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आदर्श 'प्लुरल सोसायटी' बन सकता है झारखंड : न्युरो सर्जन, डा नारायण

प्रदेश में शमां राजनीति का है। नए पुराने राजनीतिक चेहरों की नुमाईश हो रही है। लेकिन अधिकांश ऐसे ही चेहरे सामने दिखते हैं जिनपर खास किस्म का ठप्पा है। दावों की डुगडुगी बजानेवाले, वादों की फुहारें बरसाने वाले। किसकी कही सुनें और किसकी मानें। आम आदमी भ्रमित है। कोई ऐसा मिले जो पते की बात बताये, राह सुझाये। लेकिन कौन?.. न्यूज विंग ऐसे ही शख्स को तलाश कर आपसे रूबरू कराता रहा है। तीन अंक पहले हमने आपसे मिलवाया था एक शीर्ष सेवानिवृत पदाधिकारी से, जिनकी ईमानदारी और लंबे बेदाग अनुभव को हमेशा सराहा गया। हमारी कोशिश है कि ऐसे पर्सनालिटी को तलाशें जो झारखंड को नजदीक से समझता है। अपनी तीक्ष्ण दृष्टि के बूते महज नब्ज देखकर व्याधि पहचान सके और सुझाये चिकित्सा के उपाय। तो चलिए मिलते हैं, झारखंड के जाने माने शीर्ष न्यूरो सर्जन डा एच पी नारायण से। डा नारायण पिछले पांच दशकों से झारखंड में रह रहे हैं। वैसे तो न्यूरो सर्जरी चिकित्सा में इनका कोई सानी नहीं, लेकिन इनके व्यक्तित्व का दूसरा आयाम भी कुछ कम नहीं। आधे दर्जन सामाजिक संस्थाओं के शीर्ष पदों पर अवैतनिक सेवा देते रहे हैं। आज भी बेहिचक अपनी उम्र बताते हैं.. 'हां, मैं 81 वर्ष का नवजवान हूं!..' पढ़िये डा नारायण का पूरा इंटरव्यू : 

आप रांची के वरिष्ठ नागरिक हैं। चिकित्सा जगत में एक न्यूरो सर्जन के तौर पर आपकी बड़ी ख्याति है। आपके नाम की चर्चा होने पर एक और विशिष्टता सामने आती है, एक समाजसेवी के तौर पर। क्या आप किसी राजनीतिक दल के सदस्य भी हैं?

मैं किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं हूं, लेकिन हर बार वोट तो देता हूं। और, मेरा मानना है कि किसी राजनीतिक तंत्र के द्वारा समाज का कल्याण होगा, यह संभव नहीं है। कारण.. इसके लिए मैं इतिहास का उदाहरण देना चाहूंगा.. इस देश में सबसे बढ़िया राज्य माना जाता है ‘राम राज’ को। गांधी जी के लिए तो वह आदर्श ही था, बाकी बड़े लोग भी मानते रहे हैं। लेकिन, जिसको हम आदर्श राज्य मानते हैं उस राज्य में एक गर्भवती स्त्री को आधी रात में एक जंगल में भेज दिया गया, और अबतक जो भी साहित्य उस संदर्भ में उपलब्ध है उसमें कहीं भी यह चर्चा नहीं कि उस घटना के विरोध में कुछ लोग खड़े हुए हों.. उन्होंने विरोध किया हो, कि ऐसा नहीं होना चाहिए! ..जब आदर्श राज्य में ऐसा हो सकता है तो फिर यह अपेक्षा करना कि ‘राजतंत्र’ (शासनतंत्र) के द्वारा समाज बदलेगा, महज दिवा स्वप्न है! ..समाज बदलने के लिए समाज को आगे आना होगा। समाज के हर नागरिक को अपना उत्तरदायित्व समझना होगा। जिसको अंग्रेजी में ‘सिविक सेन्स’ कहते हैं, उसको बढ़ाने की जरूरत है। सच पूछिये तो बदलाव तभी होगा जब सिविक सेन्स चरम सीमा पर पहुंचेगा। लेकिन, यह सिविक सेन्स अपने आप विकसित तो नहीं होगा..? यह, या तो मनुष्य के संस्कारों से आता है अथवा समाज के विभिन्न आयामों के जो शीर्ष हस्तियां हैं उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उभरता है।

लेकिन, आज ऐसे अनुकरणीय व्यक्तित्व का घोर अभाव दिखता है..?

आपका कहना ठीक है.. इसका उपाय है जो बहुत पहले इतिहास में बताया गया था। ..एक बार अजातशत्रु नालंदा पर आक्रमण करनेवाला था। भगवान बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनन्द से पूछा, ‘आनन्द, क्या लिछ्वी लोग आपस में मिलते हैं.. निरंतर मिलते हैं?’ आनन्द ने उत्तर दिया, ‘हां भन्ते, मिलते हैं।’ फिर बुद्ध ने पूछा, ‘क्या यहां बड़े लोग छोटे लोगों की बातें प्रेम पूर्वक सुनते हैं.. और, छोटे लोग बड़े लोगों की बातें आदरपूर्वक सुनते हैं? आनन्द ने बताया, हां, सुनते हैं। बुद्ध का उत्तर था, ..तब, कोई इनको हरा नहीं सकता।' ..आज हमारे समाज में उसी संभाषण की कमी है। यह सही है कि डाक्टर लोग, डाक्टरों के साथ बैठते हैं, दुकानदार लोग दुकानदारों के साथ बैठते हैं, रिक्शावाले रिक्शावालों के साथ बैठते हैं ... लेकिन समाज में उपर से नीचे तक संभाषण का द्वार खोलने की जरूरत है। यह तभी हो सकता है जब सभी लोग आपस में मिलें। आपस में विचार विमर्श करें। 

लेकिन, समाज खुद ब खुद तो यह नहीं कर सकता!... 

..वही मैं बताने जा रहा था.. इस काम को बढ़ावा देने के लिए जरूरत है एक ऐसी समिति बने, एक ऐसा परिषद बने जो इस दायित्व का निर्वाह करे। देखिये, समाज में जितने भी घटक हैं, सभी का अपना अपना एसोसिएशन है, यूनियन है। लेकिन, ये एसोसिएशन, यूनियन केवल अपने लोगों के लिए सोचते हैं। जरूरत है इन सबको एक प्लेटफॉर्म पर एकत्र होने की। और, मिलकर पूरे समाज के लिए सोचने की। छोटे पैमाने पर यह शुरू हो सकता है। डाक्टर, वकील, बुद्धिजीवी.. सभी एक साथ जुटें। ये लोग दक्ष लोगों, युवाओं को जोड़ें। समस्याओं, जरूरतों पर विमर्श हो। समाधान निकलने लगेगा। 

झारखंड में सामूहिकता की सोच हमेशा से सर्वोपरि रही है। खासकर यहां के स्थानीय, आदिवासियों, भूमिपुत्रों में यह कारगर रहा है। सामूहिकता और आपसी संवाद से समाधान निकालने का चलन रहा है। लेकिन, बाहरी प्रभाव से वह भी खत्म होता दिख रहा है। क्या आप मानते हैं कि अलग झारखंड बनने के बाद, पिछले चौदह वर्षों में यह बिखराव कुछ ज्यादा हुआ है? 

नहीं। ..आजकल हर देश में ‘प्लुरल सोसायटी (बहुवचन समाज)। इस प्लुरल सोसायटी से उत्पन्न समस्याओं से हर देश जूझ रहा है। मैं समझता हूं, कि भगवान ने हमें मौका दिया है दुनिया को यह दिखाने का कि प्लुरल सोसायटी में भी प्रगति संभव है, और लोग सुखपूर्वक रह सकते हैं। ..झारखंड के परिप्रेक्ष्य में मैं कहना चाहूंगा कि यहां दो सोशल फोर्स है। एक सोशल फोर्स है वे लोग जो आदिवासी हैं, समझते हैं कि हम ही यहां के मूलवासी हैं। दूसरा सोशल फोर्स वह है जिनके बारे में कहा जाता है कि वे बाहर से आये हैं, यहां आकर बस गए हैं। लेकिन, इन दोनों में कोई भी कहीं खिसकने वाला नहीं है। इन्हें एक साथ ही रहना है। और, इन दोनों के बीच दृढ़ संबंध स्थापित हो, यह काम करना समाज के हर व्यक्ति का उत्तरदायित्व है। 

लेकिन, क्या यहां ऐसा होता दिखता है..? 

मैं निराश नहीं हूं। एक उदाहरण देना चाहूंगा.. याद कीजिए यहां वनवासी कल्याण आश्रम की ओर से यहां खेल कूद का एक बड़ा आयोजन हुआ था। मैं उसका आयोजक था। उस समय 30 हजार आदिवासी इस शहर में धनुष वाण लेकर पहुंचे थे। ऐसा दृश्य था कि उस समय हर दुकान का शटर गिर जाता, दुकानें बंद हो जातीं। लेकिन, मेन रोड से उनका काफिला गुजरा, एक भी दुकान का शटर डाउन नहीं हुआ। निरंतर दो ढ़ाई घंटे तक लोग मोराबादी मैदान में पहुंचते रहे और खेलकूद का कार्यक्रम शांतिपूर्वक संपन्न हो गया। ..उस समय मेरी आंख खुली.. इतना अनुशासन यहां के लोगों में ही है, दूसरे जगह के लोगों में नहीं। आज जरूरत है यहां के लोगों में उपयुक्त शिक्षा की, पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा की। दुर्भाग्यवश, आज पूरे झारखंड में कोई ऐसी जगह नहीं है जहां इन लोगों का पूर्ण रूप में मुफ्त में इलाज हो सके, न सरकारी अस्पताल में, न प्राइवेट में। ..इस तरह की कमियां हमें दूर करनी होगी। 

झारखंड के आम और कमजोर लोगों के हित में किन मूलभूत आवश्यक्ताओं में आप सुधार की जरूरत देखते हैं? 

देखिये, इस समाज में तीन ‘कटिंग एज’ हैं, एक है कचहरी, दूसरा है अस्पताल और तीसरा है पुलिस थाना। इन तीनों कटिंग एज पर किसी साधारण आदमी को कोई दिक्कत न हो यह हमें सुनिश्चि त करना होगा। तभी जाकर समाज का कल्याण होगा। 

लेकिन, झारखंड बनने के बाद पिछले 14 वर्षों में आम लोग काफी निराश हुए हैं। प्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता, राजनेताओं और शासकों का चरित्र यहां के लोगों में क्षोभ बढ़ाता रहा है। एक बार फिर विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। जाहिर है, राजनीति ही तमाम समस्याओं का हल दिखती है। आप इस हालात में कैसाी संभावना देखते हैं? 

देखिये, राजनीति से आप भाग नहीं सकते हैं। हां, पिछले चुनावों और इस दफे के चुनाव में एक मौलिक अंतर मुझे दिखता है। सच पूछिये तो पहली दफा यहां के युवा वर्ग में एक आशा जगी है। वह समझ रहा है कि हम इस हालात को बदल सकते हैं। एक एहसास बढ़ा हैं कि परिवर्तन युवाओं के हाथ में है। अबकी बार जो सरकार आयेगी उसके लिए भी यह खतरे की घंटी है। अगर वह काम नहीं करती है तो उसे मुंह की खानी होगी। 

यानी आप इस चुनाव में सकारात्मक परिवर्तन की संभावना देखते हैं। इस संभावना से ज्यादा से ज्यादा लोगों को कैसे जोड़ा जाए? 

झारखंड में, लोगों को जोड़ने का दो तरीका है। इतिहास गवाह है, बाल गंगाधर तिलक ने गणेश चतुर्थी पर्व को घर से निकाल कर सार्वजनिक पर्व बनाया और लोगों को सफलता पूर्वक एकत्र करने का नुस्खा दिया। आज भी महाराष्ट्र में ‘बप्पा मोरया..’ के नारे के साथ विशाल जनसमूह दिखता है। दूसरा तरीका है.. जो खासकर झारखंड के लिए कारगर है, वह है खेलकूद। ..आप हर स्कूल में केवल एक फुटबॉल दे दीजिए.. फिर देखिये कैसे आपका नाम बढ़ता है। हमलोग वनवासी कल्याण आश्रम की ओर चलाये जा रहे स्कूलों में खेलकूद का कार्यक्रम करते हैं। हमने हर स्कूल में एक एक फुटबॉल दे दिया। बच्चों में गजब का उत्साह और टीम भावना बढ़ने लगी। स्कूली बच्चे ही नहीं परिवार, गांव के लोग भी जुड़ने लगे। ग्रामीण फूटबॉल मैदान में केवल बच्चे ही नहीं घर परिवार के सदस्य भी पूरे उत्साह के साथ जमा होने लगे। 

लोग जुड़ भी जाएं तो यहां के नेताओं की फितरत कैसे बदले? 

देखिये इस बार ऐसा लग रहा है कि ‘वैसे’ नेताओं में भी भय हुआ है। पहली बार कोई प्राइम मिनिस्टर चीख चीख कर बोल रहा है कि ‘न खायेंेगे, न खाने देंगे!’ किसी लोकतांत्रिक देश से करप्शन को दूर करने का सबसे कारगर तरीका है ‘नंबर वन’ को करप्शन फ्री होना। तब, नंबर दो, नंबर तीन.. ऐसे जो नीचे वाले हैं उन्हें ऊपर पैसा पहुंचाना नहीं है.. स्वतः ही करप्शन कम हो जाएगा। ..याद कीजिए लाल बहादुर शास्त्री को.. कोई कड़ा ऐक्शन उन्होंने लिया था?.. नहीं लिया। सभी जानते थे कि वह एक ऑनेस्ट प्राइम मिनिस्टर हैं.. करप्शन का ग्राफ अपने आप नीचे गिर गया।  

आप अब सीधा नरेंद्र मोदी की ओर इशारा कर रहे हैं। उनके व्यक्तित्व से सुधार में संभावना देख रहे हैं। झारखंड के प्रसंग में भी?.. जल्द ही नई सरकार बनेगी। मान लीजिए भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनी.. तो क्या, बेहतर सरकार के लिए केंद्र का हस्तक्षेप निरंतर अपेक्षित होगा? क्या झारखंड सरकार केंद्र के रिमोट पर चलेगी? अगर नहीं तो आपकी नजर में, झारखंड में ऐसा चेहरा है जो ईमानदारी के उस पैमाने पर फिट होता है? 

आपने एकदम दुखती रग पर उंगली रख दी.. इसका एक ही उपाय है, यहां के लोगों को जागरूक होना होगा.. जिसको ‘वाच डॉग’ कहते हैं ना.. झारखंड के समाज में उस तरह की संस्था खड़ी करनी होगी। अब उसको आप ‘थिंक टैंक’ कहिए.. या जो कहिए। नहीं, तो आप आगे नहीं बढ़ पाएंगे। 

डाक्टर साब! एक बात तो आप भी मानेंगे कि झारखंड में कई तरह के समाज हैं, जिनका इतिहास रहा है कि वे मिलकर सुगमता से रहते रहे हैं। उनमें हैं, स्थानीय आदिवासी, ईसाई, मुस्लिम, बाहर से आकर बसे हिन्दू आदि। लेकिन, आज की तारीख में वह सामूहिक सोच वाला ढ़ांचा बिखरता जा रहा है। आप इससे सहमत हैं? 

मैं इससे सहमत नहीं हूं। देखिये, समाज क्या चाहता है?.. हमारे बच्चों को शिक्षा मिले, परिवार को स्वास्थ्य सुविधा मिले और हम शांति से सुखपूर्वक अपना काम करते चलें। बस, सरकार यही सुनिश्चियत कर दे तो लोग खुद तरक्की कर लेंगे। 

लेकिन, आज झारखंडी समाज की जटिलताएं इतनी बढ़ चुकी हैं कि यह सबकुछ इतना आसान नहीं लगता..? 

..मैं इसी प्रसंग पर आ रहा था.. एक बार रांची के हिंदपीढ़ी मुहल्ले के मुसलमानों ने सभा आयोजित की और मुझे चीफ गेस्ट के रूप में आमंत्रित किया। दरअसल, कुछ मुस्लिम युवक हमारे पास आये और मुझे आमंत्रित किया। मैंने तुरंत सहमति दे दी। वे यहां अगल बगल में कुछ अन्य हिंदु परिवारों में भी न्योता देने गए। वहां उनलोगों युवकों से कहा.. ‘आपलोगों ने इनको बुलाया.. आपलोगों को पता नहीं कि ये कट्टर हिंदू हैं, इनको कैसे आपने चीफ गेस्ट बना लिया!’.. वे लड़के फिर मेरे पास आये। कहा, ‘सर हमलोग फलां फलां आदमी के यहां गए थे, उन्होंने ऐसा ऐसा कहा’.. मैंने लड़कों से कहा, उन्होंने ठीक कहा है, मैं कट्टर हिंदू हूं। मैं चाहता हूं कि तुम भी कट्टर मुसलमान बने रहो। मेरे विचार से अच्छे हिंदू और अच्छे मुसलमान में कोई फर्क नहीं है, दोनों एक ही हैं। फिर भी, तुमलोग किसी और को चीफ गेस्ट बनाना चाहते हो तो बना लो। ..वे लड़के बाहर गए, कुछ देर बाद दोबारा मेरे पास आये और कहा, ‘सर हमलोगों ने तय किया है कि आप ही हमारे चीफ गेस्ट होंगे।’ ..और मैं उस कार्यक्रम में गया। ..जरूरत है, ईमानदारी की, उसी की इज्जत होती है। 

देखिये डाक्टर साब, आपकी पेशेगत प्रतिष्ठा को मद्देनजर आपका वह अनुभव वाकई सुकून देनेवाला है। लेकिन, जब व्यापक भारतीय समाज की बात आती है तो क्या आज हम अल्पसंख्यकों के मन से आरएसएस, विश्व  हिंदू परिषद आदि कट्टर हिंदूवादी संस्थाओं का भय हटा पाने में सक्षम हैं?

देखिये, सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि आज हिंदू, मुस्लिम या सिख, ईसाई.. उसकी पहली चाहत है बेहतर जिंदगी, तरक्की और सुकून। धर्म को वह इसके आड़े नहीं आने देना चाहता। और, हर आदमी को इसी पहलू को तवज्जोह देना चाहिए। थोड़ी देर के लिए हम सबकुछ भूल जाएं और मानें कि समाज ही भगवान है। इसी भगवान की हमें सेवा करनी है.. इस समाज में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई सभी हैं। 

आप वनवासी कल्याण आश्रम नामक संगठन से जुड़े हुए हैं। इसका जुड़ाव भी तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से है..? 

हां संपर्क है, लेकिन आरएसएस के कंट्रोल में नहीं है। ..देखिये, वनवासी कल्याण आश्रम का काम केवल शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में है। हमको पॉलिटिक्स से कोई मतलब नहीं है। कांग्रेस के लोग भी हमारे साथ रहे हैं। यहां कार्तिक उरावं की जयंती हमलोग मनाते हैं। कहने का मतलब यह कि वनवासी समाज को आगे बढ़ाने के लिए जो भी संभव हो हमलोग करते हैं, चाहे उसके लिए हमें कांग्रेस से मदद मिले या कम्युनिस्ट से मदद मिले। 

एक गंभीर सवाल.. ऐसी चर्चा होती है कि झारखंड में ईसाई मिशनरियों के प्रतिद्वंद्वी के तौर पर वनवासी कल्याण आश्रम खुद को उभारने की कोशिश करता रहा है। कहां तक सफलता मिली, यह तो आप बतायेंगे..? 

इस सवाल के उत्तर में मैं आपको तनिक इतिहास की ओर ले जाना चाहूंगा ताकि आपको परिप्रेक्ष्य मालूम हो जाए.. वनवासी कल्याण आश्रम का काम कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू किया गया था। उस समय भाजपा की सरकार नहीं थी। जब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे पं. रविशंकर शुक्ला.. वह जब जशपुर गए तो वहां उनका स्वागत किया गया उन तख्तियों से जिसपर लिखा थाः इंडियन्स गो बैक (रोमन में लिखा हुआ)! ..शुक्ला जी को बड़ा आश्चिर्य हुआ.. यहां के लोग पढ़े लिखे नहीं हैं, फिर यह अंग्रेजी कौन लिख रहा है? पता लगाया तो मालूम हुआ कि उस समय कुछ विदेशी पादरी लोग यह सब करवा रहे हैं। उसी समय स्पष्ट तौर पर बात सामने आयी कि मामला भोले भाले आदिवासियों के धर्मान्तरण का है।.. शुक्ला जी ने महसूस किया कि यह तो बहुत खतरनाक हालात बन रहा है। बात सामान्य होती, एक धर्म से दूसरे धर्म में स्थानांतरण की, तो खास बात नहीं थी, लेकिन वहां जो माहौल बन रहा था कि धर्मान्तरण के बाद लोग अपने समाज और देश की भावना से कटने लगे थे।.. गांधीजी कहा करते थे, ‘धर्मान्तरण इज द डेडलिएस्ट प्वायजन फॉर द फाउन्टेन ऑफ ट्रूथ!’.. गांधीजी और स्वामी विवेकानंद ने धर्मान्तरण के विरूद्ध जितना लिखा और कहा, उतना आरएसएस का कोई आदमी आज तक बोल नहीं पाया। ..यह सब केवल धर्म का परिवर्तन होता तो कोई बात नहीं थी, लेकिन यह तो ‘डिइन्डियनाइजेशन’ किया जाता रहा। चर्च वालों को चाहिए कि वे अपने चर्च का ‘इन्डियनाइजेशन’ करें। इसके तो बाजाप्ता उदाहरण हैं, जैसे, चर्च ऑफ इंग्लैन्ड.. आप क्यों नहीं बनाते हैं चर्च ऑफ इंडिया?! ..आप इस देश की मिट्टी पर खड़े हैं, देश के स्ट्रेन्ग्थ पर खड़े हैं। 

शिक्षा के क्षेत्र में, झारखंड में ईसाई मिशनरियों की छवि एक प्रणेता की है। शिक्षा के प्रचार प्रसार में उनकी महती भूमिका को क्या आप अस्वीकार कर देंगे? 

संसार में अच्छा काम करने का किसी का ठेका नहीं है! उन सभी लोगों का हम आदर करते हैं, साधुवाद देते हैं.. चाहे वह हिंदू हों, मुसलमान हों, क्रिश्चिहयन हों.. लेकिन, शिक्षा की आड़ में धर्मान्तरण करना, यह हमें बर्दास्त नहीं है। ..ऐसी जगहें हैं इस देश में जहां कहा जाएगा कि आप क्रिश्चिलयन बन जाइये, आपका मुफ्त में इलाज होगा! ..आज भी ऐसा है। 

चलिए अब वर्तमान चुनाव और राजनीतिक हालात पर बात करें। क्या आपको लगता है कि नरेंद्र मोदी का चेहरा सामने रखकर झारखंड में भाजपा इस बार सरकार बना लेगी? 

देखिये, मैं कोई राजनीतिक ज्योतिषी तो हूं नहीं, और, पॉलिटिक्स में मेरी रूचि भी नहीं है। किसी भी पॉलिटिकल पार्टी के मंच पर मैं आजतक गया नहींं। मैं केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जाता हूं। वोट देता हूं। लेकिन, मेरी आस्था, मेरा समय, मेरा श्रम वनवासी कल्याण आश्रम और धार्मिक कार्यों के लिये व्यतीत होता है। इससे जो बचता है वह साहित्य और दर्शन क्षेत्र में देता हूं। 

आपके पास जीवन का एक भव्य अनुभव है। अगर समाज को जरूरत हुई तो क्या आप ऐसे (पॉलिटिकल) प्लेटफॉर्म पर नहीं जाएंगे? 

क्येां नही जाएंगे? 

मान लीजिए आज आपको प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव मिले तो क्या आप स्वीकारेंगे?

(थोड़ी झिझक, फिर..) देखिये, यह क्षेत्र भी प्रजातांत्रिक प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। प्रजातांत्रिक प्रक्रिया के अनुसार लोग जो कुछ कहेंगे, करूंगा! 

आप झारखंड के मुख्यमंत्री बन गए तो आपकी प्राथमिकताएं क्या होंगी? 

मुख्यमंत्री कौन बनता है यह महत्वपूर्ण नहीं है, काम करने का तरीका महत्व का विषय है। पहले किसी एक आयाम को लीजिए। उसे दुरूस्त कीजिए, फिर दूसरे.. 

आप कौन सा आयाम पहले चुनेंगे? 

देखिये, समाज के उन तीन हिस्से को हम पहले दुरूस्त करेंगे जहां आम आदमी को सबसे अधिक तकलीफ होती है, वह है, अस्पताल, कचहरी और पुलिस थाना। इन तीनों में सुधार एक साथ संभव नहीं। एक एक कर चुनना होगा। सबसे कमजोर हालत अस्पतालों की है। पहले इन्हें दुरूस्त कीजिए। इनको दुरूस्त करना आसान है। 

हां, चिकित्सा का पहलु बहुत जरूरी है। कल तक डाक्टरों को भगवान माना जाता था, आज लोग दबी जुबान में ही सही, बेहद नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। उनकी मनमानी और लापरवाह रवैये को लेकर लोगों में काफी क्षोभ है? 

दरअसल, शासन ने कभी डाक्टरों को कन्फिडेन्स में लिया ही नहीं। ..यही डाक्टर लोग आज डाक्टरी की शिक्षा के लिए इंग्लैन्ड से काफी प्रभावित हैं। और आज दुनिया में सबसे अच्छा हेल्थ सर्विसेज है इंग्लैन्ड में, क्यों? ..क्योंकि वहां की सरकार ने डाक्टरों को कन्फिडेन्स में लिया। उनसे पूछा, आप क्या चाहते हैं?.. उनके साथ बैठकर उनकी मंशा और कार्यप्रणाली को समझा। एक समय वहां भी यह समस्या थी। सरकार समझ रही थी कि डाक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस बंद करवाना संभव नहीं है। डाक्टरों से सीधी बात की। ..आपलोग प्राइवेट प्रैक्टिस करना चाहते हैं, हम आपको जगह देते हैं, यहीं अपना प्रैक्टिस कीजिए, ऑपरेशन कीजिए.. और सरकार ने वहां सरकारी डाक्टरों के प्राइवेट प्रैक्टिस को सरकारी अस्पतालों के साथ जोड़ दिया। नतीजा..!.. डाक्टर सुबह से शाम तक अस्पताल में हैं। इसका फायदा गरीबों को भी मिल रहा है जिसके पास इलाज के लिए पैसा नहीं है, और अमीरों को भी मिल रहा जिनके पास डाक्टरों के प्राइवेट प्रैक्टिस के लायक पर्यात पैसा है। डाक्टर पैसा भी कमा रहा है, और ईमानदारी से। ..लेकिन यहां.. आप चाहते हैं कि डाक्टर लोग बेईमानी शैतानी करे और आपको पैसा दे!.. 

यानी आप चाहते हैं कि इंग्लैन्ड की वही प्रणाली यहां भी लागू हो.. क्या इससे स्वास्थ्य सेवा पूरी तरह सुधर जाएगी? 

क्येां नहीं। पूरे देश में यह व्यवस्था लागू हो। ..लेकिन, यहां आप चाहते हैं कि करप्शन को बढ़ावा मिले। एक और उदाहरण आपको देते हैं.. जैसे, यहां पोस्ट ग्रैजुएट एक्जामिनेशन ऑर्गानाइज किया जाता है। एमएस, एमडी के लिए एक्जाम लिया जाता है। पूरे देश में पंद्रह जगह एक्जामिनेशन होता है। विद्यार्थी दौड़ दौड़ उन जगहों पर जाते हैं। लड़की रही तो उसके गार्जियन दौड़ दौड़ कर परेशान होते हैं। इसके बाद भी जितने डॉक्टरों की जरूरत है आप पैदा नहीं कर पाते। उसके लिए प्राइवेट इंस्टिच्युशन पर निर्भर होते हैं.. जहां के बारे में सभी जानते हैं एक करोड़, पचास लाख वसूला जाता है। आप क्यों इस व्यवस्था को प्रश्रय देते हैं। इंग्लैन्ड का एक्जाम्प्ल देखिये!.. कोई प्रोस्ट ग्रैजुएट करना चाहता है.. भाई, ये सब, फलां फलां अस्पताल हैं जहां पीजी कर सकते हैं। आप आइये, फीस जमा कीजिए, इम्तेहान दीजिए। कड़ाई से इम्तेहान लेंगे! आप पास कीजिए तो प्रमाणपत्र मिलेगा। न कहीं पैरवी, न कोई कम्पिटिशन। और, वहां का पोस्ट ग्रैजुएट आपके पोस्ट ग्रैजुएट से अच्छा ही है। ..आप जानबूझकर ऐसा हिसाब किताब लगाये हुए हैं जिससे समाज का बड़ा तबका ‘कमाता’ रहे, बाकी लोग... जेनरल पब्लिक, तबाह होता रहे। 

झारखंड की ब्युरोक्रैसी को कैसे सुधारेंगे? 

ब्युरोक्रैसी तो घोड़ा है। वह सवार को देखता है। 

चौदह वर्षों के दौरान झारखंड में जो सरकारें बनीं, कौन सी सरकार को आप सबसे अच्छी सरकार मानते हैं? 

देखिये, मेरा काम किसी पर जजमेन्ट देना नहीं है। इस संबंध में मैं कुछ नहीं कहूंगा। सरकार से मेरा सीधा साबका बहुत कम पड़ा है। स्थानीय सरकारों के बारे में मैं कुछ नहीं कहूंगा। (रहस्यमयी हंसी के साथ..) अगर आप वास्तव में जवाब जानना चाहते हैं तो बस एक महीना रूक जाइये! 

आपका अनुभव क्या कहता है, इस विधानसभा चुनाव के बाद कौन सी पार्टी सरकार बना रही है?

लोगों और प्रेस मीडिया से पता चल रहा है कि दो ही पार्टियां मजबूत स्थिति में हैं, झारखंड मुक्ति मोरचा और भाजपा। बाकी तो नतीजा आने पर ही पता चलेगा।

(साक्षात्कार: किसलय)

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