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सायरा बानो को सलाम


मनोज कुमार

22 अगस्त 2017 को माननीय उच्चत्तम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया. पांच जजों के संविधान पीठ ने बहुमत (3-2) से यह निर्णय सुनाया कि ट्रिपल तलाक (एक ही बार में बोला व लिखा गया तीन तलाक) असंवैधानिक है, गैर इस्लामिक है. उत्तराखण्ड के काशीपुर की सायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में इस आधार पर याचिका दायर की थी कि ट्रिपल तलाक मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. महिला दो बच्चों की मां है, पुत्र 15 वर्ष का और पुत्री 13 वर्ष की. सन 2002 में इनकी शादी इलाहाबाद के करेली के रिजवान (प्रॉपर्टी डीलर) से हुयी थी. रिजवान ने सन 2015 में सायरा बानो को तलाक दे दिया था. सुल्तानपुर की अतिया साबरी, जोधपुर की आफरीन रहमान हावड़ा की इशरत जहां अौर रामपुर की गुलशन परवीन तलाकसुदा महिलायें भी याचिका दायर की थीं. 24 माह में 18 बार सुनवाई हुयी. गत मई में 11 मई से 18 मई तक लगातार सुनवाई हुयी थी और आज फैसला हमारे सामने है. विभिन्न धर्मों के पांच जजों से युक्त यह संविधान पीठ था. जस्टिस जगदीश सिंह खेहर, मुख्य न्यायधीश (सिख), जस्टिस कुरियन जोसफ (क्रिश्चियन), जस्टिस रोहिंग्टन फली नरीमन (पारसी), उदय उमेश ललित (हिन्दू) और जस्टिस अब्दुल नजीर (मुस्लिम) इस पीठ में थे. जस्टिस खेहर और जस्टिस नजीर ने इस प्रथा को असंवैधानिक नहीं माना. हां इसे गलत मानते हुए इस पर तत्काल प्रभाव से छह माह के लिए रोक लगा दिया और संसद को कानून बनाने को कहा, यह भी कहा कि छह माह में कानून नहीं बनता है तो रोक जारी रहेगा. वहीं जस्टिस कुरियन, जस्टिस नरीमन और जस्टिस ललित ने ट्रिपल तलाक को मौलिक अधिकार का उल्लंघन मानते हुए इसे असंवैधानिक घोषित किया. तीनों न्यायाधीश मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के इस तर्क को अस्वीकार कर दिए कि ट्रिपल तलाक 1400 साल पूरानी प्रथा है और आस्था का विषय है. इन्होंने यह भी कहा कि जब पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि देश इस प्रथा को निरस्त कर दिया है, तो भारत क्यों जारी रखे ? यह भी कहे कि ट्रिपल तलाक कुरान और शरिया से जुड़ा प्रथा नहीं है. यह एक ऐतिहासिक निर्णय है जो मुस्लिम महिलाओं को समानता का अधिकार सुनिश्चित करता है. यह निर्णय लैंगिक न्याय का मार्ग प्रशस्त करता है. यह प्रथा एक सामाजिक बुराई थी और परम्परागत रूप में यूं ही धर्म सम्मत भी हो गयी थी. यहां उल्लेखनीय है कि हिन्दू धर्म में भी सती प्रथा, बाल विवाह और विधवा विवाह निषेध एक समाजिक बुराई थी और कई लोगों को यह सब धर्म सम्मत लगता था, पर तत्कालीन सरकार प्रगतिशील लोगों के दवाब व अनुरोध पर इन कुप्रथाओं को निरस्त करने का काम की थी, ठीक उसी प्रकार आज माननीय न्यायालय ऐसा कर इतिहास रच दी. अंत में सायरा बानो आदि के हिम्मत व सूझ बुझ को सलाम.

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