने में क्या गैप है?  

ज्यां द्रेज:  जनसरोकारों की स्कीम में झारखंड में कई तरह के गैप हैं. योजना को सही ढंग से लागू होने में करप्शन मुख्य बाधक है. मुख्य योजना जैसे मनरेगाराशन, पेंशनमिड डे जैसी योजना बेहतर तरीके से लागू की जा सकती है. सरकार को इसमें मजबूती और ईमानदारी से कार्य करना चाहिए. इन योजनाओं में केरल, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़आंध्र प्रदेश में बेहतर परिणम आये है. दुख की बात ये है कि झारखंड जैसे राज्य में पिछले चार-पांच सालों में इस दिशा में ईमानदारी से प्रयास नहीं किया गया. इस दौरान सिर्फ तकनीक पर जोर दिया गया. राशन में अगर सिर्फ स्मार्ट कार्ड का प्रयोग किया जाये तो काफी सुविधाजनक होता. झारखंड में पीडीएस में काफी परिवर्तन आया है. 10 वर्ष पूर्व 80 प्रतिशत अनाज कालाबाजारी में चला जाता थावर्तमान समय में 80 प्रतिशत अनाज लाभुकों को मिलता है.

न्यूजविंग: झारखंड के 19 जिले देश के पिछड़े जिले में शामिल हैं. क्या इन जिलों को लेकर राज्य सरकार को विशेष रणनीति के साथ कार्य करने की जरूरत है?

ज्यां द्रेज: स्वास्थ्य,  शिक्षा एवं अन्य योजनाओं के संचालन में शहरों और गांवों में काफी असमानता है. राज्य के नागरिकों को मूलभूत सुविधा उपलब्ध कराने में सरकार का सार्वभौमिक प्रारूप होना चाहिएजो इस राज्य में नहीं दिखता है. सरकार को चाहिए कि मजबूत इच्छाशक्ति के साथ राजनीतिक हस्तक्षेप से मूलभूत सुविधाओं को लागू करे.

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