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झारखंड की जनता को आपसे नहीं रही ‘आस‘ दास जी

Mrityunjay Srivastava

प्रदेश की जनता बेहाल है और सरकार यह बताने में व्यस्त है कि 1000 दिन में इस सरकार ने प्रदेश में रामराज ला दिया है. कम से कम होर्डिंग्स और पोस्टर से पटे राज्य की राजधानी को देखकर तो यही लगता है. रघुवर सरकार 1000 दिन की उपलब्धियों का जश्न मना रही है. सरकार के सभी मंत्री प्रदेश भर में घूम-घूम कर जनता को अपने कामों का ब्योरा दे रहे हैं. जगह-जगह जाकर अपने किये कामों का बखान कर रहे हैं. बेबस जनता सुन भी रही है और पूरी राजधानी में पोस्टर से पटे विज्ञापनों को मजबूरी में देख भी रही है.

‘‘बदहाल‘‘ हो चुके एमजीएम अस्पताल में भर्ती मरीज और उनके परिजन बेहाल

एक विज्ञापन जो हर चौक-चौराहे पर चमक-धमक के साथ दिखता है वह है ‘‘-झारखंड की आस रघुवर दास ,‘‘ लेकिन मुख्यमंत्री के खुद के गृहक्षेत्र में एमजीएम अस्पताल का जो हाल है उसको देखकर कोई नहीं कहेगा कि वह जनता की आस हैं. ‘‘बदहाल‘‘ हो चुके एमजीएम अस्पताल में भर्ती मरीज और उनके परिजन बेहाल हैं.

डॉक्टर और कर्मचारी भी परेशान, पहले पानी देखें या मरीज

एक जोरदार बारिश से पूरे अस्पताल परिसर में लबालब पानी भरा गया. अस्पताल में हो रहे बदइलाज से मरीज तो पहले से ही परेशान थे, अब इस पानी ने उन्हें और भी परेशान कर दिया है. सड़क और नाले का पानी अस्पताल में घुसकर गंदगी फैला रहा है. ड्रेनेज सिस्टम बंद होने से इमरजेंसी और प्रशासनिक भवन पानी-पानी हो गया है. यही नहीं डॉक्टरों के ड्यूटी रूम और स्टोर रूम में भी पानी भर गया है. मरीज का सबकुछ अब बेड पर ही हो रहा है.

व्यवस्था पहले से और बदतर हो गयी है तो कैसा जश्न मना रही है सरकार

ऐसा नहीं है कि यह पहली घटना है. मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र जमशेदपुर का एमजीएम अस्पताल हर तरह की बदहाली से जुझ रहा है. सीएम के इलाके में इस तरह की व्यवस्था ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं. लोग कह रहे हैं जब राज्य के स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्था पहले से और बदतर हो गयी है तो कैसा जश्न मना रही है सरकार. प्रदेश में सबका साथ तो मिल रहा है लेकिन सबका विकास नहीं हो पा रहा.

सरकार की उपलब्ध्यिों से भरे पोस्टर और होर्डिंग मुंह चिढ़ा रहे

प्रदेश की जनता को राजधानी में लगे होर्डिंग और पोस्टर मुंह चिढ़ा रहे हैं. उनके सामने एक विकट समस्या है कि वह सरकार के किये कामों को कहां तलाशें. एक तो जनता बेहाल है उपर से ऐसा कुछ हुआ भी नहीं जिसे देखकर जनता खुश हो सके और सरकार की उपलब्धियों की साझीदार बने.

मासूमों की मौत का जिक्र भी करेंगे स्वास्थ्य मंत्री ?

मीलों दूर से जब वह अपने बीमार परिजनों का इलाज कराने राज्य के बड़े अस्पताल में आते हैं तो निराशा ही हाथ लगती है. कभी पैसों की कमी की वजह से बिना इलाज के, कभी डॉक्टरों की लापरवाही से तो कभी अस्पताल की बदइंतजामी के कारण अपनों की लाश लेकर घर लौटते हैं.

रिम्स से लेकर एमजीएम में हाल के दिनों में 200 से ज्यादा बच्चों की मौत के बाद भी न तो सरकार ने कोई ठोस कार्रवाई की और ना ही अस्पतालों की व्यवस्था सुधारने की पहल हुई. सरकार का ध्यान इस ओर खींचने के प्रयास के बावजूद सरकार ने अपनी आखें मूंद ली. विपक्ष मामले को लेकर सड़क पर है. बड़ा सवाल यह है कि स्वास्थ्य व्यवस्था के संवेदनशील मामलों के बावजूद भी स्वास्थ्य मंत्री को क्यों नहीं कटघरे में खड़ा किया जाता. क्या सरकार के 1000 दिनों की उपलब्धियों को जनता के बीच रखते समय वह मासूमों की मौत का जिक्र भी करेंगे?



महालेखाकार ने तीन वर्ष पहले जो रिपोर्ट दी थी स्थिति कोमोबेश अभी तक वही

देश की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय पोषण संस्थान हैदराबाद के द्वारा राज्य की महिलाओं और बच्चों की स्वास्थ्य संबंधी दयनीय स्थिति पहले ही उजागर कर चुकी है. इन सबके बीच सरकार लगातार यह दावा करने से नहीं चूक रही कि स्वास्थ्य चिकित्सा के क्षेत्र में व्यापक सुधार हुआ है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर आंगनबाड़ी केंद्रों की बदहाल स्थिति पर महालेखाकार ने तीन वर्ष पहले जो रिपोर्ट दी थी स्थिति कोमोबेश अभीतक वही है.

मुख्यमंत्री जी बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराना भी जरूरी

स्वास्थ्य सुविधा देना उतना ही जरूरी है जितना धर्म परिवर्तन नहीं करने का कानून लाना. मुख्यमंत्री रघुवर दास राज्य के आदिवासियों को हर सुविधा देने की बात तो करते हैं. लेकिन यह भूल जाते हैं कि उन्हें बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराना भी उतना ही जरूरी है, जितना उनके धर्म परिवर्तन न करने की हिमायत करना. दूर दराज के अधिकतर गांवों में चिकित्सा की कोई व्यवस्था नहीं है.

आज भी लोग झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे अपनी जिंदगी बचाने की कोशिश कर रहे हैं. न तो बिजली, न पीने का शुद्ध पानी और न ही स्कूलों में बेहतर शिक्षा. ऐसे में सरकारी योजनाओं की भारी भरकम बातें न तो लोग समझ पाते हैं और ना ही देख पाते हैं. सरकार की बड़ी-बड़ी योजनाएं शायद ही जमीनी स्तर पर उनके लिए कारगर सिद्ध हो पाती हैं. 1000 दिन का जश्न मनाने के लिए राज्य की जनता के पास कोई आधार नहीं है. स्थिति सबके सामने है बावजूद इसके लोगबाग हजार दिनों के हजार अफसाने गाने में बीजी हैं.

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