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मेरे लिए यह लड़ाई चुनौती है और मंजिल की ओर एक मार्ग भीः बाबुलाल मरांडी

आठ में से छह विधायकों का पार्टी छोड़ भाजपा में चले जाने से झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातंात्रिक) के अध्यक्ष बाबुलाल मरांडी दुःखी हैं.. भाजपा से, अपने विधायकों के इस रवैये से। लेकिन, टूटे नहीं हैं बाबुलाल। वह कहते हैं, भाजपा के इस अनैतिक, गैरसंवैधानिक काम के खिलाफ सदन से लेकर सड़क तक लड़ाई लड़ेंगे। सख्ती से कहते हैं, ‘उन छह विधायकों की सदस्यता तो जाएगी ही, जाएगी!.. मेरे लिए यह लड़ाई एक चुनौती है और मंजिल की ओर एक मार्ग भी।’ इस बयान वह क्या कुछ कहना चाहते हैं, पढ़िये बाबुलाल मरांडी से न्यूज विंग की खास बातचीत विस्तार से। 

यह दूसरी बार है कि आपके विधायकों ने पार्टी छोड़ दिया, भाजपा ज्वायन कर लिया। क्या प्रतिक्रिया है आपकी? 

बीजेपी से मुझे इस प्रकार की (हरकत की) उम्मीद नहीं थी। राजनीति में मेरी पैदाईश बीजेपी में ही हुई है। बीजेपी के लोग राजनीति में शुचिता की, नैतिकता की, मूल्यों की राजनीति की बड़ी लंबी लंबी बातें किया करते थे। जब कांग्रेस पार्टी खरीद फरोख्त और पैसे का खेल करती थी.. आप याद करें, जब नरसिंहा राव की सरकार बचाने के समय उन्होंने पैसे का खेल शुरू किया और जेएमएम का सपोर्ट लिया था, तब बीजेपी ने बड़ा हंगामा किया था। सदन में भी और सड़क पर भी। ..मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री थे, न्युक्लीयर डील के समय सरकार को सदन में बहुमत जुटाना था, उन्होंने भी पैसे का खेल किया था। नोट की गड्डियां चमकायी गयीं थीं। ..तब, हमें अच्छा लगता था कि बीजेपी नैतिकता की राजनीति करती है, मूल्यों की राजनीति करती है, शुचिता की बात करती है.. लेकिन, अब लगता कि वे सारी चीजें बीजेपी में अतीत की बातें रह गई हैं। अब, जिस प्रकार से पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिला, नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनीं और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह बने, तो लगता है कि दोनों ने ही नैतिकता, आदर्श और मूल्यों की राजनीति को गुजरात के किनारे समुंदर में सब बहा करके दिल्ली चले आये हैं। तभी तो पिछले विधानसभा चुनाव से पूर्व हमारी पार्टी से कई एक विधायकों को दिल्ली ले जाकर, विधायक रहते हुए, उनकी सदस्यता से बिना त्यागपत्र दिये, माला पहनाया। बाद में, हमने उनकी सदस्यता समाप्त करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखा। अध्यक्ष ने बार बार उन लोगों को नोटिस दिया। बचने का कोई नहीं उपाय बचा तो अंतत्वोगत्वा उनलोगों को रिजाईन करना पड़ा। इसे झारखंड की धरती ने देखा है, पूरे देश ने देखा है। ..और फिर, जब विधानसभा के चुनाव हो रहे थे, बीजेपी के लोग इतने मतवाले हो गए.. उनके शब्दों में अहंकार ही फूट रहा था.. कि हम दो तिहाई बहुमत लायेंगे.. पचास सीट लायेंगे.. पैसे को पानी की तरह बहा दिया.. यह सब, दुनिया जानती है। आजसू के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़े लेकिन परिणाम.. 37 प्लस पांच, यानी 42.. और वोटों का प्रतिशत भी आप देखेंगे तो 31 प्वायंट कुछ था। आजसू केा करीब 3 प्रतिशत मिला था। यानी कुल मिला कर 35 प्रतिशत वोट उनको प्राप्त हुए। लाख कोशिश करने के बाद भी.. जो बड़े बड़े सपने उन्होंने देखे थे कि इतनी सीटें लायेंगे.. लेकिन नहीं ला पाये तो उसी दिन से भारतीय जनता पार्टी छटपटा रही थी। 

पहले तो उन्होंने हमें ही अपनी पार्टी में मिलाने की कोशिश की। हमने साफ मना कर दिया। हमने उनको बताया कि हमने सोच समझ कर अपनी पार्टी बनायी है.. जैसा हमने कहा कि हमारी पैदाईश ही वहां हुई थी.. हमने देखा कि बीजेपी सबकुछ छोड़ती जा रही है, भूलती जा रही है.. सिर्फ सत्ता में चिपके रहना, इसके लिए ऐन केन प्रकारेण पॉलिटिक्स करना.. तब मुझे लगा कि मेरे जैसे व्यक्ति के लिए, जहां पर अंतरात्मा गवाह नहीं देता हो, उस पार्टी को छोड़ ही देना चाहिए.. और मैंने पार्टी की सदस्यता से ही त्याग पत्र नहीं दिया, उस वक्त मैं लोकसभा का सदस्य भी था, उससे भी हमने त्यागपत्र दे दिया। मैं तब ही जान गया था कि जिस रास्ते पर मैं चल रहा हूं वह कठिन मार्ग है। ..और इस बार मैंने उनसे स्पष्ट कह दिया कि भईया यह संभव नहीं है, मैं बीजेपी में वापस नहीं जा सकता हूं। ..उनकी ओर से बहुत दबाव था, तो मैंने कहा कि मैं इतना कर सकता हूं कि आपको समर्थन दे सकता हूं। इसपर, उन्होंने कहा कि मुझे समर्थन की दरकार नहीं है मेरे पास 42 विधायक मौजूद हैं। तब हमने कहा कि मैं भी समर्थन देने के लिए इच्छुक नहीं हूं। चूंकि आपने कहा कि झारखंड का विकास करना है, अच्छे ढ़ंग से काम करना है, आपका साथ चाहिए.. तो मैं इस रूप में साथ दे सकता हूं, लेकिन हम विलय नहीं कर सकते हैं। लेकिन उनको खीज थी कि हमलोग पचास साठ सीट नहीं ला पाये, उसे कैसे जुटाया जाए! और, उसी प्रयास में, उसी दिन से, वे लगे हुए थे। विधायकों से संपर्क साधना.. समाचारपत्रों में, विजुअल मीडिया में आये दिन खबर छपना.. चर्चाएं भी जोरों पर थी। कभी कांग्रेस को तोड़ रहे हैं, कभी जेवीएम को तोड़ रहे हैं.. हां, पैसे और पद का प्रलोभन देकर आज हमारी पार्टी को तोड़ने में भारतीय जनता पार्टी सफल हुई है.. लेकिन हम इस लड़ाई को लड़ेंगे। संविधान के अनुच्छेद 10 में उल्लिखित है कि इस प्रकार कोई पार्टी को नहीं तोड़ सकता है.. उनकी सदस्यता तो जाएगी ही, जाएगी! (सख्त और दृढ़ लहजे में।)...यह लड़ाई तो हम सदन में लड़ेंगे ही, सड़क पर भी लड़ाई को ले जाएंगे। ..क्योंकि, कोई भी पार्टी पैसे और पद के प्रलोभन से किसी दूसरी पार्टी को तोड़ती है तो वह लोकतंत्र की हत्या है और जनादेश का अपमान है। हमारे जैसा व्यक्ति इसपर चुप नहीं रह सकता है। हम इसके खिलाफ आंदोलन का मार्ग अपनाएंगे। हमारे लिए यह एक चुनौती है और एक मंजिल की ओर बढ़ने का मार्ग भी। 

लेकिन, संविधान के हवाले जो दो तिहाई वाली बात कही जा रही है..? 

नहीं। उसको लोग गलत ढ़ंग से इंटरप्रेटेट (परिभाषित) कर रहे हैं। आप देखेंगे कि संविधान के उसी अनुभाग में स्पष्ट किया गया है, जिसके अनुसार देा तिहाई सहमति का मतलब साफ है। दरअसल उसके अनुसार, अगर कोई पार्टी किसी दूसरी पार्टी में विलय होना चाहती है तो पहली पार्टी के दो तिहाई सदस्यों की सहमति अनिवार्य है। उसी चैप्टर में आगे देखेंगे कि कोई व्यक्ति निर्दलीय चुनाव जीतकर विधायक बनते हैं और बाद में दूसरे दल को ज्वायन करते हैं तो उनकी भी सदस्यता समाप्त हो जाएगी। दसवीं अनुसूची में जब यह संसोधन हुआ तो उसमें यही बात ध्यान में रखी गई कि कोई भी व्यक्ति किसी दल से या निर्दलीय चुने जाएं और बाद में दूसरे दल में योगदान करते हैं तो वह जनादेश का अपमान माना जाएगा। इस हालत में लोग कैसे इंटरप्रेटेट कर रहे हैं कि दो तिहाई विधायक दूसरे दल में चले जाएंगे तो सदन में उनकी सदस्यता बच जाएगी! यह नही बच सकती। मैंने यह सब बहुत बारीकी से पढ़ा है। ..तो, वह लड़ाई तो हम लड़ेंगे ही। 

अब हम दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों पर बात करें? 

देखिये, बीजेपी का वह अहंकार.. पैसे के घमंड पर जिस तरह यहां पार्टियों को तोड़ने में लगे हुए है.. मैं कहूंगा कि भारतीय जनता पार्टी जिस रास्ते पर चल पड़ी है उसी का परिणाम है दिल्ली विधानसभा चुनावों का नतीजा। दिल्ली देश की राजधानी है। पूरे देश से लोग वहां बसे हुए हैं। पढ़े लिखे लोग वहां रह रहे हैं। ..अरविंद केजरीवाल को बीजेपी ने कैसे कैसे घेरा!.. उनपर क्या क्या आरोप नहीं लगाये.. इतने पैसे बीजेपी ने खर्च किया.. तब कहीं वह तीन सीट जीत पायी है। यही नहीं, उनका वोट प्रतिशत भी घटा है। और, जनता ने अरविंद केजरीवाल को 70 में से 67 सीट दे दिया। वहां चुनाव के समय हमलोग अखबार में पढ़ते थे कि बीजेपी सरकार के केंद्रीय मंत्री चुनाव संभाल रहे हैं। मोदी जी खुद अंत में कमान संभालने उतरे। एक सौ बीस एमपी को लगा दिया, देश भर से कार्यकर्ता बुलाकर टोला मोहल्लों में तैनात कर दिया। लेकिन, जनता का जो प्रवाह है उसे कहां रोक पाये! ..तो, केवल हल्ला करने से जनता बहुत दिनों तक उसे लाइक नहीं करती है। मैं समझता हूं कि आनेवाले समय में पूरे भारतवर्ष में भारतीय जनता पार्टी को उनके अहंकार की, पैसे के घमंड की कीमत चुकानी पड़ेगी। 

शुरूआत में आपने कहा कि बीजेपी से ऐसी उम्मीद नहीं थी.. ऐसी उम्मीद से आपका मतलब? 

मैं बताऊं कि जब मैंने भाजपा छोड़ा था, पार्टी में बदलाव उसी वक्त शुरू हो चुका था। लेकिन, इस स्तर तक वे नीचे उतर जाएंगे, यह मैं नहीं सोंच सकता था!.. मैं बताऊं आपको एक घटना के बारे में.. 1999 का वह दिन मुझे आज भी याद है। मैं भारत सरकार में मंत्री था। अटलजी प्रधानमंत्री थे। उस समय पार्टी की ओर से एक सांसद की कमी थी। एक दिन एक मंत्री ने मुझे टेलीफोन किया कि बिहार से एक संासद तैयार हैं भाजपा में आने के लिए। लेकिन अटलजी और अडवाणी जी तैयार नहीं हैं। मंत्री महोदय ने मुझसे कहा कि एक बार मैं भी अटलजी और अडवाणी जी से मिलकर उन्हें मनाने की कोशिश करूं। ..अटल जी पीएम थे। कौन नहीं चाहता है कि उसकी कुर्सी बची रहे।.. मैं उसी रात अटलजी से मिला। लेकिन, उन्होंने साफ मना कर दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि हमें इस प्रकार की राजनीति नहीं करनी है। कल हाउस में जो होगा देखेंगे। फिर मैं अडवाणीजी से मिला और जैसे ही वह प्रस्ताव रखा उनका चेहरा तमतमा गया। उन्होंने कठोर शब्दों में कहा कि यह सब काम बिल्कुल नहीं करना है! ..लेकिन, आज बीजेपी बदल चुकी है। शुचिता की बातें कहां चली गईं पता नहीं। इसीलिये मैं कहता हूं कि मुझे उम्मीद नहीं थी कि ये लोग इतने नीचे तक उतर जाएंगे। भई, उनके पास झारखंड में आज की तारीख में बहुमत है 42 सीटों का। उनको पूरा मंत्रिमंडल बनाना चाहिए था। सरकार चलानी चाहिए थी। ..हां, कभी बहुमत पर संकट आता, कोई उनकी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करता तो बात समझ में आती। जनता भी समझती कि भई, अच्छी सरकार चल रही और कोई इसे डिस्टैब्लाईज कर रहा है। लेकिन, आज तो ऐसी कोई समस्या भी नहीं थी। इसके बावजूद वे हमारी पार्टी को तोड़कर अपनी संख्या बढ़ा का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं.. इसको क्या कहेंगे! इसलिए मैं कहता हूं कि मुझे उम्मीद नहीं थी कि ऐसी भी कोई राजनीतिक पार्टी होगी जो पैसे के प्रभाव में एकदम अंधी हो जाएगी। 

एक सवाल.. कहीं ऐसा तो नहीं कि आपने उन्हें विलय के लिये मना कर दिया उसी का बदला चुका रही है बीजेपी? बहुत संक्षेप में जवाब दीजिएगा.. 

देखिये, मैं सार्वजनिक रूप से कहता रहा हूं कि मैं बीजेपी में नहीं लौट सकता। मैंने अथक परिश्रम करके अपनी पार्टी खड़ी की है। और.. मैं पैसे के लिए राजनीति नहीं करता हूं। राजनीति हम इस राज्य की जनता के लिए करते हैं, मुद्दों के लिए करते हैं, मूल्यों के लिए करते हैं.. और इसको हमें स्थापित करना है। इसलिए मैं लोगों को बार बार याद दिलाता हूं कि जब मैं मुख्यमंत्री था.. मुख्यमंत्री पद के लिए अगर हम राजनीति करते तो उस वक्त भी हम समझौता कर लिये होते। पूछिये उनसे.. आज भी लालचंद महतो हैं.. बीजेपी में चले गए हैं। उस वक्त क्या डिमांड थी उनकी? यही ना, एक दो पदाधिकारियों को हटा देने की। एक दो अतिरिक्त मंत्री पद देने की थी। इतना ही तो उनलोगों का डिमांड था। हमने नहीं माना। अगर हम मान गए होते तो हमारी सरकार बची रहती, हम मुख्यमंत्री बने रहते!.. लेकिन, मैंने कभी भी राजनीति को स्वार्थसिद्धि का माध्यम नहीं बनाया। गलत से कभी समझौता नहीं किया। ..जब हम भाजपा छोड़ रहे थे तो हम लोकसभा के सदस्य थे। हम जानते थे कि दोबारा हम हार भी सकते हैं। जो लोग साथ हैं वे नहीं भी हो सकते हैं। लेकिन तब भी मुझे लगा कि उस पार्टी में घुट घुट कर रहने से अच्छा है कहीं और स्वतंत्र होकर अपने विचारों की अभिव्यक्ति करें। इसके लिए एक अलग प्लेटफॉर्म तैयार करें। उसके लिए हम निकले तो सोच समझकर निकले। ..बाद के दिनों में भी कई एक अवसर आये कि अगर हम स्वार्थ की राजनीति करते, पैसे की राजनीति करते तो ढ़ेर सारे अवसर आये। ..न्युक्लीयर डील के समय, काफी लोगों ने, कांग्रेस ने हमें कहा कि आप हमें सपोर्ट करिये। फिर राज्यसभा का चुनाव आया। मेरे साथ ग्यारह ग्यारह विधायक थे। कभी एक पैसे का आरोप नहीं लगा। वहीं, यहां दूसरे दलों के बहुत सारे सांसद बिके, विधायक बिके। अभी आप देख रहे होंगे जांच दर जांच चल ही रही है। इन सबके बावजूद ‘लोग’ सोचते हैं कि इनके सामने लोभ लालच रख देंगे तो हमारी पार्टी में चले आयेंगे.. यह गलत सोचते हैं ‘वे लोग’। मैंने उनसे (भाजपा से) स्पष्ट कहा था कि अगर आपको पार्टी केा मजबूत करना है तो हम समर्थन दे देंगे लेकिन विलय नहीं करेंगे।  

लेकिन, मेरा सवाल था..? 

जहां तक आपका सवाल था ‘बदले की भावना’ वाली बात, तो यह भले सही नहीं हो, लेकिन उन्हें लगता था कि ‘हमने (भाजपा ने) चुनाव से पहले 50 सीट लाने की घोषणा की थी, नहीं मिला तो उसी आंकड़े को जुटाना है, साबित करना है! यह दुनिया को दिखाना है कि मेरे पास बड़ी ताकत है!’ यह सब बस अहंकार, अहं की तुष्टि के लिए कर रहे हैं वे लोग। 

इस बीच, यह भी चर्चा हुई कि आपको मुख्यमंत्री बनाने का ऑफर भी दिया गया था। कितना सच है?

हां, चर्चा तो खूब हुई.. लेकिन मैंशुरू से कह रहा हूं कि किसी नेता या पार्टी के रहमोकरम पर मैं मुख्यमंत्री बनना पसंद नहीं करूंगा। चूंकि, मैं इस राज्य की जनता के लिये पॉलिटिक्स करता हूं। जनता अगर मुझे उस योग्य समझेगी तो जरूर हम उस दायित्व को निभायेंगे। राज्य की जनता हमें उस योग्य नहीं समझी तो हम उस प्रकार का सपना भी क्यों देखें! ..दिल्ली के नेता तो हमें वर्ष 2000 में भी बनाये थे, उसका परिणाम और अंजाम हम देख चुके हैं। हम उस प्रकार का सीएम कभी भी बनना नहीं चाहेंगे। ..कि कुछ भी काम करना है दिल्ली से आदेश लें, कुछ भी काम करने के लिए उनसे आदेश लें.. भई, हम जनता के बीच तो कमिट (वादा) करके आये हैं, उनकी जो तकलीफ को हम देखते हैं उसको दूर करने के लिए हम स्वतंत्र ही नहीं हों और ‘किसी’ (खास व्यक्ति या दल) की इच्छापूर्ति के लिए सरकार बनाने के कभी पक्षधर हम नहीं रहे। लोगों को इस तरह का कोई भ्रम नहीं रखना चाहिए मेरे बारे में। 

एक भावनात्मक सवाल.. बहुत कम समय के अंतराल में आपकी पार्टी को दो दो बार तोड़ा गया। यह कोई सहज सामान्य घटना नहीं है। बड़ी बड़ी शख्सियतें बिखड़ जाती। आपके अंदर ऐसी कौन सी ताकत होती है जो ऐसे कठिनतम वक्त में आपको विचलित नहीं होने देती? 

मैं कहूंगा कि राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में मेरे साथ जो घटनाएं घटीं वह भारतवर्ष के इतिहास में पहले भी होती रही हैं। धार्मिक ग्रंथों से लेकर हालिया इतिहास तक में उदाहरण मिलते हैं। मैं उन्हें ही याद करता हूं। जब त्रेताकाल में रावण का अत्याचार था, द्वापर काल में कंस का, मौर्यकाल के इतिहास में घनानंद का आतंक और हालिया इतिहास में फिरंगियों के कब्जे में छटपटाता भारत.. वे सामर्थ्यवान इतने मतवाले हो गए कि अच्छे बुरे की समझ खत्म हो गई। खुलकर अत्याचार किया। लेकिन अंततः उन सब का नाश भी हुआ। राम पैदा हुए, कृष्ण का जन्म हुआ, चाणक्य का उदय हुआ और फिरंगियों को खात्मा किया हमारे देशभक्त आजादी के दीवाने भगतसिंह, सुभाष से लेकर सिद्धु कान्हु, चांद भैरव, बिरसा मुंडा ने। पलासी के युद्ध से शुरूआत कीजिए तो लगातार लोग संघर्ष ही करते रहे आजादी के लिए। यह आसानी से तो नहीं मिला। मैं भी मानता हूं कि जिस ध्येय और जिन उद्ेदश्यों के लिए हम लड़ाई लड़ रहे हैं बिना कीमत चुकाए उन उद्देश्यों की पूर्ति तो हो नहीं सकती। ..हमने कौन सी कीमत चुकायी है?!.. 2006 में हमने भाजपा से इस्तीफा दिया, लोकसभा से इस्तीफा दिया लेकिन जनता ने फिर से मुझे एमपी बना दिया, ग्यारह विधायक भी दे दिये। इस दौरान तो हमने तो कोई कीमत चुकायी ही नहीं। कीमत चुकाने की बारी तो अब आयी है। हम लोकसभा चुनाव हार गए, विधानसभा चुनाव भी हार गए, अब सामान्य जनता की तरह ही हम भी हैं। अब होगी हमारी असली परीक्षा। जनता साथ देती है कि नहीं, यह जनता का धर्म है। हमारी असली परीक्षा तो अब होगी कि हम जनता के लिए क्या सोंचते हैं, किस प्रकार काम करते हैं। जनता के प्रति हमारा कमिन्टमेन्ट कितना है, राज्य के प्रति कितना है.. यह परख अब होगी। मेरे लिए यही असल परीक्षा की घड़ी है। 

अब फिर से वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बात करें.. आपने कहा कि हम इस लड़ाई को लड़ेंगे, कैसे? 

पहले तो, हमने विधानसभा अध्यक्ष को लिख कर दिया है कि हमारी पार्टी छोड़ भाजपा में शामिल होनेवाले छह विधायकों की सदस्यता समाप्त करें। 

अध्यक्ष इसका निर्णय तुरंत लेंगे या समय लगेगा? 

उन्हें त्वरित निर्णय लेना चाहिए। मैं मानता हूं कि विधानसभा के अध्यक्ष न्याय की कुर्सी पर होते हैं। विलंबित न्याय का मतलब है न्याय नहीं मिलना।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी के प्रचंड विजय को आप कैसे लेते हैं? भाजपा की इस करारी हार के पीछे कारण क्या मानते हैं आप? 

लोकसभा चुनाव में भाजपा को, नरेन्द्र मोदी जी को भारी सफलता मिली। कारण था कि उन्होंने जनता के बीच ‘भ्रष्टाचारमुक्त भारत’ बनाने की बात की थी। विदेशों में काला धन के मुद्दा प्रमुखता से रखा था। लेकिन, अब तो नौ महीने बीत गए। अब देश की जनता को लग रहा है कि ये भाषण ही दे रहे हैं.. पीसी सरकार जैसे जादुगर क्या करते हैं! केवल ड्रेस ही चेंज करते हैं और हाथ की सफाई दिखा कर दर्शकों को भ्रमित करते हैं। सचमुच में वैसा कुछ होता नहीं है। वही हाल इनका है। हां, मीडिया में बने रहने का गुर इन्हें खूब आता है। जब वे (मोदी) ओथ (शपथ) ले रहे थे, पड़ोसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को बुला लिया। अच्छी बात है! लेकिन, उससे निकला कुछ भी नहीं। पड़ोसी देशों से आज भी हमारे संबंध कैसे हैं दुनिया जानती है। पाक की गोलीबारी जारी है। चाइना के राष्ट्रध्यक्ष यहां आये, उनके साथ झुला झूलते रहे और उधर चीनी सैनिक सियाचीन में गोला बारूद दागते रहे। आप अमेरिका गए, ओबामा को गणतंत्र दिवस पर यहां बुलाकर जो प्रोपोगंडा किया उसका क्या नतीजा मिला या मिलेगा! ओबामा लौटकर गए तो हमारे देश की विचारधारा पर ही कटाक्ष किया। गांधी के विचारों को नजरंदाज करने की बात तक सुना दी। हमारी ही विचारधारा की सीख ‘ये’ ओबामा से दिलवा रहे हैं। ..तो, जनता को लगा कि ये काम कुछ नहीं कर रहे केवल भाषण दे रहे हैं.. हमने इनको बहुत कुछ दे दिया, केंद्र से लेकर महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा दे दिया फिर भी वे काम कुछ नहीं कर रहे। अब नहीं चलेगा भाषण तुम्हारा! और उसी का जवाब दे दिया जनता ने। और उधर अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के विकास पर तर्कसंगत ब्लुप्रिंट तैयार कर जनता के सामने रखा। लोगों को विश्वाास हुआ केजरीवाल पर। 

एक गंभीर सवाल.. आप भाजपा में रहे हैं। भाजपा और आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के संबधों को नजदीक से देखा है। इस हालात पर आरएसएस चुप कैसे है? क्या आपको लगता है कि इस परिस्थिति में आरएसएस को कुछ करना चाहिए था? 

देखिये, मैंने जहां तक समझा है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक विचारधारा वाला मंच है जो केवल सुझाव देता है। सत्ता में बैठे लोगों की अपनी कमजोरियां होती हैं। उनको जो सूट करता है उसे मान लेते हैं, जो नहीं सूट करता उसे नहीं मानते हैं। 

धारणा तो यह है कि आरएसएस..? 

(बीच में ही टोक कर) देखिये धारणा तो बहुत कुछ है.. अपने गांव का एक उदाहरण देता हूं.. हम लोग जब छोटे बच्चे थे तो गांववाले पास के एक गहरा नाले से बचाने के लिए हमलोगों को डराते थे। वहां कई जंगल झाड़ थे। लोग कहते थे, उधर मत जाना वहां चुड़ैल रहती है! बड़े होने के बाद भी, जब भी लोग उधर से गुजरते, जेहन में वह बात एक बार जरूर कौंध जाती। यह जानते हुए भी कि चुड़ैल जैसी कोई चीज नहीं, शरीर में एक सिहरन हो ही जाती है। बावजूद इसके, हम उस रास्ते से गुजरना बंद नहीं कर देते। ठीक उसी तरह है यह भी एक धारणा, एक भाव बना हुआ है.. जब जनसंघ बना था, उस समय संघ में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोग थे.. खास सम्मान था उनका। उस समय पार्टी का शुरूआती समय थे। लगता था जैसे संघ जो कह रहा है पार्टी वही कर रही है। लेकिन, आज जिस तरह से पार्टी (भाजपा) सत्ता में आयी, संघ की या किसी की क्या हिम्मत कि मोदी जी जो काम करेंगे, संघ उसे नहीं पसंद करेगा तो मोदी जी को कान पकड़कर बाहर कर देगा! आज की तारीख में यह संभव है क्या?!.. यह बिल्कुल संभव नहीं। ..ठीक है, उनको जीत दिलाने में संघ के लोगों ने काम किया होगा, विश्वय हिंदू परिषद के लोगों ने काम किया होगा। संघ भले ही यह बोले कि मोदीजी की जीत में हमारा योगदान है!.. इधर, मोदी जी भी बोलें कि उसी पाठशाला से हम निकले हैं! लेकिन, यह सब बोलने भर की बातें हैं, करेंगे वही जो उनको अच्छा लगेगा। 

यानी, संघ एक मुखौटा भर रह गया है? 

हां, इनकी (संघ की) भी मजबूरी है, ये इतने मजबूत नहीं है कि खुद को अलग कर सकें। इनको और कोई सहारा तो मिलेगा नहीं। उसी तरह पार्टी के लिए भी संघ का चेहरा साथ रखना जरूरी है, वोटरों के लिहाज है। यानी कुल मिलाकर दोनों का एक दूसरे के साथ जुड़ा रहना दोनों की जरूरत है। इसीलिए मैं कहूंगा कि वही भूत वाली कहानी भर है यहां भी।

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