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संस्कृति कर्म, झारखंड और झारखंड से बाहर – कुछ अनुभव

|| महादेव टोप्पो ||
विद्वान एवं विशेषज्ञ मानते हैं कि हिन्दी प्रदेश साहित्य, संस्कृति और कला के मामलों पर कभी गंभीर नहीं रहे. एकमात्र मध्य प्रदेश में ही साहित्य संस्कृति के मुद्दों को लेकर गंभीरता दिखती है. जबकि उत्तर पूर्व के आदिवासी बहुल कहे जाने वाले अनेक राज्य भी इस मामले में हिन्दी प्रदेशों से ज्यादा जागरूक और संवेदनशील हैं. फलतः वे राज्यों में क्षेत्र विशेष की साहित्य, कला भाषा, संस्कृति के पक्ष में कुछ न कुछ करती दिखाई देती है.

कोहिमा में दिसंबर के प्रथम सप्ताह में विश्वविख्यात हॉर्नबिल मेला आयोजित किया जाता है. इसके लिए एक विशाल हेरिटेज विलेज का निर्माण स्थायी रुप से किया गया है, जहां न केवल हर ट्राइब के निवास स्थल के नमूने आदि बनाए गए है बल्कि नृत्य, नाटक आदि के कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए मंच भी निर्मित्त हैं. इसके अलावा विविध नगा भोजन, वेशभूषा आदि को बहुत ही गरिमापूर्ण ढंग प्रस्तुत करने की व्यवस्था भी है. नॉर्थ ईस्ट के प्रायः हर छोटे बड़े सरकारी या गैर सरकारी आयोजनों में देशज खान पान विशेष ऱुप से प्रदर्शित करने की आकर्षक व्यवस्था की जाती है. यहां पारंपरिक पेय से लेकर आधुनिक भोजन तक उपलब्ध होते हैं. इसी तरह गुवाहाटी में शंकरदेव कला क्षेत्र है जहां पूर्वोत्तर के समस्त एथनिक समुदाय द्वारा प्रयुक्त वेश भूषा, वाद्य यंत्र, जीने के लिए जरूरी साज सामानों के नमूने संग्रहित हैं. इसे देखने के लिए न केवल बाहर से बल्कि स्थानीय लोग भी आते रहते हैं. “डॉ.भूपेन हाजारिका संग्रहालय” इस कला क्षेत्र का एक और आकर्षक केन्द्र बन गया है. इस संग्रहालय में डॉ. हाजारिका द्वारा प्रयुक्त वस्तुओं के अलावा प्राप्त पुरस्कार, ट्रॉफी आदि का गौरवशाली संग्रह है. ग्वालपाड़ा में दिसंबर महीने में शाल वृक्षों के बीच निर्मित खुले मंच में आयोजित नाट्य समारोह को देखना एक अदभुत अनुभव है.

हाल ही में रांची में “झारखंड सरकार” के सहयोग से “झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा” ने तीन दिवसीय दलित आदिवासी नाट्य समारोह एवं सेमिनार का आयोजन किया. जहां मणिपुर, राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली एवं तमिलनाडु की नाट्य मंडलियों ने भाग लिया. मुख्यमंत्री जी ने इस आयोजन का नगाड़ा बजाकर उदघाटन किया और घोषणा की कि हर जिले में थियेटर का निर्माण होगा. मुख्यमंत्री जी इसके लिए बधाई एवं धन्यवाद के पात्र हैं कि कम से कम उन्होंने या उनकी सरकार ने झारखंड में साहित्य, संस्कृति, कला आदि के विकास के लिए कुछ तो सोचा. निश्चय ही इस आयोजन से हिन्दी प्रदेशों में और खासकर झाऱखंड में साहित्य, संस्कृति और कला कर्म को आगे बढ़ाने में एक माहौल बन सकता है.

पूर्वोत्तर का एक और उदाहरण - कुछ दिनों पहले आसाम सरकार ने एक सौ कलाकारों को प्रतिवर्ष फैलोशिप देने की घोषणा की. अंतर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व पद्मश्री रामदयाल मुण्डा जी के संस्कृति कर्म का सम्मान करते उनकी याद में कुछ ऐसा किया जा सकता है जिससे झारखंड के साहित्य, संस्कृति, कला को बढ़ावा मिले. उक्त नाटक समारोह के पहले दिन “जेवियर समाज सेवा संस्थान प्रेक्षागृह” से जब लोग रात के दस बजे तमिल नाटक देखकर हॉल से यह कहते हुए निकले कि – “नाटक देखने के लिए तमिल को समझने की जरूरत नहीं है” या अगले दिन मणिपुरी नाटक देखकर लोग कहें – “अरे! यह तो हमारी कहानी है” तो इसकी उपयोगिता स्वयंसिद्ध है. ऐसे प्रयासों से राष्ट्रीय संस्कृति के अलग रंग देखने को मिलेंगे ही. लोग एक दूसरी की समस्याओं को समझने में संवेदनशील भी बन सकते हैं. साथ ही झारखंड राज्य की संस्कृति, भाषा, कला आदि की विशिष्टता, विविधता को भी नई पहचान और दिशा दी जा सकती है.

हमारे झारखंडी फिल्मकारों एवं खिलाड़ियों की तरह जब उनके कार्यों को भी राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय सम्मान मिलेगा तो निश्चय ही हर झारखंडवासी उन पर गर्व करेगा. आशा है, सरकार इस ओर, और ध्यान देगी तथा जनता, मीडिया, कलाकार, संस्कृतिप्रेमी एवं युवा - भविष्य में इसके लिए, एक दूसरे का ध्यान रखते, आपसी सहयोग, समझदारी, उत्साह एवं संवाद बनाए रखेंगे. कला, साहित्य आदि के क्षेत्र में छिपे विजेता धोनी जैसे - प्रतिभाओं को अवसर देना, प्रोत्साहन देना, सम्मान देना सरकार एवं जनता दोनों का कर्त्तव्य है. क्योंकि एक राज्य का गौरव - कला, साहित्य एवं अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों हेतु कृत प्रयासों से भी बढ़ता है.

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