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ब्युरोक्रैट्स चला रहे झारखंड सरकार, रघुवर दया के पात्र! - बाबुलाल मरांडी

: झारखंड विकास मोर्चा (प्र) के सुप्रीमो बाबुलाल मरांडी से किसलय की लंबी बातचीत :

रघुवर सरकार के कार्यकाल पर इन दिनों खूब समीक्षा हो रही है। विपक्षी दल के रूप में आपके भी कई बयान आते रहे हैं। आप स्वयं इस प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। झारखंड के मुद्दों से आपका गहरा लगाव रहा है। एक अनुभवी प्रशासक के रूप में आप रघुवर सरकार के एक साल के कार्यकाल को कैसे समीक्षा करेंगे? हमारा आशय है कि आपकी यह समीक्षा वर्तमान शासनकाल के लिए मार्गदर्शन भी बने।

आपने जिस लिहाज से जानने की इच्छा व्यक्त की है इसके लिए हम केवल रघुवर सरकार तक ही सीमित हो जाएंगे तो सही उत्तर सामने नहीं आयेगा। हमें पंद्रह साल पीछे लौटकर उन दिनों को याद करना चाहिए जब लोग यहां अलग राज्य के लिए संघर्ष कर रहे थे.. हम अलग राज्य की लड़ाई क्यों लड़ रहे थे? हम बिहार से अलग होना क्यों चाहते थे? इन बुनियादी मसलों को हमें समझना होगा। एकीकृत बिहार के जमाने में यहां के लोगों की सोच थी कि पटना में बैठे लोग हमारा हक मार लेते हैं, हमें अवसर नहीं मिलता है। खासकर झारखंड के दूर दराज गांवों में रहने वाले आदिवासियों, दलितों को लगता था कि अलग राज्य बनेगा तो हमें वह हक और अवसर मिलने लगेगा।

उस समय लोगों की शिकायत थी कि इतनी सारी खदानें खुल गयीं लेकिन हमारे लोगों को अवसर नहीं मिला। इतने सारे डैम बन गए, हमारे लोगों की जमीनें गईं, लोग बेघर-बार हो गए.. लेकिन उस जमीन से न हमें पीने का पानी मिला, न खेतों को पानी मिलता है और न उसके बदले में हमें कोई नौकरी मिलती है। एचईसी, बोकारो जैसे बड़े कारखाने खुल गए लेकिन उसमें हमारे लोगों को नौकरियां नहीं मिलीं। उस समय यह आक्रोश था लोगों में। ..और दशकों चले इस आंदोलन के फलस्वरूप 15 नवंबर 2000 को अलग राज्य झारखंड मिला। अब राज्य बनने के बाद, पंद्रह वर्षों की यात्रा को आप देखेंगे.. हम भी उसमें रहे, करीब दो साल चार महीना (बतौर मुख्यमंत्री).. लेकिन जब हम बारीकी से विचार करते हैं तो लगता है कि जिन बुनियादी मुद्दों को लेकर यहां के लोगों ने इतना बड़ा आंदोलन किया उन मुद्दों को हम लोगों ने वहीं छोडृ दिया, भुला दिया। शासन की ओर से उन समस्याओं के समाधान का प्रयास नहीं हुआ, और अभी भी नहीं हो रहा है। यानी राज्य बनने के बाद भी न्याय होते दिख नहीं रहा है। पहले की तरह ही खदानों के लिए जमीन अधिग्रहण हो रहा है, आज भी डैमों को लेकर लोग संघर्ष कर रहे हैं। इसलिए मैंने कहा कि किसी एक सरकार की नहीं.. पूरी जो पोलिटिकल सिस्टम है.. इन मुद्दों पर आज कोई भी पोलिटिकल पार्टी लड़ नहीं रही है, आवाज नहीं उठा रही है। लोग आज भी हताश हैं।

जहां तक रघुवर सरकार की बात करें.. पूर्व में कोई सरकार बहुमत की नहीं बनी। अस्थिर सरकारें रहीं। ..फिर, वह सरकारें दिल्ली में बैठकर बनीं.. तो स्वाभाविक रूप से वहां के नेताओं को खुश रखना, उनके एजेंडा को भी यहां लागू करना उन सरकारों की प्राथमिकता रही, लेकिन रघुवर सरकार तो बहुमत की सरकार बनीं, 37 और 5 मिलाकर 42 विधायकों की सरकार बनी। इससे उम्मीद बंधी कि पूर्व की सरकारों को जो कठिनाई थी वह इस सरकार को नहीं झेलनी पड़ेगी। लेकिन एक साल का कार्यकाल देखें तो यह सरकार भी उस दिशा में कोई काम करती दिख नहीं रही है। यहां के लोगों का जो दर्द था उसके निवारण के लिए यह सरकार कोई भी मेकैनिज्म तैयार नहीं कर रही है। आज भी देखेंगे कि जगह जगह पर लोग संघर्ष कर रहे हैं। कोई देखने सुननेवाला नहीं है। पहले जैसे ही आज भी गरीब जमीन से बेदखल हो रहे हैं। जमीन लौटाने की बात तो दूर, यहां फिर से जमीन लूटी जा रही है। धनबाद जैसे शहरी इलाकों में कैसे लोगों को ठगा गया। एक डेढ़ साल तक आंदोलन के बाद जांच बैठी है लेकिन जिस गति से जांच होनी चाहिए, नहीं हो रही है। चूंकि उसमें बड़े बड़े अफसर फंसनेवाले हैं, उन्हें ही बचाने की कोशिश है यह सब। इसलिए मैं कहता हूं कि इस सरकार से  भी जो उम्मीदें थीं वह इस एक साल के कार्यकाल देखते हुए पूरी नहीं होती नहीं दिख रही है।

सडकें बन जाना विकास नहीं, विकास तो वह है जहां सड़कें उपयोगी बनें!

लेकिन, आधारभूत संरचनाएं तो बन रहीं हैं, जैसे सड़कें आदि..?

देखिये, ये सड़कें जो बन रही हैं वह अपने आप में विकास नहीं है। ये विकास के लिए हैं। ये जो तालाब डैम बन रहे हैं वह अपने में विकास नहीं हैं, बल्कि विकास के लिए हैं।  डैम तो आज भी बड़े बड़े बने हुए हैं.. मेहसान डैम है, मसानजोड़, पंचेत डैम,  तिलैया, कोनार, तेनुघाट, स्वर्णरेखा भी है.. इन डैमों की क्या उपयोगिता हो रही है, उससे लोग किस प्रकार लाभांवित हो रहे हैं? अगर हम इसका मूल्यांकन नहीं करते हैं तो वे डैम, वो सड़क वो बिजली.. इन सबका कोई मतलब नहीं। इन संरचनाओं से यहां के लोगों के जीवन में खुशहाली आ रही है या नहीं, ग्रामीण इलाकों में हालात सुधर रहे हैं कि नहीं। अगर हालात में कोई सुधार नहीं हो रहा तो सरकार को विकास प्रक्रिया और रणनीति में बदलाव लाना चाहिए। हम जिस घिसे पिटे रास्ते पर वर्षों से चल रहे हैं.. आजादी के 66 साल से हम चल रहे हैं.. हमें विकास के इस ट्रैक को बदल देना चाहिए। सरकार को इसमें हिचकिचाना नहीं चाहिए। विकास के लिए नए प्रयोग किये जाने चाहिए। लेकिन, ऐसा कुछ दिख नहीं रहा है।

सड़क के साथ यह सुनिश्‍चित हो कि गांव उत्पादन केंद्र कैसे बने

किस तरह के नए प्रयोग की बात आप कहना चाहते हैं?

सत्ता में जो लोग बैठे हैं, जिनपर जनहित का दायित्व है उनमें विजन होना चाहिए। हम उस समय (अपने कार्यकाल में) लोगों से कहा करते थे, पहले हमें गांव को उत्पादन केंद्र के रूप में विकसित करना होगा। उसके बाद जरूरी है कि गांवों को जोड़नेवाली सड़कें बनें, जिससे ग्रामवासी अपने उत्पाद को बाजार तक पहुंचाकर अपनी अर्थव्यवस्था सुधारें।

यही होगा विकास का पूरा चक्र। इसलिए, जब हम रोड बना रहे हैं तो कम से कम समानान्तर रूप से यह विचार करें कि गांव को उत्पादन केंद्र कैसे बनाया जा सकता है। जो लोग योजना बनाते हैं उनके दिमाग में यह बात होनी चाहिए। योजना बनाते समय यह देखना चाहिए कि सहज और सरल तरीके से लोग क्या कर सकते हैं।

जबरन स्किल डेवेलॉपमेंट यानी बेरोजगारों की कतार में इजाफा

इन दिनों केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक स्किल डेवेलॉपमेंट की बातें कर रही हैं। क्या यह विकास की राह नहीं?

मैं तो कहता हूं हर व्यक्ति स्किल्ड है। हमें पहचाना पड़ेगा कि वह किस क्षेत्र में स्किल्ड है। अगर हम उसे किसी नए क्षेत्र में स्किल्ड बना रहे हैं तो यह समझिये कि हम उन्हें बेरोजगारों की कतार में खड़ी कर रहे हैं। ..यहां देश के प्रधानमंत्री स्किल डेवेलॉपमेंट की बात करते हैं और बस, सब उसी तर्ज पर चल पड़ते हैं.. अब हर जिला में फलां केंद्र, फलां ट्रेनिंग सेंटर होगा..। हमें इससे विरोध नहीं है, होना चाहिए! ..लेकिन हमें पहले उन्हें पहचाना पड़ेगा.. गोड्डा क्षेत्र में अलग क्षमता है, तो सिमडेगा में एकदम अलग। हमें पता करना होगा कि वहां के लोगों में पहले से क्या रूझान है, क्या क्षमता है और तब उसमें थोड़ा मोडिफाई करके, अपग्रेड करके.. ताकि तुरंत रिटर्न मिले और उनके जीवन में फौरन सुधार हो।

उसी तरह.. मुख्यमंत्री की घोषणा इन दिनों सुन रहा हूं.. हर बीपीएल परिवार को गाय देंगे!.. गाय वो दें, हमें इससे कोई विरोध नहीं है। लेकिन एक बात मैं अवश्य कहूंगा कि हर व्यक्ति के लिए गाय पालना आसान नहीं है। उसके लिये पर्याप्त चारा चाहिए, देखभाल का अनुभव चाहिए, फिर दूध को बाजार तक पहुंचाना। खासकर ट्राइबल इस मामले में उतना स्किल्ड नहीं हैं। तो, मैं कहूंगा कि और भी कई जानवर हैं जिन्हें वे पाल सकते हैं, जैसे सूअर है, मुर्गी है, बकरी है, उसके लिए हम उन्हें थोड़ा ट्रेन कर सकते हैं। इससे वे अपना खेती-बाड़ी करते हुए भी रोजगार का अतिरिक्त जरिया बना सकते हैं। यानी, हमें यह समझना जरूरी है कि इलाकावार तरीके से हमें किसे किस क्षेत्र में लोगों को स्किल्ड करना है। अगर हम सभी को मेकैनिकल क्षेत्र में स्किल्ड बना देते हैं तो उनके रोजगार के लिए कहां जगह है? कितने को नौकरी मिलेगी? ..तो ये सारी चीजें लोग नहीं समझेंगे.. चाहे केंद्र की सरकार हो या राज्य की। ..आज कृषि क्षेत्र में नए नए अनुसंधान हो रहे हैं। हमें गांवों में उन अनुसंधानों को लाने की जरूरत है।

आपके कहने का तात्पर्य यह है कि गांव जिलों में सीधा स्किल डेवेलॉपमेंट सेंटर न खोलकर पहले वहां के लोगों का सर्वेक्षण कराया जाए और उनकी रूचि और क्षमता को आंककर ही उनके विकास की दिशा तय की जाए।

बिल्कुल सही।

रि-पैकेजिंग भर है 'योजना बनाओ अभियान'

इन दिनों राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने एक योजना बनाओ अभियान शुरू किया है। वे स्वयं भी गांव गांव जिला जिला घूमकर लोगों को इस काम के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। इस अभियान को आप कैसे देखते हैं?

 मैं तो बस इतना कहूंगा कि यह पुराने माल की नई पैकेजिंग भर है! .. चाहे वह जनप्रतिनिधि हो, अफसर हों, सभी को पता है कि पहले से ही.. जितनी भी योजनाएं बनती हैं वह सबसे पहले ग्राम सभा में ही पास होती हैं। वहां से ब्लॉक जाती हैं फिर जिला को जाती हैं। और जिला में, डीआरडीए की मीटिंग होती है, प्रबंध परिषद की। यानी, जो योजना ग्राम सभा से पारित होती है वही जिला स्तर पर स्वीकृत होती रही हैं। तो, यह सब तो पहले से होता रहा है। इनके अभियान में नया क्या है? वही पंचायत में योजना बनाने की बात कह कर लोगों को बेवकूफ बना रहे हैं। इस रि-पैकेजिंग से लोग समझ रहे हैं कि सरकार कुछ नया कर रही है, इससे अचानक सबकुछ बदल जाएगा।

चलिए अब गांवों से अलग, शहरों की बात करते हैं। प्रधानमंत्री जी ने स्मार्ट सिटी की बात की है। इन दिनों रांची के लोग और प्रशासन काफी उत्साहित नजर आ रहा है। इसमें क्या संभावनाएं देखते हैं आप?

देखिये, मैं कुछ कहूंगा तो लोग कहेंगे कि आलोचना कर रहा हूं.. फिर भी मैंबताना चाहूंगा कि मोदी जी जब से देश की राजनीति में आये तब से नई नई चीजों की घोषणाएं कर रहे हैं। लोगों को लगा कि उससे उन्हें कुछ मिल जाएगा तो उन्होंने काफी सपोर्ट भी किया.. जैसे जन-धन योजना। जिसमें बहुतों ने बैंक खाता खुलवाया। जिसके बारे में मोदी जी ने कहा कि इस योजना के माध्यम से लोगों ने करीब बीस हजार करोड़ जमा किया! ..दरअसल, लोगों को लगा कि खाता हमारा खुलेगा तो बैंक से लोन, सब्सिडी, या कई अन्य तरह के पैसे सरकार से मिलने लग जाएंगे। इसी आशा में लोगों ने एकाउन्ट खोला, पैसे डाले और उसी से पैसे इकठ्ठा हुए। लेकिन, प्रधानमंत्री की दूसरी योजना जो सोना के बारे में है.. कि लोग बैंक में सोना जमा करें, उसके बदले में काफी ब्याज मिलेगा, लाभ होगा!.. वह योजना तो बिल्कुल फ्लॉप हो गई। मैं एक दिन टीवी पर सुन रहा था कि किलो भर भी सोना जमा नहीं हुआ। अब मंदिरों में दान के सोने को रखने की बात चल रही है। ..तो मुझे लगता है कि यह सब योजनाएं बिना सोचे समझे लागू कर दी जा रही हैं। किसी ने कुछ कह दिया उसे प्रधानमंत्री स्तर से लागू कर दिया जा रहा है। उसी तरह है स्मार्ट सिटी। मैं कहता हूं स्मार्ट सिटी ही क्यों, स्मार्ट हिन्दुस्तान क्यों नहीं! स्मार्ट विलेज क्यों नहीं बनाना चाहते हैं। ..स्मार्ट सिटी में आप क्या करेंगे!.. यही न कि बिजली होगी, सड़क होगी, पानी होगा, इंटरनेट होगा। आज इंटरनेट का जिस तरह स्वतः प्रसार हो रहा.. नए नए शोध हो रहे हैं.. हवाई अड्डे से लेकर रेलवे स्टेशन तक वाईफाई जोन बन रहे हैं.. तो यह इंटरनेट तो स्वतः ही दुनिया की जरूरत बनती जा रही है। इसलिए यह कोई नया करने का विषय रहा नहीं। हमारा कहना है कि पूरी स्मार्ट सिटी बनाने की जगह सरकार को नीति तय करना चाहिए था कि हम सड़क बना देते हैं, एक योजनाबद्ध आधारभूत ढांचा बना देते हैं, और कानून बना देते कि अब जो घर बनेंगे इसी इलाके में बनेंगे। ताकि अगले दस बीस वर्षों में सबकुछ व्यवस्थित हो जाता, एक स्मार्ट सिटी की तरह। इसके लिए बहुत अधिक हाय-तौबा करने की जरूरत नहीं थी।

देखिये ये रांची बहुत बेतरतीब ढंग से बसा हुआ है। आप यहां चुटिया, किशोरगंज या अपर बाजार तरफ घुस जाइये, अंदर जा नहीं सकते! इस तरह के जो बाजार हैं उन्हें हेरिटेज प्लेस घोषित कर दीजिए। जो लोग रह रहे हैं उतना ठीक है लेकिन अब इससे अधिक कंन्सट्रक्शन नहीं होगा। कानून बना दीजिए। आगे विस्तार करना है तो उसी इलाके के बगल में अगर स्थान है तो ठीक वरना थोड़ी दूर पर ही जमीन तय करके उसे सलीके से विकसित कीजिए। ..किसी परिवार में विस्तार होता है, बेटों की शादी होती है तो घर मकान में कम जगह के कारण पिता उसके लिए अन्यत्र मकान की व्यवस्था करता है। यह साधारण सी बात है, इसके लिए हाय तौबा मचाने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह सरकार बड़ी बड़ी बातें ही कर रही है.. स्टार्ट अप इंडिया, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया..

स्मार्ट सिटी यानी अमीरों का इंडिया

अभी पिछले दिनों जाने माने अर्थशास्त्री डा ज्यां द्रेज ने स्मार्ट सिटी पर बहुत कटू प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि स्मार्ट सिटी की अवधारणा केवल बड़े बड़े उद्यम घरानों को ठेके के रूप में लाभ दिलाने की कोशिश है..।?

उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा। आप जो स्मार्ट सिटी की घोषणा कर रहे हैं, बताइये कैसे रांची को स्मार्ट सिटी बना लेंगे? जाहिर है, अलग स्थान चुनकर स्मार्ट रांची बनेगी। उसमें कौन लोग रहने जाएंगे? जिसके पास पैसे हैं वही लोग जाएंगे ना! गरीब तो कोई जा नहीं पाएगा। यानी आप उन अमीरों के लिए एक नया भारत बना रहे हैं.. नया इंडिया बना रहे हैं!.. भारत तो बोलते ही नहीं देश के प्रधानमंत्री.. भारत नाम से उन्हें शायद कोई चिढ़ है।  उनकी जितनी भी योजनाओं के नाम होते हैं इंडिया लगा होता है.. स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया..

एक जमाने में आपने भी ग्रेटर रांची की घोषणा की थी। ग्रेटर रांची और इस स्मार्ट सिटी को तुलना कैसे करेंगे आप?

स्मार्ट सिटी के बारे में जितना मैं समझा उससे तो यही लगता है कि कहीं जमीन अधिग्रहण किया जाएगा। उसके खिलाफ वहां के लोग जुलूस प्रदर्शन करेंगे। अंत में सरकार द्वारा तय उस जमीन पर धनाढ्य लोगों की संपत्ति खड़ी हो जाएगी। गरीब लुट जाएगा। यह तो ऐसे भी रांची में हो रहा है। गरीबों की जमीन अधिग्रृहित करके अमीरों की चांदी हो जाती है। यहीं पास में हरमू कॉलोनी का ताजा उदाहरण है। यहां हाउसिंग बोर्ड ने एक मार्केटिंग कॉम्प्लेक्स बनाया है। जिस दिन वहां दुकानों की नीलामी हो रही थी मैं रांची में ही था। मुझे लोगों ने बताया कि उस कॉम्प्लेक्स में छोटी छोटी दुकानों के लिए बाइस तेईस लाख से तीस लाख तक की बोली लग गई। आखिर कहां से यह पैसा आ रहा है? साफ दिख रहा है कि सामान्य लोगों को वह दुकानें नहीं मिलनेवाली। अब देखिये सरकारी नीति.. हाउसिंग बोर्ड के लिए जमीन क्यों ली गई थी? क्योंकि नो लॉस नो प्रोफिट में गरीबों को मकान मिले। लेकिन, उसे तो वह दुकान नहीं मिल सकता.. सताईस तीस लाख कोई कमजोर आदमी तो नहीं दे सकता। ..और इसी तरह अगर स्मार्ट सिटी का कॉन्सेप्ट है तो मैं उसका घोर विरोधी हूं।

आपके उस ग्रेटर रांची के बारे में बताइये..?

हां, अब बताता हूं.. नई राजधानी बनाने की बात आयी तो यहां भौगोलिक स्थिति देखने के बाद मुझे पता चला कि रांची और आसपास के इलाके में खेतिहर परिवारों की जमीन है। उनको उजाड़ दिया गया तो तुरंत उसकी भरपाई संभव नहीं होगी। यूं तो झारखंड में 26 प्रतिशत आदिवासी हैं लेकिन रांची, गुमला सिमडेगा में इनकी आबादी करीब पचास प्रतिशत से अधिक है। ये लोग खेती के अलावा तुरंत कोई रोजगार नहीं चुन सकते। व्यापार के क्षेत्र में आदिवासियों की भूमिका अबतक नहीं दिखती। ठेकेदारी जैसे रोजगार में भी वे नहीं है। सरकारी नौकरी में, चूंकि उन्हें रिजर्वेशन मिलता है, कुछ लोग दिख जा रहे हैं। रांची और आसपास कहीं भी हम जमीन अधिग्रहण करेंगे तो इन्हीं लोगों की जमीन है। परिणामस्वरूप ये लेाग जमीन से बेदखल हो जाएंगे। मुआवजा के रूप में जो पैसे उन्हें मिलेंगे उसका सही उपयोग नहीं कर पायेंगे, खा कर खत्म कर देंगे। तब मेरे दिमाग में आया ग्रेटर रांची। मैंने सोचा, रांची के चारों तरफ एक रिंग रोड बनायेंगे। रिंग रोड के आसपास ऐसे इलाके चुनेंगे जो गैरकृषि भूमि हो अथवा ऐसे लोगों की जमीन जो खेती के अलावा कुछ कर रहे हैं, जिसे हम असानी से अधिग्रहण कर सकते हैं.. ऐसी जमीन को चिन्हित करके विकसित करें। कहीं सौ एकड़ में, कहीं दो सौ, चार सौ एकड़ में.. और इस तरह उस चारों तरफ, रिंग रोड के आसपास नये नये इलाके विकसित करें। साथ ही उन इलाकों को सड़कों के जरिये रांची से जोड़ें। और इस तरह तैयार हो जाती ग्रेटर रांची। साथ साथ, कुछ जमीन पर विधानसभा, सेक्रेटेरियट आदि कोर कैपिटल का इलाका विकसित होता। इसके लिए हमने कांके के सुकूरहुटू में तय किया जहां अधिकांशतः सरकारी जमीन है, जहां लोगों ने कभी विरोध नहीं किया। आज तो लोग एईसी में डंडा लेकर विरोध कर रहे हैं। सुकूरहुटू में ऐसा कुछ नहीं हुआ, हमने वहां शिलान्यास भी किया था। लोग बहुत खुश थे। ..तो मैं कहूंगा कि सरकार का विजन और नीयत दोनेां स्पष्ट होना चाहिए, तभी सही विकास होगा।

आज जो रांची का रिंग रोड बन रहा है वह आपकी ही शुरूआत की हुई थी?

नहीं, मेरा केवल कॉन्सेप्ट था वह। मेरे बाद लोगों ने उसे बनवाया जरूर लेकिन सही प्लानिंग नहीं हुई, जिस तरह कनेक्टिंग रोड्स बनाये जाने थे। इसलिए आज रिंग रोड भी पूरा नहीं हुआ, पंद्रह साल हो गए। आज ग्रेटर रंाची बना होता तो इस पुरानी रांची पर ऐसा ट्रैफिक लोड नहीं होता।

अफसर न बेलगाम हो न डिमॉरलाइज्ड

अब राज्य के वर्तमान प्रशासन की बात करें। अभी अभी सरकार ने घोषणा की है कि सरकारी अधिकारियों की सामान्य गलतियों के खिलाफ अब प्राथमिकी दर्ज नहीं होगी। इस घोषणा पर आपका नजरिया?

देखिये, इस बारे में मैंने भी अखबारों में पढ़ा। विस्तृत जानकारी नहीं है। लेकिन, सामान्य नियम है, अगर कोई भी गलती करता है और उसे दंडित नहीं करेंगे तो गलती करते ही जाएगा। अभी मुझे लगता है.. चूंकि इस राज्य के बड़ी तादाद में सीनियर अफसर भी भ्रष्टाचार के घेरे में हैं.. होता क्या है.. हम घेरे में हैं तो खुद को बचाने के लिए जरूरी है कि नीचे के अफसरों को भी बचाया जाए। तभी हमारे समर्थन में माहौल बन पाएगा। ..मुझे तो यही कारण समझ में आता है। इसके लिए लॉजिक यह दिया जाता होगा कि काम प्रभावित नहीं होगा। हालांकि, मेरे विचार से प्रशासनिक सुधार के लिए जरूरी है कि अफसर को तय समय तक विभाग में जरूर रखा जाए, जैसे तीन साल। तुरंत तुरंत ट्रान्सफर नहीं होना चाहिए। अगर कोई गड़बड़ी पायी जाती है तो उसे दूसरे जिला में भेजने की बजाय उसे हटाइये, सस्पेंड कीजिए, या कुछ और सजा दीजिए। ..लेकिन.. वहां लोगों ने मांग की अफसर को हटाइये और उसे हटाकर दूसरे जिले में पदस्थापित कर दिया..। यह प्रक्रिया बिलकुल गलत है, इससे अफसर डिमॉरलाइज होते हैं।

विशुद्ध रूप से केवल ब्युरोक्रैट ही चला रहे हैं झारखंड सरकार, रघुवर दया के पात्र!

सरकार के एक साल के कार्यकाल में नौकरशाही की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?

एक साल के कार्यकाल की बात करें तो मैं यही कहूंगा कि इस राज्य में सरकार विशुद्ध रूप से ब्युरोक्रैट ही चला रहे हैं। ..और रघुवर.. क्या बोलते हैं ना.. वे दया के पात्र दिखते हैं!

आप कह रहे हैं.. दया के पात्र हैं रघुवर दास.. क्या मतलब?

देखिये.. मैं कमजोर शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहूंगा.. यह सब इसलिए मैं कह रहा हूं कि .. दिल्ली के झारखंड भवन में एक रेसिडेन्ट कमिश्‍नर है.. वहां के बारे में मुझे जानकारी मिली कि दो दो सीनियर अफसर.. एक तो वर्तमान चीफ सेक्रेट्री भी डबल चार्ज में हैं.. यहां भी हैं वहां भी हैं.. इसके अलावा उदय प्रताप सिंह भी वहां हैं। मैं कहूंगा कि छोटे से झारखंड भवन में डिप्टी कलक्टर स्तर का एक अधिकारी ही काफी था। लेकिन, इतने सारे बड़े अफसर को पदस्थापित करना.. उनका लाव लस्कर वहां भी होता है और यहां भी। और जब चाहे, प्रत्येक शुक्रवार को वहां चला जाना, हवाई जहाज से.. इसके बाद भी मुख्यमंत्री कुछ नहीं कर पाते हैं.. तो मुख्यमंत्री कमजोर है। अफसर ही सरकार को चला रहे हैं। ..अभी अभी क्या हुआ.. मुख्यसचिव के बेटे की शादी हुई.. हमें भी आमंत्रण मिला था.. लेकिन जो जानकारी मिली, सोशल मीडिया में जो कुछ आया और लोगों ने मुझे बताया.. पचास से अधिक अफसर उस शादी के रिसेप्शन में दिल्ली गए। कई सरकारी प्रोग्राम रखे गए.. शिलान्यास कार्यक्रम हुआ.. गवर्नर भी गईं.. मेरा कहना है, क्या मतलब है इन सब का.. यह सब क्या प्रदर्शित करता है?..अरे भाई, शादी वहां करते और यहां रिसेप्शन करवा लेते..। वहां जाने के लिए छुट्टी तो चीफ सेक्रेट्री ने ही दिया होगा इतने लोगों को! या फिर, वहां मीटिंग का आयोजन भी उन्होंने ही किया होगा। ..इन सबसे लगता है कि राज्य के मुख्यमंत्री निहायत ही कमजोर हैं, भले ही वे बड़े बड़े बोल बोलते हों! ..हमें तो लोगों ने बताया कि एक एसडीओ जो हाल में बोकारो के डीसी बनाये गए, वह टाटा के चार्टर्ड प्लेन से जमशेदपुर से रांची आते थे।

विधानसभा स्पीकर अच्छे इंसान हैं, लेकिन सरकार और पार्टी के दबाव में हैं

पिछले दिनों आपकी पार्टी के आधे दर्जन विधायक भाजपा में चले गए। आप मुकदमा भी लड़ रहे हैं। कहां तक पहुंचा है मामला?

देखिये, हाई कोर्ट के अलावा विधानसभा में भी केस चल रहा है। 29 (जनवरी) को डेट दिया है। मुझे लगता है कि काफी विलंब हो रहा है फैसला आने में। और कहीं न कहीं विधानसभा अध्यक्ष सरकार और पार्टी के दबाव में काम कर रहे हैं। हमने अपने वकील को कहा है कि 29 तारीख को बताईये कि एक साल हो गया, इतने समय में निर्णय नहीं करेंगे तो पांच साल बीतने पर उस निर्णय का क्या मतलब रह जाएगा। ..इस बीच इसी तरह का दो फैसला आ चुका है.. बिहार विधान परिषद में जदयु छोड़नेवाले सदस्यों की सदस्यता समाप्त कर दी गई, अध्यक्ष अवधेश नारायण सिंह इन्हीं की पार्टी के हैं। वहां त्वरित निर्णय हो सकता है तो झारखंड में क्यों नहीं। असम में कांग्रेस के कुछ विधायक भाजपा में चले गए थे, उनकी भी सदस्यता समाप्त कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट का भी वर्डिक्ट है इस तरह के मामले में त्वरित न्याय की.. जबकि विधानसभा का कार्यकाल ही मात्र पांच वर्षों का होता है। इस अवधि के बाद आप जजमेन्ट देते हैं तो देना, न देना बराबर है। ..मैं दिनेश उरावं जी को शुरू से जानता हूं। ऑनेस्ट हैं, अच्छे इंसान हैं, लेकिन पार्टी और सरकार के दबाव के आगे वे कितना कर पायेंगे अभी कहना कठिन है। हम तो उनसे जल्द न्याय की अपेक्षा करेंगे, नहीं तो जनता का दरवाजा खटखटायेंगे।

राशन किरासन और स्थानीय नियोजन होगा झाविमो का मुद्दा

आपकी पार्टी ने फरबरी में बड़े कार्यक्रमों की घोषणा की है। क्या हैं वे कार्यक्रम?

कार्यक्रम के मुद्दे जनहित से जुड़े हैं। केंद्र की तत्कालीन सरकार ने 2013 में खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत भोजन के अधिकार की घोषणा की थी। 180 दिनों के भीतर लाभुक परिवारों को चिन्हित कर भोजन की व्यवस्था करना था, कार्ड देकर राशन उपलब्ध करवाने की शुरूआत करनी थी। इसमें ग्रामीण क्षेत्र में 86 प्रतिशत और शहरी क्षेत्र में 50 प्रतिशत लोगों को लाभ मिलता। लेकिन अफसोस है कि 2013 से लेकर आज तक दोनों सरकारें केवल तारीखों की घोषणा करती रहीं। कुछ लोगों को राशन कार्ड मिला भी तो उसमें त्रूटियां ही हैं। फिर सबकुछ बदला जा रहा है, मंत्री ने तो कहा है 31 मार्च तक सब हो जाएगा, लेकिन मुझे आशा कम ही है। जबकि सबको पता है कि इस बार झारखंड में खराब मौसम के कारण अनाज की घोर कमी है। करीब पंद्रह लाख मेट्रिक टन कम अनाज है। यह योजना लागू हो गई होती तो इस समस्या का समाधान निकल जाता। यह हुई राशन की बात, अब किरासन की बात.. गा्रमीण क्षेत्रों कहां बिजली है! सबको किरासन तेल भी नहीं मिल रहा है।  कई और भी मुद्दे हैं। लेकिन हमारे आंदोलनों का प्रमुख मुद्दा होगा, राशन किरासन और स्थानीय व नियोजन।

घोषणाएं कर के भूल जाते हैं मोदी जी

मोदी सरकार पर आपकी प्रतिक्रिया?

मोदी सरकार के बारे में तो मैं इतनी ही बातें कहूंगा कि मोदी सरकार वादा करती है और भूल जाती है। और फिर नई नई घोषणाएं करती है।  याद कीजिए, पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने जितनी घोषणाएं की.. एक एक घोषणा को याद करा दें.. उस समय कहा था विदेश से काला धन ले आयेंगे, हर देशवासी के खाते में 15 से 20 लाख डालेंगे! पंद्रह से बीस लाख वाली बात को जुमला मान भी लें लेकिन विदेश से काला धन लाने की बात का कुछ तो दिखता। लेकिन डेढ़ वर्ष बाद भी.. खोदा पहाड़ निकली चुहिया! उस समय लाखों करोड की बात कही जा रही थी, अब हजार करोड़ में ही मामला अटक गया है। दूसरा, उन्होंने कहा था कि प्रत्येक वर्ष दो करोड़ लोगों को रोजगार देंगे, लेकिन अभी तक तो वे बस लोगों को स्किल्ड, कुशल बनाने तक की ही बात कर पाये हैं।  मंहगाई कम करेंगे!.. क्या हुआ, पेट्रोल के दाम में कमी का मुनाफा भी जनता को नहीं मिल रहा कोई और फायदा ले रहा है.. उसी तरह, छप्पन इंच सीना!.. पाकिस्तान का रवैया लोगों के सामने है। इसलिए मैं कहूंगा कि चुनाव के वक्त उन्होंने जो भी घोषणाएं की थीं, भूल गए। अब नई नई घोषणाएं शुरू की हैं.. देखिये क्या होता है।

विपक्ष के नेता पिताजी के लिए दिल्ली में बड़ा बंगला मांग रहे हैं सरकार से

झारखंड में मुख्य विपक्ष जेएमएम पर हाल में आपने टिप्पणी की थी। आखिर ऐसा क्यों?

विपक्ष का जो आक्रामक तेवर होना चाहिए.. झारखंड मुक्ति मोर्चा ने झारखंड आंदोलन का नेतृत्व किया था। जयपाल सिंह के बाद शिबु सोरेन को लोग इसके लिए जानते हैं। इन्होंने ही जल, जंगल, जमीन के लिए आंदोलन किया था और आज भी वही समस्यां यहां पूर्ववत बिखरी पड़ी हैं। इन समस्याओं को लेकर कभी भी हम उन्हें सदन में लड़ते देखे, न सड़क पर। हां, कभी कभी प्रेस में बयान या अपने कार्यकर्ताओं के सामने कुछ भाषणों में चर्चा जरूर करते हैं। याद कीजिए संथालपरगना में पैनम समस्या.. मैंने लंबा आंदोलन किया था। जांच शुरू हुई, रिपोर्ट आयी, उस समय इन्हीं की सरकार थी, लेकिन आज तक कार्रवाई नहीं हुई। और आज उस संथाल परगना के दर्द पर वह कुछ नहीं कर रहे जबकि इनकी चुनावी जमीन है वह इलाका। इसी बात को पिछले दिनों मैंने अपने कार्यकर्ता सम्मेलन में उठाया था। अपने लोगों को कहा कि मुख्य विपक्षी दल ने झारखंड के मुद्दों को भुला दिया है और अब हमें आगे बढ़कर आवाज उठाना होगा।

हां एक दो और बातें हमने कहीं जो अखबार में पढ़ा। मैंने कहा कि विपक्ष के नेता अपने पिताजी के लिए दिल्ली में बड़ा बंगला मांग रहे हैं सरकार से जो कहीं से शोभा नहीं देता है। वैसे, यह हाल एक पार्टी का नहीं, कई पार्टी के नेता ऐसा कर रहे हैं। जनता के पास एक झोपड़ी नहीं ये एक पर एक बंगला के लिए सारे सिद्धांत दांव पर लगाने को तैयार हैं। यह सब कहते हुए हमने कार्यकर्ताओं को आगाह किया कि उन्हें अब सड़क पर उतरकर संघर्ष करना होगा। इसी प्रसंग में मुझे वह सब बातें अपने कार्यकताओं को प्रेरित करने के लिए कहनी पड़ी। मेरा कतई मतलब किसी की आलोचना करना नहीं था।

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