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न्यूज विंग के जागरूक पाठक अपनी समस्या, अपने आस-पास हो रही अनियमितता की तस्वीर या कोई अन्य खबर फोटो के साथ वाहट्सएप नंबर - 8709221039 पर भेजे. हम उसे यहां प्रकाशित करेंगे.

डेढ़ दशक में जर्जर झारखंड : बदलेगा झारखंड़?

झारखंड राज्‍य के पूर्व मुख्‍य सचिव डा ए के सिंह ने 'न्‍यूज विंग' को झारखंड की व्‍यथा सुनायी

बात झारखंड की हो.. झारखंड के दर्द की, टूटन की और इसके लिए दोषी राजनेताओं, मंत्रियों, पदाधिकारियों के कारनामों की, तो मेरा दावा है कि ए के सिंह से बेहतर बेबाक और विशुद्ध समीक्षक शायद ही कोई झारखंड में हो। अक्सर एक सीनियर आइएएस से इंटरव्यू करना किसी पत्रकार के लिए सरल नहीं होता। प्रश्न  तैयार करने के लिए होमवर्क, शब्दावली का चयन, मुद्दों का पूर्व अध्ययन और उनसे मुखातिब होते वक्त हमेशा चाक चौबंद सवाल.. यानी एक चुनौती तो जरूर है। लेकिन, प्रसंग जब झारखंड के विकास का, संभावनाओं का, अबतक की बदहाली और दोषियों को चिन्हित करने का हो तो डा अशोक कुमार सिंह के सामने प्रश्ना रखने की जरूरत ही नहीं, वह स्वयं उत्तर देंते हैं, उद्धरण पेश करते हैं और प्रासंगिक सवाल भी खुद ही रखते चलते हैं। यानी आप बस उन्हें सुनिये और नोट करते चलिए। तो चलिए महज एक सवाल से शुरू करते हैं यह साक्षात्कार..

प्रश्नःभ झारखंड अपना 15वां स्थापना दिवस मना रहा है। यहां एक बार फिर विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। केंद्र में ‘दबंग’.. जबरदस्त बहुमत वाली.. मोदी सरकार बन चुकी है। राज्य में आनेवाली सरकार के लिए क्या संभावना देखते हैं आप?

ए के सिंहः झारखंड में कोई संभावना तभी हो सकती है जब आनेवाली सरकार अपनी नीतियों और अपने लक्ष्य के बारे में पूरी तरह स्पष्ट हो। झारखंड बनने के बाद से अबतक जो सरकारें बनी हैं.. वास्तविकता यह है कि उसके अधिकांश मंत्री निजी स्वार्थसिद्धि से आगे सोच ही नहीं पाये। सत्ता का नेतृत्व कर रही पार्टी के मंत्री हों या समर्थन करती गठबंधन पार्टियों के मंत्री, ऐब्सोल्युट ट्रूथ (परम सच्चाई) यह है कि हर व्यक्ति निजी स्वार्थसिद्धि.. धनोपार्जन में लगा रहा। राज्य का विकास, जो एजेंडा होना चाहिए था.. कभी बन नहीं पाया।

ब्लैकमेल होती सरकारें, भ्रष्ट अधिकारियों की मांग बढ़ी 

जो भी गठबंधन सहयोगी आये उन्होंने सरकार को ब्लैकमेल किया। ..और उस ब्लैकमेलिंग का मुख्य मकसद था कि हम ज्यादा से ज्यादा पैसे कैसे कमा पायें! इसके लिए उन्होंने जो तरीका अख्तियार किया.. राज्य में जो ‘इनएफिसिएन्ट’ (अक्षम) लेकिन ‘प्लायेब्ल’ (नमनशील) पदाधिकारी थे, उनकी मांग बढ़ गयी। ऐसे पदाधिकारी जिनके बारे में सभी लोग जानते थे कि पूरी तरह से भ्रष्ट हैं, किसी काम के नहीं हैं.. ऐसे पदाधिकारियों के लिए मंत्रियों में कम्पीटिशन होने लगा कि इनको हमें दे दीजिए, ताकि वे मनमाना काम कर सकें। इसलिए मैं कहता हूं कि वास्तविक विकास इस राज्य में कभी एजेंडा रहा ही नहीं। 

भ्रष्टाचार यहां ‘क्रीडो’ बन गया!

हां, मंत्रियों की ही क्या कहें, मुख्यमंत्रियों ने भी यही काम किया। अनेक मुख्यमंत्रियों ने केवल निजी एजेंडा पर काम किया, निजी धनोपार्जन के लिए काम किया.. तो ऐसे में राज्य की क्या स्थिति होगी?!.. और, पदाधिकारी तो देखता है कि सरकार के जो कर्ताधर्ता हैं.. जो उपर में बैठते हैं, वे क्या चाहते हैं। जैसी उसकी नीति हुई, उसी नीति का इन्होंने अनुसरण किया। ..वो कमा रहे हैं तो इन्होंने भी कमाना शुरू किया। एक स्थिति यह आ गयी थी कि प्रखंड विकास पदाधिकारियों को अपने प्रखंड में छह माह से अधिक रहने के लिए हर छह माह पर आकर राज्य सचिवालय में अपनी पीरियड को एक्सटेन्शन कराने के लिए पैसा देना पड़ता था। बाजप्ता, उन्हें बुलाया जाता था। यही स्थिति थी अभियंताओं की। ..तो राज्य में जो भ्रष्टाचार का माहौल फैला.. राजनीतिक अस्थिरता के कारण.. उसने पूरे राज्य को बर्बाद कर दिया। अभी मैं कुछ दिन पहले मुचकुन्द दुबे का इन्टरव्यू पढ़ रहा था.. उन्होंने सही कहा, इस राज्य को किसी ने डुबोया है तो वह है ‘रैम्पेन्ड कॉरप्शन’ (निरंकुश भ्रष्टाचार)! .. वह ‘क्रीडो’ (पन्थ/धर्मसार) हो गया इस राज्य में!.. और उसकी जड़ में थी राजनीतिक अस्थिरता। क्येांकि कोई मुख्यमंत्री अपने गठबंधन सहभागी को नाराज नहीं कर सकता था। अगर नाराज करता तो सरकार गिर जाती। जिसने भी थोड़ा ठीक होने की कोशिश की उसकी सरकार गिर गयी। और तब, कोएलिशन पार्टनर्स को छूट मिल गयी कि अपना लूटो! ..और हरेक व्यक्ति इसी काम में लग गया.. और दूसरी बात, जिन कार्यों में कोई पैसा नहीं था कोई उसमें काम नहीं करना चाहता था। 

सरकार में सिस्टम बनने नहीं दिया जाता, पद नीलाम किये गए 

राज्य में व्यवस्था.. सिस्टम कभी नहीं बनने दिया गया। मैं छोटा उदाहरण देना चाहूंगा.. 2001 से 2014 तक संघ लोक सेवा आयोग ने 14 परीक्षाएं लीं, रिक्रुटमेंट पॉलिसी के लिए। झारखंड में मात्र चार परीक्षाएं हुईं। इसमें से तीन को यहां खुलेआम नीलाम कर दिया गया। सारे पदों को नीलाम कर दिया। ..यह मामला न्यायालय में है.. मैं अभी बहुत कुछ नहीं कह सकता.. लेकिन आम धारणा है कि सारे पदों को बेच दिया गया.. चाहे वह डिपुटी कलक्टर का पद रहा हो, व्याख्याता का पद रहा हो। ..और यह आरोप गलत नहीं है। अभी देखिये, सबइंस्पेक्टर की नियुक्ति हुई राज्य सरकार में। और, यह राज्य सरकार का एफिडेविट है जो कहता है कि हां, हमने नियुक्ति में अनियमितता बरती। और, आपने जिन 42 सबइंस्पेक्टर को नौकरी दी थी, दो साल तक ट्रेनिंग दी थी.. नौकरी से निकाल दिया। मूल मुद्दा यह है कि इस तरह की अनियमितता करने का साहस किसी को क्यों हुआ? कैसे हुआ? इसने पूरी व्यवस्था को बर्बाद कर दिया। आपके पुल टूटे, चेक डैम टूटे, सड़कें टूटीं.. आपने जो कुछ बनाया, सब सत्यानाश हो गया। क्या इसे ही ऐसेट क्रिएशन कहते हैं? 

बदहाल सर्विस सेक्टर 

इसके अलावा सर्विस सेक्टर को देखिये.. यह यथार्थ है कि राज्य के सारे अस्पतालों में रिम्स से लेकर छोटे अस्पतालों तक, सारे डॉक्टर्स प्राइवेट प्रैक्टिस में लगे हुए हैं। आम आदमी कहां जाएगा! ..ये रोज निजी अस्पताल क्यों खुल रहे हैं? क्योंकि आपकी जेनरल हेल्थ सर्विस कोलैप्स हो गई है। क्यों कोलैप्स हो गई? ..आप एक तरफ उनको नॉनˆप्रैक्टिसिंग एलॉउएंस देते हैं और आप (सरकार) यह अच्छी तरह जानते हैं कि जिनको नॉनप्रैक्टिसिंग एलॉउएंस दिया जाता है शत प्रतिशत लोग प्रैक्टिस कर रहे हैं। आप दिल्ली चले जाइए, एम्स अस्पताल में.. वहां एक डाक्टर भी प्राइवेट प्रैक्टिस करता नहीं मिलेगा। बहुत दूर नहीं, पटना चले जाइये.. मैं दावे से कहता हूं कि वहां के एम्स में भी एक भी डाक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस करता नहीं मिलेगा। वहां के लोगों ने उस संस्कृति को विकसित किया जहां लोग प्राइवेट प्रैक्टिस करनेवालों से घृणा करते हैं। लेकिन यहां आपने प्रतिकूल परिस्थिति विकसित की कि प्राइवेट प्रैक्टिस करो! ..आलम यह है कि धनबाद में पोस्टेड डॉक्टर रांची में प्रैक्टिस करता है, हजारीबाग में प्रैक्टिस करता है। ..तो इस तरह हेल्थ सेवा आपकी चौपट हो गई। 

चलिए शिक्षा मे.. लार्ज स्केल ऐब्सेन्टिज्म ऑफ टीचर्स इज ए कॉमन फेनोमेना! स्कूलों में शिक्षक नहीं रहते हैं.. इसके लिए, बस ‘फीस’ दीजिए अपने डीएसई को और जहां चाहे गायब रहिए! ..तो जो सेवाएं हैं, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य उसको आपने नेस्तनाबूद कर दिया। क्यों नेस्तनाबूद कर दिया, क्योंकि हर चीज में आप पैसा कमाना चाहते हैं। आप डीएसई की पोस्टिंग में पैसा लेते हैं, वह नीचेवालों से लेता है.. आप सिविल सर्जन की पोस्टिंग में पैसा लेते हैं वह सिविल सर्जन नीचेवालों से लेता है। 

कहां है ग्रिवान्स रिड्रेसल? 

आप बात करते हैं नक्सलिज्म प्रॉब्लेम की.. उग्रवाद प्रॉब्लेम है.. आपका ग्रिवान्स रिड्रेसल मेकैनिज्म है कहां?!.. विश्विविद्यालय में न परीक्षा समय पर होती है, न बच्चों को पढ़ाया जाता है। आप अर्बन सेन्टर्स को छोड़ दें जैसे, रांची, हजारीबाग, देवघर जैसे डिस्ट्रिक्ट टाउन्स.. किसी भी रूरल कॉलेज में किसी भी टाइम चले जाइए, न क्लास होता है न पढ़ाई होती है.. और वहां हमारे सभी महान.. विद्वान.. व्याख्यातागण अनुपस्थित रहते हैं। मैं, शिक्षा सचिव की हैसियत से खुद गया था कई बार ग्रामीण इलाके के कॉलेजों में.. दिन में, पीक पीरियड में.. व्याख्याताओं को छोड़ दीजिए प्रिंसिपल तक नहीं रहते हैं। इसलिए, जो सेवाएं हैं.. उनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं स्वास्थ्य, शिक्षा.. वह ध्वस्त हो गईं। 

कैडर मैनेजमेंट जीरो! 

उसके बाद आप चलिए रिक्रुटमेन्ट पॉलिसी पर.. आपने कोई नियुक्ति नहीं की! जो हर वर्ष होनी चाहिए थी। जहां राज्य के युवा लगे रहें.. जेपीएससी की परीक्षा.. स्टाफ सेलेक्शन की परीक्षा..। अब देखिये, सन 2000 से 2014 तक में स्टाफ सेलेक्शन की मात्र एक परीक्षा हुई। ..तो आपका कैडर मैनेजमेंट जीरो हो गया। वन विभाग में कोई नियुक्ति नहीं हुई, जंगल कट रहे हैं, कोई देखनेवाला नहीं है। और सबसे दुर्भाग्य है कि जो सबसे भ्रष्ट है, जो सबसे नालायक है, उसको आपने प्रोमोट किया, तरजीह दी, उसको राज्य का शीर्षस्थ पदाधिकारी बना दिया। और, उसको ‘टेन्टरहूक’ (खूंटी) पर रखा कि जब चाहेंगे तुमको हटा देंगे! ऐसे में आप क्या उम्मीद करते हैं!.. मैं किसी का नाम लिए कह रहा हूं कि इस राज्य ने ईमानदारी के प्रति ‘इनटॉलरेन्स’ और बेईमानी के प्रति ‘एक्सेप्टेन्स’ का नजरिया स्थापित कर दिया है। यही यथार्थ है। भ्रष्ट

अधिकारियों की तूती बोलती है यहां 

अब ‘निट्टि ग्रिट्टि (nitty gritty /महत्वपूर्ण पहलू/सार) ऑफ डिटेल्स’ में आयें.. आपके राज्य में सिंचाई की सुविधा है अधिकतम 10 से 15 प्रतिशत! आप सेंटर स्पोंर्स्ड स्कीम की राशि, जो सेंटर से मिलनेवाली राशि है, 90 फीसदी कभी खर्च ही नहीं करते हैं। ..और किसी को चिंता नहीं है कि वह राशि खर्च क्यों नहीं हो रही है.. न मुख्यमंत्री को, न मुख्य सचिव को न किसी अन्य पदाधिकारी को। क्यों?.. आपने एक एक पदाधिकारी को चार चार पद दे दिया। और जो काबिल पदाधिकारी हैं उसको दरकिनार कर दिया। आपके राज्य का वित्त सचिव आज आपदा प्रबंधन विभाग में पड़ा हुआ है। कौन सा काम कर रहा है दस से पांच तक?! ..उसके पास कोई काम नहीं। इसलिए कि उसमें हिम्मत थी कि उसने कहा कि ‘यह गलत काम है, मैं इसमें आपके साथ नहीं रहूंगा’। आपने उसको ‘किक आउट’ कर दिया। आपके राज्य के मुख्यमंत्री का प्रधान सचिव, जिसे आपने चुनकर रखा था.. आपने खुद हटा दिया। क्योंकि, एक ऐसे पदाधिकारी को लाया गया जो आपके निजी स्वार्थ की योजनाओं में आपकी मदद कर सके, उसका ‘नाम’ सभी जानते हैं। राज्य का हर पदाधिकारी उसका दरबार लगाता है। ..मैं यह माहौल बता रहा हूं आपके राज्य की! ..मतलब, जो निष्ठावान है, जो ईमानदार है उसको दूर करो। 

चीप पॉपुलिज्म की राजनीति 

आप अपनी सड़कें देखिये, पुल देखिये.. बनते ही टूट जाती हैं। एक भी एक्जाम्पल दे दीजिए कि सड़कों के टूटने पर, पुल के गिरने पर किसी को दंडित किया गया हो! ..आपने विभागीय कार्रवाई प्रारंभ की और उनसे पैसा लेकर छोड़ दिया! होगा क्या.. आपने संदेश दे दिया कि पैसा देकर इस राज्य में कुछ भी करा सकते हो! ..इस माहौल में, जो ऐसेट फॉरमेशन हो सकता था, वह नहीं हुआ। ..आपने आजतक अपनी नई राजधानी नहीं बनायी। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी बनना शुरू हुआ क्योंकि माननीय उच्च न्यायालय ने उसमें अपना नजरिया स्पष्ट किया। लेकिन आपकी विधानसभा.. जिसके लिए आज आप चुनाव करा रहे हैं उसका भवन आजतक नहीं बना सके.. चूंकि मात्र एक या दो टुटपुंजिया एमएलए उसको अपोज (विरोध) कर रहे हैं। यह राज्य इतना कमजोर हो गया है कि अपनी विधानसभा (भवन) नहीं बना सकता! अगर आपको वहीं बनाना है जहां आप बैठ रहे हैं तो वहीं तोड़कर बना दीजिए। ..आपने कुछ नहीं किया क्योंकि आप ‘चीप पॉपुलिज्म’ (सस्ती लोकप्रियता) के फेरे में पड़े रहे। 

इन्टेलिजेंस गैदरिंग जीरो है यहां! 

इन्टेलिजेंस गैदरिंग पर बात कहना चाहेंगे.. सूचनातंत्र आज यहंा जीरो है। आपने अपने स्पेशल ब्रांच को, सीआईडी को.. सबको.. जो रिजेक्टेड अफसर हैं उनकी आश्रयणी बना दिया। किसी भी राज्य के लिए इन्टेलिजेंस गैदरिंग स्पेशियलाइज्ड सर्विस है। इसके लिए खास अफसरों को चुनना चाहिए, और उसे लंबे समय तक रखना चाहिए, तभी वह अपने कॉन्टैक्ट्स डेवेलॉप करते हैं। लेकिन, आपने ऐसा नहीं किया। 

विकास की कमिटियां महज झांसा

‘लैन्ड एक्युजिशन’ (भूमि अधिग्रहण) आपकी सबसे बड़ी समस्या है, आपने आजतक उसका निराकरण नहीं किया। रिहैबिलिटेशन (पुनर्वास) बड़ी समस्या है, आपने इसपर भी कुछ नहीं किया। हर समस्या का निदान है। ..आपने योजना व विकास के लिए परामर्शी का पद सृजित किया था, वह ऐसा अनुभवी आदमी हो जो पूरी चीजों को देखकर, नियमित समीक्षा करके सरकार को परामर्श दे। इसके लिए आप बॉम्बे से बुलाकार ले आये ऐसे ‘महानुभाव’ को जो कहते थे ‘एक रूपया’ वेतन लेंगे.. उन्होंने क्या प्रोड्युस किया, यह आप निर्णय लें! ..आपने पटना से भी एक निष्ठावान पदाधिकारी को लाया, इन्टरनल सिक्युरिटी का परामर्शी बनाकर.. उनकी क्या दुर्गति की, याद कीजिए!.. वे मजबूरन छोड़कर भाग गए! ..मतलब, आपकी जो मंशा है, उसमें खोट है! आपने कमिटी बनायी.. विवेक डेबरॉय, देवलीन भंडारी, विशाल सिंह.. उसने राज्य के विकास के लिए रिपोर्ट दिया, आपने उस रिपोर्ट को फाड़ कर फेंक दिया.. रद्दी की टोकड़ी में डाल दी। अबतक, 10 रिपोर्ट आ चुके हैं, झारखंड का विकास कैसे हो? लेकिन आपने एक भी एजेंडा पर काम नहीं किया। चूंकि आपकी नीयत नहीं है। आप मात्र झांसा देने के लिए, लोगों को ठगने के लिए ये सब कमिटियां बनाते हैं! अगर आपमें थोड़ी भी निष्ठा होती, कम से कम अपनी एक विधानसभा बिल्डिंग बना लेते। मध्यप्रदेश की राजधानी बन गयी, उसका राज्य सचिवालय बन गया। छत्तीसगढ़ में विकास हो गया, वह भी आप ही के साथ अलग राज्य बना था.. आपने कुछ नहीं किया! उत्तराखंड चले जाइये.. उतना डेवेलॉपमेंट नहीं हुआ है, लेकिन उतना भ्रष्टाचार भी नहीं है जितना आपके यहां है। 

झारखंड जब अलग हुआ था तो यहां का रिसोर्स निश्चिात रूप में बिहार से ज्यादा था, आज बिहार आपसे कोसों आगे है। चूंकि उसने अपने रिसोर्सेज को मोबिलाइज किया। उनके सेल्सटैक्स रेवेन्यु का ब्यॉन्सी (उछाल) देखिये, उनके एक्साइज का ब्यॉन्सी देखिये, उसकी सड़कें देखिये, पुल देखिये! आपके यहां क्या है? ..कुल मिलाकर मैं कहूंगा कि आपकी कभी निष्ठा रही ही नहीं इन विषयों में। 

सुधार संभव है बशर्ते.. 

अफसरों को टेन्युअर सिक्युरिटी मिले, टेन्टरहूक पर न रहें 

इसलिए अब, जो भी सरकार आये.. मैं कामना करूंगा कि मजबूत और स्थिर सरकार आये! जो बिलकुल क्लीयर हेडेड होकर काम करे। सबसे पहले, वह पदाधिकारी को सिक्युरिटी ऑफ टेन्युअर (कार्यकाल की सुरक्षा) दे। हर पदाधिकारी कम से कम दो साल और अधिकतम तीन साल एक विभाग में रहे, और किसी व्यक्ति या किसी स्थानीय दबाव पर हटाया नहीं जाए। अगर वह गलत कर रहा है तो आप वहीं उसे दंडित कीजिए, उसका सीआर खराब कीजिए, टेन्टरहूक पर मत रखिये। चीफ सेक्रेट्री से लेकर क्लर्क तक को आप टेन्टरहूक पर रखे हुए हैं अपने स्वार्थसिद्धि के लिए.. इट्स मस्ट स्टॉप्ड फर्स्ट! 

हर छह महीने में हिसाब दें मंत्री, अफसरों के सीआर लिखे जाएं 

उसी तरह मंत्रियों के लिए.. डेमोक्रैसी के तहत मिनिस्ट्री में एकाउन्टेबिलिटी की थ्योरी है। हर छह महीने में उनसे (मंत्रियों से) हिसाब लीजिए। सक्षम नहीं है तो उनकी जगह दूसरे लोगों को लाइये। वहीं से शुरू हेागी यह उत्तरदायित्व की भावना। एक और चीज है.. गोपनीय उक्ति (सीआर/कॉन्फिडेन्शियल रेकॉर्ड) का अभिलेखन.. अधिकारी इससे बड़ा कन्सर्न्ड रहता है। क्योंकि उसकी प्रोन्नत्ति उसपर निर्भर करती है। यहां इसको माखौल बना दिया गया है। सीआर एक महत्वपूर्ण टूल है, ब्युरोक्रैसी से काम लेने का। इसको बिल्कुल एफेक्टिव (प्रभावकारी) बनाना होगा, मुख्यमंत्री के स्तर पर और मंत्रियों के स्तर पर। 

क्वालिटी एश्युरेंस चाहिए तो कमीशनखोरी नहीं चलेगी! 

इसके बाद है, क्वालिटी एश्युरेंस (गुणवत्ता सुनिश्चरय)। आपकी जो क्वालिटी है हर चीज की, वह इतनी घटिया है.. आप घूमकर देख लीजिये जो अस्पताल बन रहे हैं या स्कूल बन रहे हैं.. क्या क्वालिटी है?! ..चूंकि कोई पदाधिकारी आपके राज्य में उसकी मॉनिटरिंग नहीं करता है। एक दृष्टांत देना चाहूंगा.. पाकुड़ में एक 14 किलोमीटर की सड़क बन गई। बनना था सिमेन्टेड, और बन गई बिटुमिनस (अलकतरा वाली)। और सभी पदाधिकारियों ने लिख दिया कि यह सड़क मानक और निर्देशों के अनुसार बनी है। वह तो, नबार्ड ने डिटेक्ट किया! - ‘हमने पैसा दिया था सिमेन्टेड सड़क के लिए, चूंकि घनी आबादी से सड़क गुजर रही थी’.. जबकि, जूनियर इंजीनियर से लेकर सुपरिनटेन्डिंग इंजीनियर तक ने लिख दिया कि ‘मेड ऐज पर प्लान’! क्यों हुआ ऐसा, यह सोचने की बात है। यह इसलिए हुआ क्योंकि कोई भी उस सड़क को देखने नहीं गया, सबने अपना कमीशन लिया और लिख दिया! और, जिस राज्य में कमीशनखोरी ही मुख्य धंधा बन जाए उसका विकास भगवान भी नहीं कर सकता है! 

सत्ताधारी दल का एजेंडा स्पष्ट हो 

राज्य की दुर्दशा के लिए मैं किसी खास पार्टी को दोष नहीं देना चाहूंगा, चाहे वह झारखंडनामधारी हों या बगैर झारखंड नामवाली पार्टी, सभी पार्टियों की जो सरकारें बनीं मिलीजुली ही बनीं। और, किसी भी सरकार में डेवेलॉपमेन्ट एजेंडा नहीं रहा है। यह मात्र कहने के लिए, लोगों को ठगने के लिए रहा है.. कॉमन मिनिमम प्रोग्राम हो अथवा लीप सर्विस टू द डाउनट्रोडेन.. आये दिन यहां डोमिसाइल की बात खड़ी हो जाती है! अरे जो सेट्ल (तय) करना है एक महीने में सेट्ल कर लीजिए कि आपको नियुक्ति कैसे करनी है। आप नियुक्ति करते ही नहीं! नियमित नियुक्ति होती रहे तो राज्य के युवा उसमें लगे रहेंगे। सिस्टम बनाइये, एकाउन्टिबिलिटी तय कीजिए। ..नक्सलिज्म इतनी बड़ी समस्या क्यों है कि आप उसको टैक्कल नहीं कर सकते हैं। हां सही है कि यह एक राष्ट्रीय समस्या है। लेकिन, आपने अबतक क्या किया है? इंटेलिजेन्स गैदरिंग की व्यवस्था खत्म कर दी। मैं चाहूंगा कि स्थिर सरकार बने, कैसे बनेगी यह मैं नहीं जानता! ..और कोई भी सरकार बने, अगर कोएलिशन की सरकार भी बने तो सबसे पहले सिस्टम को जगह पर लाये। ..और हर निर्णय पैसे लेने के उद्देश्य से नहीं हो.. अब, सायकिल की खरीद को लीजिए!.. आप इस पैसे को सीधा बेनिफिशियरी (लाभुकों) को क्यों नहीं ट्रान्सफर करते? आप खुद सायकिलें क्यों खरीदते हैं.. इसलिए कि उसमें आपको कमीशन मिले! ..जो चीजें सीधे हो सकती हैं, आप वह क्यों नहीं करते? ..जमीन के कागजातों का निबंधन!.. लोग लंबी लाईन लगाकर रजिस्ट्रार के यहां क्यों खड़े रहते हैं?! यह कामकाज आज ऑनलाईन क्यों नहीं हो रहा है? आप डिक्लेयर कर दीजिए कि इतना पैसा देना है। क्यों लाईन लगाकर खड़ा रहें? इसलिए कि रजिस्ट्रार को पैसा मिले! 

ऐसे अनेकों दृष्टांत दिये जा सकते हैं जिसकी व्यवस्था में परिवर्तन करके सुधार किया जा सकता है। विद्यार्थियों की परीक्षा का मामला.. आप क्यों नहीं कलेन्डर प्रकाशित करते कि फलां दिन परीक्षा होगी। और, उस तय तारीख को परीक्षा हर हाल में आयोजित की जाए। रिजल्ट की तारीख तय की जाए। नियुक्तियों का कलेन्डर क्यों नहीं निकाल देते?.. देखिये, आइएएस एकेडमी मसूड़ी में पिछले चालीस वर्षों से 15 जुलाई तक हर वर्ष नई कक्षाएं शुरू हो जाती हैं। 

प्राइवेट सेक्टर में बांटिये काम 

एक और बात, सरकार को फालतू कामों से दूर रहना चाहिए। जो काम निजी प्रयास से हो सकता है उसे यथासंभव प्राइवेट सेक्टर को हैन्डओवर कर देना चाहिए। एनजीओ को दे दीजिए। और, गवर्नमेन्ट उन चीजों पर ध्यान केंद्रीत करे जो ‘सॉवरेन (प्रभुसत्ताक/राजकीय काम काज) फंक्शन्स ऑफ द स्टेट’है, जिसमें कोई विकल्प नहीं हो। ‘फ्युु प्रायॉरिटीज बट कन्सन्ट्रेटेड प्रायॉरिटीज’ (चंद प्राथमिकताएं हों लेकिन बिल्कुल एकाग्रता के साथ)। ऐसा करके आप अपने राज्य को पांच साल में बिल्कुल नया रूप दे सकते हैं। यह जो सरकार आयी है केंद्र में, बिल्कुल सही दिशा में काम कर रही है। उसी अप्रोच से अपना नियमित एजेंडा बनाकर यहां सरकार काम करे.. और देख लीजिएगा, दो तीन साल में परिवर्तन नजर आयेगा। जैसे ही आपने सिस्टम सुनिश्चि त किया.. कलेन्डर से परीक्षा हो, सिपाही दारोगा की नियुक्तियां हो, एकाउन्टेबिलिटी हो, ट्रान्सफर का नियम बने.. नजरिया बदल जाएगा! अगर अफसर जान जाएंगे कि हमें तीन साल यहां रहना है, रिजल्ट देना है, और नहीं करेंगे तो हमारा सीआर खराब होगा.. तो वे काम करने को मजबूर होंगे!.. अधिकारियों को अपनी जगह पर रहने के लिए बाध्य कीजिए.. अगर बीडीओ हैं तो ब्लॉक में रहना है, सीओ हैं तो अंचल में रहना है.. उनको सुविधा दीजिए। उनको कष्ट में मत डालिए, आखिर वह भी इंसान हैं, उनकी भी अपनी समस्याएं.. और, यह सबकुछ हो सकता है। मेरा वही मानना है, फियुअर एजेंडा बट कन्सेन्ट्रेटेड एजेंडा। 

बंद कर दीजिए बिजली बोर्ड 

बिजली में आप ट्रान्समिशन और डिस्ट्रिब्युशन नेटवर्क को सुधारिये। यह झारखंड इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड, जो ‘मनी मेकिंग’ का सेंटर हो गया है, जिसका घाटा एक करोड़ से बढ़कर चार करोड़ हो गया है.. आप इसको बंद कर सकते हैं। उसमें अधिक से अधिक काम प्राइवेटाइज करके और कोर सेंटर्स में अपने को कन्सन्ट्रेट करके राज्य में परिवर्तन लाया जा सकता है। सारे कामों में प्राइवेटाइजेशन संभव है। जैसे रिम्स में.. अगर आपसे बहुत सारे लैब टेस्ट नहीं हो सकता है तो प्राइवेट सेक्टर को लाकर वहां रख दीजिए। मरीजों से कहिए, जाइये वहां टेस्ट कराकर आइये, वहीं पैसा दीजिए। कोई बहुत गरीब है तो उसके कॉस्ट को रिइम्बर्स कर दीजिए। लेकिन, बहुत सारे काम जो नहीं संभल सकते हैं उनको बांटिये। 

बंद हो सकता है प्राइवेट प्रैक्टिस 

रिम्स में डॉक्टरों का प्राइवेट प्रैक्टिस एक दिन में बंद हो सकता है। ठान लीजिए, आज से वहां कोई प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं करेगा। जो करता है उन्हें बुलाकर कहिए या तो वे प्रैक्टिस छोड़ें या वहां की नौकरी। उनकी जगह नए डॉक्टरों को लाइये। लेकिन, आपके यहां नया मेडिकल कॉलेज डेवेलॉप नहीं हो रहा है, जो हैं उनपर डिरिकॉग्निशन की तलवार लटक रही है, क्यों? आप सारी व्यवस्था को क्यों नहीं दुरूस्त कर सकते हैं? ..इसलिए कि आपने एक ही आदमी को हेल्थ सेक्रेट्री और कई पद दे दिया है। क्या जरूरत है? ..बाकी अधिकारियों को आपने किनारा कर दिया है। निष्ठा में खोट है आपकी! आप चीजों में बेहतरी चाहते ही नहीं, मूल बिन्दु यही है। 

परामर्श कोषांग शुरू करे सरकार 

कोई सरकार आवे, उसकी निष्ठा ठीक है तो उसे चाहिए कि वह समाज के विभिन्न वर्गों से परामर्श ले। मोदी जी ने अपना वेबसाइट खोल दिया है जिसपर कोई भी व्यक्ति अपना परामर्श दे सकता है। एक दृष्टांत सुनाता हूं.. 

मैं जेल का आइजी प्रिजन्स था। जमुई जेल का एक सिपाही मेरे पास आया और कहा कि हमको आपके साथ पंद्रह मिनट का टाइम चाहिए। मैंने सोचा, जेल का एक अदना सिपाही मेरे पास पहुंचा है, पंद्रह मिनट का समय मांग रहा है, मुझे सुनना चाहिए! उसने जेल की पूरी कहानी मुझे बतायी कि वहां कैसे चोरी और शोषण होता है, और उसको कैसे बंद किया जा सकता है। उसकी बातों में इतनी सच्चाई और व्यवहारिकता थी कि उसको हमने लागू किया। और सबसे पहले रांची से लागू किया। उसने कहा कि रांची जेल में जो दूध, अंडा, मछली, हॉर्लिक्स के नाम पर प्रिजनर्स डायट दिया जाता है वह सब झूठ है, जाली बिल बनता है। सबलोग लूटते हैं। आप बंद कर दीजिए सबको, और लिख दीजिए कि जिस प्रिजनर को देना हो उसका केस आईजी को रेफर करो, यहां से क्लीयरेंस देंगे तब मिलेगा। देखिये कल से यह जाली व्यापार बंद हो जाएगा। ..और, मैंने आदेश निकाल दिया। मैं बताउं कि आजतक वह आदेश लागू है, पूरे राज्य में, झारखंड बिहार दोनों में। ..तो उस एक व्यक्ति के परामर्श से मैं इतना अनुगृहीत हूं.. उसके प्रैक्टिकल विजडम से हमने बहुत सारे मौलिक परिवर्तन किये। इसलिए, जो भी नई सरकार आवे उसको एक ऐसा सेल (कोषांग) खोलना चाहिए जहां लोग हर बिंदु पर, सेल्स टैक्स, एक्साइज, शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि पर परामर्श दें। उन सुझावों की समीक्षा की जाए। और जो निष्कर्ष निकले उसको दृढ़ता से लागू कीजिए। जैसे मुझे अगर परामर्श देना हेागा तो मैं कहूंगा कि आप अधिकारियों को सिक्युरिटी ऑफ टेन्युअर दीजिए, ऐसेसमेन्ट के आधार पर बेस्ट लोगों को सही जगह पर बैठाइये, बेकार लोगों को हटाइये, और सबसे ज्यादा.. इस भ्रष्टाचार पर, सिस्टेमिक चेंज करके, नियंत्रण लाइये! ..रिम्स में पढ़ रहे हैं ‘रंजीत डॉन‘ के आदमी, जिन्होंने परीक्षा नहीं दी, उनके खिलाफ विजिलेंस की इन्क्वायरी को पांच साल तक लटका के रखने का क्या औचित्य है? यह पूरी की पूरी जांच पंद्रह दिनों में क्यों नहीं खत्म हो सकती है! इसलिए कि आपको उनसे पैसा मिल रहा है, जांच को लटकाने का? इस पूरी स्थिति को बदल सकता है राज्य का मात्र एक व्यक्ति, वह है मुख्यमंत्री, एबली असिस्टेड बाई ए कॉम्पिटेन्ट चीफ सेक्रेट्री ऐन्ड ए टीम ऑफ डेडिकेटेड मिनिस्टर्स। बस हमको यही कहना है।

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