Skip to content Skip to navigation

मीडिया बदनाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए..

|| किसलय ||
दरअसल, यह पूरा मामला युवा पत्रकारों की साख का है. कैसे भूल सकते हैं कि कल तक पत्रकारिता की चर्चा पर ये चेहरे ही यूथ आइकॉन्स के रूप में छपते रहे. ऊर्जावान, बेदाग, दुस्साहसी. कितने ही मिडिल क्लास, अपर क्लास घरों से किशोरियों-युवतियों ने बरखा दत्त को टीवी पर देख पत्रकारिता को अपना करियर चुना. वीर संघवी आज पेशे की जिस दहलीज पर हों, युवा भूलते नहीं कि उन्होंने 22 की उम्र में इंडिया टुडे जैसी नेशनल वीकली के एडिटर का पद बखूबी संभाला. लेकिन आज, 2जी स्पेक्ट्रम मामले में फंसे इन दो नामों पर मंथन की बजाय नीरा राडिया सेंटर प्वाइंट बनी हुई हैं. हम क्यों भूल जाते हैं कि नीरा राडिया ने जो किया, जो कर रही हैं, यह उनका पेशा है.

ग्लोबल इकोनॉमी के इस एरा में शामिल हमारे देश ने भी ऐसी दलाली को इंस्टीच्‍युस्नलाइज्ड प्रोफेशन के रूप में स्वीकार लिया है. कई नाम दिये गये, फिक्सर से लेकर मीडिया मैनेजमेंट, ब्रान्ड प्रोमोशन, कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी आदि-आदि. जाहिर है, अपने क्लायन्‍ट के हित में काम करने के नाम पर राडिया बच निकलेंगी. वैल्युज, इथिक्स अथवा कानूनी तौर पर न सही, व्यवसायधर्मिता के नाम पर ही सही. इससे बडा खतरा तो यह है कि बरखा-वीर के नाम पर प्रेस-मीडिया जिस तरह जुबान दबा कर खुसुर-फुसूर कर रहा है, पूरा प्रोजेक्शन तो ’मीडिया मैनेजर’ नीरा राडिया को मिल रहा है, नेगेटिव ही सही. खूब ब्रान्डिंग हो रही है उसकी, खास कर जब आज के युवाओं के लकदक-करियर रूझान को देखें.

बरखा दत्त और वीर संघवी, दोनों स्थापित और बडे नाम रहे हैं. उनके सपोर्टर्स और प्रोमोटर्स दमखम वाले हैं. लेकिन उन वेलविशर्स की यह प्रभावोत्पादक चुप्पी उनको शील्ड करने की बजाय शैडी अवस्था में अधिक लिये जा रही है. बात पत्रकार कुनबे भर की नहीं. इस प्रकरण से व्यापक भारतीय युवा समाज को जा रहे संदेश के खतरे को महसूस कीजिए . कंज्युमरिज्म के मायाजाल में फंसता युवा आखिर क्यों शैडी होती पत्रकारिता को चुनेगा, जबकि उसके सामने मैस्मराइजिंग ’राडिया ट्रेन्‍ड’ हो. पूरी क्लीयरिटी के साथ, बिल्कुल स्पष्ट. रातों-रात करोडों-अरबों में खेलनेवाला, सत्ता के गलियारे में सहज प्रभुत्व जमा लेने वाला ट्रिकी ट्रेन्‍ड. इसलिए, दो टूक कहें: हमें राडिया कंपनी की ऐग्रेसिव मार्केटिंग की बजाये, बरखा-वीर की पत्रकारीय भूमिका और स्थिति पर गंभीर समीक्षा करनी चाहिए, लॉजिकल एंड तक. बात केवल उनके पक्ष रखने की नहीं है, वरिष्ठ अनुभवी पत्रकारों को चाहिए कि वर्तमान हालात, पत्रकारिता के इस नये फलक, कॉरपोरेट जर्नलिज्म कल्चर, में खुद को रख कर उन दोनों पत्रकारों की अब तक भूमिका पर मंथन करें. किसी निष्कर्ष से पहले खुली बहस होनी चाहिए.

इस नए कॉरपोरेट जगत की व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता की रेस में एक से बढ कर एक हथकंडे अपनाये जा रहे हैं. व्यावसायिक घराने अब खुद का पब्लिक रिलेशंस डिपार्टमेंट पाले रखने के झमेले में नहीं पडते. ब्रांडिंग के नाम पर आउटसोर्सिंग का जबरदस्त गोरखधंधा शुरू हुआ है. कंपनियों को इससे दो फायदे हैं. सफेद हाथी बनते पीआर डिपार्टमेंट से मुक्ति, और दूसरा, वैध-अवैध लेने-देन-समझौतों में अपनी नाक बचाते हुए इन ब्रांडिंग ’हुनरमंद’ ठेकेदारों को आगे कर दिया जाना. मामला फंसा तो कंपनी अपने पल्ले झाड लेती है, जैसा 2जी स्कैंडल में दिखने लगा है और आगे कर दिये जाते हैं ये ’हुनरमंद’. अब जाहिर है, ये बिचौलिये ’हुनरमंद’ दाम भी वसूलते हैं. सौदा खरबों का हो तो कमीशन करोडों-अरबों में पहुंच जाता है. अब एक लाइन में इन हुनरमंदों की मोडस-ऑपरेंडी को देखें- बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा!.. के तर्ज पर बिना पूंजी लगाये करोडों की कमाई!.. सोशल-मॉरल वैल्युज के मायने बदल जाते हैं..! जाहिर है, कॉरपोरेट-बीट जर्नलिस्ट को इसी काजल की कोठरी से गुजरना होता है. जितना बडा नाम उतनी अधिक अपेक्षाएं, पाठक से लेकर संपादक तक की. फर्ज कीजिए किसी व्हाइट कॉलर धुरंधर से कुछ उगलवाना हो.. जुडिशियरी के पास कानून का हथौडा है, तो जांच एजेंसियों के पास थर्ड डिग्री तक का विकल्प, लेकिन पत्रकार के पास एक कलम के अलावा कुछ है, तो वह है उसकी जुबान. वह भी कडवी.. नहीं चलेगी!.. और बोली की चाशनी, प्रकाश की किरणें तो हैं नहीं जो सीधी रेखा में गमन करें, दाएं-बायें पसरेगी भी. ऐसे में, महज कुछ रिकॉर्डेड टेप क्या उसकी दशकों के किये-कराये पर पानी फेर देंगे!

हालांकि, सिक्के का दूसरा पहलू प्रभुत्व वर्ग के साथ पत्र्ाकारों के प्रत्यक्ष घालमेल की एक अलग ही धुंधली तसवीर पेश कर रहा है. माना कि काजल की कोठरी में दाग लगते हैं, लेकिन शंका तो बलवती हुई उसके गहराने पर. समय रहते सफाई क्यों नहीं? ये अनुभवी पत्रकार हैं. सूचना स्रोत जब इतना दागी है, तो एक प्रत्यक्ष दूरी बनाये रखने का मेकनिज्म तो आता ही होगा. माना कि खादी का कुरता और कंधे पर झोला वाली पत्रकारिता कॉरपोरेट जर्नलिज्म में कठिन है, फिर भी पत्रकारिता की कुछ शाश्वत वर्जनाएं रहन-सहन, उठ-बैठ में अंतर की तसदीक करती रही हैं. फिर, नीरा राडिया के हमकदम क्यों बन गये?

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने ठीक ही कहा है, पूरे मामले को प्रेस कॉउंसिल ले जाना चाहिए. एडिटर्स गिल्ड को भी पहल करनी चाहिए. कम से कम, खुली पारदर्शी बहस की तो पूरी गुंजाइश है. नीरा राडिया को तो सरकारी एजेंसियां जांच लेंगी. मॉनिटरिंग भर की जरूरत है. उस पर केंद्रित होने की बजाय जरूरी है कि प्रेस मीडिया खुद के इस गंभीर संकट से दो-दो हाथ करे. ऐन वक्त, सबसे अहम है पत्रकारिता की साख का सवाल. मौका और दस्तूर कहता है, हमारी पत्रकारिता को एक पुनरीक्षण की जरूरत है. इस पेशे में जुडते नये-नये आयाम, नयी-नयी तकनीक, बदलती जीवनशैली को मद्देनजर जरूरी है कि पारंपरिक मानदंड और वर्जनाओं का भी पुनरवलोकन हो.

(साभार : प्रभात खबर)

Share

Add new comment

UTTAR PRADESH

News WingGajipur, 21 October : उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में मोटरसाइकिल पर आए हमलावरों ने राष्ट्रीय स्...
News Wing Uttar Pradesh, 20 October: धनारी थानाक्षेत्र में पुलिस के साथ मुठभेड़ में एक इनामी बदमाश औ...
Website Designed Developed & Maintained by   © NEWSWING | Contact Us