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हॉलीवुड परिवारवाद नहीं, प्रतिभा का कद्रदान : कवि राज

प्रज्ञा कश्यप
नई दिल्ली, 30 जुलाई. भारतीय मूल के ब्रिटिश फिल्मकार कवि राज भारतीय कहानियों को हॉलीवुड के दर्शकों के बीच बड़ी सादगी से उतारते हैं और यही सादगी उनकी हालिया फिल्म 'द ब्लैक प्रिंस' में भी नजर आ रही है. भारतीय फिल्मों पर हावी राजनीति, परिवारवाद व सेंसर बोर्ड को लेकर निराशा जाहिर करते हुए कवि राज ने कहा कि हॉलीवुड में भी यह सब चीजें हैं, लेकिन बहुत कम। हॉलीवुड में परिवारवाद नहीं प्रतिभा की कद्र होती है.
हॉलीवुड फिल्म निर्माता, अभिनेता, निर्देशक और लेखक कवि राज ने खास दर्शकवर्ग और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित इस फिल्म को बहुत सहजता के साथ भारतीय व अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों के बीच उतारा है. मूल रूप से पंजाब से ताल्लुक रखने वाले कवि राज बहुत ही कम उम्र में ब्रिटेन चले गए थे, लेकिन उन्होंने विदेशी धरती पर देशी कहानियों का हमेशा प्रतिनिधित्व किया है.
दिल्ली में 'द ब्लैक प्रिंस' के प्रीमियर के दौरान उन्होंने पंजाब से ब्रिटेन और फिर हॉलीवुड तक के अपने सफर के बारे में आईएएनएस को एक खास बातचीत में बताया, "मैंने हॉलीवुड में अपने शुरुआती दिनों में वेंडरिंग प्लेयर्स थिएटर कंपनी स्थापित की थी. वहां उस समय फिल्म, टेलीविजन और यहां तक कि थियेटर में भारतीय कलाकारों के लिए भूमिकाएं नहीं होती थीं. एक अभिनय शिक्षक के सुझाव पर मैंने अपनी ही कंपनी स्थापित की और यहां भारतीय नाटकों का प्रदर्शन शुरू कर दिया. मैंने पहला नाटक रवींद्रनाथ टैगोर पर प्रस्तुत किया। मैं हाल के समय में थियेटर में बहुत अधिक सक्रिय नहीं हूं लेकिन उम्मीद करता हूं कि कुछ अच्छे विषयों के साथ जल्द वापसी करूंगा. मैं मानता हूं कि अच्छे नाटकों को लोगों के अनुभवों की आवाज बनना चाहिए."
'द ब्लैक प्रिंस' को बनाने का ख्याल कैसे आया? इस सवाल पर उन्होंने कहा, "मैं एक ऐसी कहानी को पेश करना चाहता था, जो न केवल महान हो बल्कि उद्देश्यपूर्ण भी हो. एक अभिनेता, लेखक और निर्देशक के रूप में मैं हमेशा इस प्रकार की सामग्री को प्रस्तुत करने के लिए उत्सुक रहता हूं, जिसका प्रमुख किरदार भावनाओं, भाग्य, सुख-दुख जैसी परिस्थियों को बखूबी पर्दे पर पेश करता हो. इससे मुझे एक स्टोरी टेलर के रूप में खुद के विकास के साथ-साथ व्यक्तिगत सुधार की दिशा में भी मदद मिलती है. और रही बात द ब्लैक प्रिंस की, तो मैं चाहता था कि लोग सिख साम्राज्य के आखिरी महाराज के बारे में जानें. उनका अधिकांश जीवन अपनी पहचान स्थापित करने, खुद को एक शक्तिशाली साम्राज्य का महाराजा मानने, और शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ एक युग की खोई हुई प्रतिष्ठा को दोबारा हासिल करने की लड़ाई में बीता. यही वजह है कि मैं चाहता था कि दलीप सिंह की कहानी से भारतीय के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय दर्शक भी रूबरू हो सकें."
भारत में इन दिनों सेंसर बोर्ड फिल्मों द्वारा फिल्मों पर रोक लगाने और उन पर कैंची चलाने की बात सामान्य है, जिससे कई बार फिल्मों पर बुरा प्रभाव पड़ता है, चूंकि आपकी फिल्म ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वास्तविक चरित्र पर आधारित है, क्या ऐसा कोई डर महसूस हुआ?
इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "फिल्म की पटकथा लिखने और उसके निर्माण के दौरान मेरे दिमाग में ऐसे फिल्म से संबंधित कई पहलुओं पर खयाल आया, जिस पर विवाद हो सकता था जैसे कोहिनूर, जिसे लेकर आज भी भ्रम की स्थिति है और महाराजा के धर्म परिवर्तन. लेकिन भारतीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने इसे बगैर किसी कट के पास कर दिया. ब्रिटेन, अमेरिका, न्यूजीलैंड जैसे कई देशों ने इसे पास कर दिया, खासकर पाकिस्तान में फिल्म रिलीज को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई गई. भाग्शवश हमें ऐसी किसी मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ा."

बॉलीवुड में इन दिनों परिवारवाद पर खूब बहस हो रही है, क्या हॉलीवुड में भी यह चीजें हावी हैं? इस पर कवि राज ने कहा, "भारतीय फिल्म उद्योग की तरह हॉलीवुड में भी राजनीति, परिवारवाद जैसी चीजों का दखल रहता है, लेकिन एक सीमा तक. वहां प्रतिभा की कद्र है और वहां प्रतिभा ही सबसे बड़ी चीज है. वहां कलाकारों के बीच प्रतिस्पर्धा होती है, लेकिन वहां के कलाकार आपको यहां के कलाकारों की तरह खेमे में बंटे नहीं मिलेंगे. वहां कलाकारों को काफी स्वतंत्रता है."

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